मानव…. तू अपना निज-स्वरूप पहचान

– Pujya Asharam Bapu ji Dehradun 9th June’ 2013 Part 1

                
                “ॐ दुर्जनों सज्जनोंभूयात, सज्जनो शान्तिमुप्न्यात ।  
               
शान्तोमुचेत बंधेभ्योमुक्तश्चअन्योविमोच्ययेत  ।।
            
वेद-भगवान ये कैसी सुंदर प्रार्थना सिखाते हैं कि दुर्जन के प्रति भी नफरत मत करो| दुर्जन की गहराई में भी परमात्म-चेतना है। हे भगवान, दुर्जन सज्जन हों, लेकिन सज्जन होकर भी रुकें नहीं| सज्जन को भी शांती की प्राप्ती हो जाए, लेकिन शांत भी वहां रुकेगा तो प्रकृति के राज्य में रह जायेगा, शांत-मुक्तबंधन हो जाए। शान्ति प्राप्त करे, लेकिन शांती भी है तो माया के राज्य में, इसलिए माया के राज्य से भी शांत-आत्मा मुक्त हो जाए, ब्रह्म-ज्ञान पा ले और ब्रह्म-ज्ञान पाकर घर-गृहस्थी में अथवा अकेले किसी गिरी-गुफा में बैठे नहीं अपितु ब्रहमज्ञानी मुक्तात्मा दूसरों को भी मुक्त कर दे कितना ऊंचा विचार है ।
      

          बंधन किसी को प्रिय नहीं हैं । आप घर में कुंडा लगा के बैठते हैं तो अपनी मर्जी से…. लेकिन अगर किसी ने आ कर कुंडा मार के बंद कर दिया है तो पसंद नहीं करते, बंधन लगता हैं । कहेंगे- हम हमारी मर्जी से कुंडा बंद कर के बैठें, अलग बात है, हमारी मर्जी…. तेरे बाप का क्या जाता है ? हम कोई चोर है क्या, कोई डकैत हैं क्या ? लेकिन अगर हम मेहमान हो के आये और तुम बाहर से कुंडा बंद कर दो तो हम तुम्हारे घर में रहना ही पसंद नहीं करेंगे । आप मन में ऐसा सोचने लगेंगे, क्योकि बंधन आप नहीं चाहते । आपका असली स्वभाव बंधन रहित है । आप मुक्तात्मा की अमृतमय संतान हो । आप चैतन्यस्वरूप आत्मा, ज्ञानस्वरूप आत्मा, निर्लेप-आत्मा की अमृतमय संतान हो ।
       

        जो जिसका पूत-सपूत होता है, उसका स्वभाव भी उसी पर जाता है । अर्जुन ने कहा,  “ मैं युद्ध नहीं करूँगा ।” भगवान हँसे कि “ छोड़…. डरपोक, युद्ध नहीं करेगा..? सब अपने अपने स्वभाव के अनुसार अपने कर्म की और खिंच जाते हैं । तेरा क्षत्रिय स्वभाव है…… आततायी, अत्याचारी अन्याय करे और तू चुप बैठा रहे… लाक्षागृह में जलाने का कार्य हुआ, द्रौपदी को नग्न करने का कार्य हुआ…. अब सामने युद्ध करने का समय आया तो….. मैं साधू बन जाऊँगा, ऊपर ऊपर से बोलता है । साधू बनने का वैराग्य होता तो पहले बनता । मैं युद्ध नहीं करूंगा, भिक्षा मांग के खाऊंगा…. रहने दे, रहने दे….” जिसका जो स्वभाव होता है न उससे वो कार्य सहज में ही हो जाता है ।
           

    एक चुटकला है कि कोई फौजी इच्छापूर्वक सेवानिवृत हो गया । अब घर में रहता था तो घर का सामान तो लेने जाना ही पड़ता था । पंजाबी था, शायद सरदार होगा.. बड़ा कटोरा दही का ले के जा रहा था । किसी को मजाक सूझा और जोर से बोला, “ अटेंशन…”, उसने कटोरा एकदम छोड़ दिया और अटेंशन हो गया । वह उसका स्वाभाविक कर्म था । ऐसे ही सबका अपना स्वभाव होता है । पहलवान चाहे रिटायर हो जाए, कुश्ती खेलेगा.. नहीं तो देखेगा जरूर । अपने अपने स्वभाव के अनुसार सबकी आदत होती है, तो आपका असली स्वभाव क्या है ? आपका असली स्वभाव सुख-स्वरूप आत्मा है, इसलिए आप सुख की तरफ आकर्षित होते हो, सुखद अवस्था की तरफ आप खिंच कर जाते हो । जैसे अटेंशन सुनते ही उसका दही का कटोरा छूट गया और वो अटेंशन हो गया ऐसे ही आप जहाँ भी सुख देखते हैं, झुक जाते हैं ।
               

आपका सुख-स्वभाव है, चेतन स्वभाव है । मरना पसंद नहीं करते, जड़ता पसंद नहीं करते, दुःख आप पसंद नहीं करते आपका असली स्वभाव सत्, चित्त और आनन्द स्वरूप है । शिवजी ने बहुत सुंदर, सही और सारभूत बात कही है पार्वती को… पार्वती तो निमित्तमात्र है, कही है बात हम लोगों को …
            “उमा, राम-स्वभाव जेहि जाना, ताहि भजन-तजि भाव न आना”
            जो रोम रोम में चैतन्य-आत्मा रम रहा है, उस राम का स्वभाव जिसने जाना उसका भजन छोड़कर किसी भाव में, किसी परिस्थिति में, किसी अवस्था में उसके भजन के बिना वो रुक नहीं सकता । भजन किस को बोलते हैं ? किम लक्षणं भजनम ? क्या राग-रागिनी गाना, उसको भजन बोलते हैं ? गीत और कवालियाँ गाना, उसको भजन बोलते हैं ? माला घुमाना उसको भजन बोलते हैं ? जटाजूट करने को भजन बोलते हैं ? अथवा घर गृहस्थी में चिपक चिपक कर जीवन भोगना, उसको भजन बोलते हैं – नहीं… किम लक्षणं भजनम? रसनं लक्षणं भजनं । भगवद-रस जिससे आये उसको बोलते हैं भजन । 
               

शबरी भीलन गुरुद्वार पर झाडू-बुहारी लगाती है, भजन हो जाता है । मीरा पद गाती है, गीत गाती है, सत्संग सुनती है-सुनाती है, रैदास के चरणों में जाती है । संकरी गली में रैदास जा रहे थे और मीरा मिली, मीरा ने प्रणाम किया । रैदास तो चमार जाती के थे और मीरा तो क्षत्रिय जाती की थी, महारानी.. पटरानी । विक्रम राणा ने मीरा को कहा कि मीरा, ये तू क्या करती है ? दो-चार बच्चे हो जाएँ और फिर तू साधू बाबा से मिले तो कोई बात नहीं, पर अभी तू युवती है और साधू बाबा से संकरी गली में खड़ी होकर बाते करती है तो लोग कुछ का कुछ बोलते हैं । मीरा ने कहा कि जेठ जी, मेरे दिल की बात सुनो… राणाजी म्हाने या बदनामी लागे मीठी (मेरे को ये बदनामी मीठी लगती है) । मेरी कोई निंदा करता है अच्छा लगता है, मेरे को गुरु से जो सुख मिलता है, शांती मिलती है, आनन्द मिलता है मेरा अपना स्वभाव गुरु के स्वभाव से, गुरु का स्वभाव मेरे स्वभाव से और हम दोनों के स्वभाव में परमात्म-स्वभाव दीखता है  
राणाजी म्हाने या बदनामी लागे मीठी, 
कोई नींदों, कोई बीन्दो, मैं चलूंगी चाल अनूठी..
राणाजी म्हाने या बदनामी लागे मीठी… 
सांकली गली में सदगुरु मिलिया, क्यूँ कर फिरूं अपूती
                

