ईश्वर प्राप्ति की लगन

Sant Shri Asharamji Bapu Rajokari 10th Oct’ 2012 (Ekant Satsang)

मध्यम को संकेत करना पड़ता है और जो कनिष्ट होते हैं उनको आज्ञा करनी पडती है और जो कनिष्टतर होते हैं वो जान बचाकर खिसक जाते हैं | दुसरो पे डोलते रहते हैं | हनुमानजी उत्तम सेवक थे | तो उत्तम पद की प्राप्ति हुई |
अगर हमारी गलती को दरकिनार करते तो हमारे दुश्मन हैं, मीठे दुश्मन हैं | दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक हैं और शास्त्रों में आता है :-

ज्ञानी निज जन कठोरा |

ज्ञानी महापुरुष जिसको अपना मान लेते हैं, वो फिर सफेद कपड़े पे दाग बरदाश नही किया जाता, ऐसे ही अपने वालो की गलती बरदाश नही होनी चाहिए | एक असमाजिक छोरे को फांसी का हुकुम हुआ | तो फांसी के समय पूछा जाता है आखरी इच्छा क्या है उसकी ? बोला मेरे को मेरी अम्मा जान बुला के दो | अब अम्मा जान आई, बोले अम्मा जान और नजदीक आओ और नजदीक और नजदीक | फांसी के तख्त पर खड़ा था वो, रेशम का रस्सा था, खली खाली तख्त नीचे होना था और जान जानी थी | थोड़ी पुरानी घटना है | युवक ने झटका मार के अम्मा जान के नाक पे ऐसा तो काटा के नाक के दो नथुने उसके मुँह में आ गये । काट के नाक का हिस्सा अलग कर दिया, मुँह में ले लिया और थूक दिया | अब जज लोग, जो जूरी बैठते हैं उनको आश्चर्य हुआ के मरने वाले को सजा दूसरी तो क्या हो सकती है ? ३०२ की अब फांसी की सजा लगी अब 3०७ थोड़े ही लगेगी ? उन्होंने हँसते हुए पूछा के तुने तेरी अम्मा जान का नाक काट के थूक दिया | आखिर तेरी अम्मा जान के प्रति तेरे को क्या नाराजी थी ? तो उसने कहा ये ऐसी डाकिनी है के मैं उसका पूत था | थोड़ी बहुत रबड़ चुरा के लाया, पेन चुरा के लाया, पेंसिल चुरा के लाया, कहीं कुछ किया, तो मेरे को टोकती नही थी, टांडती नही थी | प्यार-दुलार, प्यार-दुलार में मुझे डकैत बना दिया इसने | मेरी खिचाई करती तो मैं यहाँ तक का गुनाहगार नही बनता | माता, पिता, गुरु, हितेषी अगर आपको प्यार-दुलार करते हैं तो वो खतरनाक है खतरनाक | आपके विकास से उनका कोई सबंध नही है | वो खुशामद खोर हैं | आप से नीचे वाले तो आपको खुशामद करके आपको उल्लू बनाते हैं लेकिन ऊपर वाले भी खुशामद करें तो उल्लूपना गहरा हो जाता है | मेरे गुरुदेव इस बात में बड़े बहादुर थे | मैं तो कुछ नही उनके आगे | सब अनुशासित रहते थे लोग | मेरे गुरूजी की हाजरी में कोई जोर से बात नही कर सकता था | यहाँ तो छोरे बकते रहते हैं आवारा, मर्यादा नही होती | जरा सा इधर गये तो शोर मचाने लगे | ये मेरी कमी है, कमजोरी है मेरी | गांधीजी ने अलूना भोजन का नियम आश्रम में करा | मैं एक महीने के लिए बिना नमक का भोजन लूँगा | तो उनका बेटा मणि बिना नमक का भोजन खा-खा के ऊब गया था | गांधीजी के पास कुछ अंग्रेज लोग आये, वो महेमान थे | उनके लिए खिचड़ी बनी लेकिन उसमें नमक डालने का आदेश मिल गया | जैसे महेमान के लिए बनती है खिचड़ी ऐसी बनी | आश्रम वासियों के लिए जो फीकी बनती है | अब क्या हुआ के गांधीजी का बेटा मणि जहाँ आश्रम वासियों की खिचड़ी थी वहाँ नही गया | जहाँ महेमानों के लिए खिचड़ी बनी थी उधर जाकर थाली धर दी | तो आश्रम वासियों ने कहाँ अपन तो आश्रम वासी हैं बिना नमक का, ये तो महेमानों के लिए हैं | बोले मुझे पता है, लेकिन एक महिना बिना नमक का है तो आज नमक वाली खा लेता हूँ, फिर एक दिन बढ़ा दूँगा | लेकिन संचालकों की हिम्मत नही

