भगवन नाम से बैलों से भी दूध दोया जा सकता है

Ramgarh (Jammu) – 2ndNov’12

भय नाशन दुरमति हरन कलि में हरी को नाम, निश दिन नानक जो जपे सफल होवहि सब काम |
मदन मोहन मालवीय का नाम सुविदित है | वो जब कोलेज जा रहे थे तो माँ को बोले, माँ, मेरे पेपर हैं, आशीर्वाद दे मैं पास हो जाऊ | माँ बोली, ये तो तू हर ६ महीने, १२ महीने भीख मांगता रहेगा क्या ? आशीर्वाद, आशीर्वाद, सारे आशीर्वादो का जहाँ खजाना है, उस खजाने को खोलने की कुंजी मेरे पास है | बोले मैया बता दे फिर | अभी कहे को फिर कभी | अरे माँ, भूख लगाके फिर बोलती है अभी कहे को खिलाऊँगी | अरे माँ क्या अभी भूख तेज करना है ? तू मेरी माँ है न बता न | बोले इसे कोई चलते-फिरते बताया जाता है क्या ? नही माँ | मैं बैठता हूँ, तू जो बोले मैं वो करता हूँ | तेरे को देर हो रही है, जा | बोले नही-नही माँ | वो कुंजी लेने में फिर बात रह जाएगी | जा कुल्ला क्र ले, तिन आचमन पानी पी ले | गर्म आसन पे, कम्बल पे पलथी मार के बैठ | खाबे कान में ऊँगली डाल | ये है नर-नारी का अयन, नर-नारी का चैतन्य | जिसको सिख अकाल पुरुष कहते हैं | शंकराचार्य अद्वैत ब्रह्म कहते हैं | भक्त जिसको भगवान् कहते हैं | उसका चार बार तू नाम लेकर कोई भी काम प्रारम्भ करेगा, पेपर लिखना हो, चाहे पढाई करनी हो | बेटा इस नाम में, इस कुंजी में इतनी ताकत है, मदन तुझे मैं क्या कहू ? ये कुंजी हर प्रकार के ताले खोल देती है | ये ऐसी कुंजी है बिटू के गाये तो दूध देवे लेकिन बैल से भी दूध ले ले | तो माँ बता न | अरे बहुत जोरदार है | चार बार बोलना है | कोई भी काम करो, दिन की शुरुवात हो, अथवा पेपर की शुरुवात हो, पढाई की शुरुवात हो, शुरू में ही चार बार जपना है बस | नारायण, नारायण, नारायण, नारायण || बस | चार बार ही जपना है | वो तो गए जपके पेपर देने | मार्क तो अच्छे आये लेकिन कुंजी मिल गयी | कोई भी काम करे चार बार नारायण….. | शास्त्र कहता है के
सर्वदा सर्व कालेषु, नास्ति ते शाम अमंगलम, ये शाम हृय्स्त भगवन, मंगलाय तनो हरी | सर्वदा और सब समय में उनका अमंगल नही होता जिनके हृदय में मंगलाय तन हरी, भगवान् का सुमिरन, आश्रय, प्रीति | फिर दूसरा श्लोक बोलता है |
नित्य उत्सव भये ते शाम, नित्य श्री, नित्य मंगलम, ये शाम हृय्स्त भगवन, मंगलाय तनो हरी | उनके जीवन में सदा उत्सव, सदा मंगल रहता है, नित्य श्री , श्री माना सम्पदा | बाहर की सम्पदा तो सम्पदा दिखती है, लेकिन सत कर्म वाली बुद्धि भी एक सम्पदा है | लोगो के सद भाव हमारे साथ रहे ये भी एक सम्पदा है | और सुख-दुःख में सम रहे और मरने के पहले जिसकी मौत नही होती उस आत्मा के ज्ञान को और रस को पा लेने वाली मती भी एक सम्पदा है | नित्य श्री, नित्य सम्पदा और नित्य उत्सव उन्ही के जीवन में रहता है, जिनके जीवन में मंगलाय तन हरी का ज्ञान, आश्रय, प्रीति | पुरुषार्थ अपना लेकिन सम्पुट हरी का उसके सिवाय कितना भी धन हो, कितनी भी सत्ता हो, कितना भी सौन्दर्य हो, कितना भी सामर्थ्य हो, आदमी भीतर से खोखला रहता है | हे शराब, कबाब, दुराचार, तुम मुझे सुख दो | ऐसे करते-करते शाहजहाँ की नाई उसका जीवन तुच्छ हो जाता है | कश्मीर में बात आती है तो , कश्मीर की घटना तो मैं सुनाऊंगा आपको |
सोने की लंका होने के बाद भी अंदर की श्री नही हुई तो रावण अपनी मन्दोदरी तो क्या अपनी लंका की सुंदरिया, आखिर सीताजी को लाकर अपनी मुसीबत का प्रदर्शन करा दिया उसने | श्री बहुत ऊँची चीज है | आत्म-संतुष्टि, आत्मरस | नानकजी ने बहुत सुंदर बात कही |
भय नाशन दुरमति हरन कलि में हरी को नाम, निष् दिन नानक जो जपे सफल होवे सब काम | शास्त्र कहते हैं
शतं विहाय भोत्व्य्म, सौ कम छोडकर भोजन कर लो | सहस्त्र्म स्नानम आवृत, हजार काम छोडकर स्नान कर लो | लक्ष्म विहाह्य दातव्यम, लाख काम छोडकर दान, पुण्य, सत कर्म कर लो | मरने वाला शरीर है, क्या पता कल किसने देखि | कोटि त्यप्त्व हरी भजे | करोड़ काम छोडकर अपने जीवन में हरी का ज्ञान, प्रीति, स्मृति और हरी में तृप्त रहने की कला पा लो | जो हरी में तृप्त रहने की कला पा लेते हैं, उनके लिए नित्य उत्सव, नित्य मंगल, नित्य श्री | न्यू यॉर्क, न्यू जर्सी में दीक्षित साधको को कोई परेशानी नही हुई ठीक वैसे ही जैसे भोपाल गैस कांड हुआ था तब भी हामरे साधको को कुछ नही हुआ था | हेलिकॉप्टर के हादसे में भी हमे कुछ नही हुआ | ये चमत्कार हुआ, ऐसा हम इसलिए बोल देते हैं के हमारी वहां गति नही है | ये एक अकाट्य सिद्धांत है |
आप पी.एम्. के, सी.एम्. के गेस्ट हो जाते हो, मैं जम्मू, कश्मीर में जब जाता हूँ तो राज सरकार ने मुझे राज्य अतिथि घोषित किया |
एक सौ चौवालिस्वि कलम या कर्फु में भी चाहे गोवा में हो या खिन और पर सत्संग तो खूब आराम से चला |
शबरी भिलन के जीवन में मंगलाय तनो हरी | भगवान अंतरात्मा का सत्संग है | तो श्री रामजी शबरी के द्वार जाते हैं और झूठे बेर खाते हैं | और रावण के पास सोने की लंका है, लेकिन भगवत रस, भागवत शांति, भागवत प्रसद्जा मति नही है, तो न करने जैसी चेष्टा करने के कारण रावण सारीं जीती हुई बाजियां हार कर चला गया | और हर १२ महीने दे दिया सलाई | हर १२ महीने रावण को जलाने की आवश्यकता नही है | लेकिन समाज को संदेश मिले के परम सत्ता से विमुख होकर तुम सोने की लंका भी बना लेते हो, तभी भी तुम्हारा जीवन नालत से भरा है | अगर भागवत आश्रित तुम्हारा जीवन है, भागवत आश्रित मतलब वो आलसी नही होता वो बड़ा पुरुषार्थी होता है | नासमझ नही होता बड़ा समझदार होता है | आप मेरे को नासमझ बोल सकते हो क्या ? आलसी बोल सकते हो क्या ? तो भागवत आश्रय नही है क्या ? तो भागवत आश्रय तो आदमी को ६ सद्गुणों से भर देता है | आप अपने हृदय पटल पर लिख देना |
