5 क्लेशों की आहुती -108 दिन की साधना

P. P. Sant Shri Asharamji Bapu –Satsang–Ahmedabad Ekant- 20th June 2013 Part-2             

               जो संवेदन, स्फुरना इधर-उधर भटकती है, उस स्फुरण के घुमाके मूल में ले आओ बस… भगवान हो जावोगे, बापू बन जावोगे | जो खयाल इधर-उधर भटकते है, तुमको तुच्छ कर रहे है | उन खयालों को घुमाके जहाँ से उठते है वहाँ ले आओ… बस हो गया | निगुरे आदमी के लिए कठिन है, लेकिन जिसको गुरुभक्ति है उसके लिए ये साधन सरल है |

रात को नींद में सोये तो ईश्वर में सोये | ॐ.. ॐ शांति.. सुबह उठे तो मैं ईश्वर से उठा हूँ और मेरे नाभि के जठरा है..  जठराग्नि से – श्वास जो अंदर जाता है गरम हो के आता है | श्वास को खींचता कौन है और छोड़ता कौन है ? चैतन्य, आत्मा | नहीं तो श्वास बाहर छोड़ा और वापस नहीं खींचा तो मर जावोगे | तो  शक्ति संचार हो रहा है, रक्त बन रहा है, बाल बढ़ रहे है…  तो  मानना पडेगा ना कि कोई सुव्यवस्थित संचालक है शरीर का | तो नाभि के पास जठराग्नि है | जठराग्नि जैसे यज्ञकुंड होता है वैसे चौड़ा होता है | ऊपर से उसकी लौ पतली होती है – त्रिकोणाकार उसमे अग्निकुंड की भावना करो और उसमे सदा अग्नि जल रही- ईश्वरीय अग्नि | मेरे और ईश्वर के बीच जो ना समझी है वो स्वाहा करता हूँ | इतना तो कर सकते हो | इसको बोलते है – अविद्या जुहोमि  स्वाहा |
अविद्या.. मन शरीर में ममता है और विद्यमान का पता नहीं | ये अविद्या की तो बेवकूफी है | ये बेवकूफी के कारण तो दुःख भोग रहे है | ईश्वर को बनाना नहीं है, ईश्वर के पास जाना नहीं है, जगत को बदलना नहीं है खाली बेवकूफी को बदलना है बस… | सब आनंद हो जायेगा | अविद्या जुहोमि स्वाहा | मैं अविद्या को हवन कर रहा हूँ | फिर – अस्मिता जुहोमि स्वाहा | शरीर को ‘मैं’ मानने की बेवकूफी को अस्मिता बोलते है | हकिकत में हम शरीर नहीं है | हम शरीर होते तो मरने के बाद शरीर के साथ जाते | हम शरीर छोड़ के भी जाते ना.. तो हम शरीर नही है|  शरीर में ‘मैं’ पने की बुद्धि अस्मिता है | ईश्वर और हमारे बीच की नासमझी अविद्या है और शरीर को ‘मैं’ मानना अस्मिता है और अस्मिता के बेटे पैदा हुये – राग और द्वेष | जहाँ राग होता है वहाँ आदमी फँसता है | मरते समय भी कहीं राग रहेगा तो वहीं भटकेगा | पैसे में राग रहा, पत्नी में रहा, किसी में भी राग रहा, आम में राग रहा तो आम में कीड़ा बन गया , बड़ा प्रसिद्ध महात्मा  था | रागं जुहोमि स्वाहा | मैं राग को.. जो अग्निकुंड है शरीर में जो नाभि के उपर उसमें स्वाहा करता हूँ | द्वेषं जुहोमि स्वाहा | द्वेष से आदमी पचता रहता है | ये ऐसा है, ये ऐसा है जिसके विषय में सोचते है वो तो खाता-पीता खेलता है | लेकिन आप सोच-सोच के अपने ह्रदय में राग पैदा कर रहे | तो जो द्वेष से किसी का चिंतन करता है ना उसका चेहरा भी भद्दा होता है | तो द्वेषं जुहोमि स्वाहा |
तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष.. ये चार सारे दुर्गणों के मूल तो गये | पाँचवा है अभीनिवेश मृत्यु का भय | शरीर की मृत्यु होने वाली है तो उसका भय अपने को घुस आये | इससे मृत्यु तो टलती नहीं है, मृत्यु को बिगडती है | मरेगा तो शरीर मरता है | वो भी पाँच भूतों में लीन होगा.. मरता क्या है और हमारे को तो भगवान भी नहीं मार सकते क्योंकि हमारा आत्मा और भगवान का आत्मा एक ही है | जैसे घड़े का आकाश और महाकाश, जैसे तरंग और पानी एक है | ऐसे जीवन आत्मा-परमात्मा एक ही तो है | तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभीनिवेश ये पाँच क्लेश है जीव को फंसाने वाले | उसकी आहुति देना शुरू करो |
 अविद्या जुहोमि स्वाहा
 अस्मिता जुहोमि स्वाहा 
 रागं जुहोमि स्वाहा 
 द्वेषं जुहोमि स्वाहा
अभिनिवेष जुहीमि स्वाहा 
पाँच मिनट का काम है सुबह-सुबह, तीन महीने में आपकी साधना ऐसी चमकेगी की आप को लगेगा की अरे! इतने दिन हम….. | बिल्कुल निर्भार हो जावोगे, अच्छे विचार, संकल्प | संतों से जो मार्गदर्शन लेने आते हो तुम स्वयं मार्गदर्शक दुसरे के बन जावोगे | अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभीनिवेश पाँचो को स्वाहा करो | ये झगड़े क्यों होते है, मारपीट क्यों होती है, ग्रुपबाजी क्यों होती है | किसी ने ये लिखा है, किसी ने वो लिखा, कुर्सी के लिए नेता कोई भी करता है | राग और निंदा कुर्सी के लिए तो बढ़ा | नेता की कुर्सी तो आयी और वो गयी लेकिन लोगों के संस्कार बहुत दुःख बनाने वाले हो रहे, राग-द्वेष बढ़ाने वाले हो रहे है | तो उसका तोड़ ये है अपने साधक बचे रहे | जिसको बचना है वो बचे रहे | किसी के राग में आकर  फसों मत, किसीके द्वेष में आकर जलो मत | इसीका नाम दुनिया है ये तो चलता रहता है |
रागी आदमी अंधा होता है, अपने वाले का दोष नहीं देखता और दुसरे का गुण नहीं देखेगा | द्वेषी आदमी भी अंधा होता है जिसका द्वेष है उसका गुण नहीं देखेगा | बाहर आँखे होते हुये भी भीतर के आँख बंद हो गई| ज्ञानी तटस्थ है और नजर डालते ही पहचान जायेगा | ये आदमी ऐसा, वैसा है तो तुरंत उसके चित्त में सत्य का स्फुरना होगा | राग-द्वेष आदमी को सत्य से दूर कर जाते है | तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभीनिवेश | राग से किसी का पक्षपात करता है तो साधक नहीं है | द्वेष से किसी पर आरोप करता तो वो साधक नहीं है | साधक का भेस है लेकिन नकली साधक है | जो द्वेष करता है वो नकली साधक है | जो राग से पक्षपात और यूनियन बनाता है वो नकली साधक है | इनक्लाब जिंदाबाद!!!