   संकरी गली के दो अर्थ होते है एक तो बाहर की संकरी गली और दूसरा अंतर आत्मा में| श्वास अंदर जाए तो राम अथवा ॐ श्वास बाहर आये तो भगवान अथवा गुरूजी का नाम… और उसमे भी भगवान का रस मिले तो वह हो गया भजन । सांकली गली में सदगुरु मिलिया, क्यूँ कर फिरूं अपूती…. अर्थात अब मैं कैसे अपूती रहूंगी जब हजारों लोग मुझे माताजी माताजी कहते हैं, आद्यसत्ता से जुड़ी हूँ, सतचित्तानंद से जुड़ी हूँ तो मैं अपूती कैसे… ये हजारों पूत हमारे ही तो हैं ।
 सद्गुरूजीस  सूं बातां करदा दुर्जन लोगों ने डीठी 
                        

सतगुरु से बाते करते हुये मुझे दुर्जन लोगों ने देख लिया और दुर्जन लोगो की नजर थी झूठी अर्थात लवर लवरी की… हम प्रेमी प्रेमिका तो हैं लेकिन शरीर के प्रेमी प्रेमिका नहीं, हम उस परमात्म-पद के प्रेमी हैं । मेरे गुरूजी जिस परमात्म-पद के प्रेमी थे, उसी के प्रेमी हम भी हैं । शारीरिक दृष्टी तो तुच्छ दृष्टी है, नीच दृष्टी है, दुर्जनों की दृष्टी है । 
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दुर्जन जलो जाये अंगीठी 
               

मीरा का तो ईश्वर के नाते, प्रभु गिरिधर के नाते गुरूजी से सम्बन्ध था, ये ब्वाय-फ्रेंड, गर्लफ्रेंड के सम्बन्ध तो हाड-मांस के सम्बन्ध होते हैं, लेकिन मीरा और रैदास का तो आत्मा और परमात्म के नाते का सम्बन्ध था । आपका हमारा ईश्वर के नाते सम्बन्ध है, भाई बहन है… हैं न ? रैदास के संपर्क में आने से मीरा का स्वभाव और मीरा के संपर्क में आने से रैदास का स्वभाव राम के स्वभाव को जान कर राममय हो गया था । मीरा के संपर्क में रैदास आये तो मीरा का स्वभाव भी ऐसा हो गया । एक बार आप भगवान का स्वभाव जान लो, फिर आपको कोई रोके, कोई टोके चाहे कोई कुछ करे आपका मन फंसेगा नहीं । कितना भी धन हो, सत्ता हो, सौन्दर्य हो-सब नाश हो जाए आपको फर्क नहीं पड़ेगा । 
               

पट खुले बदरीनाथजी के, यात्रियों की भीड़ आई जिसमे भगवद-स्वभाव में रमण करने वाले संत सुन्दरदास जी अपनी एकांत साधना के बाद चल पड़े थे कि चलो, बद्री-विशाल से मिल के आयेंगे । साधारण लोग तीर्थ में भगवान से कुछ लेने के लिए जाते हैं, लेकिन संत को इस सबसे लेना देना क्या है ? जैसे सनकादी ऋषि भगवान से मिलते हैं तो कुछ लेने के लिये थोड़ी मिलते हैं । ऐसे ही सहज में संत सुन्दरदास जी, फक्कड संत थे, दोपहर में जरा बाबा जी ने आसन जमाने का विचार किया । दूकान वाला समझ गया कि बाबाजी यहाँ अपना धूना रमाएंगे । अगर संत को मना किया तो नाराज हो जायेंगे, और अगर धूना लगा लिया तो मेरी ग्राहकी कम हो जायेगी । तो दूकान वाला बोला, “ बाबाजी मैं गरीब आदमी हूँ… सीजन में दो पैसे कमा लेता हूँ । आप यहाँ विराजेंगे, मैंने तो दर्शन कर लिया लेकिन और लोग आयेंगे, आज मेला है । मेरे दो पैसे रोटी के ….” 

“अच्छा…अच्छा, हम आगे जाते हैं….” कह कर आगे चल दिये । आगे गये तो एक सुंदर कोठी दिखी, बढ़िया बरामदा था बाबा ने वहीं अपना धूना लगा दिया । जो संत भगवदीय स्वभाव में रमण करते हैं उन संतो में भगवदीय आकर्षणी शक्ति होती है, जैसे मेरे लीलाशाह बापूजी जब कहीं जाते तो लोग दूर दूर से रुक कर उनके दर्शन करने के लिए जाते थे – विवेकानंद के, रमण महऋषि के, मीरा के, कृष्णजी के, श्रीरामजी के… लेकिन कंस बाहर निकलता था तो उसे देखकर लोग भाग जाते थे.. अरे! कंस आया, कंस आया… । रावण आता तो अरे! अरे! रावण आया कह कर घर में छुप जाते थे । जो भगवदीय रस में भगवतमय होते है उन्हें देख कर भक्त लोग उनके पीछे आ जाते हैं । खुद को ही देख लो, तुम खिंच के आये हो कि रूपैये पैसों से आये हो ? कोई तुम्हे पकड़ के लाया क्या, नहीं अपने पवित्र स्वभाव से ही यहाँ खिंच के चले आये ।
जा को जापर सत्य-सनेहू, सो ताहि मिले ना कछु संदेहू
जिसको जिस पर सच्चा स्नेह होता है तो वो एक दुसरे से मिल ही लेते हैं । कुछ भक्त लोग इकठे हो गए…… “बाबाजी, कुछ आपके लिए लायें ? दूध लायें, आटा लायें या सब्जी लायें….”
बोले, “ अरे, कुछ नहीं, थोड़ी लकड़ी ले आओ, धूना लगाऊँगा” 
लकड़ियाँ आ गयी, धूना लग गया । धुंआ धुंआ हो गया, इतने में फौजी आ गये, सिपाही आ गये 
“ऐ, ये क्या धुँआ लगाया है यहाँ?”
बोले, “हम एक दिन यहाँ ठहरेंगे”
“ अरे! यह राजा साहब की कोठी है । बद्री-विशाल के दर्शन करने आये हैं, उनके साथ रानी साहिबा भी है, उनकी सखियाँ भी हैं । कोठी के बाहर बरामदे में कहीं धूना लगाया जाता है क्या ? राजा साहब आयेंगे और आदेश देंगे तो उसी समय सिर धड से अलग हो जायेगा|”
“हम भी देखेंगे कौन सिर धड से अलग करता है, हम तो यहीं बैठेंगे, एक दिन यहीं रहना है हमें”