उद्यम, साह्स्म, धेर्यम, बुद्धि, शक्ति, पराक्रमः, षडेते, यत्र, वर्तन्ते, तत्र देव सहायकृत |
वो अन्तर्यामी देवता सहायता पग-पग पे करता है | अकबर ने पुचा बीरबल से सदा प्रसन्न, सदा सुखी कौन व्यक्ति रहता है ? बोले जिसने भागवत रस चखा है | और जिसके जीवन में उचित निर्णय लेने वाली मति है प्रसंग उचित | वो सदा प्रसन्न रहेगा, सदा सुखी रहेगा | अकबर ने कहा अच्छा बच्चू देख लेंगे | ऐसे मौके खोजता था अकबर | बीरबल की बात को निचा दिखाए | लेकिन बीरबल की बुद्धि बचपन में ही सारस्वते मन्त्र ली हुई थी | तो प्रसंग उचित निर्णय करने की तो उसको इश्वरी सत प्रेरणा मिलती थी | आयोजन हुआ बीरबल, अकबर और दुसरे कुछ खास-खास | वन गमन दिवस | और अलग-अलग अपना टेंट लगाया | बीरबल स्वयम पाकी थे, स्वयम अपनी रोटी पका रहे थे टेंट के बाहर | महावत को बुलाया, वो जो बदमाश हाथी हैं न अपना उसको खूब दारू पिलाओ और बिर्बलिया पे छोड़ो | और प्रसंग उचित हाथी से कैसे बचते हैं हम देखते हैं | क्योंकी बीरबल को बचपन में सारस्वते मन्त्र मिला था उसे बुद्धि में आत्मा का प्रकाश लेने की अटकल आ गयी थी | बीरबल रोटी पक्का रहा है, वहां से बदमाश हाथी दारू पीकर छोड़ा गया | और वो तो बदमाशी की अपनी खबर दे रहा है | पेड़, पौधे, लताओं को उखाड़ता हुआ, चिंघाड़ता हुआ, बीरबल की तरफ बढ़ रहा था और महावत उसे उतेजित क्र रहा था | बीरबल ने रोटी पकाते समय सामने कुत्तिया थी उसको रोटी का टुकड़ा डाल दिया | कुत्तिया ने टुकड़ा खाया उसको विश्वास हुआ, नजिक आई, दूसरा टुकड़ा डाला, और नजिक आई, तीसरा डाला | कुत्तिया एकदम नजिक आई | हाथी नजिक आये उसके पहले कुत्तिया के दो पेर पकड़ के हाथी के सर पे दे मारी | हाथी ने देखा ये कौन सी आपदा आ गयी | हाथी पर चढ़ी कुतिया अब निचे जम्प भी कैसे मारे | हाथ, पेर इधर-उधर | तो वो कुत्तिया के जो नख थे हाथी को लगे | और कुत्तिया बोले हा…. और हाथी चिंघाड़े | जहाँ से आया वहीँ हाथी भागता चला गया | अकबर ने बीरबल का लोहा मान लिया के प्रसंग उचित निर्णय |
जब हेलिकॉप्टर गिरा तो पेट्रोल फैला और पीछे के हिस्से में आग लगी | तो आग न फैले ये देखने की सत्ता किसकी थी | फाइबर का शीशा था आगे वो टुटा | हम तो स्वयम निकल जाते लेकिन भावना का टोला, भक्तो का | २-३ व्यक्तियों ने मेरा इधर का हतः पकड़ा, खिंचा | ३ व्यक्ति इधर से खींचे, २-४ उधर से खींचे और बेल्ट बंधा हुआ| मैं बोलू बेल्ट बंधी हुई है भक्त बापूजी, बापूजी चिल्लाये | करोड़ो लोग मुझे रोज सुनते हैं | लेकिन ये ५-२५ लोग मुझे काहेको सुने ? वो वहां से खींचे, वो वहां से | और बेल्ट मेरे को छोड़े नही | बेल्ट का हिस्सा बेल्ट के पास रहता और उनके हाथ वाला हिस्सा उनके पास जाता | हेलिकॉप्टर ने तो मेरे दो टुकड़े नही किये लेकिन ये भावुक भक्त | अब मैं क्या