कानून से नही संयम से समाज निर्माण

न्यू योर्क और न्यू जर्सी में जो तूफान चला जो भोपाल कांड हुआ, जो हेलिकॉप्टर चमत्कार हुआ तो ये श्लोक सत्य हो गया |  सर्वदा सर्व कालेषु, नास्ति ते शाम अमंगलम, ये शाम हृदयस्त भगवान, मंगलाय तनो हरी | माँ बीमार हुई और मैंने उसकी श्रद्धा का सदुपयोग करके मन्त्र दिया और उसने श्रद्धा से जपा और माँ सब काम काज करने लगी | ९३ साल तक मेरी माँ जी | मेरी उपस्थिति में गयी | अमंगल हुआ क्या ? मंगल ही मंगल हुआ |
जो भगवान के नाम का आश्रय लेते हैं और भगवान को अपना आत्मा मानते हैं | भगवान उसे कहते हैं जो कभी मरता नही | शरीर उसे कहते हैं जो सदा रहता नही एक जैसा | जो सदा न रहे वो संसार और शरीर | और जो कभी हमारा साथ न छोड़े वह आत्मा और परमात्मा है | जो कभी हमारा साथ न छोड़े, कभी मरता नही, कभी बिछड़ता नही और बेवफाई नही करता वो आत्मा-परमात्मा है | जो  मरता है, बिछड़ता है, बेवफाई करता है, वह संसार है, वह शरीर है | संसार और शरीर का सेवा कार्य, भजन-वजन करके इसका उपयोग क्र लो, बाकि ये मरने वाला शरीर है | बिछड़ने वाले सबंध हैं | छुटने वाले रुपय-पैसे हैं | शरीर, संसार और वस्तुओ का सदुपयोग करो | और अपने को भगवान की विश्रांति में शांति दिलाओ | भगवान में विश्रांति की मैं तरकीब सिखा देता हूँ | आपको तो बहुत फायदा होगा लेकिन आपके बच्चो को हस्ते-खेलते कल्पना से ज्यादा फायदा होगा | भगवान के नाम का आश्रय, भगवान के नाम का जप, और भगवान को अपना मानने वाले की जो सूझ-बुझ है बस होगया काम | इससे क्या होगा आपको सत्संग प्यारा लगेगा | सत्संग से आपकी बुद्धि में में ज्ञान आएगा | आपके मन में सदभाव आएगा | व्यवहार में सत चरित्र आएगी | और इन्द्रियों में सयम आएगा | बस होगया काम | ये ना करो, ये ना करो …… कानून बनाकर धर्म के और समाज के बजाये जेलखाना हो जायेगा | और जो आये वो करते जाओ तो संसार विकारो का नारकीय दलदल बना देंगें | जो मन में आये वो करने लगो तो नर्क हो जायेगा, उच्लंगता हो जाएगी | जंगल हो जायेगा | और अति अनुशासन कैदखाना बना देगा | लेकिन सत्संग सिखाता है के कमरे में भी चार दिवारी में और जेल की चार दिवारी में बंद होना क्या है | जेल की चार दिवारी मजबूरी है और घर की चार दिवारी, बंद भी है और मुक्ति भी है | जब चाहो खिड़की खोलो, दरवाजा खोलो, बाहर जाओ,आओ | घर की चार दिवारी में बंधन सुरक्षा के लिए है और स्वतन्त्रता विकास के लिए है |
ऐसे ही धर्म आपको, आपकी इन्द्रियों को कुछ नियमो से बंधने की शक्ति और कला भी देता है और धर्म आपको, आपके मन को, आपकी इन्द्रियों को संसार का भोग करने की भी कला देता है | शादी करो लेकिन अमावस्या, पूर्णिमा, जन्माष्टमी, होली, दिवाली, उन दिनों में व्यवहार करोगे तो बच्चे विकलांग होंगे और तुम्हे जिवलेवा बीमारी होगी | बेटे सावधान | जो किसान खेड़ता है और बिज नही डालता तो मुर्ख है किसान | जो संसारी व्यवहार करता है और सन्तान उत्पति नही करता ऐसे ही करता है तो मुर्ख है | गर्भाधान के लिए, जैसे बिजाधान के लिए किसान खेड़ता है, ऐसे ही संसार का व्यवहार गर्भाधान के लिए | शादी कर ली तो एक दुसरे की कमर तोड़ने के लिए, जल्दी मरने के लिए थोड़े ही शादी की | शादी – शाद, आबाद रहने के लिए | अपनी इन्द्रियों को संयत करकेसुनिश्चित जीवन जीने के लिए | भोजन करो लेकिन एकादशी है | अगर चावल खाए तो तबियत भी बिगड़ेगी और पाप भी लगता है |