फ़ौजी तिलमिलाया, राजा साहब के आने की खबर से यहाँ साफ सफाई करवाने आये थे और जरा खाना खाने के लिए क्या गए कि यहाँ तो कब्ज़ा करके बैठ गए बाबा और बाबा के भक्त । अब कहते है एक दिन रहेंगे । एक रात ही तो राजा साहब रहने वाले है यहाँ, और रानी साहिबा भी रहेंगी और इधर ये लंगोटिया बाबा बरामदे में कब्जा कर के बैठ गए हैं….. उन्होंने राजा के मुख्य पुजारी को बताया तो वह भी आग-बबूला हो गया । राजा साहब ने सुना तो कहा कि धीरज रखो, चलते हैं । महल मे तो क्या जाना था, गए कोठी में, उत्तरकाशी का राजा था उस समय बद्री-विशाल का वो प्रभारी भी था । 
     

आये महाराज के पास, प्रणाम करके बोले, “महाराज, मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकता हूँ ?” 
बोले, “हां.. पूछो” 
“महाराज, आप कौन हो?”
“इसका जवाब तो तुम ने खुद ही दे दिया है । मैं महाराज हूँ…. तुम राजा हो, मैं महाराजा हूँ |”
“महाराजा तो मैं हूँ, मेरे पास सेना है, ऐश्वर्य है, आपके पास तो धूनी के सिवाय कुछ नहीं है, आप महाराज कैसे..?”
“जिनके हृदय में भगवद प्रसाद है, जो भगवान् को चाहते हैं, ऐसे सभी लोग मेरे सैनिक हैं, सभी लोग मेरे पक्ष में इकठे हो गए है ना.. तुम तो सेना को पगार देते हो तो कुछ करते हैं यहाँ तो अपने आप ही सब तैयारी कर लेते हैं, तुम्हारा तो खाली उत्तरकाशी में ही राज्य और सेना है, मैं तो कहीं भी जाऊं…. बात रही ऐश्वर्य की तो ये सारे पञ्च-भूत और सारी सृष्टी जिस परमात्मा की है वो परमात्मा मेरे हैं और मैं परमात्मा का हूँ इसलिए परमात्मा का ऐश्वर्य मेरा ऐश्वर्य है । और हाँ, राजा ध्यान से सुनना जो जितना कंगला होता है न, उसको उतनी ही बाहर की सत्ता चाहिये, और जो भीतर से जितना प्रसन्न होता है, बाहर से उतना ही बेपरवाह होता है, ये बात मानते हो ?”
बोले, “हाँ, महाराज.. मानता हूँ”
“तुम बाहर से तो बड़े सुखी दीखते हो, कई नौकर हैं, चाकर हैं, दास हैं, दासियाँ हैं लेकिन अंदर से जितने खोखले हो.. उतने बाहर से बाहरी सामग्री के गुलाम हो । वास्तव में तुम बहुत दुखी हो, निस्संतान होने का दुःख तुम्हे पीड़ा दे रहा है”
“महाराज..”
“और हाँ, रानी साहिबा को वातरोग है । नींद नहीं आती, गठिया- वातरोग है”
“हाँ… महाराज”
अभी अभी तो राजा होकर प्रश्न कर रहा था और अब वह तुरंत महाराज का सेवक बन गया । बाबा ने चिमटे से भभूत उठायी और बोले, “ लो, राजा-रानी तुम दोनों फांक लो । वातरोग और गठिया चला जायेगा । दो साल के बाद बच्चा होगा, ठीक है!” 
    

वह महाराज की स्तुति करने लगे । पहले तो राजाधिराज महाराज बन रहे थे और संत महाराज के चरणों में आते ही दो क्षण में ही महाराज के स्वभाव के प्रभाव में आ गए जैसे तरंग समुन्द्र के स्वभाव में आ जाती है, गहना सोने के स्वभाव में मिल जाता है, ऐसे ही सबके अंदर असली स्वभाव की प्यास है सच्चे सुख की प्यास है । मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ कहीं दो-चार व्यक्ति लड़ रहे हैं, आप को लगे कि उनमे से एक बेचारा सीधा है और शेष तीन हरामी हैं । आप बीच में पड़कर उन्हें छुडाएं ऐसी परिस्थिति नहीं लग रही तो आपका हृदय उनमे से किसके पक्ष में जायेगा ? जो निर्दोष है, उसके पक्ष में आपका हृदय जायेगा । जायेगा कि नहीं जायेगा । जो हरामी हैं, उनके प्रति आपकी लानत जायेगी और निर्दोष के प्रति आपका सदभाव जायेगा| आपके शरीर की अपेक्षा आपकी इन्द्रियां आत्मा के अधिक नजदीक हैं, इन्द्रियों से आपका मन नजदीक है, मन से आपकी बुद्धी नजदीक है और बुद्धी आत्मा के नजदीक है । आत्मा सत्य का पक्षधर है, चेतनता का पक्षधर है, सच्चाई का पक्षधर है । कल्पना करो कि कोई बड़ा आदमी है, नेता है, उसके बेटे ने किसी को कुछ कर दिया और वो पकड़ा गया तथा अब वो बेटा जेल में है । बड़े आदमी ने पूरा जोर लगाया लेकिन पेशीयाँ पड़ते-पड़ते भी बेटा निर्दोष नहीं छूटा, सजा मिल गयी तो बड़ा आदमी अपनी पत्नी को कहता है कि मैंने तो अपनी और से पूरी कोशिश की लेकिन आखिर गलती तो गलती होती है । अपना बेटा है तो क्या, अब कर्म का तो फल भुगतना ही पड़ेगा । मैं क्या कर सकता हूँ ? उसको ऐसा नहीं करना चाहिए था । बाहर जा कर तो चिल्लाता है कि मेरा बेटा निर्दोष है, उसे फंसाया गया है, लेकिन अंदर बेटे की माँ को कहता है कि आखिर गलती तो गलती है । लोफरों से मिलकर अपने लड़के ने गलत काम तो किया ही है । 
   