हुई गांधीजी को पूछे बिना उसको खिचड़ी दे दे | बोले एक मिनट रुको | वो गया सेवक गांधीजी के पास | के मणि भाई नमकीन खिचड़ी माँग रहे हैं | और वो बोलते हैं के एक दिन फिर मैं बढ़ा दूँगा | गाँधीजी आये, जहाँ नमकीन खिचड़ी थी | गाँधी ने अपना कान पकड़ के अपने को थप्पड़ मारी खूब | के मैं कमजोर, बुजदिल रहा हूँगा, इसीलिए मणि कायरता करता हैं | जब एक महीने का व्रत है तो बिच में नमकीन खाने का मतलब क्या होता है ? जरुर मैं चटोरा रहा हूँगा इसीलिए मेरा बेटा नमक का गुलाम हो रहा है | मणि चरणों में गिर पड़ा | पिताजी-पिताजी मैं, नही आप अपने को थप्पड़ नही मरेंगे, मेरी नालायकी | आजकल के छोरे हो तो बोले इस में क्या हो गया नमक वाली एक दिन खा लिया तो ३१ दिन कर लेंगे | इससे मनोबल का विकास नही होता | बुद्धि ईश्वर तक पहुंचने वाली सूक्ष्म नही बनती | तप, त्याग, तितिक्षा के बिना मानव जीवन का उद्धार नही होता | सत्संग तो बहुत ऊँचा मिलता है, अभागों को फलता ही नही | लापरवाह टट्टू, नही तो रोज साक्षत्कार हो जाये, ऐसा सत्संग मिलता है मेरे यहाँ | इधर देखना, उधर देखना, ये खाना ही-ही करना | अनुशासित नहीहै जैसा मन में आये वैसा कर लिया | उस में और मक्खी में, मच्छर में, बिलार में कोई फर्क नही | बड़ा पंडित हो, बड़ा बुद्धिमान हो, लेकिन विकारो पर अपनी अनुशासिता नही है | तो ऐसे लोगो को शास्त्रों ने मुर्ख कहा | खूब पढ़ा है, खूब डिग्रियाँ हैं | लोग भी खूब मानते हैं | लेकिन काम, क्रोध, और लोभ, मोह की जब लग मन में खान तुलसी दोनों एक है क्या मुर्ख और विद्वान |

एक डॉक्टर है, दिल्ली में ही है | परम्परागत माँ-बाप का महेंगी एरिया में बड़ा बिल्डिंग भी है | अब तो वोही मालिक है डॉक्टर | एम्.डी. पढ़ा है, प्रैक्टिस भी खूब चलती है | खाली मरीज को देखने का या मिलने का ६०० रुपया | कोई टाइम लेकर मिले तो ७०० रुपया | इलाज के पैसे अलग | फुर्सत नही मिलती | और पत्नी भी किसी जगह पे काम करती है बड़ी कम्पनी में | दो-तिन करोड़ रुपया कमाती है, ऐसा मेरे को दुसरे डॉक्टर ने बताया | आज की बात है | मैं क्या इतना सारा | बोले मेरे साथ बात करते-करते कभी बोला था वो डॉक्टर | के जब हम प्रेक्टिस करने के लायक नही रहेंगे तो क्या खायेंगे ? इससे बड़ी व्यवस्तता क्या होगी ? महीने में की लाख रुपय कमाता है, स्वयं और पत्नी साल में करोड़ो रुपय की सैलरी लेती है, मल्टी नैशनल कम्पनी मिन्हाई अच्छी पोस्ट पे है और एक खाली सन्तान है | वो भी ससुराल चली गयी या जाएगी | तो उसकी भी शादी वादी हो गयी | वो बोलते हैं अगर हम प्रैक्टिस करने के लायक नही रहेंगे तब क्या खायेंगे ? इससे बड़ी भारी मुर्खता क्या हो सकती है ? लोभ, लोभ | अरे माँ के गर्भ में थे जब गोद में आये तो क्या प्रैक्टिस करके आये थे ? कैसे दूध बना लिया नियंता ने | कुछ अपने प्रारब्ध पर, कुछ प्रकृति के नियम पर कुछ सृष्टि करता के नियम पर भरोसा होना चाहिए | लोभ का गुलाम बन गया | मरीज हैं बिचारे सबकी शक्ति भी नही है | तुम हाथ लगाओ और ऐसे ६००, बात करो और ६०० रुपया दे | जो देने के लायक हो उनसे लो, ऐसे किसी को २०० में भी देख लो, १०० में भी देख लो | वो जो डॉक्टर था वो मेरा भक्त था | वो ५० रुपय में मरीज की सेवा कर लेता था | वो बड़ा खुश है | लेकिन उसका दोस्त जो है वो ६०० रुपय में ये बात करेगा फिर बाकी का अलग खर्चा | एम्.डी. भी है | एक ही सन्तान थी बेटी | वो भी शादी करके अपने पेरो पे खड़ी है | अब वो बोलता है अगर हम प्रैक्टिस करने के लायक नही रहेंगे तब क्या खायेंगे ? पत्नी करोड़ो रुपया लाती है, और पति भी करोड़ो रुपया कमाता है | और ये बोलता है अगर हम प्रैक्टिस करने के लायक नही रहेंगे तब क्या खायेंगे ?
वो  प्रोपर्टीयां काफी है | मैं नाम नही लूँगा उसका नाम जनता भी हूँ, मैंने उसको देखा हैं | नारायण हरी।।  हरी ॐ हरी |
काम, क्रोध अरु लोभ, मोह की जब लग मन में खान |
जब पैसे को महत्त्व देता है तो आदमी लोभी हो जाता है | इच्छा पूर्ति को, काम विकार को महत्त्व देता हैं तो कामी हो जाता है | एक होता है क्रोध और दूसरा होता है अनुशासन | अभी हमने जो डांटा है बच्चो को क्रोध नही था | इनकी लापरवाही, इनको जीवन में आगे चलके भटका न दे इसीलिए डांटा | गांधीजी ने अपने आप को थप्पड़ए मारी, क्यों ? अलूना भोजन करने का नियम था साबरमती के आश्रम में सावन के महीने में इन्द्रिय संयम | तो उनका बेटा भी अलूना भोजन, बिना नमक का भोजन लेता था | अंग्रेज आ गये गांधीजी के यहाँ महेमान | तो बापूजी ने कहा के महेमानो के लिए जैसे खिचड़ी बनती है नमक, काली मिर्च मसाला जो भी ऐसे बनाओ, आश्रम वासी वैसे खायेंगे | तो गांधीजी का बेटा जाकर उस परोसने वाले के पास जाकर खड़ा हो गया | के मेरे को आज ये नमकीन खिचड़ी दे दो | तो उसने कहा अपने तो आश्रम वासी हैं बिना नमक के भोजन का नियम है अपना | बोले वो मुझे पता है आज अपने खा लेता हूँ | बाद में, मैं एक दिन खिंच लूँगा बिना नमक का | उसने कहा ठहरो | मैं पूछ के आता हूँ | गांधीजी से पूछने गये | और गाँधी आये परोसने वाले की जगह | बेटे को खिचड़ी तो परोस दी | लेकिन खिचड़ी की थाली उठा के ले जाए उसके पहले गाँधीजी अपने आप को थप्पड़ए मारी के जरुर मैं जीभ का चटोरा रहा हूँगा | इतना नालायक हो गया के जरा सा नमक भी नही छोड़ सकता | पूरा शरीर छोड़ने पड़ेगा | पुरे रिश्ते-नाते छोड़ने पड़ेंगे | एक छोटी सी चीज छोड़ने के नियम में फिसल रहा है तो जरुर मेरी कमजोरी रही होगी | फिर गाँधीजी ने अपना कान पकडके अपने आप को थप्पड़ मारा | अब वो नमक वाली नमकीन खिचड़ी क्या खायेगा उनका बेटा | चरणों पे गिर पड़ा उनका बेटा | नही, नही आपका कसूर नही, मेरी गलती | ऐसे पुरुष ही बापू बनते हैं | महा पुरुष बनते हैं | अपने ऊपर नियन्त्रण हो, अपनी इन्द्रियों पे नियन्त्रण हो, अपने मन पे नियन्त्रण हो |

सुख-दुःख आ जाये, सुखी-दुखी दिखे लेकिन अपनी समझ पर ऐसा नियन्त्रण होता है ब्रह्म्वेता को के अष्टावक्र मुनि कहते हैं:-    खिद्योपी न खिन्नते, खिन्न होते हुए भी अंदर खिन्नता नही। जैसे रंग मंच पर खूब गुस्साया हुआ अभिनय करता है लेकिन गुस्सा गुसा नही है उसमें और खूब लैला मजनू का पार्ट अदा करने के समय खूब स्त्री लमपटूता का अभिनय करता है लेकिन अंदर में जानता है के जो स्त्री बनी है, लैला बनी है, वो तो मेरा जुनेद है, वो मेरा फलाना दोस्त है | अभी लडकी के रूप में आया है | मैं तेरे बिना नही जिऊंगा, तुम हँसती रहती हो तो ईक बिजली सी चमक जाती है | तुम रूठी रहती हो तो मेरी जा , मेरी जान, मेरी जान निकल जाती है | अब जान वान कुछ निकलती नही | लेकिन ऐसा करता है वो जो दर्शक तत्व है न वो फिर अपनी लवरी के आगे ऐसे ही टट्टू हो जाते हैं जीवन में | ये बचपन में गाना चल पड़ा:- तुम हँसती रहती हो तो ईक बिजली सी चमक जाती है | तुम रूठी रहती हो तो  मेरी जान, मेरी जान, मेरी जान निकल जाती है | ऐसा मैंने देखा नही कहीं पिक्चर विक्चर नही देखा लेकिन ये सुना है गाना | कैसा भी किया होगा कहीं पिक्चर में हुआ होगा | जो अभिनय करते हैं, उस वख्त उनको क्रोध नही होता, क्रोध का अभिनय करते समय | काम का अभिनय करते समय काम नही होता | लोभ का अभिनय करते हैं लोभ नही होता है | मुर्खता का अभिनय करते समय मुर्खता नही होती | बड़े सतर्क होते हैं, सावधान होते हैं | ऐसे ही ज्ञानी पुरुष पुरे जीवन भर अपने आप में सावधान रहते हैं | बाकी का व्यवहार यथायोग्य | तो अष्टावक्र महापुरुष ऐसे योगियों की प्रशंसा करते हैं :- खिद्योपी न खिदते | स्न्तुश्तोपी न संतुष्ट: | खिन्नोपी न खिज्यते | दश्य आश्चर्य दशाम ताम | ताम दशा एव जानते |
लोगो की दृष्टि से प्रसन्न होने पर भी वह ज्ञानवान प्रसन्न नही होता और खिन्न होने पर भी खिन्न नही होता | उसकी उन आश्चर्य दशाओ को देख कर लोग ही, उसी प्रकार के लोग ही उन महापुरुष को जान सकते हैं | दुसरे तो बोलेंगे देखो क्रोध हो गया | देखो कैसे हैं ? कैसा कर दिया ? कैसा डांट दिया ? कैसा कर दिया ? लेकिन मुर्ख अपने संचालको का, आश्रम वासियों की खिचाई करते हैं तो अपमान नही है | उनका कहीं अपमान न हो तो ऐसी सुव्यवस्था बनाते हैं | ब्रह्मज्ञान के योग्य हो जाये | ज्ञानी का सेवक यमपुरी जाये तो यमराज खड़े हो जाते हैं, आदर करते हैं | गुरुवाणी कहती है ब्रह्मज्ञानी संग धर्मराज करे सेवा | यमदूत नही, यमदूतो का स्वामी | ब्रह्मज्ञानी संग धर्म राज करे सेवा | ब्रह्मज्ञानी की मत कौन बखाने, नानक ब्रह्मज्ञानी की गत ब्रह्मज्ञानी जाने |
एक राजकुमार रहा होगा संयमी, बुद्धिमान | राज-पथ की ममता छोडकर किसी संत का शिष्य बन गया होगा | ऐसी तत्परता से सेवा करे के संत की निगाहों में सत्पात्र हो गया | उसको अंगत सेवा में रख दिया | अंगत सेवा में तो, बाबाजी पैदल यात्रा में निकल पड़े | तो सेवा की है एकदम निकट से तो गुरूजी और एक चेलाजी कहीं ठहरे, फिर चले | रात पडती तो कहीं ठहरते, सुबह चलते, दोपहर को भिक्षा माँग लेते, थोडा आराम कर लेते | थोड़ी पुरानी घटना है | एक जगह पर गुरु महाराज प्रणाम करने लगे, माथा टेकने लगे | वहाँ की धूलि अपने ललाट को लगाने लगे | शिष्य राजकुमार था, बुद्धिमान था, समीक्षा उसका स्वभाव था | भगवान की प्रतीक्षा करना वे लोग ठगे जाते है | भगवान आयेंगे, मिलेंगे, वो लोग बेवकूफी में रह जाते हैं | भगवान की तो समीक्षा करो कृपा की | आयेंगे क्या, तुम्हारे से बिछड़े नही है | मिलेंगे क्या ? बिछड़े ही नही है | समीक्षा करो उसकी कृपा की, उसकी प्रेरणा की, उसके अनुशासन की | तो शिष्य गुरु का सत्संग सुन कर खोजी था, समीक्षा करता था | गुरु महाराज तो भगवान को मूर्ति में, मन्दिर में, आकाश में नही, जर्रे-जर्रे में मानते हैं | तो यहाँ, एक खंडर धरती पर मथा टेक रहे हैं क्यों ? इतने जरा-जरा बात में गुरु के मुँह नही लगना चाहिए, मन में रखा, कुछ यात्रा करते | दुसरे कुछ दिनों में गुरूजी, क्या देखा ? की कोई अनुष्ठान कर रहा है, गुरूजी ने उस व्यक्ति को भी प्रणाम किया | नर्मदा किनारा रहा होगा, जो भी जगह रही होगी | यात्रा करके जब, जंगल पार करे शहर और जंगल के बीच एक सुंदर-सुहावनी सात्विक जगह पर कुटीर बनी थी | उस कुटीर को देखे गुरूजी, शांत हो गये, कुटीर के आगे मथा टेका | अब शिष्य की जो समीक्षा वाली नजरिया थी, गुरूजी से छुपी नही थी | बोले चलो बेटा, कुछ पूछना है क्या ? बोले गुरूजी, पूछना तो उसी दिन से शुरू हो गया, जब से यात्रा शुरू हुई | लेकिन आज्ञा दो तो मैं पूछु  | हाँ पूछो | यात्रा शुरू की और एक खंडर था, टुटा-फुट, ईंट के रोड़े और मलबा पड़ा था | उसको आपने खूब मथा टेका और आपका रब तो जर्रे-जर्रे में समाया है ऐसा आपकी अनुभूति है फिर वहाँ आपने मथा टेका ये मुझे समझ में नही आया | बोले बेटे रब तो समाया है, परमात्मा तो जर्रे-जर्रे में समाया है लेकिन उसका साक्षात्कार करके जीवन बिताने वाला महापुरुष का ये पुराना खंडर है | ब्रह्मज्ञानी संत रह चुके थे यहाँ | तो इस ईंट को भी और इस मलबे को भी मैं नमन करता हूँ | के जहाँ ब्रह्मज्ञानी संत की चरण रज पड़ी और दृष्टि पड़ी ये वो मलबा है | ब्रह्म तो सर्वत्र है लेकिन उसकी अनुभूति करने वाला महात्मा वासुदेव सर्वंइति स महात्मा सु दुर्लभ: | ऐसा दुर्लभ महात्मा की नजर इस मलबे पर पड़ी, इन ईंटों पर पड़ी जब रहते होंगे | जब मकान था, अभी मलबा है | इसीलिए प्रणाम करता हूँ की ये मलबा और ये ईंट भाग्शाली है के ब्रह्म्वेता की नजर पड़ी इन पर | जिसके हृदय में ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है | गुरूजी एक साधक अनुष्ठान कर रहा था | उसको भी आपने खूब प्रणाम किया | बोले वो साधक अनुष्ठान कर रहा था तो दुनियावीं चीजों की माँग नही थी उसमें | अनुष्ठान कर रहा था के मैं परमात्मा के परम को, परमात्मा के ज्ञान को, परमात्मा के स्वरूप को, परमात्मा को पाऊं | जब परमात्मा को पाने की इच्छा से कुछ भी किया जाता है, फिर चाहे करने की अक्ल हो, न हो, करने की सामग्री हो चाहे न हो | लेकिन ईश्वर प्राप्ति के लिए कुछ किया जाता है तो सारी जिम्मेदारी ईश्वर अपने हाथ में ले लेते हैं | और उसके योग शेम का वहन भी करते हैं | और वो गुरु और संत के पास जाये तो ठीक नही तो गुरु और संत उसके पास आ जाते हैं | जैसे परीक्षित शुकदेवजी के पास नही गये, शुकदेवजी परीक्षित के पास आ गये |

जिसको ईश्वर प्राप्ति की लग्न है, वो कुछ भी जप-तप करेगा, देर-सवेर ईश्वर को पा लेगा | क्योंकी जो कुछ करता है अंतर्यामी नियंता जानता है की ईमानदारी से मेरे लिए कर रहा है | नौकरी-धंधे के लिए तो अनुष्ठान होते हैं | कुछ बनने के लिए तो अनुष्ठान होते हैं | कुछ पाने के लिए तो साधना-तपस्या एक-से-एक है | ये आधिभौतिक जगत है | आधिभौतिक जगत में कुछ चमत्कारी बनना हो तो आधिदैविक जगत की उपासना करो | जीवन में बहुत कुछ हो जाता है | सोने की लंका बना कर प्रजा की वाह-वाही लुटने वाला रावण देखो | सोने की हिरणपुर बनाकर मैं ही सब कुछ हूँ | ऐसा   हिरणाकश्यपु का जीवन देखा-सुना होगा साहित्य में, कथाओ में | लेकिन कुछ बनने के लिए किया न तो आखिर में बिगड़ेगा | कुछ बनना नही है | केवल परमात्मा को पाना है | और जो बना है वो भी विसर्जित हो जाये | मेरी हो सो जल जाये, जो भी मेरी ख्वाहिशे है, इच्छाएँ है जल जाये | खाली ईश्वर प्राप्ति | बोले ईश्वर प्राप्ति की भी तो इच्छा है | नही-नही वो मेरी इच्छा जीव की होती है, ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा उन्नत साधक की होती है | तो उसको फिर भगवान  संभाल लेते हैं | बच्चा अपने बल पे चलना सीखता है न, चलता है तो गिरता रहता है | लेकिन माँ की ऊँगली पकड़ता है, बाप की तो