करूं ? उसी समय प्रसंग उचित निर्णय हुआ | मैंने पेट अंदर को दबाया और बेल्ट निचे होने लगी, मैं उपर होने लगा | जैसे बच्चे की चड्डी फसती है और माँ निचे से उतारती है एसे मैंने बेल्ट निचे से उतारी और ऐसी आईडिया से उतारा के लुंगी बनी रही | अगर बेल्ट के साथ वो कपड़ा भी हट जाता तो जैसे जन्मे थे वैसे बाहर निकलते | तो मुझे कितना वो होता | आप समझ गये | तो प्रसंग उचित निर्णय के पीछे परमात्मा की सत्ता | जहाँ सुमति तहां सम्पत्ति नाना, जहाँ कुमति तहां विपत्ति निदाना |
तो मदन मोहन मालवीय की माँ ने कहा के बेटा बार -बार तू मुझ से आशीर्वाद मांगे, नही आशीर्वाद का जो ग्राम है, उसपे जो ताला लगा है, नारायण, …….. ये है कुंजी | जब भी तू कोई काम करे, चार बार ये चिन्तन कर लेना | चिन्तन करके काम में लग तुझे सफलता मिलेगी | मदन तू गाये से, भैंस से तो दूध ले सकता है, लेकिन भैंसा का दूध निकलना चाहे तो वो भी तेरे को, मजबूर हो जायेगा | बैल से भी तू दूध निकाले | माँ ने तो ये कह दिया | बही साहब पास हुए | स्वतंत्र सेना संग्रामियों के साथ, गांधीजी के साथ जुड़ गये | और गांधीजी, तिलकजी, नेहरूजी और दुसरे | अंग्रेज शासन ने उनको जेल की हवा खिलाई | लेकिन मदन मोहन मालवीय कभी अरेस्ट नही हुए | ओपनिंग सेरेमनी में जा रहे हैं | रिबिन काट रहे हैं | पत्रकारों नेपूछा के आप ब्रिटिश के आदमी है क्या ? बोले आपको क्या लगता है ? मैं ब्रिटिश का आदमी हो सकता हूँ ? बोले नही | तो ब्रिटिश शासन तुमसे डरता है क्या ? बोले मैं एक व्यक्ति और वो तो पूरा शासन है मेरे से डरेगा क्यों ? तो गांधीजी, तिलकजी, नेहरूजी जैसे जेल की हवा खा रहे हैं, और तुम इधर उद्घाटन क्र रहे हो तो क्या रहस्य है ? बोले गांधीजी बोलते हैं, के विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार करो | तो बहिष्कार का इन लोगो का जो नारा है, उससे कानून भंग होता है | और मैं सभाओ में कहता हूँ के आज से भारत वासी पक्का निर्णय करो, के स्वदेशी वस्तु ही उपयोग में लायेंगे | बात तो वहीं  की वहीं लेकिन कानून का भंग नही होता ये प्रसंग उचित निर्णय करने के कारण मैं आजाद घूम रहा हूँ और वो घसीटे जा रहे हैं | आखिर अंग्रेजो ने एक ऐसा दाव खेला, के ये स्वतंत्र सेना संग्रामी  की आपस में ही तू-तू मैं-मैं हो जाये और इनका सम्मेलन विफल हो जाये | और अंग्रेज सम्मेलन विफल करने में सफल हो गये | सबका हौसला टूट गया |