वो नकली साधक है और दूसरे भी उनके साथी, जो यूनियन बनाते है वो साधक नहीं है | यूनियन दार द्वेष की बिना नहीं बनती | इनक्लाब जिंदाबाद!!! पक्षपात नहीं तटस्थ होना चाहिये | तो ये घर में यूनियन बन जाती है तीन आदमी एक तरफ दो-चार मेम्बर दूसरे तरफ लॉबीयाँ  बन जाती है | ये सब हल्की अवस्था है | घर में कलह बना रहेगा | तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभीनिवेश.. सुबह पाँच आहुतियाँ डाल दो मन से ही| तीन महीने १०८ दिन की साधना ही है | फिर तो करते रहोगे स्वाभाविक, करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी | जीवन बड़ा ऊँचा हो जाएगा | जैसे जल में कमल निर्लेप वैसे आप निर्लेप हो जायेगे, आपके डिसीजन अच्छे हो जायेगे |
मेरे को मेरा भाई रोकता था | तो मैं उसकी बात न मानकर सत्संग में जाता था | तो उसके मिलने वालों से, व्यापारियों से मेरे बारे में रुदन रोता था | मेरे भाई को समझावो| ऐसे तो अच्छा है, इतनी भक्ति करता है लेकिन वो साथ नहीं देता है | तो व्यापारी आकर मेरे को अपना-अपना भाषण सुनाते थे | मैं उनका सुनकर अंदर में समझता था कि जिन्होंने भगवान को नहीं पाया उनके उपदेश में क्या रखा है | उनकी बात को वजन नहीं देता | अब रासनिक का जमाना था हेरा-फेरी हुई और पकड़े गये | और वो ऑफिसर रिश्वत नहीं खाता था | नाक में दम हो गया तो सभी आये मेरे पास घुटने टेके| तुम संत आदमी, भक्त आदमी हम को बचावो | जो मेरे को भाषण ठोकते थे जब मैं २० साल का था उस समय | एक ऑफिसर ने नकेल कर दिया ब्लैक मार्केट वालों को.. सब के सब नाक रगड़ने लगे | तो मेरे ह्रदय में भगवान की प्रीति थी तो जिसके ह्रदय में भगवान की भक्ति का अभाव होता है वही सब लडते रहते है | राग-द्वेष के आग में जलते रहते है और दूसरों को ढकलते रहते है | ये सब नीच प्रकृति है | अकेले में विरोधी की निंदा करना अपने चमचों के आगे.. ये नीच प्रकृति है | अपने खुशामत खोरों की बातों में आना राग पूर्ण है| ये राग-द्वेष की आदते सब निगल जाता है | सेवा को, सच्चाई को.. सब निगल जाता है राग-द्वेष | तो इनको स्वाहा करो | जिसके प्रति राग होगा उसको द्वेष नहीं दिखेगा | जिसके द्वेष होगा उसका गुण नहीं दिखेगा | तो अंधापन हुआ ना बधू हो गया | अरे! राग-द्वेष में बेदाडा हो गया | हिटलर ने आपनी भी सत्यानाश की, जालियनवान बाग़ में कईयों की जाने लिई और खुद भी तडफ-तडफ के बुरी तरह मरा |
राग-द्वेष छोडो साधन-भजन के लिए टाइम निकालो | जब देखो… क्या करते है? काम बहुत है….| अरे! धूर्त क्या काम बहुत है ? हिप्नोटाईज होता है और दूसरों को करता है | राग-द्वेष छोडो, नालायकी छोडो | जो भी राग-द्वेष से प्रेरित है वो नालायक है | साधक की लायकात नहीं है उनमे | भगवान से प्रेरित होके कर्म करो, भगवान से प्रेरित होके बोलो | भगवान को साक्षी रखकर व्यवहार करो |
आम की सीजन शुरू हुई थी… पढ़ा-लिखा गधा पेटी लिए आये एक डजन हजार रूपये में | तो भाईयों के बच्चे खेल रहे थे | टिन्नू, मिन्नू दौडके आये | जहाँ अपना बेटा आया वो आम था छोटा | जहाँ भाई का बेटा आया वो आम था बड़ा | अब वो पढ़ा-लिखा, रागी-द्वेषी गधा.. आँख बंद करो मैं तुमको जादू दिखता हूँ | वन, टू, थ्री…. जहाँ भाई का बेटा था वहाँ छोटा आम आ गया | जहाँ आपना बेटा था वहाँ बड़ा आम आ गया | पढ़ा-लिखा गधा है | एम् ए और क्या क्या डिग्रियाँ थी | बड़ा बिजनस मेन होगा | ये लीला छोटे भाई ने देख ली| वो ऑफिसर था | उसने कहा भाई साहब अपन अलग रहे तो अच्छा होगा ? बोले- क्यूँ ? What is the problem?  