जरा सुरक्षित होता है | फिर भी बाप-माँ थोडा आगे-पीछे जल्दी-देर करें तो बच्चे के हाथ से छूट सकता है | लेकिन माँ-बाप जब पकड़ लेते हैं, तो फिर बच्चे के गिरने की संभावनाएँ नष्ट हो जाती हैं | ऐसे ही जो भगवान के लिए भगवान का जप करता है, भगवान के लिए भगवत जनों की सेवा करता है, भगवत प्राप्ति के लिए ये सब काम करता है, तो फिर भगवान उसका, अंतरात्मा उसका हाथ पकड़ लेते हैं | वो बाहर का हाथ नही होता है | सूझ-बूझ और ईश्वर-प्राप्ति की लग्न हो तो ऐसे मुर्ख संचालक नही रह सकते | मुर्ख लोग नही रह सकते | ईश्वर-प्राप्ति की लग्न नही इसीलिए बेवकूफी बनी रहती है | नही तो बेवकूफ लोग भी अच्छे बुद्धिमान हो जाते हैं |

जूते में तेल ले जा रहा था | राजा ने देख लिया छत पर से, मंत्री का मजाक उड़ाते हुए | बोले  तू बोलता है सत्संग और गुरुमंत्र से मूर्ख भी बुद्धिमान हो जाते हैं | तो ये जूते में तेल ले जा रहा है इसको बुद्धिमान बना के दिखाओ | मंत्री ने उसको, उसके माँ-बाप से मांगकर गुरु दीक्षा दिला दी और गुरुमंत्र दिला दिया | वही महामूर्ख लड़का श्रीधर स्वामी बन गया | भगवान कृष्ण उसके यहाँ आते, खिचड़ी उठाकर बोझा और उन्होंने गीता लिखी तो श्रीधर स्वामी की टिका वाली गीता अभी भी गीतपुर प्रेस वालो ने कई लाखो गीता का प्रिंट किया होगा | मधुसूदनी गीता और श्रीधर गीता | दोनों को श्री कृष्ण रु-ब-रु हुए | तो उपासना में ये ताकत है | श्री कृष्ण का शरीर माया में था वो विलय हो गया लेकिन वो फिर से बन जाता है, आ जाता है, बात कर लेता है | श्रृष्टि में वो देवता, वो वस्तु है तो ठीक है नही तो आप आधिदैविक उपासना करो तो वो वस्तु और वो देवता बनकर वो वरदान देते हैं | उपासना में ये ताकत है | आधिदैविक उपासना में वो ताकत है के आप जो चाहते हैं वो देवता धरती पे, आकाश में, त्रिभुवन में नही हैं, तो आपकी उपासना से वो देवता बन जायेगा, आएगा और वरदान देगा और आपको वो चीज मिलेगी | फिर हिरणाकश्यपु, रावण, उपासना में बड़े ऊँचे उठे हुए व्यक्तित्व के धनी | लेकिन उपासना आधिदैविक जगत का बल बड़ा देती है, ले आती है | लेकिन परमात्मा प्राप्ति परमात्मा को ही प्रकट कर देती है | फिर उपासना में इतना समय, इतने वर्ष नही भी लगाये तो चल जाता है | जैसे शबरी, शबरी ने केवल गुरु की शरण ली थी | हरीदास की शरण ली थी मीरा ने | तुकाराम ने भगवान की शरण ली थी, भगवान को पाने के लिए | नामदेव ने भगवान की भक्ति की थी, भगवान को पाने के लिए | तो  सिद्धियाँ भक्त के जीवन में, ज्ञानी के जीवन में भी आ जाती है थोड़ी बहुत | लेकिन वो ईश्वर ही महत्त्वपूर्ण होता है | और ईश्वर के सिवाय कोई चीज आई तो उसके महत्त्व में आदमी फिर जैसे संसारी सम्पदा पाके अहंकार आ जाता है धन का, इसका उसका | जैसे मैं लंका पति रावण हूँ | असली में मैं क्या हूँ वो छिप गया | मैं हिरणाकश्यपु भगवान हूँ और कोई भगवान नही, मैं ही भगवान हूँ | क्योंकि दृष्टि मात्र से खेत-खली लहराने लग जाते थे | पैदावार हो जाती थी | पर्वत अपने खनिज उगलने लगते थे | समुद्र मोती उगल के रख देता था किनारे | ऐसा हिरणाकश्यपु का प्रभाव था | लेकिन समय की धारा में सब बह जाता है | परमात्मा समय की धारा में बहने वाला तत्व नही है | समय की धारा में जो बहता है अष्टधा प्रकृति का होता