विश्रांति का सहज तरीका

29th Oct’12 – Dhyan
ये भौतिक शरीर नही हूँ, ऐसा चिन्तन करो | शरीर ढीला छोड़ दो | इस शरीर को शव वत, मुर्दे की नाई मान कर शव आसन में चले जाओ | मन अब तो हापा-धापी छोड़, बुद्धि और अहंकार, अब ये ५-६ घंटे नींद के जो हैं, उसमें तो तुम्हे कुछ करना नही | जाओ तुम भी विश्रांति में | तुम प्रकृति के हो प्रकृति में लीन हो जाओ | मैं परमात्मा का हूँ, चैतन्य | मैं अपने सो-हम स्वभाव में आता हूँ | स्वास अंदर आया, सो, बहर आये तो हम | वो चैतन्य आत्मा हूँ मैं जो मरता नही, वृद्ध नही होता, प्रलय, महाप्रलय भी जिसको कुछ नही कर सकता | मैं वो चिद्घन चैतन्य हूँ | शांत हूँ, आनंद स्वरूप हूँ | नित्य नवीन रस देने वाला, मन-बुद्धि को पुष्ट करने वाला | कभी कृष्ण के नाम से तो कभी कंस के काम से | मेरी सभी लीला हो रही है | कभी साधक के रूप में तो कभी साईं के रूप में सारा मेरा विस्तार है, ॐ…. शांति |
पीड़ितों में कहराने की सत्ता मेरी है और खुश रहने वालो में खुशहाली मेरी है | मेरे सभी अभिनय हैं | वही मैं चैतन्य आत्मा हूँ | सो-हम | शान्तो-हम, सब कुछ हो गया | अधिकारी हों तो काम हो जावे | नही तो भी शुद्धि तो हो ही गयी | ॐ…. शांति | हम परमात्मा स्वभाव में विश्राम पा रहे हैं |  ॐ…. शांति |
रास लीला इन्द्रियों और मन में विचरण करने वालो के लिए अत्यंत उपयोगी है | रास लीला के बाद गोपियों को विश्रांति में भी भगवान ने पहुंचाया था | सारी लीलाओ के मूल में भी भगवान ने गोपियों को पहुंचाया था | इसलिए शुकदेवजी कहते हैं यथा गोपी का नाम | भक्ति कैसी हो, गोपियों जैसी, परा भक्ति | परा भक्ति में विश्रांति है कुछ नही करना है आपको | शरीर मैं नही हूँ, मन मैं नही हूँ | बुद्धि मैं नही हूँ, अहंकार मैं नही हूँ | ये प्रकृति की हैं आठो चीजे | मैं चिद्घन चैतन्य | भगवान नारायण ४-४ महीने इसी विश्रांति योग में होते हैं | तो आप थोड़ी देर विश्रांति करो | रात को सोते समय विश्रांति योग का प्रसाद पो | मैं दिन में कोई साधना नही करता, रात में बस विश्रांति | रात भर साधना हो जाती है | साधना क्या है ? विजातीय को हटा दिया, सजातीय तो है ही है | विजातीय में सतबुद्धि नही है तो बस विजातीय आओ, सजातीय आओ-जाओ क्या है ? सिनेमा को सिनेमा समझे,  संसार तो सिनेमा है, सपना है और उसको जानने वाला चिद्घन चैतन्य अपना है | ॐ… आनंद ॐ…..| जैसे स्वप्न दृष्टा से भी सपने की चीजे हैं ऐसे ही चैतन्य से सारा ये | ॐ… शांति … |
रूपम मधुरम, एक-एक शब्द स्वप्न हो गया | सारी मधुरता का उद्गम स्थान मेरा सो-हम स्वभाव | श्री कृष्ण भी इसी में विश्रांति पाकर जब प्रवेश करते नगर में तो किसी का प्रणाम स्वीकार करके मधुर मुस्कान देते | तो किसी को प्रणाम करके मधुर मुस्कान देते, किसी के चरण छूकर लेते | किसीका अभिवादन करके मिलते, किसीका अभिवादन लेके मिलते | लेकिन जो बिलकुल साधरण होते, उनसे तो एक-एक से मिलते, नजिक से | और उनकी दुखद मान्यता हटाकर आवश्यकताए पूर्ति का कुछ करके उनके भी दुःख हरते थे | घोड़ो की मालिश करते और जख्मों में मरहम लगाते | ड्रेसिंग का धंधा भी जानते थे | मलहम पट्टी का काम भी जानते | वैद्य का काम भी जानते | युद्ध में भी कुशल | मथुरा में इतनी बार युद्ध हुआ, मथुरा का एक भी बंदा मरने नही दिया | अपने आप में तृप्त रहने की कला जानते थे | संतुष्टि और तृप्ति सभी की मांग है | और श्री कृष्ण तृप्त रहते थे और बंसी बजाकर भी तृप्त करते थे | केसिओ हो, बंसी हो, बाज-गाज ये  गंधर्व विद्या के करण होते है | वो भी कृष्ण जानते थे | वोही कृष्ण अभी आत्म रूप में हमारे अंतरात्म हैं | कर्षित, आकर्षित आनंदित करने वाली चैतन्य का नाम कृष्ण है | वोही कृष्ण के प्रकटय के पहले ही वेदों में हजारो वर्ष पहले ही कृष्ण शब्द की व्याख्या है | ॐ ….. | और ॐ तो भगवान विष्णु के पहले ही है | ॐ शांति..| सो-हम | वैदिक मन्त्र | शांति, आनंद | जन्म-जन्म की थकन मिटाने को हम अंतरात्मा में आराम पा रहे हैं | ॐ….. | आज तो खीर बनी है लेकिन कल चाँद पूरा होगा, पूनम पे तो कल भी खीर बनाना | एकादशी से पूनम तक चन्द्रमा की किरणों का लाभ ले | ॐ……..कीर्तन ……|
Advertisements
Explore posts in the same categories: Pujya Bapuji

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


%d bloggers like this: