मधुसूदन महाराज का जप प्रभाव

21st Oct 2012

हरी ॐ कीर्तन |
एक तो उज्जैन तीर्थ क्षेत्र, सिह्स्थ क्षेत्र | दूसरा शारदीय नवरात्र की सप्तमी | और तीसरा महत्वपूर्ण योग है रविवार की सप्तमी | रविवार की सप्तमी कभी भी आये | ये तो शारदीय है और उज्जैन है | रविवार की सप्तमी कभी भी आये, तो सप्तमी के दिन किया हुआ जप लाख गुना फल दायी होता है | तो इस हिसाब से मन्त्र सिद्धि योग भी है | उज्जैन सिह्स्थ क्षेत्र भी है |

मधुसुदन महाराज जा रहे थे | उनको देख के मोची ने कह दिया, ” क्यों महाराज दो अनुष्ठान से उबकर आ गये ?” महाराज ने कहा “अरे !, मैं दो अनुष्ठान करके उबा हूँ, ये चप्पल सिनेवाले को किसने बता दिया ? बोले महाराज मैं काई बताऊँ आपको ? मैंने भूतनी सिद्ध कर रखी है | भूतनी का मन एक जगह नही होता | कर्ण पिशाचनी | बोले चलो श्री कृष्ण का दर्शन करने के लिए मैंने अनुष्ठान किया था तब | कृष्ण तो बड़े भगवान हैं, तो बड़े आदमी बिना अनुष्ठान के नही आवे | लेकिन तेरी भूतनी का ही दर्शन कराई दे | बोले महाराज उसके अंदर तो हमारा भुत-भूतनी सब | महाराज ने मन्त्र लिया | ३ दिन में ७२ घंटे होते हैं | महाराज ने ७३ घंटे कर लिया | बोले न भुत आया न तेरी भूतनी आई | ये काई है ? श्री कृष्ण के लिए तो पुण्य जोरदार चाहिए | एकाग्रता चाहिए लेकिन भुत-भूतनी तो ३ दिन में वश हो जाये | तो क्या हम भुत के दर्शन करने के भी योग्य नही है | बोले बाबजी जरा ठहरो, मैं पुच के आता हूँ | वो गया, मकानों के पीछे जहाँ गंदी, गटर लाइन होती हैं, नालियाँ | वहाँ अपने भूतनी-भूतनी से जिससे पूछना था पुच के आया | बोले, महाराज ये खी रह्या है के महाराज ने ज्यों जप किया त्यों हम खीचके गये लेकिन ज्यों ही | महाराज ने ॐकार का जप किया हुआ है पहले | फिर श्री कृष्णम शरणम का जप किया हुआ है | तो इनके अनुष्ठान से इनकी अद्यतनीक औरा, अध्यात्मिक तेज इतना बलवान है के हम इनके आगे प्रकट नही हो सकते | उनको बोलो एक अनुष्ठान फिर श्री कृष्ण का और कर दे | तो श्री कृष्ण आवेंगे | और बात-चीत भी करेंगे | और श्री कृष्ण के विषय में जोप महाराज जी गीता लिख रहे हैं, उनकी गीता भी बहुत प्रसिद्ध होगी | महाराज ने उनकी बात मन ली और तीसरा अनुष्ठान किया तो श्री कृष्ण आये | अ गा पर टिका लिखने की सम्मति दी | आशीर्वाद दिया | और गीता तो इतनी प्रसिद्ध हुई के कई लाख तो क्या, करोड़ो में छप गयी होगी गीता | जैसे अपना दिव्य प्रेरणा पुस्तक करोड़ो में छप गया | गीता प्रेस गोरखपुर वालो ने म्धुसुद्नी गीता | दो गीता बड़ी प्रसिद्ध मेरे सुनने में आई | ऐसे तो ४८ गिताये हैं लेकिन श्री कृष्ण की गीता कई २ टिकाये | राम गीता है, अष्टावक्र गीता है और भी अलग-अलग नाम की गिताये हैं | लेकिन श्री कृष्ण गीता पर बहुत सारी टिकाये हैं | उसमें मधुसुद्नी गीता | मधुसुधन महाराज और श्रीधर स्वामी | उनकी गिताये मेरे गुरूजी भी पढ़ते थे, कभी सुनते थे | मैं भी सुनता था | उनको श्री कृष्ण का साक्षात्कार हो गया |
आजतक मैंने कुछ खाया-पिया नही | जब खता-पिता है तो शरीर खता-पीता है | प्राण खाते-पीते है, मैं नही खाता | तुम प्राण से अलग आत्मा हो, चैतन्य हो | दुर्वासा ऋषि को भी साक्षात्कार हुआ, श्री कृष्ण को भी ये साक्षात्कार हुआ | अपने भी वही | दृष्टि से कैसा काम | व्यवहार दृष्टि से तो खा-पी के आये | तत्व दृष्टि से कुछ भी नही | कभी कहीं गये ही नही | आकाश कहीं नही जाता | घड़े जाते-आते हैं | ऐसे ही चैतन्य कहीं नही आता-जाता | शरीर आते-जाते हैं | शरीर को मैं मानो तो खूब आये-गये | लेकिन आकाश-चैतन्य को मैं मानो ज्यों का त्यों भर दिया है | आज तो जप करना है लेकिन जप में एक तो बह्ग्वान की प्रीति का विनियोग करना है | दूसरा सद्बुद्धि प्राप्ति अर्थे का विनियोग करना है | तीसरा आरोग्य प्राप्ति अर्थे | चौथा इश्वर प्राप्ति अर्थे | और जप करने की रित मैं बताऊंगा आपके लिए बहुत सरल तरीका हो गया है | आरोग्य प्राप्ति के लिए करना है तो बोलना आरोग्य प्राप्ति के लिए | भागवत प्रीति के लिए करना है तो मन में बोलना इश्वर प्रीति अर्थे | अभी मैं प्रतिज्ञा करता हूँ | फिर लम्बा जप करके हृदय से जप करेंगे | फिर लम्बा जप करके हृदय से जप करेंगे | मैं थोडा सिखा देता हूँ, फिर आप खैजो -पीजो और जप चालू रख जो | और शाम को फिर सत्संग हो जायेगा | ठीक है |