बोले- very big problem. अभी से तुम ऐसी मैजिक करते हो तो जरा-सा आम टुकड़े के लिए तो कभी मैं इधर-उधर हो गया तो… टूर में जाता हूँ| कभी ऐसा-वैसा हो गया, एक्सिडेंट हो गया तो.. तुम तो ऐसे मैजिक करोगे तो मेरे बच्चे फुटपाथ पर और तुम्हारे बच्चे पूरा फ्लैट, दोनों फ्लैट तुम्हारे नाम हो जायेगे | I don`t want your magic. I want truth, I don`t want need of magic. कुटुंब टूट गया | बड़ा था अगर छोटे आम पे भाई का बेटा आया तो उसको बड़े आम पे लाना चाहिए था | बड़े का काम ये था | ये तो बेईमान था.. रागी-द्वेषी था | घर का बड़ा होगा तो द्वेषी होगा तो.. संस्था का बड़ा द्वेषी होगा… संचालक होगा तो संचालकी विफल होगा |.. ये रागी द्वेषी है.. कर्म बंधन में फंसते है | तटस्थ रहना चाहिये | तो ये पाँच मुसीबते है मनुष्य के पीछे लगी | उनको स्वाहा करें १०८ दिन का प्रयोग है | बड़ा अच्छा जीवन हो जायेगा, अच्छी बुद्धि खुलेगी, तटस्थ हो जावोगे |
हिन्दू भगवान को मानते है, मुसलमान नहीं मानते भगवान को | देवता भगवान को मानते है, दैत्य, राक्षस नही मानते | लेकिन नारदजी की बात तो देवता ही मानते है, हिन्दू भी मानते है, मुसलमान भी मानते है | संत भी नारद स्वरुप है हमारी बात मुसलमान भी मानते है | भगवान को माने नहीं माने बापू की बात माने | भगवान तो हिन्दुओं का है बापू सबके है | जो सबके होते है उनकी बात सभी मानेगे | रागी-द्वेषी सबका नहीं होता| रागी रागीयों का होता है और द्वेषी तो दुश्मनों का होता है | तो जो रागी है वो द्वेषी भी है लेकिन जिसमे राग-द्वेष नहीं है वो तो ईश्वर का रूप है, संत रूप है, फकीर है, दरवेश है |
शाकिर का सत्संग
ऐसा एक दरवेश का चेला था | वो दरवेश का चेला दरवेश ही था | ब्रम्हज्ञानी संत का चेला था | उसका नाम था शाकिर | यात्रा करने गया था कोई दरवेश.. किसी ने कहा रात को रहना है तो वो अल्ला का भगत है, हिन्दू संत, वेदांती संत, सूफी संत का भगत शाकिर है | शाकिर के घर चले जाओ | उस दरवेश को शाकिर ने रखा, खिलाया-पिलाया, सेवा की | दरवेश एक दिन ठहरने के बदले ढाई दिन ठहरा | जाते समय शाकिर ने (शाकिर माना शुक्रगुजारी) हज करने जाने वाले दरवेश को सुखी रोटियाँ, मीठी रोटियाँ, आचार, खजूर, ऐसा कुछ दिया कि दो-तीन दिन भोजन की दिक्कत न आये | दरवेश शुक्र गुजर करता हुआ, दुवा करता हुआ शाकिर गजब के हो | क्या तुम्हारी मेहमान नवाजी है ? तभी सभी गाँव वालों ने कहा कि शाकिर यहाँ जावो | सभी यात्री तुम्हारे पास ही आते है शाकिर | शाकिर ने कहा कि ये भी नहीं रहेगा | ये क्या कहे रहे हो ? बोले- ऐसे ही है | वो दरवेश यात्रा करके जब लौटा तो देखा की शाकिर का मकान बाढ़ में बह गया | खेत-खली उजाड़ हो गई.. नदी किनारे थी | शाकिर एक जमीदार के पास.. हमदाद के पास नौकरी करने लगा | अपनी टूटी-फूटी झोपडी में दरवेश को आराम करवाया | चटाई तो थी नहीं फटी बोरी पर रुखी रोटी खिलाई | दरवेश के आँखों में आसू थे की शाकिर जुलुम हो गया तुम्हारे साथ | बोले, वो नहीं रहा तो ये क्या करेगा | शुक्र करो अल्ला की मौज है | दरवेश ने कहा कि ये न रहे तुम तो आमिर हो जावो | बोले- वो भी नहीं रहेगा | कौनसी चीज सदा रहती है ?