डोंगरे जी महाराज की कथा में मैंने सुना अगर आप खाते हो चावल एकादशी के दिन तो एक-एक चावल एक-एक कीड़ा खाने का पाप लगता है | एकादशी के दिन अन्न खाना नही, खिलाना नही | उपवास रखो | लेकिन जो बूढ़े हैं, डाइबिटीज है, बालक हैं, इनको जबरदस्ती एकादशी ना रखवाओ | तो भी चावल से तो परहेज कराओ | सत्संग में ज्ञान मिलता है, धर्म से नियन्त्रण आता है | भगवान की प्रीति से मन में रस आता है | और भगवान के ज्ञान से आदमी निर्भीक हो जाता है | जो मरता नही वो भगवान है | जो बिछड़ता नही वो भगवान है | जो बेवफाई नही करता वो भगवान है | और हजार-हजार ऐब होने पर भी हमारा बुरा नही कर सकता वो भगवान है और मेरा अंतर आत्मा है | ॐ…… | तुम ये कर सकते हो के नही कर सकते हो, रस आता है के नही आता | अपने बच्चे-बच्चियों को सिखाओ |
दूसरी एक तरकीब है जिससे तुम्हारा बंद छिद्रों का जो खजाना है वो खुलेगा | इससे रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी | अनुमान शक्ति, क्षमा शक्ति, शौर्य शक्ति बढ़ेगी | तुम्हारी भी बढ़ेगी और जिन बच्चो को सिखाओगे उनकी भी ये शक्तियाँ बढ़ेगी | क्या करना है ? अभी-अभी करो | बाए नाक से स्वास लो रोको उसमें ॐ स्वरूप का नाम भरो फिर दाए से छोड़ो | फिर दाये से लो….. | अब दोनों नथुनों से स्वास लो और रोको जो भगवान हमसे अलग नही होते, बेवफाई नही करते उस भगवान का मैं जप करूंगा | होंठ बंद रखना कंठ से ॐ जपना है और गर्दन आगे-पीछे करनी है | जैसे तुम्हारे बबलू हैं वैसे तुम मेरे बबलू हो |
मेरी नानी मर गयी थी | श्मशान तक ले गये थे | लकड़ियों पे रखा और नानी हिली | रस्सियाँ काटी, नानी पैदल चल के आई | पूछा तुम मर गयी थी क्या हुआ ? बोले सुन्न सा हो गया | इसके बाद मैंने देखा ये तो नर्क है | तो पापियों को सजा मिल रही है | मैंने कहा मेरे को इधर कैसे लाये | जिसने ओमकार का जप किया है, गुरु की दीक्षा लिया है, उसको नर्क नही होता | नर्क तो उनको होता है जो मास खाते हैं, दुराचार करते हैं | दुसरो को सताते हैं | मैं तो सत्संगी हूँ | दीक्षा लिए हुए को नर्क नही होता | मेरे को नर्क में कैसे लाये | यमराज की क्लास  ले ली मेर नानी ने | जिस नानी ने यमराज क क्लास ली और वापिस जिन्दी हो गयी, ऐसी नानी का मान दोता लगता हूँ | बोले तुम्हारा नाम हेमिबाई है न | हेमिबाई तो हमारे शहर में हजारों होंगी, पूरा नाम बोलो | बोले हेमिबाई पोहुमल | बोले पोहुमल मेरे पति का नाम नही है | प पे है लेकिन दूसरा है | हम नाम बोलते नही | हमारा धर्म है | वो बोलते गये फिर जब उन्होंने कहा हेमिबाई प्रेमकुमार तो बोली कुमार को हटा के चंद लगा दो | अच्छा हेमिबाई प्रेमचंद | हाँ भैया | बोले ऐसी धर्मात्मा को तुम ले आये | पहले पुष्करनाथ पापी को लाना था तो तुम पुष्करनाथ पुन्य आत्मा को पकड़ कर लाये | मुझे माफ़ी मंगनी पड़ी अब हेमिबाई पोहुमल को लाना था तो हेमिबाई प्रेमचंद को लाये | जाओ जल्दी छोडके आओ | जिन्दी हो गयी |
नीम के पेड़ को आदेश दिया लीलाराम प्रभु ने, नीम का पेड़ चल पड़ा | जहाँ हिन्दुओ के झुलेलाल मन्दिर की हद पूरी होती है वहाँ डट गया | हिन्दू, मुसलमान को ब्रिटिश शासन झगड़ा कराते थे | बयालीस साल से केस चल रहा था | तो उसका निपटारा कर दिया | तो मुसलमानों ने कहा आप केवल लीलाराम हिन्दुओ के नही, हमारे भी फकीर हैं, लीलाशाह नाम रखा | जिन्होंने पेड़ को आज्ञा करके चला दिया ऐसे गुरु का मैं चेला हूँ |
हवा पीकर पेड़ पर रहनेवाले साधुओ का मैं दोस्त हूँ | अदृश्य हो जाएँ ऐसे साधुओ से मैंने बातचीत की | और मेरी माँ ने मेरे को बताया ये जो झुला है, वो झुला अभी मेरी आँखों के आगे आता है | ४-५ साल का था मैं, मैं अच्छी तरह झूले को पहचानता हूँ | ऐसा बड़ा, सुंदर झुला तो मैंने कभी देखा ही नही | बोले तुम्हारे जन्म के पहले एक सौदागर एक दिन पहले आकर दे गया था | तुम्हारे बाप ना बोल रहे थे क्योंकी हम तो नगर सेठ हैं तो हमे क्या कमी थी ? और हम ब्राह्मण तो हैं नही | क्षत्रिय हैं, जमींदार हैं | तो उसने कहा तुम्हारे घर बालक का जन्म होने वाला है | मेरे को भगवान ने प्रेरणा की है | तुम्हारे आने के पहले भगवान ने इतना बढिया झुला भेजा है | मेरे आने के पहले जिस भगवान ने ऐसा बढिया झुला भेजा मैं भी सो सकूं, मेरा भाई-बहेन भी सो सके | मेरी माँ भी और मेरे पापा को भी सोना हो तो वो भी लेट जाये इतना बढिया झुला था | मेरे आने के पहले मेरे लिए झुला भेजते हैं, और हेलिकॉप्टर चूर-चूर हो जाये और मुझे भरपूर रखे | उस परमात्मा का मैं प्यारा बापू हूँ | और वे मेरे प्यारे हैं | हमारी महोब्बत का कोई और ही अंदाज़ उसे हम पर और हमे उस पर नाज़ है |
डीसा आश्रम में मैंने कहा त्यागी के क्या लक्ष्ण हैं | त्यागी कितने अलमस्त और फक्कड होते हैं | तुमने कभी त्यागी देखा है ? बोले नही | बोले देखना है ? बोले हाँ | मैंने धोती वहीं उतारी, कुर्ता उतरा, नीचे की धोती उतारी | एक कच्छा पहन के चल दिया | बोले क्या | मैंने कहा ऐसे ही होता है त्यागी | चल गया तो चल गया फिर उस आश्रम में मैं एक रात भी कभी नही रहा | अड़तीस साल हो गये | जंगल में गये नारेश्वर | रात भर तो एकांत में रहे, सुबह स्नान करने गये तो भूख लगी | सोचा मैं न खिन जाऊंगा, यहीं बैठके अब खाऊंगा | जिसको गरज होगी आएगा, सृष्टि करता खुद लायेगा | ऐसा हुजत खोर भी हूँ भगवान के साथ | गरज हो तो  सृष्टि करता लायेगा | वो तो सुबह मुझे विचार हुआ लेकिन ज्यों ही मन विचार वे आये त्यों ही दो किसान वहाँ आये |   दोनों सर पे बंधे साफा खाद्य पेय लिए दोनों हाथा | बोले जीवन सफल है आज अर्ध्य स्वीकारो महाराज | मैंने कहा तुम्हारे कोई और संत महात्मा होंगे | मेरा आपका परिचय नही आप मेरे लीये थोड़े ही लाये होंगे | बोले सपने में रात को मार्ग देखा | मुझे सुबह ख्याल आ रहा है की कहीं जाऊंगा नही यहीं बैठके खाऊंगा | जिसको गरज होगी आएगा सृष्टि करता खुद लायेगा | वो मेर्रे प्यारे ने रात को तिन बजे सपने में उनको रास्ता भी दिखा दिया और मेरा फोटो भी दिखा दिया | वो कैसा दाता है | कैसा ख्याल रखता है | मैं तो हाथ जोडके प्रार्थना करता हूँ | उस दाता को अपना मनो बस | वास्तव में वो ही आपका है | पत्नी आपकी नही है, पति आपका नही | आपका शरीर भी आपका नही है | हरामी है ये शरीर | कितना भी खिलाओ, पिलाओ, नहलाओ, धुलाओ | फिर भी बुढ़ापे में बीमारी, कभी कुछ, कभी कुछ | अंत में मर जायेगा | तो शरीर मर जाता है, तुमको जो मरने नही देता वो तुम्हारा आत्मदेव है |
तुम कभी नही सोचना के हम मर जायेंगे | तुमको भगवान भी नही मार सकते | शरीर को तो भगवान ने भी नही रखा | तुम अम्र आत्मा हो | आता-परात्मा अविभाज्य है | घड़े को तो कोई तोड़ देगा लेकिन महाकाश के आकाश को तो कोई भी नही तोड़ सकता | तरंग को तो कोई भी मिटा देगा लेकिन सागर को कौन मिटाता है ? पानी को कौन मिटाता है ? कंगन, चूड़ी, अंगूठी को तो तोड़ दोगे लेकिन सोना कौन तोड़ेगा ? मूल धातु आत्मा है | तुम आत्मा हो, तुम सुख को भी जानते हो और दुःख को भी जानते हो | लेकिन गलती ये होती है के सुख के साथ जुडकर बोलते हो मैं सुखी हूँ | मैं दुखी हूँ, मैं बच्चा हूँ, मैं जवान हूँ, मैं बीमार हूँ | अरे बीमारी शरीर को आती है, सुख-दुःख मन को आता है | मैं उसको जानता हूँ, मैं परमात्मा का हूँ | तुम्हारा तो बेडा पार, तुम्हारा सत्संग और दीदार करने वाला भी खुश हाल और बेडा पार हो जायेगा | हरी ॐ……. |
अष्टावक्र १२ साल के थे | सीता के पिता जनक ८०-९० साल के | अष्टावक्र बोलते हैं हे पुत्र जनक ! १२ साल का बाप और ८०-९० साल का बेटा ! क्यों ? के बापों का बाप आत्मा को मैं जानने वाला पुरुष चाहे १२ साल का हो फिर भी सबके बापों का बाप है | तो मैं तो बापू हूँ | तुम भले कितने बच्चो के बाप हो किसीके दादा हो और मेरे से उम्र बड़ी हो | फिर भी मेरे आगे तुम बच्चे हो | तो मैं जैसे तुम को अपने बबलू-बबलियाँ मानकर सिखाता हूँ, ऐसे तुम अपने पडोस के बबलू-बबलियों को सिखाना | देखो आओ बच्चो तुम को एक तरकीब सिखाते हैं |
हो सके तो कारपेट बिछा हो, कपड़ा बिछा हो, कम्बल बिछा या प्लास्टिक बिछा हो | क्योंकी ॐ कार का जप करने से एक प्रकार की शक्ति बनती है | जैसे डाऐनामो घूमता हैं न तो बिजली बनती है ऐसे ही नाम के पुनरावृति से अध्यात्मिक ओरा बनती है | एर्थिंग मिलने से वो शक्ति धरती में चली जाती है | भजन तो बहुत लोग करते हैं लेकिन जिन्होंने दीक्षा नही ली है उनका भजन ऐसे ही एर्थिंग में बिखर जाता है | गुरु की तरकीबो से अनजान हैं | इसलिए उनके भजन में बरकत नही आती | मेरे शिष्य जब दीक्षा लेते हैं, कोई १२ साल से भजन करता हो लेकिन म,एरा शिष्य १२ हफ्ता से दीक्षा ली है वो १२ साल वाले से आगे की अनुभूति करता है | मेरे शिष्यों का ऑपरेशनो से बचाव होता है | हार्ट अटैक नही हो सकता मेरे शिष्यों को | मेरे साधक को हाई बी.पी., लो बी.पी.  नही होगी | अगर है तो दीक्षा के समय आशीर्वाद मन्त्र देते हैं उसका जप करे | गीजर अलग, फ्रिज अलग लेकिन बिजली एक की एक | ऐसे ही भगवान नाम में एक मन्त्र देता हूँ | शनिचर का ग्रह हो तो १०० माला करो, शनी देव आशीर्वाद देकर चले जायेंगे | क्योंकी शनी देव के साथ हमारा कोलेबोरेशन है | शनी देवता ब्रहस्पति के शिष्य हैं और तुम भी हमारे शिष्य हो | सादे सात साल के लिए शनी आये हों चाहे १२ साल के लिए आये हों मैं मन्त्र देता हूँ, शनी देवता आशीर्वाद देके चले जायेंगे | जौंडिस हुआ हो, पीलिया हुआ हो तो ५० माला जप करो, पीलिया एक दिन में चला जायेगा | नही तो २३, २६ लाख लेते हैं दिल्ली की हस्पतालों में | और लीवर बदलते हैं, कुटुम्बी की लीवर काट के डालते हैं | एक चुटकी चावल फांके, एक-दो दिन में लीवर ठीक |
ॐ कार मन्त्र से पेट, लीवर और दिमाग की तकलीफे तो दूर होती हैं लेकिन | अभी तो वैज्ञानिक भी बोलते हैं हमारे ऋषियों ने तो २२००० श्लोक बोले ॐ कार की महिमा के | और नानकजी ने भी कहा है सर्व रोग की औषध नाम, नानक गावही गुण निधान | ॐ कार मन्त्र अगर इस विद्धि से जपते हो तो गजब की याद शक्ति, बुद्धि शक्ति गजब की होगी | दोनों कानो में उँगलियाँ डालो घर स्वास लो अब हम ॐ कार का जप उसकी प्रीति के लिए कर रहे हैं | अब कंठ से जपना है | ये १० बार करना है | करो | ॐ……… | मैं भगवान का, भगवान मेरे, ॐ….. |
मुझे इस बात की बड़ी ख़ुशी है के हम उस धर्म में जन्मे हैं जहाँ से जन्म जात हम हिन्दू | मुसलमान भाइयो को सुनत करानी पड़ती है तब मुसलमान | उनको कोई मनुष्य मुसलमान बनाता है | ईसाईयों को कोई मनुष्य ईसाई बनाता है | लेकिन हमको कोई मनुष्य हिन्दू नही बनाता | जन्मजात हम हिन्दू | और वैदिक मन्त्र और उसमें ॐ कार जप, गायत्री जप और हरी ॐ का जप और सत्संग | हिंदुस्तान में ऐसी एक सुंदर साधना है के भगवान को पुत्र, शिष्य, सखा, के रूप में आप पा सकते हैं | स्वामी के रूप में पा सकते है और घोडा गाड़ी चलवा सकते हैं | अर्जुन ने चलवा ली | छछिन भरी छाछ पर उसे नचा सकते हैं | ये हिन्दुओ का कैसा सौभाग्य है | निर्गुण निराकार भगवान तो है लेकिन उसको सकर्क्रने की व्यवस्था हिन्दू और वैदिक धर्म में है | हम कितने भाग्यशाली हैं | और मजहबो में भगवान को पुत्र रूप में पाने की व्यवस्था नही है | लेकिन यहाँ भगवान पुत्र रूप में, शिष्य रूप में | संधिपनी विद्यार्थी थे और उनके गुरु जा रहे थे , शरीर छोड़ रहे थे | गुरु ने कहा जिसको जो चाहिए ले लो | किसी ने खाऊ ली, किसी ने अंगोछा | किसी ने गुरूजी के हाथ की कलम मांगी तो किसी ने बिछोना | सांधिपनी गुरूजी को देखते ही रहे | गुरु ने कहा बेटा तुझे भी कुछ चाहिए तो लेले | बोले मैं क्या लूँ ? मुझे तो आपके दर्शन से बड़ी शांति मिलती है | बड़ा सुकून होता है | तब सांधिपनी के गुरु बोले बेटा पढ़ने में तू हुशियार विद्यार्थी नही है लेकिन हुशियारो के हुशियार श्री कृष्ण का अवतार हुआ है वो तेरा चेला बनेगा | अपने शिष्य को संसारी चीजे नही चाहिए तो भगवान तेरा चेला बनेगा वरदान दे डाला | और श्री कृष्ण सांधिपनी के शिष्य बने | हरी ॐ……..|

 

 

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One Comment on “कानून से नही संयम से समाज निर्माण”

  1. shailesh Says:

    aatma rash ki bhang pilo or mast ho jao


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