मदन मोहन मालवीय नारायण,…..करके शांत हुए | अंदर से प्रेरणा हुई | गजेन्द्र स्त्रोत का पाठ करो | गजेन्द्र स्त्रोत का पाठ करके नारायण,….., सबको एकत्रित करके १९ मिनट का प्रवचन दिया | लाखों, करोडों खर्च करके जिस सम्मेलन को विफल कर रहे थे, १९ मिनट के प्रवचन ने फिर स्वतंत्र सेना संग्रामियों को संगठित कर दिया | अगर अंग्रेजो को भगाने में गाँधीजी को यश जाता है, लेकिन वैसे का वैसा यश मदन मोहन मालवीय जी के नारायण…… नाम को भी देना चाहिए | मदन मोहन मालवीय जी ने सोचा की मैं एक ऐसा कोलेज बनाऊ जिससे भारत वासियों को अपनी संस्कृति का पता चले | काशी विश्व विद्यालय | तो अब चंदा लिया गया | काशी वाले बोले हमारा ५१ रुपया लिख लो, १०१ लिख लो, २५१ लिख लो | मालवीय जी ने कुछ काम करवाया फिर कहा के आप लोग काम चालू रखो, मैं जाता हूँ, हैदराबाद | हैदराबाद का नवाब हमारे साथ आंदोलन में थे | तो वो नवाब हैं | उनसे मैं काफी पैसे ले आता हूँ | नवाब के यहाँ गए तो नवाब ने कहा के अब भई तुम लोगों का विश्व विद्याल बन रहा है काशी में | इससे हमारा क्या लेना-देना ?  हमारा हैदराबाद घुमो | आप हमारे गेस्ट हैं | लेकिन, डोनेशन | मन में वही जपा नारायण……. | चाहे कोई परिस्थिति हो, चाहे कोई आघात लगा हो, ये आप के लिए कुंजी दे रहा हूँ | आप भी कई परिस्थितयों से गुजरते हो, नारायण…… | है बहुत सामान्य | ऐसा कहके मालवीयजी न रुष्ट हुए, न निराश हुए, न पलायन हुए, सहेज में रवाना हुए | रस्ते में देखा कोई वृद्ध आदमी मर जाते हैं न तो हिंदू लोग पैसे फेकते हैं, चीलर | मालवीयजी चवन्नी, दुवन्नी, आना, दो आना वो जमाना था | वो चीलर चुन रहे थे | तो सी.आई.डी. वालो ने जाकर नवाब को बताया के इतने बड़े मालवीयजी और जो भीख मंगे छोरे चुनते हैं या कोई शकुन के लिए चुनता है,  वो चीलर चुन रहे हैं | बोले मालवीयजी को बड़ी इज्जत से लाओ | मालवीयजी को पूछा के आप जैसे इतने बड़े आदमी और सड़कों पर, फुटपाथ पर चीलर ढूंढने वाले दो पैसे के लोगों के साथ आप लगे मुझे ये बात समझ में नही आती | मालवीयजी ने फिर उसी हथियार का उपयोग किया भीतर नारायण,….. | बोले मैं साथियों को बोलके आया था, के मैं जाता हूँ हैदराबाद के नवाब के पास, वो हमे बहुत सारी सहायता देंगे | कोलेज बन जायेगा | लेकिन आपने ना बोल दिया | तो मैं क्या कह सकता हूँ आपको ? आप तो अपनी मर्जी के मालिक हैं न | तो साथी पूछेंगे कुछ पैसे लाए तो मैं क्या बोलूँगा ? हैदराबाद वाले कंगाल हैं कुछ नही दिया | नही ! जिंदो ने नही दिया तो मुर्दे तो उदार हैं | उन्होंने दे दिया है | वो बरकत का समझ के ले जाता | अब महाराज माँ ने जो कहा था बेटा गाये तो दूध देगी, तू बैलों से भी लाएगा | लाखों रूपी का चेक दिया और दूसरा भी हम बैठे हैं कोलेज आप बनवाओ | बैलों से भी दूध निकालने कई कला इस भगवन के आश्रय में है | तो कठिन से कठिन काम भी सुगम करना हो तो भगवान की सत्ता, भगवान का आश्रय, भगवान में विश्वास और भगवान में प्रीति करो | और अपना उद्यम करो |