  आपकी बुद्धी तो हमेशां सत्य के पक्ष में जाती है, क्योंकि आपका सत्य-स्वभाव है, आपका चेतन स्वभाव है, आपका आनन्द स्वभाव है, आपका अमर स्वभाव है । मरना आप पसंद नहीं करेंगे, जड़ होना आप पसंद नहीं करेंगे ।आप अपने सत्य-स्वरूप के अनुरूप कर्म करोगे तो शीघ्र ही आप निर्दुख हो जाओगे । आप अपने चेतन स्वरूप के अनुसार सोचोगे तो निर्दुख हो जाओगे ।आप आनन्द स्वभाव के अनुरूप चिंतन करोगे तो दुखों से मुक्त हो जाओगे । आप दुःख नहीं चाहते, आप चिंता नहीं चाहते, आप अशांति नहीं चाहते । आप द्वेष नहीं चाहते, आप ईर्ष्या नहीं चाहते फिर भी उसमें घसीटे जाते है । क्यों…? स्वभाव के विपरीत कर्म करके । और ये विपरीत कर्म कौन करवा रहा है – लोफर… काम, काम आता है तुमको नोच के चला जाता है । थोड़ी देर एक दुसरे के शरीरों को नोचते हैं, बाद में हाय…. उसी समय अंदर से ग्लानी होती है – चाहे माई हो, चाहे भाई हो । ये लोफर आ के उत्तेजित करते हैं, बाद में लगता है कि ये सब बेकार है, ये आपके असली स्वभाव की पुकार है । अपने असली स्वभाव की पुकार को पकड़ लो न तो कल्याण हो जाए । क्रोध आता है, तपा के चला जाता है, क्रोध शांत होता है तो लगता है कि ओह शी ….खामखाँ के रोज रोज के लडाई झगडे अच्छे है क्या ? ठीक तो नहीं हैं । सोचेंगे कि ये झगडे न हो, क्रोध न आये । आप क्रोधी होना नहीं चाहते, क्रोध मिटने के बाद… ऐसे ही लोभ से अनर्थ हो जाता है ।भोग का संग्रह, भोग की वासना, मन की कल्पना और देखा देखी के भावों में बह जाते हैं इसीलिए आप इन लोफरों के प्रभाव में आ जाते हैं । काम आकर तुमको नोच गया, क्रोध आकर तुमको तपा गया, लोभ आकर तुमको बेईमान बना गया, दगाबाज बना गया, मोह आकर आपको झूठे मोह ममता में गिरा गया, अहंकार आकर आपको उलझन में डाल गया लेकिन आप उलझन चाहते नहीं है । क्या करे…. ? आप हैं कमजोर, और ये लोफर है बलवान, आप हैं एक और ये लोफर हैं, बदमाश है पांच, तो आप क्या करो । आप जो जोर में जोर वाला है उसकी शरण लो, जोर में जोर वाला है आत्म-देव, रात को सोते समय…..“ हे प्रभु… हे दीनबंधु… दिनभर जो हुआ, अच्छा हुआ तो तेरी किरपा से, गड़बड़ हुई तो प्रभु इन लोफरों ने करायी । महाराज.. मैं तुम्हारी शरण हूँ । हे प्रभु, आनन्द-दाता ज्ञान हमको दीजिये कौन सा ज्ञान..? इंजीनियरिंग का ज्ञान…? डाक्टरी का ज्ञान…, नहीं, तुम्हारा ज्ञान, भगवत-ज्ञान ।

शुकदेवजी महाराज को राजा परीक्षत ने सोने के सिंहासन पर बिठाकर सोने के थाल में उनके चरण धोकर प्रार्थना की कि प्रभु एक सवाल पूछने की इजाजत दो । 

“हाँ, पूछो..”

“मनुष्य को जीवन-काल में क्या करना चाहिए और मृत्यु नजदीक हो तो उसको क्या करना चाहिए?”
शुकदेवजी ने कहा, “राजन, तुम धन्य हो । तुमने अपने लिए नहीं, सारी मानव-जाति के लिए मंगल के द्वार खुलवा दिये । मनुष्य को अपने जीवनकाल में अपने परमात्म-स्वभाव का ज्ञान पा लेना चाहिये । मकान का ज्ञान, दूकान का ज्ञान, रोटी बनाने का ज्ञान, सब्जी बनाने का ज्ञान, बाल की खाल उतारने का ज्ञान पाने में झख मार मार के मर गये, भगवद-ज्ञान, भगवान क्या है, भगवान कहाँ रहते हैं, कैसे मिलते हैं – इसका ज्ञान, मनुष्य को भगवद-ज्ञान पा लेना चाहिये ।” 

भगवद-ज्ञान पाने से जो लाभ है, सोने की लंका मिल जाने पर भी वो लाभ नहीं होता । शबरी ने भगवद-ज्ञान पाया तो रामजी झूठे बेर खा गये, मीरा ने भगवद-ज्ञान पाया तो जहर अमृत बन गया, रैदास ने भगवद-ज्ञान पाया, नानक जी ने भगवद-ज्ञान पाया । हमारे लीलाशाह गुरूजी ने भगवद-ज्ञान पाया । भगवद-ज्ञान पाने से दुखों की दाल नहीं गलेगी, चिंता दूर हो जायेगी और ये लोफर तुम्हारे आगे घुटने टेक के बैठे रहेंगे । आज्ञा करोगे वो काम करेंगे, फिर चुप बैठेंगे । एक होता है घोड़े की पूंछ पकड़ के यात्रा करना, तो घसीटे जायेंगे ।  दूसरा होता है, घोड़े पर सवार होकर घोड़े की लगाम पकड़ के यात्रा करना । ऐसे ही मन रुपी घोड़े की लगाम पकड़ने की विद्या है भगवद-विद्या, जिसको बोलते हैं भगवद-प्रसादयामति, जो कि सत्संग से उत्पन्न होती है ।
शुकदेवजी ने राजा परीक्षत को कहा, “ राजा, मनुष्य को जन्म के साथ, ज्यों ही सूझ-बूझ बढे उसे परमात्म-तत्व का ज्ञान पा लेना चाहिये और भगवान की यश गाथा करके अपने अंदर छुपे हुये भगवान का रस प्रगट कर लेना चाहिये । 
तस्मात् सर्वात्मना राजन हरि अभिधीयते 
श्रोतव्य कीर्तितव्यस्य समृतितव्य भग्वदोनिर्माण । 
भगवान के विषय में सुनो, भगवान की कीर्ति गाओ, और भगवान का सुमिरण करके भगवदीय सुख को जगाओ|” 
सुख तो आप चाहते हो, पति-पत्नी के गंदे अनुभव से भी आप सुख ही तो लेना चाहते हो । नाक से भी सुख ही तो लेना चाहते हो । लेकिन तुम अगर इसे महत्त्व न दो , इसका महत्व ही क्या है ? इन गंदी इन्द्रियों से सुख लेने की कोशिश करते करते ही दुःख बढ़ गया । संयम से इनका उपयोग करो और जहाँ से सुख प्रगट होता है, सुख की मांग पैदा होती है, उसकी गहराई में जाओ तो पाओगे कि सुख सवरूप तो मेरा आत्मा है, मैं जिस को महत्व देता हूँ, सुखद मानता हूँ तो वो सुख देता है और जिसको मैं ठोकर मारता हूँ, वो बेकार हो जाता है । मेरा आत्मा प्रेम-स्वरूप है, आनन्द-स्वरूप है, चैतन्य-स्वरूप है और वह इन इन्द्रियों को भी सत्ता देता है इसलिए उसका नाम गोविन्द पड़ता है । इन्द्रियाँ सारा दिन संसार में थक कर, भाग कर रात को उसकी शरण में जाती हैं, इसलिए मेरे प्रभु का नाम गोपाल पड़ता है । गोविन्द बोलो, हरि गोपाल बोलो, राधारमण हरि गोपाल बोलो………। 

राधा…. उल्टा दो तो धारा । हमारे ख्यालों की धारा जहाँ से उठती है और रमण करती है आँखों  के द्वारा, कान के द्वारा, नाक के द्वारा, जीभ के द्वारा, त्वचा के द्वारा वो जो चेतन-धारा जिस को चित्त-कला भी बोलते हैं, सुरता भी बोलते हैं तो जब ये धारा रमण करती है तो उसका नाम है राधा… । राधारमण हरि गोविन्द बोलो…… जिससे वो धारा रमण करती है उसका नाम गोविन्द भी है, राधारमण भी है, केशव भी है – ‘क’ माना ब्रह्मा, ‘श’ माना शिव और ‘व्’ माना विष्णु । यही जो ब्रह्मा का आत्मा बनी बैठी है, शिव का आत्मा बनी बैठी है, विष्णु का आत्मा बनी बैठी है, वही मेरा आत्मदेव है । ॐ प्रभु ॐ… ॐ ॐ ॐ… (दीर्घ ॐ गुंजन प्रयोग) ।

