गुरु सेवा का महत्व

29th Oct’12 – Mathura
कुछ नही ये तो संत पुरुष का दर्शन महा टंकसाल है | लाखो-करोड़ो रूपय खर्च करके ये हवन यज्ञ करो, मरने के बाद स्वर्ग मिले, फिर गिरो | लेकिन ये एक बार दर्शन करो और अन्तर्यामी प्रभु की दीक्षा लो | भगवान से सीधा सबंध, मुलाकात | धर्मदास ने कहा के अब बाबा मैं यहीं रहूँगा | आनंद की गिनियाँ तिजोरी, सत्य की रही अशर्फी, इतना कह मन कीन्हा विचारा, तब कबीर उन और निहारा | कबीर जी ने धर्मदास की और देखा | आओ धर्मदास पग धरो | कुहुक  , चुहुक , कुहुक , तुम काहे निहारो ? टिकटिकी लगा कर तुम मेरे को क्यों देख रहे हो ? एसा प्यार क्यों उभर रहा है ? कुहुक, चुहुक, कुहुक, चुहुक काहे निहारो ? धर्मदास हम तुमको चिन्हा | हमने तुमको वृन्दावन में देखा के ये बाहर के मन्दिर में जाने का अधिकारी नही है |  अब इसको हृदय मन्दिर में पहुँचना है | इसकी यात्रा बाहर को भटकने की पूरी हो गयी | अब अंतर आत्मा में आना है | इसलिए मैंने तुमको कहा था और उस दिन से तुम फिर बाके बिहारी को अंतरात्मा के रूप में देखने के लिए वापिस चले गये | धर्मदास हम तुमको चिन्हा बहुत दिन में तुम दर्शन दीन्हा | ६ महीने के बाद पहुँचे हो | धर्मदास को अंतरात्मा में शांति मिलने लगी | आनंद आने लगा | जमीन, जायदाद, दुकान, कारोबार, जाकर बाँट कर आ जून, साधू बन जाऊ | लेकिन जाने में बाँटने में भी तो समय लगेगा, खत लिख दिया के जो भी मेरी जमीन, जायदाद, दुकान, सम्पदा है, वो जैसा भी हो तुम लोग कर लेना | अब मुझे अच्छी महा  टंकसाल मिल गयी है | अब मैं गुरु के चरण छोड़ कर नही कहीं जाऊंगा | धर्मदास कबीरजी के शिष्य हुए तो फिर कबीरजी के दैवी कार्य में लगे और फिर अंतरात्मा, परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया | गुरु का कार्य करने को मिले इससे बड़ी तपस्या क्या हो सकती है ?
कबीरजी के विचारो को दुसरो तक पहुँचाने में भागीदार होने का निमित बनता है ये बड़ी एकांत, बड़ा तप, बड़ा जप, बड़ी सिद्धियों का बाप है | रावण की सिद्धियों की ऐसी-तैसी |
धर्मदास की गुरु सेवा से धर्मदास रावण की नाई हर १२ महीने दे दिया सलाई नही | धर्मदास तो पार हो गये | शबरी भिलन पार हो गयी गुरु सेवा से | धनाजाट, रहिदास चमार, मीराबाई गुरु सेवा से, गुरु के सिद्धांत की सेवा में भागीदार होकर महत पद को पा लिया | और मैंने भी गुरु की सेवा में पाने का कुछ बाकि नही रहा मुझे, ऐसा मिल गया है | गुरु सेवा साधू जाने, गुरु सेवा क्या मूढ़ पिछाने ?
खाली गुरु के पैर दबाना ये सेवा नही ये तो तुच्छ सेवा है | गुरूजी को तकलीफ हो और पेर दबा दें तो ठीक, बाकि सच्चे गुरु तो पेर दबवाने की इच्छा नही करते | भगवान के दैवी कार्य में साझीदार बनकर भगवान का साक्षात्कार करने की सेवा देते | फिर पैर दबाने का अवसर कभी किसी को मिल गया तो मिल गया अंगद सेवक को | मेरे को नही मिला गुरूजी के पैर दबाने को, पैर दबाता था दूसरा अंगद सेवक | लेकिन गुरूजी का सिद्धांत | झाड़ू लगाना, भोजन बनाना ये भी सेवा है | तो कोई कुछ भी सेवा करता है, तो हृदय में शांति, आनंद, गुरु का दैवी कार्य | भगवान के रस्ते जाने वालो की सेवा मिल रही है |
धर्मदास को रंग ऐसा लगा, के साहेब है मेरो रंगरेज, चुनरी मोरी रंग डारी | बुद्धि रूपी चुनरियाँ मेरी रंग दी | स्याही रंग छुडायके दियो मजीठा रंग | संसार का गंदा राग, द्वेष, काम, क्रोध, स्वार्थ का रंग छुड़ाकर मुझे परमार्थ के रंग से रंग दिया | धोये से छूटे नही, अब वो चदरिया को धोता हूँ तो वो रंग छूटता नही, संसारी रंग तो धीरे-धीरे छूटता है, फीका पड़ जाता है | लेकिन ज्यो-ज्यो ये चदरिया धोता हूँ ये रंग सुरंग होता है | और बढिया होता है, प्रगाढ़ होता है | संसार का रंग तो उतर जाता है, गिर जाता है | लेकिन ये न उतरता है, न गिर जाता है, स्याही रंग छुड़ाई के दियो मजीठा रंग, साहेब है मेरो रंग रेज, चुनरी मोरी रंग डारी | धोये से छूटे नही, दिन-दिन होत सुरंग |
ये कबीरजी के वचन धर्मदास जी के जीवन में ओत-प्रोत हो गये | कबीरजी सत्संग में कहते थे, यह तन विष की बेलरी, ये शरीर जहर की बेल है | जैसे कडवे फल वाली जहर की बेल होती है न |
कई ऐसे फल होते हैं, एक बार जंगल में मैंने भी खा लिए | गिलोरी जैसे थे लेकिन वो थे जंगली | मैं सोचा साग-वग कभी कुछ मिलता नही, मुंग उबालके खता हूँ, तो ये साग है | खाया तो जुलाब-जुलाब हो गये, जहरी थे | तो जहरी बेले होते थे |
ऐसे संसारी रंग, स्याही रंग, राग, द्वेष, काम, क्रोध, भय, शोक, चिंता, कितनो के आगे गिड़गिड़ाओ, फिर भी आखिर दुखी-दुखी | ऐसा है संसार का रंग | लेकिन गुरूजी का रंग तो सारी दुनिया भी नतमस्तक हो तो भी अभिमान न आये | सारी दुनिया के हरामजादे मिलकर  कुप्रचार करे तो बापूजी के दिल में दुःख नही और किसीका अमंगल नही चाहते | और हेलिकॉप्टर चूर-चूर हो गया तो बाल बांका नही होता है | अग्नि और पेट्रोल साथ में और आगे लगाने वाले देवता ने रोक दी | स्याही रंग छुड़ाई के दियो मजीठा रंग, साहेब है मेरो रंग रेज, चुनरी मोरी रंग डारी |  धोये से छूटे नही, दिन-दिन होत सुरंग |
अब दीक्षा मिली है न, अब बुद्धि रूपी चुनरी दिन-दिन सुरंग होगी | दिन-दिन अच्छे भाव आयेंगे और अच्छी प्रेरेना आएगी | दीक्षा लेने के बाद गुरु शिष्य का आन्तरिक सम्बन्ध हो जाता है | गुरुमंत्र आ गया तो तुम गुरुतत्व से जुड़ गये |
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