अब बाएँ नाक से स्वास लो और उसमें ॐ स्वरूप भगवान का नाम भरो | स्वास रोको और उसमें ३ बार -५ बार जप करो | फिर दाये नाक से स्वास छोड़ो | फिर दाये से ॐ स्वरूप इश्वर को भरो | ३ बार जप करो भगवान मेरे, मैं भगवान का | ॐ, ॐ, ऐसा २-३ बार कर लियो | संकल्प करो इश्वर प्रीति अर्थे | ईश्वर प्रीति होने से द्वेष चला जायेगा, कपट चला जायेगा | ज्यों कपट और द्वेष को छोड़ते जाओगे ईश्वर प्रीति बढ़ती जाएगी | ज्यों काम, क्रोध को छोड़ते जाओगे ईश्वर प्रीति बढ़ती जाएगी | अब दोनों नथुनों से स्वास लो | मैं भगवान का, भगवान मेरे, भगवान आनंद स्वरूप हैं और चैतन्य रूप हैं | और ओमकार उनका स्वभाविक मन्त्र है | कंठ से जपने से स्मृति बढ़ती है, भक्ति बढ़ती है |  ॐ,…. | फिर से घर स्वास दोनों नथुनों से ………| बस रोज दो बार करोगे | अब मैं तुमको एक प्रयोग सिखाता हूँ | भजन का तो भजन हो जायेगा लेकिन आपके बच्चे और पडोस के बच्चे बुद्धिमान बनेंगे, अच्छे मार्क लायेंगे | बॉय फ्रेंड, गर्ल फ्रेंड करके जो युवक, युवती तबाही के रास्ते गिर जाते हैं, जो तुम्हारे इस प्रयोग में आयेंगे वो बच्चे खुद तो नही गिरेंगे दुसरे गिरे हुओ को भी बचा लेंगे | ऐसे अच्छे हो जायेंगे | ये ॐ कार मन्त्र जो है न इसकी खोज भगवान नारायण ने की थी |

एक होता है निर्माण दूसरी होती है खोज | निर्माण उसका होता है जो पहले नही बना था | और खोज उसकी होती है जो पहले था | तो भगवान नारायण के पहले ये ॐ कार मन्त्र था | भगवान की नाभि से ब्रह्माजी और ब्रह्माजी के बाद सृष्टि जन्मी | लेकिन ॐ कार मन्त्र भगवान नारायण के पहले था | नारायण जिससे नारायण है वो आत्मध्वनी ॐ कार | तो प्रतिज्ञा करेंगे | हम ओमकार मन्त्र का जप करते हैं | तो इस ओमकार मन्त्र की छंद है गायत्री | इसके ऋषि हैं भगवान नारायण | और इस ओमकार मन्त्र के देवता हैं हाजरा-हजूर | जो कभी मरते नही, कभी बिछड़ते नही, कभी बेवफाई नही करते | और हम हजार-हजार गलतियाँ करे तो भी हमारी भलाई का ही सोचते हैं | दंड देके भी हमारी भलाई का ही | वो है अन्तर्यामी परमात्मा |