एकटक भगवान को देखते जाओ और खाली दस मिनट तक ये ॐ गुंजन करो । कम्बल बिछा दो अथवा गर्म कपडा बिछा दो, आसन बिछा दो या प्लास्टिक बिछा दो क्योंकि जब ये जाप करोगे तो आत्मिक ऊर्जा-शक्ति उभरेगी । अगर जमीन पर कुछ बिछा नहीं है तो वह ऊर्जा-शक्ति, वह बिजली अर्थिंग मिलने से धरती में चली जायेगी । ध्यान-भजन में जो बरकत आनी चाहिये, वो नहीं आयेगी । दस से पंद्रह मिनट सुबह, दोपहर, शाम तीनों समय कर सको तो थोड़े ही दिनों में आपको भगवान के स्वभाव का रस आने लगेगा । आपके रोग कैसे भाग गये आपको पता ही नहीं चलेगा |
   

पूना में अपना आश्रम है । पूना में एक वैद्य है उसका नाम गौरी है| उसके माँ-बाप खूब सारी वस्तुएं प्रसादी वसादी वगैरा और सोने की चेन लेकर आये । मैं बोला कि इतना सारा क्यूँ लाये बेटी ? हम ये सब तो नहीं ले सकते । माँ-बाप ने कहा कि ये जो गौरी है, आपके दिए गए मन्त्र के प्रभाव से इसकी स्त्री-सम्बन्धी जो भी बीमारिया थी.. सब चली गई| थायरायड भी चला गया । ये प्रसाद लाये हैं । अब थायरायड की ऐसी बीमारी है कि जीवन भर गोलियां खाते रहो । उस मन्त्र से थायरायड चला गया । उन्होंने खूब प्रसादी-वसादी किया कि थायरायड मिट गया तो कोई भाई आये और बोले कि मेरे को थायरायड है मुझे भी दो तो उसको भी दिया वह भी कुछ समय बाद मिला और बोला कि मेरा भी थायरायड चला गया । अगर श्रद्धा पक्की है तो भगवान का जप करते करते भगवान के स्वभाव में तुम्हारा स्वभाव मिलेगा तो फिर थायरायड चला जाये तो क्या बड़ी बात है । हकीम डाक्टर बोलते हैं कि ये नहीं हो सकता या इनको संतान नहीं हो सकती लेकिन उनको भी हो जाती है । ये ठीक नहीं हो सकते.. वो भी हो जाते हैं । 

भगवान के स्वभाव में बड़ी विलक्षण शक्तियाँ हैं । आपका स्वभाव भगवान के स्वभाव से मिलता जुलता है । भगवान ज्ञानस्वरूप है तो तुम भी ज्ञान-स्वरूप हो, भगवान सृष्टी बनाते हैं तो तुम भी सृष्टी बनाते हो, बच्चों के लिए दूध बनाते हो, रोटी में से खून बनाते हो, तुम भी मकान बनाते हो, करोड़ों करोड़ों बैक्टेरिया बनाते हो, हजारों हजार विचार बनाते हो । जैसे तरंग और सरोवर का पानी एक है, ऐसे ही आत्मा और परमात्मा का स्वभाव एक है ।आत्मा सत्य-स्वभाव है, परमात्मा भी सत्य है । आत्मा चैतन्य स्वभाव है तो परमात्मा भी चैतन्य है । परमात्मा आनन्द-स्वभाव है तो आपका भी आनन्द स्वभाव है । जो संसारी सुख चाहते हैं तो उनको तो बड़े बड़े दुःख भोगने पड़ते हैं ।जो दुःख के भोगी होते हैं वो भयभीत हो जाते हैं और जो सुख के भोगी होते है वो खोखले हो जाते हैं ।आप सुख का भोग मत करो, सुख का उपयोग करो । सुख बांटो तो आपको आनन्द आएगा । दुःख का भोग न करो, दुःख-हारी हरि के ज्ञान में आ जाओ तो दुःख कभी आपके आगे आयेगा ही नहीं… प्रभाव नहीं दिखायेगा । दुःख आये तो समझो कि दुःख क्यों आया ? सुख की लालच के लिए| ये होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए.. लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो इस आग्रह के कारण ही दुःख आया । समझो कि कोई मर गया और हम रो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं… क्योंकि उसे नहीं मरना चाहिये अब नहीं मरना चाहिये कहने से वो तो जिन्दा नहीं हो सकता लेकिन हमारे पल्ले तो दुःख पड़ेगा । और… कोई मर गया तो… अरे, तुम्हारा शरीर मरा है, तुम तो अमर हो… ये तुलसी की माला पहनो ताकि तुम्हारी दुर्गति न हो । तुम तो आत्मा हो, मरने वाला तो तुम्हारा शरीर है । सुखी-दुखी होने वाला तो मन है तुम तो चैतन्य हो । भगवद-सिमरण करके भगवद-धाम को प्राप्त करो । ॐ ॐ ॐ….. गोविन्द हरे गोपाल हरे, जय जय प्रभु दीनदयाल हरे….. (कीर्तन) 

 लंबा श्वांस लो उसमे ओंकार स्वरूप ईश्वर का नाम भरो| मन ही मन बोलो-  मैं ओंकार मंत्र का जप करता हूँ – जिसका छंद गायत्री है, जिसके ऋषि भगवान नारायण हैं, जिसके देवता अंतर्यामी प्रभु हैं जिसका जप करने से बुद्धि और भक्ति बढ़ती है भगवान प्रसन्न होते हैं………ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ …..(दीर्घ ॐ गुंजन प्रयोग) ।

 ये प्रयोग आप भी करो और बच्चो को भी कराओ| उनकी याद-शक्ती बढ़ेगी और भी बहुत लाभ होगा । लुधियाना के बाल-संस्कार केंद्र में एक बच्चा पढता था, पठानकोट का विनय शर्मा, अमिताभ बच्चन के ‘कौन बनेगा करोडपति’ से २५ लाख रूपैये जीत के आ गया । इसी तरह एक दूसरा ५ साल का बच्चा कार चला कर विश्व-प्रसिद्द हो गया । बाल-संस्कार केंद्र और सारस्वत्य मन्त्र से बुद्धि-शक्ति आत्म-शक्ति विकसित होती है । बच्चो को ये पाठ पढाओ ताकि बच्चे युवान होने पर गंदी आदत में न फंसे। गंदी वेबसाईटों के शिकार न बनें.. गंदी फिल्मों के शिकार न बनें । बच्चो को रस आ जाये ऐसा बच्चों को भी कराओ और आप भी करो । 

पलाश के फूलों का शरबत और तरबूज के शरबत का सेवन करना चाहिए । शरबत को पीना नहीं चबा चबा के खाना है, गर्मायश ज्यादा होती है । तरबूज, पलाश गर्मयाश को तोड़ता है । अधिक गर्मायश के कारण अधिक मासिक होता है और बेवक्त होता है । पलाश के फूल अथवा एक ग्राम कमर-कस दूध में डाल कर पीयें, कमर तो मजबूत होगी मासिक सम्बन्धी बीमारियाँ गायब हो जायेंगी । ये अगर नपुंसक आदमी को भी दो न तो वह भी मर्द बन जाये । इसी पलाश के फूलों के पेड़ में से कमर-कस बनता है । गर्मी में प्यास और शरबत प्यारा लगता है ।
ये संसार दुखों का घर है अगर भगवान प्यारा लगने लग जाये तो बेड़ा पार है । जो प्यारा लगेगा वो जल्दी मिलेगा । प्यारा लगने के दो सिद्धांत हैं । जिसको अपना मानते हो वो भी प्यारा लगता है जैसे कईयों के जूते पड़े हैं और कुत्ता कुछ भी गन्दा कर रहा है लेकिन अगर उसने आपके जूते पर जरा भी ……. तो ओये… ओये…. हट… हट । क्यों?… क्योंकि ये जूता अपना है, तो ये प्यारा लगता है,  अथवा आवश्यकता है तो भी चीज प्यारी लगती है । भगवान अपने भी हैं और भगवान की आवश्यकता भी है । इसलिए भगवान जूतों से, कपड़ो से, पहनावों से, गहनों से, प्रोग्रामों से, हसबैंड से, वाईफ़ से सबसे अधिक प्यारे लगते हैं । मेरे को लगे तो मिले, तुमको लगेंगे तो तुमको भी मिलेंगे । जहाँ चाह… वहां राह । “ये कौन सा उकदा है जो हो नहीं सकता, तेरा जी न चाहे तो हो नहीं सकता, छोटा सा कीड़ा पत्थर में घर करे, इंसान क्या दिले-दिलबर में घर न करे”  आप केवल अटल इरादा रखो, केवल तीन चीजें अपने जीवन में लाओ – एक तो गलत संस्कारों को मिटाने का संकल्प करो, दूसरा अच्छे संस्कारों को जीवन में लाओ, और दृढ़ता से उसमे लग जाओ और तीसरी बात नि-संकल्प होकर अपनी अंतर-आत्मा में विश्रांती पाओ, बस हो गया साक्षात्कार । तुम्हारे दर्शन से दूसरों के भाग्य बन जायेंगे, तुम्हारे दिए हुये मन्त्र से दूसरों के अंतर-चक्षु खुल जायेंगे ।

दिन-चर्या कैसी रखें 
ये सीजन ऋतू-परिवर्तन का सीजन है । इस सीजन में खान-पान का टाईम-टेबल समझकर अगर खान-पान रखोगे तो स्वस्थ रहोगे, उम्र बढ़ेगी और अगर कोई छुपे हुए रोग हैं तो भाग जायेंगे और जीवन के जिस भी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हो, आसानी से आगे बढोगे । हमारे शरीर में जीवनी-शक्ति जितना सबल होगी उतना हम हर किसी कार्य में सफल होंगे जितनी जीवनी-शक्ति दुर्बल होती हैं, उतना हम विफल होते हैं । 

सुबह ३ से ५ हमारी जीवनी-शक्ति फेफड़ों में होती है । ३ बजे न उठ सको तो ४ बजे, ४-३० बजे से ५ के बीच खूब गहरे श्वांस और प्राणायाम करो| मैं तो एक मिनट ४० सेकेण्ड तक श्वांस अंदर रोकता हूँ, फिर छोड़ता हूँ और फिर एक मिनट १० सेकेण्ड तक श्वांस बाहर रोकता हूँ । ऐसे ही आप प्राणायाम करो, एक बार अन्दर श्वांस रोका एक बार बाहर रोका । ये एक प्राणायाम हुआ, शुरू में ऐसे केवल दो प्राणायाम करो और फिर देखो चमत्कार । अगर मैं झूठ बोलूँ तो तुम सब मरो…….. लेकिन मैं अपने प्यारों की झूठी कसम क्यों खाऊँगा…. कई बीमारियाँ और कई समस्याओं का समाधान करने की शक्ती विकसित हो जायेगी । ४ से ५ के बीच ये २ प्राणायाम गर्दन पीछे करके….. श्वांस अंदर जाए तो ॐ बाहर जाये तो गिनती… २५ बार करो अच्छे अंक आयेंगे, पक्की बात है ।
भगवान की भक्ती में सफलता मिले ऐसा सोच के लता मंगेशकर की तरह फ़िल्मी गाने गा गा कर तो कई गायिकाएं गायक चले गए, लेकिन प्रभु के प्रेममय गीत गाकर मीरा अभी भी अमर है, शबरी अभी भी अमर है । 
आचार्य विनोबा भावे लिखते हैं कि मैं रेलवे में यात्रा कर रहा था| एक सूरदास लड़का सवारी डिब्बे में चढ़ा, गाड़ी चली तो उस लड़के ने अपना साज निकाला और ऐसा सुंदर गीत उसने गाया कि डिब्बे के सारे यात्री दीवाने हो गए उस अंधे गायक के, उस भिखमंगे के…. कंठ बढ़िया हो, कोई बड़ी बात नहीं हाव-भाव और सौदर्य हो, मेकअप वगैरा किया, इसकी कोई कीमत नहीं होती है, अंदर की आकर्षणी शक्ति भी मायने रखती है, रूप-लावण्य सौन्दर्य तो लोफर-लोफरीयों के पास भी होता है, लवर लवरीओं के पास भी होता है, अच्छे लोगों के पास भी होता है…. उस भिक्षुक ने ऐसा गीत अलापा कि वाह.. वाह, और एक सुना दो.. और एक सुना दो । उसके तीन-चार गीत सुनने के बाद एक जमींदार उठा और उसने कहा तुम्हारे गीत ने मेरा दिल जीत लिया, लो दोस्त ये सौ रूपये… और एक फ़िल्मी गीत सुना दो| उस ज़माने में जब विनोबा जी यात्रा करते थे, आज से ५० साल पहले की बात है,… उस समय में एक-दो रुपया भी काफी महत्वपूर्ण होता था । उसने उत्तर दिया कि सौ रूपये तो क्या, अगर आप हजार रूपये भी दोगे न तो भी मैं फ़िल्मी गीत नहीं सुनाऊंगा, भगवान के भजन के लिए ही मेरा जन्म हुआ है । एक भिखमंगा सूरदास ये कहता है कि मैं ये नटखटों वाले गीत नहीं सुनाऊंगा, मैं तो ये भजन सुना सकता हूँ| ये अपना सौ रूपये अपने पर्स में रखिये, मुझे जो दो-चार पैसे रोटी के लिए मिल जाते हैं, वही मेरे लिए पर्याप्त हैं । रुपयों के लिए अथवा अच्छे भोजन के लिए मैं अपना दिल क्यों बुरा करूँ? 