यमुनाजी वृन्दावन, मथुरा आदि से गुजरती है | साधू लोग झोपडी बना कर भजन आदि करते हैं | एक साधू ने झोपडी बनाई घास-फूस की | चौबीसों घंटे तो माला नही होती तो साधू बाबा ने कुछ न कुछ उद्यम किया | जामफल के पौधे लगा दिए साधू बाबा ने | और छोरा कोई २५-३० साल का गुजरा वहाँ से घोडा लेके | बाबा बोले मैंने वहाँ खेत लगाया है थोडा वहाँ से जा | वो बोला बाबा इधर बालू में कोई खेत होता है क्या ? हम तो बैल खेत में ले जायेंगे | क्या करा बाबा से भीड़ गया | बाबा ने हाथ फैला दिए | नही जा सकते | उठाया डंडा जो बैलों को पिटने का था | यूँ उठाया, बाबा को मरने जाये तो उसके हाथ वहीं रह गए | ये घटित घटना है | अखानान्दजी महाराज ने बताई मुझे ये बात | डंडा उठाया, पर प्राण शक्ति, वायु देवता जब चले तो हाथ चले | और चक्कर खाकर छोरा भी गिर गया, बैल भी गिर गए | गॉव वाले आये, बाबा से माफ़ी-वाफी माँगी, बाबा ने भगवान को प्रार्थना की, यथावत हो गए | कुछ समय बाद जो पौधे लगाये थे जामफल के बढियां फल हो गए | बड़े मीठे जामफल हुए | तो अखानान्दजी ने पुचा के जब छोरा आपको डंडा मरने को उद्युत हुआ तो आपने कौनसा मंत्र से उसके हाथ रोक दिय ? बोले भाई मंत्र तो कोई नही जो भगवान के साथ तदाकार होता है तो, वायु, जल, तेज, आकाश ये ५ भुत भगवान के अनुकूल होते हैं | तो जो भगवान से जुड़ा है, तो ये ५ भुत हमारे अनुकूल हो गए, जामफल भी हुए और उसको चक्कर भी आये और उसका अडियल पना भी मिटा और वो भक्त बन गए |
तो गुरवाणी कहती है जो तू मेरा होए तो मैं तेरा होऊ | आप इश्वर के थे, इश्वर के हैं और इश्वर के ही रहेंगे | शरीर आपका थोड़े दिन आपके पास है | शरीर बेवफा है, लेकिन इश्वर वफादार है | शरीर मरने वाला है, आत्मा अमर है | जो मरता नही, बिछड़ता नही, बेवफाई नही करता उसका नाम है आत्मा-परमात्मा | जो मरता है, बिछड़ता है, बेवफाई करता है उसका नाम है शरीर और संसार | तो शरीर, संसार का सत उपयोग करो | और जो मरता नही, बिछड़ता नही, बेवफाई नही करता उसका ज्ञान पा लो | उससे प्रीति कर लो और उससे प्रीति और ज्ञान होने से तुम्हारा व्यवहार भी बन्दगी हो जायेगा | हरी ओम…… | ओमकार मंत्र जपने से लोग दवा के बिना ठीक होते हैं | लेकिन ओमकार मंत्र के २२००० श्लोक हैं | अलग, अलग ढंग से जपने से अलग-अलग फायदे होते हैं | दिन को जो अच्छे कम किये वो प्रभु को अर्पण कर दो | जैसे बच्चा माँ की गोद में वैसे रत को भगवान की गोद में सो जाओ | फिर सुबह उसको याद करते हुए दिन की शुरुवात करो | प्रभु मैं तेरा, तू मेरा | आज हमसे अच्छे काम करवाना जो तुम्हे पसंद हो | फिर एक प्रयोग करो | एक बार दाये से स्वास लो रोको भगवान का नाम जपो, फिर बाये से छोडो, फिर दाये से लो, ….. ऐसा तिन बार करो | फिर दोनों नथुनों से स्वास लो कंठ से ओमकार का जप करो और गर्दन आगे पीछे करो | ये दो बार करना है | फिर दोनों कानो में ऊँगली डालो और दोनों नथुनों से स्वास लो | कंठ से ओम का जप करो | ये १० बार करो | इससे अंतर आत्मा श्रृष्टि का सबंध जुड जाता है | ओम…….. | एर्थिंग ना मिला इसका ख्याल रखना | ओम….

 

मनुष्य जन्म मकान बनाना, रुपया-पैसा इकट्टा करना और दुखी-सुखी होते-होते मर जाना उस लिए नही है | रुपया-पैसा, मकान-वकान ये तो बिलकुल छोटी चीज है | अपने दिल को बनाना है | दिल में दिलबर का ज्ञान, दिलबर की प्रीति हो | और दिलबर के नाते संसार में रहे | और संसार को मुसाफिर खाना समझे | और भगवन को अपना समझे | बस, इससे मती, गति ऊँची हो जाती है | धन-तेरस को लक्ष्मी का पूजन इसलिए किया जाता है के हमारा धन पाप में ना जाये | लक्ष्मी का पूजन इसलिए करते हैं के ये लक्ष्मी हमको नारायण से मिलाने वाली हो | धन की शुद्धि, मन की शुद्धि, भावो की शुद्धि, कर्मो की शुद्धि, शुद्ध फल की प्राप्ति | शुद्ध फल भी भगवन की प्रसन्नता के लिए बहुतो के मंगल में लगा दिया तो भगवन स्वयम अंतर आत्मा हमे अपनी प्यास देते हैं | इश्वर प्राप्ति | इश्वर प्राप्ति की प्यास हुई और सच्चे संत मिल गए तो फिर इश्वर तो अपना आत्मा है | कठिन नही है | पानी की प्यास हो और घड़ा, पानी पिलाने वाला पास में हैं फिर पिने में क्या देर है ? ऐसा ही है | ईश्वर प्राप्ति कठिन नही है | दुर्लभ नही है, परे नही है, पराया नही है | जिसको हम कभी छोड़ नही सके वो तो ईश्वर है | और जिसको हम सदा रख ना सकें वो शरीर है, संसार है |  बचपन नही रहा लेकिन बचपन को जानने वाला ईश्वर तो है | दुःख नही रहे, दुःख को जानने वाला तो है ही | सुख नही रहे, सुख को जानने वाला तो है ही | हमारा अंतरात्मा ही ईश्वर है | एक-एक शरीर में हैं तो आत्मा बोलते हैं | सर्वत्र है तो परमात्मा है | एक घडे में है तो घटाकाश है | लेकिन घडे के कारण घटाकाश, बाकि तो महाकाश है | ऐसे ही शरीर के कारण आत्मा | नही तो परमात्मा ही है | परमात्मा कहीं बैठके दुनिया बनाते हैं इस चक्कर में नही आना | हमारे आत्मा का नाम ही परमात्मा है |
धरती पे इतने मनुष्य नही जितने बक्टेरिया है |
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One Comment on “भगवन नाम से बैलों से भी दूध दोया जा सकता है”

  1. Sandeep Kumar Says:

    Hari hari om !
    Sadho prabhuji kripa banayen rakhen,
    Hariom


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