अगर उनका ये दिव्य स्वभाव नही होता, तो आप हम अभी यहाँ नही होते | कई बार हमने झूठ बोला है | आपने भी बोला है | कई बार न खाने का हमने खाया है आपने खाया है | न करने का किया है | फिर भी हमारे अपराधो की ओर ध्यान न देकर अपनी उदारता से हमारी ओर आपकी बुद्धि में आज का पर्व ओर फिर ॐ कार की साधना करने का अवसर, उसी की कृपा नही है क्या ? आपकी हमारी अक्ल के बल से बैठे हैं नही | उसकी कृपा है | प्रभु तेरी कृपा है | तेरी उदारता है | तो चलो अब संकल्प करो | अथ ॐ कार मन्त्र | अब मैं तुमको अपने बबलू, बबलियाँ मन कर सिखाता हूँ | ओर तुम अपने बबलू, बबलियों को सिखाना |

अष्टावक्र १२ साल के थे | ओर जनक राजा, सीता के पीता ८०-९० साल के थे | १२ साल के गुरु बोलते हैं बेटा जनक, समझ गये, १२ साल का तो बाप है ८०-९० साल के हैं बेटे | क्योंकी सब के बाप का बाप आत्मा है | जो आत्मा को मैं मानता है वो सब बापों का बाप होता है | तो ऐसे ही उम्र से भी मैं तो तुम्हारा बाप लगता हूँ | ओर बापू के नाते भी, बापू, बापू कहते हो | लेकिन आज तुम सत्य रूप से चाहे मेरे से उम्र में बड़े हो तभी भी आज मेरे आगे बबलू हो | घर में चाहे दादा-दादी, नाना-नानी, परदादा-परदादी, हो लेकिन मेरे आगे आज बच्चे-बच्चियाँ हो | तो देखो बबलू अभी अपन ॐ कार मन्त्र जपेंगे | और कान में ऊँगली डाल के जपेंगे तो ॐ कार का तो लाभ होगा लेकिन स्मृति शक्ति बढ़ेगी, सद्बुद्धि बढ़ेगी | तो करोगे | जब बैठे तो कम्बल पे बैठेंगे, या प्लास्टिक पे बैठे | कुल मिला के एअर्थिंग न मिले, विद्युत् का कुचालक आसन हो |क्योंकी ये करने से विद्युत् बनेगी, अध्यात्मिक शक्ति बनेगी | अगर नंगे पैर घूमते हैं अथवा बिना आसन के बैठते हैं, तो ये जो भक्ति की शक्ति है, उर्जा है वो धरती में चली जाती है | ध्यान नही रखते इस लिए बहुत वर्षो से करते हैं भजन | तो फिर जीवन में जो बल चाहिए, बुद्धि-बल, अनुमान बल, क्षमा बल, शौर्य बल ये कम दीखता है | जब ध्यान करे तो तुलसी की माला हो, अथवा रुद्राक्ष की माला हो | और आसन | और ऐसा गुंजन करे तो बिना माला के गुंजन होता है |

ॐ कार मन्त्र, गायत्री छंद, परमात्मा ऋषि, अंतर यामी देवता, अंतर यामी प्रीति अर्थे जपे विनियोग |ॐ…… अब जितनी देर चुप हुए तो हुए फिर मन में जपते जाओ ॐ…. | फिर मैं प्लुत करूँगा | जितनी देर लम्बा कराऊ, करो फिर हृदय में ॐ …. | तो हृदय के जप की आदत बन जाएगी आपकी | परम सिद्धि मिलेगी | ॐ…… सुमिरन ऐसा कीजिये खरे निशाने चोट, मन ईश्वर में लीन हो हले न जिव्हा, होंठ | हरी ॐ …….. | इस प्रकार थोडा जप करके दोनों कानो में ऊँगली डालो | अब कंठ से जप करना है | लम्बा स्वास लो | ॐ…..| अब दूसरी बार | हाथ ऐसे रखे के तनाव न रहे | ॐ….. | ये ॐ कार मन्त्र बहुत शक्ति शाली मन्त्र है | इसकी छंद गायत्री है, इसके ऋषि देवता नारायण है और परमात्मा अन्तर्यामी खुद है | तुम जपोगे न तो अन्तर्यामी देवता प्रसन्न होंगे तुम्हे हँसी आएगी | आनंद आएगा, बुद्धि विकसित होगी | बहुत लाभ होता है |