३ से ५ आपकी जीवनी-शक्ती फेफड़ों में होती है, उस समय प्राणायाम करो, प्राण रोक कर भगवान के नाम का जप करो और भगवान की प्रार्थना करो कि हम तेरे गीत गायें हमे, तेरा ज्ञान मिले, तुम्हारी प्रीती मिले । ५ से ७ जीवनी-शक्ति बड़े आंत में होती है ।उस समय पाद-पश्चिमोत्तान आसन, वायु-मुक्तासन, सर्वांग-आसन ये आपकी आँतों को मजबूत करेंगे । घूमना, गुनगुना पानी पीना और शौचादि का काम ७ बजे से पहले पहले पूरा करना तो आपका पेट बढ़िया रहेगा, गैस की तकलीफ, पाचन-शक्ति सब ठीकठाक हो जायेगी । ३ से ५ के बीच प्राणायाम, ५ से ७ के बीच आसन, ऊषा-पान अर्थात सूर्योदय होने के थोडा पहले पानी पीना चाहिए, इससे पहले अँधेरे में पानी नहीं पीना चाहिए, मन्दाग्नि होती है । घूम-घाम के, हरढ़-रसायन वगेरा ले ले ताकि पेट साफ़ हो जाए और ७ से पहले शौचालय का काम निवृत हो जाए । आपकी तबीयत बढ़िया रहेगी ।

७ से ९ जीवनी-शक्ति आपके आमाश्य में रहती है । उस समय दूध पी सकते हो अथवा भूख नहीं लगती हो तो नारंगी का रस लो, भूख लगाएगा अथवा जो भी पेय पी सकते हो ७ से ९ के बीच, चाय, काफी के सिवाय ठीक रहेगा । ९ से ११ आपकी जीवनी-शक्ति आपके पाचन-तंत्र में रहती है, जठरा में , इस समय भोजन कर लो । जो १२ से ३ के बीच भोजन करते हैं उनका तो खाना खराब हो जाता है, खाना बीमारियाँ पैदा करता है, मुझे पता है कि १२ से ३ के बीच खाना खाने वाले तुम बहुत से लोग हो । ९ से ११ के बीच भोजन कर लो और जिनको डायबिटीज है और बच्चों को तो ११ से पहले पहले जरूर भोजन कर लेना चाहिए ।

सूरत का एक जाना-माना वकील है, जमनादास उसका नाम है, ९२ साल का है, कहता है, “बापूजी मैं कोर्ट में खड़े होकर लगातार दो- दो घंटे बहस कर सकता हूँ और कार चला के आपके सत्संग में भी आता हूँ|” “ मैंने कहा-’९२ साल की उम्र में तुम्हारी इस तंदरुस्ती का क्या कारण है ?” तो बोला कि मैं सुबह १० बजे भोजन कर लेता हूँ । मैंने पुछा कि रात को कब सोते हो तो बोला कि ११ के बाद । मैंने कहा कि इसमें थोड़ी गड़बड़ है, ११ के पहले सोते तो इतने बूढ़े नहीं दीखते । 

११ से १ जीवनी-शक्ति हृदय में रहती है । ११ से एक के बीच भक्ती के भजन गाओ, भगवान को प्रार्थना करो ‘मीरा के हृदय को तुमने चमकाया, बापू के हृदय में चम्-चम् चमक रहे हो, तो मेरे हृदय में भी आओ न मेरे लाला, मेरे प्रभु…” मीरा थी तब थी लेकिन इस युग में मीरा की बहुत मांग है । ११ से १ के बीच हृदय को स्नेह से, भाव से, मानवीय संवेदनाओं से, ईश्वरीय आराधना से गाओ और भगवान को आर्त भाव से या कैसे भी सखा भाव से पुकारो । ११ से १ हृदय को विकसित करने वाले भाव सुमिरन चिंतन, भजन करें । भावो हि विद्यते देवो, न विद्यते लोष्टे काष्टे पाषाणे । लोहे की मूर्ती में, काठ की मूर्ती में, पाषाण की मूर्ती में नहीं, भाव में ही भगवान प्रगट हो जाते हैं । भाव-ग्राही जनार्दना । तो ११ से १ के बीच भाव की साधना करो, लवर-लवरीयों के गाने नहीं…. “एक झलक जो पाता है, राही वहीं रुक जाता है, देख के तेरा रूप सलोना, मन भी वर वर जाता है ……”  था तो फ़िल्मी गाना लेकिन जोड़ तोड़ के ईश्वर की तरफ ले गए । जोगी रे, हम तो लुट गए तेरे प्यार में…… लेकिन भाव में सुरेश ने इसे वापिस वापिस गाया, फिल्म तो फेल हो गयी लेकिन उसकी ये टोन सुरेश ने जग प्रसिद्ध कर दी…. जोगी रे, क्या जादू है तेरे प्यार में । ये भाव की शक्ति है, इससे मोबायल फोन से होने वाली हानियों से टक्कर लेने वाली जीवनी-शक्ती विकसित होती है । ११ से १ आपका हृदय विकसित हो, ऐसे काम करने चाहिये जैसे करुना, दया, प्रेम, भावना, भगवत-रस, भजन, भगवद-ज्ञान भगवान सम्बन्धी ।

१ से ३ जीवनी-शक्ति छोटी आंत में होती है । १ से ३ के बीच खाना खाया तो खाना-ख़राब । ११ से ३ के बीच जो खाना खाया तो उसका कच्चा रस अथवा भोजन में से जो सार-रस निकला उसको छोटी आंत अपनी ओर खींचती है तथा सारे शरीर में भेजती है । बाक़ी का कचरा बड़ी-आंत की ओर टायलेट के लिये धकेल देती है । यदि इस समय कुछ खाओगे तो उसका कच्चा रस चला जायेगा इसलिए १ से ३ के बीच भोजन करना अपने शरीर से दुश्मनी के बराबर है ।  

३ से ५ के बीच जीवनी-शक्ति मूत्राशय में रहती है – अच्छी तरह से पानी पी लो तो कभी पथरी की तकलीफ नहीं होगी और १५-२५ मिनट के बाद पानी निकाल दो ।पेशाब संबंधी जो तकलीफें होती हैं वो नही होगी और है तो भाग जायेगी । 

किसी को भी पथरी की तकलीफ हो तो भूल कर भी आपरेशन नहीं कराना । पथरीचट पौधा है, दो पत्ते चबाकर खा लो, थोड़े दिनों में पथरी टुकड़े टुकड़े होकर निकल जायेगी । अपने दून के आश्रम में भी यह पौधा होगा यदि नहीं है तो मंगवा लेना । उस पथरीचट पौधे के विशेषता है कि उसके पत्ते के दो टुकड़े कर दो अथवा चार टुकड़े कर दो, कटा हुआ भाग धरती में गाड़ दो और थोडा थोडा पानी दिया करो तो उसमे से भी पौधा पैदा हो जाता है । इसलिए महाराष्ट्र में इसे पनफुटी भी बोलते हैं । अत: पथरी का आपरेशन नहीं कराना । बाय-पास सर्जरी नहीं कराना, आश्रम में लिक्विड मिलता है ले लेना , ब्लाकेज वगैरा उससे खुल जाता है । मेरे सत्संगी हो कर बाय-पास सर्जरी नहीं कराना, नहीं तो मारूगा… हाँ । अपेंडिक्स का आपरेशन करने की कोई जरूरत नहीं है, कोष्ट-शुधि नाम से २०-२० रूपये की गोली की डिब्बी आती है, दो दो गोली लो, पेट की सभी तकलीफों को भगा देती है । अपेंडिक्स बिना आपरेशन के ही ठीक हो जाता है । ऐसे ही मोतियाबिंद का आपरेशन नहीं कराना, मेरे वैद्य के पास मेरी बताई हुई एक औषधी है, आँख में डालोगे, मोतीया ऐसे ही कट जायेगा बिना आपरेशन के । 