है | पाँच भूत, मन, बुद्धि और अहंकार ये समय की धारा में बहता रहता है | उसको जानने वाला ज्यों का त्यों है | उसकी प्राप्ति वाले थे गुरूजी | तो गुरूजी ये तीसरा सवाल है | एक सवाल आपने खंडर को प्रणाम किया संतोष हुआ, दूसरा सवाल था के एक साधक को देखकर आपने प्रणाम किया क्योंकी उसका उद्देश ईश्वर प्राप्ति था लेकिन इस कुटिया में जो अभी आप प्रणाम करके पधार रहे हैं, इस कुटिया में तो कोई रहता भी नही है | इसको आपने प्रणाम किया ये मुझे समझ में नही आया | बेटे मैंने कुटिया को देखकर थोडा जानना चाहा तो भीतर से मुझे सत्य प्रकट हुआ के कुटिया कोई ब्रह्म्वेता, आत्मरामी संत के भक्तों ने बनाई और वो अपने गुरु भी यहाँ पधारेंगे इस भाव से बनाई है, गुरुजी यहाँ रहेंगे | इस कुटियाँ को मैं प्रणाम करता हूँ की कुटिया ब्रह्म वेता को अपनी सेवा से निवास देगी | तो ये कुटिया नही है ये तो साक्षात् वैकुण्ठ है | जहाँ हरी को पाए हुए पुरुष रहते है वो जगह तो वैकुण्ठ है न | बोले गुरूजी हाँ | शास्त्र की बात है, सत्य है | शंका का समाधान हो गया | अब यात्रा चलते-चलते कहीं बस्ती तो कहीं जंगल आता है | जवान शिष्य था | गुरु का शरीर वृद्ध था | शिष्य भिक्षा माँग के आया | गुरु शिष्य पा लेते | शिष्य को सपन दोष न हो, विकार-आवेश न हो तो गुरुजी वही चीज देते भिक्षा में | बाकि खट्टा, खरा जो कुछ, भिक्षा माँग कर आता है तो किसी की बनी हुई होगी | लेकिन गुरु की दृष्टि पडती तो फिर वो उसके दोष मिट जाते थे | आपके हाथ में जब है तो मिठाई और फल है, प्रसाद के लिए हैं | जब वो भगवान को भोग लगते हैं, गुरु की दृष्टि पडती है तो वो प्रसाद हो जाता है | आप जितना भर-भर के ले आते हो फिर प्रसाद के लिए हाथ क्योंकि ये प्रसाद है | चित को पावन करेगा, मन को पवित्र करेगा | भगवान की दृष्टि पड़ी है, गुरु की दृष्टि पड़ी है | आप उठा लाये तब तो मेवा, मिठाई, फल है | लेकिन वो उसको संवार के थाल में भर दिया और भगवान की दृष्टि पड़ी, पुजारी ने घंटी-वंटी बजाई या गुरु की दृष्टि पड़ी तो वो प्रसाद हो जाता है | वो शिष्य गुरु का प्रसाद खाता था | भोजन नही करता था | भिक्षा ले आता था तब तो अन्न था भोजन लेकिन गुरूजी निकाल देते बाकि का | ये तू खा लेना बाकी का डाल देना पक्षी को | गर्मी के दिन थे | बड़ी उम्र में नींद कम होती है | जवान को नींद आती है | तो पैदल यात्रा करते-करते थका और फिर भिक्षा में मिल गयी लस्सी-वस्सी, दही-वही | शिष्य जरा लेट गया, आ गयी नींद गहरी | रात को मच्छर-वच्छर रहे होंगे तो नींद अच्छी नही आई | दोपहर को कसर भी निकल जाती है | तो गुरूजी जरा, एक मिनट सीधा लेट जाना चाहिए, दो मिनट दाई करवट, ४ मिनट बाई करवट हाजमे में मदद  होती है, हो गया आराम | शिष्य बेचारा थका था तो सो गया | गुरु ने क्या देखा के एक सांप आया है | गुरु समझ गये के ये सांप मेरे शिष्य को काटेगा | गुरु ने कहा रुक जाओ | अपनी योग शक्ति से पूछा तू क्यों आया है ? बोले अगले जन्म का मेरा हिसाब चुकता करने आया हूँ | इसके द्वारा हम सताये गये थे | अब मैं इनको डसकर यमपुरी पहुँचाऊँगा | ये मेरा किसी जन्म में खून का प्यासा था तो मेरा बदला चुकाने के लिए कुदरत ने इसे यहाँ पहुंचाया है | गुरूजी बोले तू इसके खून का प्यासा है, तू इसको नही काट सकता | मैं बीच में हूँ | बोले गुरूजी आपके प्रभाव से अभी ये नही होगा तो कभी न कभी फिर, कर्म का नियम तो पूरा होता है | बोले ये बात भी तेरी मानता हूँ | गुरु को बोले गले का खून पीना है | मैं तेरे को इसके गले का खून देता हूँ | गुरूजी ने छोटा सा चाकू था, धार तेज थी | शिष्य तो लेटा था | गुरूजी छाती पे यों बैठा के वो हिले-डुले नही | चकु से जरा सा चिर डाला | अब गुरूजी छाती पे बैठे है तो आँख तो खुली | आँख खुली है लेकिन देखा के गुरूजी के हाथ में चाकू है | राजकुमार ने आँख बंद कर ली | गुरूजी ने थोडा सा चीरा मारा थोडा सा खून लेकर बड के पत्ते पर सांप को दिया ले तू इसके खून का प्यासा था जा बेटे | हंसराज बूटी होती है मैं जानता हूँ | मेरे को मेरे गुरूजी ने बताया था वो घोट के लगा दो तो घाव-वाव सब ठीक हो जाता है | पट्टा-पुट्टी बांध दी | संकल्प दिया गहरी नींद में थोडा आराम मिलेगा | संध्या हुई तो देखा क्या पता सांप कुछ कर दे | अब उठो,  राजकुमार उठा | गुरु आगे, शिष्य पीछे | बोले बेटा कुछ शंका है तो पूछ ले | कुछ पूछना है तो पूछ ले | बोले गुरूजी कुछ नही पूछना | अरे तेरे गले में पट्टा बंधा है तेरे को पता है | मैंने चाकू घुमाया था | बोले गुरूजी ये मेरा दुर्भाग्य है के आपको सफाई देने के लिए कुछ बोलना पड़ता है | बोले बेटा तेरा प्रारब्ध तर-तीव्र था | तेरे खून का प्यास तेरा शत्रु को तेरे किसी जन्म का बदला चुकाना था | इसीलिए मैंने चाकू से चिर मारके तेरा खून दे दिया और पट्टा बांध दिया | गुरूजी मेरी आँख खुली थी | फिर देखा गुरूजी हैं और हाथ में चाकू | तो न जाने कितने-कितने जन्मो में कैसे-कैसे मौत हुई होगी ? अब गुरु के हाथ से मौत भी हो जाएगी तो वो मुक्ति देगी | आप जो भी करेंगे मेरे हित में ही होगा | ऐसा सोच के मैंने आँखे बंद कर दी | बाद में आपने जो भी किया वो सब मैं महसूस कर रहा था | लेकिन आपके दैवी कार्य में मुझे भागीदार होना चाहिए | ये क्या करते हो, ऐसा क्यों, वैसा क्यों? मैं जब समर्पित हो गया फिर ये तन मेरे बाप का तो है नही, आप ही का तो है | गुरु ने कहा अरे राजकुमार नही है मेरा शिष्य है, बस हो गया काम | संस्कार तो पहले ही थे | गुरूजी बरस पड़े | ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे न शेष | मोह कभी ना ठग सके इच्छा नही लवलेश | अब जब मैंने कहा न दिल्ली का है, एम्.डी.  है डॉक्टर है, बेटी शादी करके जा चुकी है, पति-पत्नी है, पत्नी करोड़ो रुपय की जॉब करती है | २-३ करोड़ कमाती है ऐसा मुझे आज उसके दोस्त डॉक्टर ने कहा | उस डॉक्टर को मैंने देखा | उसने ये भी कहा | मैंने कहा इतना सारा कमाता है क्या करेगा ? तो उस डॉक्टर ने आज कहा के एक बार मेरे साथ बात करते-करते मेरे को बोले के जब हम प्रक्टिस करने के लायक नही होंगे तो मैं क्या खाऊंगा | तो मैं भी हँसा और जो मेरे से मिलने आया था वो डॉक्टर भी हँसा | वो भी डॉक्टर है | उसकी प्रक्टिस बहुत कम पैसे में चलती है | लोगो की सेवा करता है | बोला मुझे आपका सत्संग मिला, सत्संग से मैं बड़ा संतुष्ट हूँ |

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One Comment on “ईश्वर प्राप्ति की लगन”

  1. shish ram saini Says:

    good


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