दरवेश चला गया | हज तो करके आया लेकिन उस संत के.. शाकिर का सत्संग दरवेश को बड़ा प्रभावित किया | दरवेश ने सोचा की इस हज का निमित्त बनाता हूँ इस बहाने मुझे शाकिर जैसे सत्संगी का कुछ सान्निध्य मिलेगा | यात्रा करते-करते शाकिर के गाँव पहुँचा तो शाकिर हमदाद जमीदार की उसी जमीन में एक बड़ा आलिशान महल बना है और शाकिर उस महल का मालिक | शाकिर ने बताया की जमीदार का मुझ पर भरोसा हो गया था | उसे संतान नहीं थी, सोने की ढिगो में उसकी हिरे-जवाहरात गढ़े थे उसने मुझे बता दिये मरते-मरते | उससे तो पहले से हजारो गुना ज्यादा आमिर हो गया | अल्ला ने सुनी ! अल्ला करें तुम्हारी बनी रहे | बोले- वो नही रहा तो ये क्या रहेगा | दरवेश बोले- तुम ऐसा क्यों बोलते है ? बोले- ऐसा ही है नियम |
कह रहा है असमान, ये समा कुछ नहीं |
रो रही है ये शबनमें, ये नजारे कुछ नहीं |
जिनके महलों में, हजारों रंग के जलते थे फानूस |
झाड़ उनकी कब्र पे है, और निशान कुछ भी नहीं |
किसका क्या रहा ? रामजी गये, रावण गये, उनका परिवार गया | शाकिर का क्या रहेगा ? पहले की आमिर नहीं रही, बीच की गरीबी नहीं रही अब ये भी मेरी कब तक रहेगी | दरवेश ने कहा- गजब के आदमी हो | मै हज करके लौटता हूँ | हज करके लौटा तो देखा शाकिर मौत की गोद में सो गया | तो सारी मिलकत भू-माफियाँ ये – वो सरकारी अमलदार, सरकार सबने नोच ली |
दरवेश ने सोचा की ऐसे शाकिर के मज़ार पर में जाऊँ, उसकी कबर पे जाऊं, अल्ला से दुआ माँगू | कबर पे गया तो आँखे फट गयी | कबर पे लिखा था कि ये भी नहीं रहेगा | हद हो गई | अब इसको कौन उठाके ले जायेगा ? शाकिर जाते-जाते ये संदेशा दे गया कि, मेरी कबर पर ये लिख देना ये भी नहीं रहेगा | दरवेश ने कुछ दुआ माँगी | अब कब्र… ये भी नहीं रहेगी क्या ? जाते-जाते दो-चार साल बीत गये | बोले जाता हूँ शाकिर की कब्र को देखूँ | हज के बहाने शाकिर की कब्र का दीदार होगा | आये… देखे तो शाकिर की कब्र गायब | बोले- कब्र कहाँ चली गई ? बोले- तुमको पता नहीं है जिलजिला हुआ था भूकंप.. सब जमीनदोस्त हो गया और ये मकान वही खड़े है | हाजी को लगा कि मै तो हज कर-करके झक मार लिया लेकिन शाकिर ने सत्संग करके संसार का मिथ्या जाना और अल्ला का सत्यत्व जाना है | धन्य है शाकिर का सत्संग ! मैं तो हाजी बना लेकिन मेरे हजार हज की पुण्याई शाकिर के काम पर कुर्बान कर दूँ |
सत्संग ऐसी बड़ी बात है ये भी नहीं रहेगा | घोर अपमान होगा हो धीरज रखो ये भी नहीं रहेगा | घोर मान हो धीरज रखो ये भी नहीं रहेगा | कर्म का फल मिलता है |