मन्दिर का देवता तो पुजारी दरवाजा खोले तब दर्शन हुए | मन के देवता तो बोलते तो सत्ता उन्हीं की आती है | इससे देवता प्रसन्न होते हैं | ऐसे १० बार करना है | ब्रह्मज्ञानी का चेला काहे को फिर जन्मे फिर उन्धा लटके | पापी तो ऐसा कर भी नही सकते | और करे तो पाई रहेगा नही | ये तो ५-६ साल के बबलू, बबलियाँ भी कर रही हैं और ५० साल के भी कर रहे हैं | जितना घर स्वास लोगे उतना स्वस्थ बढ़ेगा, क्षमा शक्ति बढ़ेगी, शौर्य शक्ति बढ़ेगी, अनुमान शक्तिओ में इजाफा होगा| दुसरे की भलाई में अपनी भलाई है | देसी घी में सेंक लिया | बहुत ज्यादा न सेंके, कम न सेंके | पिलास  पकड़े उतना सेंक ले | फिर जितना आटा सिंघाड़े का उतना खजूर | दोनों का अच्छी तरह से मिश्रण कर दिया | आटा अच्छी तरह से पिआस हुआ हो | मोटा न हो | सिंघाड़े का आटा और खजूर सम्भाग | मिश्रण हो गया घी में सेंक लें | उसकी गोली बना  ली ५-७ ग्राम की छोटी-छोटी गोलियाँ बना ली बेर जितनी | सुबह १-२-३ गोली खूब चबा-चबा के खावे | फिर थोड़ी देर कुछ न खाए | थोड़ी भूख लगे तब दूध पिए | और हाजमा अच्छा हो, घी की सुविधा हो | तो दूध में थोडा घी भी डाल दें | उपवास में मोरिया की खीर बनी है आज | मैं भगवान का भगवान मेरे, भगवान चैतन्य रूप हैं, आनंद रूप हैं, वो मेरे हैं, मैं उनका हूँ, मरते नही बिछड़ते नही, बेवफाई नही करते, मैं उनको स्नेह करता हूँ, वो मुझे स्नेह करते हैं | ॐ……… |

यशोदा मने क्या ? भगवान को यश देने वाले बुद्धि का नाम यशोदा है और कृष्ण क्या ? बुद्धि को जानने वाला आत्मा कृष्ण है | अभी साथ में ही हैं | ॐ…….. | गहरी शांति, मधुर शांति | ऐसा कोई सामर्थ्य नही जो परमात्मा शांति से उत्पन्न न होता हो | कीर्तन, राग, भजन, सबका सार संसार की हापा-धापी भूलकर मन परमात्मा में शांत हो, विश्रांति पाए | परमात्मा विश्रांति सभी साधनों का लक्ष्य होना चाहिए | परमात्मा ज्ञान ही लक्ष्य होना चाहिए | इन्द्रिय सयम, व्यवहार में शुद्धि, बुद्धि में परमात्म ज्ञान, और हृदय में भगवत प्रीति, बस हो गया | बाकि का काम तो भगवान अपने आप करवा लेते हैं | कपट, छल, छिद्र मोहि सपने न भावा | कपट करो, माला घुमाओ | थोडा सा फायदा होगा तो होगा | दुसरे के छिद्र देखो, झूठ बोलो | बुद्धि मारी जाती है | करा-कराया चोपट हो जाता है |

इन्द्रिय सयम, व्यवहार में शुद्धि | हवन तो कृते हैं लेकिन नजर है यजमान के खीशे पे | पूजा तो करने जाते हैं वहाँ महाकाल की लेकिन वहाँ के लोगों की नजर महाकाल पे है या लोगो की जेब पर है | फिर महाकाल के पास होते हुए भी महाकाल के पास नही हैं | अपनी नजरिया, अपनी भावना, अपनी समझ भगवान के ज्ञान से सम्पन्न करो | ठगी न भगवान प्रसन्न होते हैं , न तुम्हारा जीवन अंदर से प्रसन्न होता है | कपट गांठ मन में नही सबसे सहेज स्वभाव नारायण वह संत की लगी किनारे नाव | वो संत हो गया जिसके कपट का अंत हो गया, वासनाओ का अंत हो गया | अज्ञान का अंत हो गया | ऐसे संत का आधी घड़ी का सत्संग भी बेडा पार करने की ताकत रखता है | एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध |

 

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3 Comments on “मधुसूदन महाराज का जप प्रभाव”

  1. Sandeep Kumar Says:

    Prabhu aapki is sewa se bahut sishyon ko fayada phuchta hai, Dhanayawaad
    Jai gurudev!

  2. Amit Says:

    This satsang was very spritual and with
    teaching of japa.
    Thx world press.com

  3. shailesh Says:

    pujya shree kahtehe bus itnajanlo aap nigude nahe aap to tribhuvan palak ke sishya ho laala………….lalliya


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