३ से ५ पानी पीना है पर पानी पीकर तुरंत बाथरूम नहीं जाना और पेशाब करके तुरंत पानी नहीं पीना वर्ना आगे जाकर पेशाब सम्बन्धी तकलीफें हो सकती है । खड़े खड़े पानी पीना और खड़े खड़े खाना खाना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । इसको पिशाच-भोजन कहते हैं । आजकल तो इसका फैशन आ रहा है….छी.. । अपने यहाँ राक्षस और पिशाच ही ऐसा करते थे । विदेशों से यह प्रथा यहाँ भी आ रही है । ५ से ७ जीवनी-शक्ती गुर्दे में रहती है उस समय किया हुआ भोजन हितकारी है, नियम –संध्या आदि कर के । ७ से ९ तुम्हारी जीवनी-शक्ती मस्तक में होती है । उस समय किये हुये निर्णय और मस्तक की जो कुछ भी प्रक्रिया है जप, ध्यान, भजन, कीर्तन, सत्संग की केसेट सुनना या ऋषिप्रसाद देखना, सुनना, दिव्य-प्रेरणा पुस्तक पढना, मंगलमय जीवन-मुक्ति, ईशवर की ओर पुस्तक पढना अथवा ओर कोई शास्त्र पढ़ना-कुल मिला कर मस्तिष्क को विकसित करने का समय है ७ से ९ का,  भूलना मत – हृदय को विकसित करने का समय ११ से १ । अगर हृदय और मस्तक विकसित है और ९ से ११ पेट संबंधी फायदा उठाया ये तीन बाते अगर आ गई तो बस …. हैं तो सभी बातें उपयोगी । तो ७ से ९ मस्तक विकसित करने का काम करना चाहिए । 

९ से ११ मेरु-रज्जू में जीवनी-शक्ती होती है । ९ से ११ के बीच की नींद आपकी थकान मिटा देती है । कल रात को मैं पौने दस बजे लेट गया कुछ खाया पीया नहीं, दूध वुध भी नहीं पीया, कल रात को तो मैं थका थका वृद्ध बापू और आज जवान बापू हो के आ गया । ९ से ११ की नींद बहुत बढ़िया है । अगर ९ बजे नहीं सो सकते तो दस और बस… । ११ बजे के बाद अगर जगे तो तुम्हारी ख़ैर नहीं… लोग कहते है कि विकास का युग है लेकिन मैं कहता हूँ कि युवक युवतियों के साथ जितना अत्याचार इस युग में हुआ है उतना आजतक कभी नहीं हुआ । युवाधन और युवतियों का आध्यात्मिक और चारित्रिक धर्म नाश करने वाली वेब-साईटें लोग दस ग्यारह के बाद देखते रहते हैं और जवानी में ही बुढ़ापे के लक्षणों से जैसे चश्मा, चिडचिडापन और बूढों जैसी चाल वाले हो जाते हैं । 
११ से १ के बीच जीवनी-शक्ति नयी कोशिकायें बनाती है । १० से १ के बीच जो नींद करते है वो जवान बने रहते है लेकिन १० के बाद जो जगते हैं वो बूढ़ों जैसे हो जाते हैं । मैं ७४ साल का भी जवान बना बैठा हूँ, हालांकि रोज दस बजे नहीं सो पाता हूँ लेकिन ११ के बाद तो जगता भी नहीं हूँ । दस के पहले, दस, साढ़े-दस बजे सो जाओ ।
१ से ३ आपकी जीवनी-शक्ती लीवर में होती है । जो १ से ३ के बीच जगते हैं वे तो अपने आप के सबसे बड़े दुश्मन हैं । तुमने देखा ऐसा किसी ट्रक-ड्राईवर को, जिसका मुम्बई में कोई बढ़िया फ्लेट हो, कार हो, देखा क्या कभी….नहीं| तुम तो हाथ पैर से कोई काम करोगे तो नजर किधर भी जायेगी और ट्रक ड्राईवर के तो पांच कर्म इन्द्री, पांच ज्ञान इन्द्री, पांच प्राण, मन, बुद्धी… १७ तत्व काम में लगे रहते हैं| अगर एक मिनट भी आँख इधर-उधर झोंका खा ले तो अपनी और कईओं की जान ले डूबेगा । फिर भी ट्रक ड्राईवरों की इस जागरण की गलती से उनकी जीवनी-शक्ती इतनी दब्बू रहती है कि अपने अधिकारों के प्रति भी सजग नहीं, बुद्धी की, मन की प्रतिक्रिया की ताकत नहीं । दो खाकी वर्दी वाले खड़े हो जायेंगे तो दर्जनों ट्रक वालों को घंटो तक खड़ा रखेंगे, उनसे पैसे लेंगे और बाद में उनको घुटने टिकाते हुये रवाना करेंगे । अगर प्रतिक्रिया की शक्ति होती तो संगठित होते और जो खाकी वाले जहाँ तहां खड़े होकर लूट रहे हैं… टोल टेक्स भी भरते हैं, आर टी ओ टेक्स भी भरते हैं, फिर यह क्या…. लेकिन वह यह नहीं कर पायेंगे, क्योंकि रात का जागरण उनकी जीवनी-शक्ती को हर लेता है । पति-पत्नी का प्रोग्राम भी रात को १ से ३ करना बड़ा खतरनाक है, आप समझ गए गृहस्थी लोग कि खोल के समझाऊँ । १ से ३ गहरी नींद होनी चाहिए । और फिर ३ से ५ प्राणायाम का समय आ गया । 

हिसार में जो लोग सत्संग सुन रहे है रेखा दीदी का वो ५-७ साल की बच्ची थी और उसको गुर्दे का तकलीफ था और डाक्टरों ने कहा कि इसकी दस-बारह साल और जिन्दगी है तो ५ साल और १२ साल कुल १७ साल का जीवन था और  अब वही लडकी तुम्हारे सामने… रेखा दीदी, हिसार में सत्संग कर रही है, ३८ साल की हैं और लाल टमाटर जैसी है इतनी मोटी ताजी है मुम्बई की है – अखंड ब्रह्मचारिणी । ५० लोफरों के बीच भेज दो, लोफरों की मजाल नहीं उसका सत्व तोड़ सकें, ऐसी ऐसी मजबूत बच्चियां हैं हमारे पास, भव्या भी ऐसी है ५० लोफरों के बीच भेज दो, जूता सुंघा के आ जायेगी ।

जिनको सत्संग प्रिय है तो समझो उनकी सात-सात पीढीयाँ तारने का भगवान ने ठान लिया है। राजा जनक सत्संग करवाते थे, राजकोष से खर्चा करते थे । जो प्रजा को सत्संग देता है, दिलाता है, देने-दिलाने में भागीदार होता है, वो मानव-जाती का सर्वोपरि हितैषी है । आठ प्रकार के दान होते है – अन्न-दान, भूमि-दान, कन्या-दान, सुवर्णदान, गौदान, गोरस दान, विद्या दान लेकिन इन सब दानो से ऊपरी सर्वोपरी है सत्संग-दान । कन्या-दान किया फिर भी जमाई राजा टेंशन में हो सकता है, सुवर्ण-दान हुआ फिर भी हवाला काण्ड बन सकता है, विद्या-दान मिला फिर भी वकील कुछ का कुछ कर सकते हैं लेकिन सत्संग दान मिला तो चिंतित की चिंता छूटती है, तनाव वालों का तनाव छूटता है, बीमारों की बीमारियाँ छूटती हैं, अहंकारियों का अहंकार छूटता है, चिंता वालो की चिंता छूटती है और भगवान सबके हृदय में प्रसन्न होते हैं । सत्संग दान करना, कराना और उसमे सहयोग करने का जिसने काम किया है, बहुत बड़ा काम किया है ।
नारायण हरि नारायण हरि नारायण हरि 

ॐ शांति

श्री सद्गुरूदेवजी भगवान की महा जयजयकार हो ….. 

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