एक आदमी बड़ा प्रसिद्ध था | बहुत प्रसिद्ध तुम जानते हो उसे, अच्छी तरह जानते हो, तुमने कई बार उसका नाम भी लिया है | उसको जिंगा खाने का शौक था, जिंगाबाज था | जिंगा खाता था वो समुद्री जंतु होते है | बहोत सारे पैर होते है उनको, मैंने मरे हुये जिंगे देखे है | मासाहारी लोग जहाँ मांस खरीदते है वहाँ मिलता है | तो जिंगे मरते है ना जाल में तो तडफ तडफ के मरते है | वो जिंगाबज आदमी बड़ा प्रसिद्ध था | लेकिन जिंगे तडफ-तडफ के उनके भोजन में आये तो वो बिचारा तडफ रहा है | जिंगा तो दो मिनट में अपनी जान देता है | लेकिन कई जिंगो की जान टूटी उतनी समय वो तडफ रहा है वो | सुन नहीं सकता, चल नहीं सकता, उठ नहीं सकता, बैठ नहीं सकता तुम जानते हो | बड़ा पद था | सरकारी नौकोरों के हवाले बिचारा कर्म गति…, उसकी पार्टी वाले भी उसका दुःख नहीं मिटा सकते, विरोधी पार्टी वाले क्या मिटायेगे ? हम भी नहीं मिटा सकते, कर्म की गति | इसलिए भूलकर भी ऐसे कर्म न करो कि उसका बदले बड़ा दु:ख भोगना पड़े |
कर्मप्रधान विश्व करि राखा जो जैसा करे तैसा फल चाखा |
नारायण हरि … हरि ॐ हरि ….
भूलकर भी ऐसे कर्म न करो | झूठ-कपट से कुछ दबाओगे लेकिन कर्म तो तुमको देर-सबेर फल दिए बिना नहीं रहेंगे | ये दूषित कर्मों को दबाकर गहरे मत बनाओ.. भगवान से प्रार्थना करों | एकादशी का व्रत आपके स्वभाव को बदलने में, तबियत को बदलने में बड़ा मदद करेगा |
आज मुझे उन बच्चों पर बड़ी प्रसन्नता है कि जो निर्जला एकादशी करते है | मेरे को वहम था कि मैं कर पाऊँगा या नहीं? इसलिए मैं करता नही था लेकिन आज किया तो पता चला की बड़ा आसान है | क्योंकि मेरी तो वायु प्रकृति है तो डकार आता है, सिरदर्द होता है | लेकीन आज की एकादशी ने क्या कृपा कर दी कि, न डकार है ना … ना सिरदर्द … ना कुछ | सुबह से मैंने कुल्ला के सिवाय पानी का उपयोग नहीं किया | एक घूंट पानी भी मैंने पेट में जाने न दिया | अब बड़ा ठीक लग रहा है |
तो जिन्होंने ये व्रत रखा है निर्जला एकादशी का उनके लिए सुबह घी डाल के पंचगव्य पिलाओ ताकि उनकी उमर लॉन्ग लाइफ रहें | उपवास से सफाई होगी तो गाय का घी बहुत काम करेगा |
दिमाग की कमजोरी हो तो –
ककड़ी के बीज, तरबूज के बीज, पतले पिस्ते (देशी), ममरी बदाम बहुत ताकत देते है दिमाग को | १५ दिन के लिए कोर्स करें तो दिमाग दबंग हो जाएगा | दिमाग की कमजोरी से बहुत सारी गड़बड़ियाँ होती है | खाली दिमाग की कमजोरी नहीं जायेगी पुरे नाडी जाल की कमजोरी चली जायेगी | अथवा तो  ममरी बदाम, मिश्री और गाय का घी उसको पीस के ७ दिन तक अनाज में दबा के रखते है और वो शरद पूनम की रात को बदाम छत पे रख दे चाँदी के बर्तन में | वो बनाकर १० ग्राम वो खाये | तो दिमाग मजबूत और नाडी तंत्र मजबूत हो जाता है | इससे माइग्रेन की बीमारी  ठीक होती है | तो इस युग के लिए उस प्रयोग की बड़ी महानता रहेगी|

हरि ॐ ॐ ॐ

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो …

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2 Comments on “5 क्लेशों की आहुती -108 दिन की साधना”

  1. sanket om Says:

    jay gurudev


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