भगवत प्राप्ति का काम सरल है

परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी का सत्संग अहमदाबाद दिनांक – २७ सितबर २०१२

 

हरि ॐ हरि ॐ

भगवत प्राप्ति कठिन से कठिन काम है तो भगवत प्राप्ति का, ऐसा सरल कोई काम नहीं त्रिभुवन में इतना भगवत प्राप्ति का काम सरल है | सात दिन में कोई ग्राज्युशन से ग्राज्युयेट नहीं हो सकता, सैट दिन में  दो  क्लास भी नहीं पास हो सकता | लेकिन  परीक्षत को सात दिन में भगवान प्राप्ति हो गई | सरल है ना? सात दिन के अंदर परीक्षत राजा को परमात्मा साक्षात्कार हो गया | परीक्षत की तडफ ऐसी थी तो सातवे दिन तक्षक काटेगा | पुरे राज पात का त्याग करके शुक्रपाल गंगा किनारे मुझफ्फरनगर के पास सातवे दिन परीक्षत को सुखदेव जी ने कहा कि राजन ! ये जो तुमको राजोंकी वंश परंपरा सुनाई मैंने वो विस्तार से जो कथाएँ सुनाई ये तुम्हारी मन, बुद्धि, पक्षी को  ठीक हो शांत करने के लिए बाकी सार बाद कहिये तुम्हे हाड, मास का शरीर नही हो | इस दुर्बुद्धि का त्याग करना | मैं शरीर हूँ और मै मर जाऊंगा ये दुर्बुद्धि है | मै शरीर हूँ, मै बीमार हूँ ये दुर्बुद्धि है | हम शरीर को जानते है और बीमारी को भी जानते है | मन में प्रारब्धद्वेग से अनुकूलता प्रतिकूलता आती है लेकिन मन में चाहना कि विपरीत चाहे तो दुःख पैदा होता है | प्रारब्ध दुःख –सुख नहीं देता, प्रारब्ध तो अपना पारिस्थित लाता है दुखी होना नहीं होना अपनी बेवकूफी | प्रारब्ध दुखी-सुखी नहीं करता अपने मान्यता को व्यक्ति दुखी-सुखी होते है | तो मन दुःख-सुख कि भावना में चिलागता है | ये भी मन कि मूढता है , चित-चिंता में मूढता है लेकिन ये स्वयं आत्मा है और परमात्मा का अविनाशी अंश है | जैसे घड़े का आकाश, महाआकाश का अंश है, महाआकाश अंशी है, घढ-घड़े का अंश है की जो घड़े में वो आकाश वास्तव में उतना नहीं है ? घड़े की आकृति में उसने बनाया | घडे का आकाश महाआकाश से  अलग नहीं है ऐसे आत्मा-परमात्मा से अलग नहीं है | तो वो आत्मा-परमात्मा व्यापक ब्रम्हरूप हो तुम, तुम शरीर रूपी घड़ा नहीं हो, तो पंचभौतिक शरीर है और दुःख-सुख आता है मन में ये भी प्रकृतिका है | चिंता आती है चित्त में ये भी प्रकृतिका चित है | वैसा तो क्रोध आदि होता है अहंकार में ये भी प्रकृतिका है | तो पाच भुत और तीन सूक्ष्म प्रकृतिका, पाच भुत उस्फ्रुत प्रकृतिका है और तीन भुत सूक्ष्म का है | भगवान जो बोलते है – भूमि रापो नलो वायु खमं मनो बुद्धिर वच अहंकार इत्तेव् में भिन्न प्रक्रति अष्टदा || भगवानने कृपा करके अपना अनुभव बता दिया था की मेरा अनुभव मेरे अभी भाई को मिले, सभी जिविओं को मिले | तो ये भूमि माना पृथ्वी, अनलो माना अग्नि, वायु माना वायु, आप माना पानी, खमं माना आकाश ये पाच भुत और अहंकार इत्तेव | भूमि रापो नलो वायु  खमं मनो बुद्धिर वच | खमं तो हो गया पाच भुत, मन, बुद्धि आकाश ये तीन हो गये तो आठ हो गये | तो भगवान कहते है कि ये मेरे से अलग है | ताकि मेरी संतानोकी मेरी ज्ञान मिल जाये वो भी अपने को भिन्न माने | शरीर बदलता है तो तुम जानते हो, मन बदलता है तो उसको तुम जानते हो, बुद्धि बदलती है तो उसको तुम जानते हो, अहंकार बदलता है तो उसमे बच जावो | तो मै हूँ मै तो वही सत्ता है | लेकिन शरीर को मै जानकर उससे जुड जाता है | मै सबको जानने वाला हूँ, जवानी आयी, बचपन आया उसको मै जाननेवाला हूँ | मन में दुःख आता है चला जाता है मै उसको जनता हूँ | बुद्धि में अच्छे–बुरे निर्णय आते है मै उसको जानता हूँ | मै उससे भिन्न हूँ, मै साक्षी हूँ, मै आत्मा हूँ , परमात्मा हूँ | ये सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर है उसका अंश मै हूँ | परमात्मा का भुलाना नहीं है, परमात्मा के पास जाना भी नहीं और जगत में उथल–पाथल करके के कुछ भुलाना भी नहीं ना नहीं है | जगत की कितनी उथल–पाथल करके के रावण थक गया लेकिन रावण ने सोने की लंका बना दी फिर भी दुःख नहीं मिटा | शबरी भिलने खाली गुरु के चरण पकड़ लिया तो इतनी आत्मरस में तृप्त हो गई | सयंमि, सदाचारी मुझे ये हो जाये, मुझे बेटा हो जाये ये शबरी में वासना नहीं थी | बस ईश्वर को पाना तो गुरु ने शबरीको साक्षात्कार का रास्ता दिखा दिया | शबरी को साक्षात्कार हो गया आतंरात्मा राम का और दशरथ नंदन राम भी आये | शवरी के झूटे बेर खाए, तो रावण जैसा सोने के लंका भी नहीं थी, ब्राम्हण कुल की भी नहीं थी, आत्मा का कोई कुल नहीं होता | तो शरीर का कोई ब्राम्हण जाती, कोई क्षेत्रीय आदि आदि | आत्मा को कोई दुःख-सुख नहीं होता, आत्मा तो दुःख-सुख को जानता है, लेकिन बेवकूफी से कोई दुःख-सुख से जुड जाते है | जो दुःख को याद करता रहता है तो उनको दुःख बढ़ता है | जो जगत की बाते याद करते रहते हो तो जगत में मोहित हो जाते है | जितना जरुरी काम है उतना तो कर लिया बाकि का तो भूलो और वेदांत के शास्त्र के नुसार आत्मदेव को सुनो, आत्मदेव में तृप्ति लो अगर समज आ जाये तो ये काम है | परीक्षत को सात दिन में हो गया, खटराम राजा को मोहरत में हो गया, जनक राजा को घोड़े के नाकाम में पैर डालते-डालते हो गया, हमको चालीस दिन में हो गया |  तो चालीस दिन में एक पास हो सकती है क्या ? कितना सरल है और साक्षात्कार होने से कितना आदमी सबसे बड़े – में – बड़ा है आत्मसाक्षत्कार |

आत्म ज्ञानात परम् ज्ञानमं न विध्येते |

आत्म लाभात परम् लाभातं ने विध्येते |

आत्म सुखात परम् सुखमं  ने विध्येते |

आत्मसुख से कोई बड़ा सुख नहीं, आत्म लाभ से कोई बड़ा लाभ नहीं और आत्मज्ञान से कोई आत्मज्ञान नहीं | इसलिए बारा वर्ष के आष्टावरक को ज्ञान हुआ तो जनक के दरबार में जा रहे थे | तो पहले तो चौकीदारों रोका ये आष्टावरक ने …… आत्मसाक्षात्कार में निर्भय होते है | बोले जनक राजा ने विद्वानों के लिए सभा भरी है, मै जाता हूँ , प्रश्नोत्तर करने ? टेढ़ी-मेढ़ी टांगे है, छोटासा कद है ऐसा ऋषिपुत्र आया है | जनक धर्मात्मा राजा था | तो देखा तो बड़े योगी, उसे आँखों तो आत्मशांति है राज निपुण, जनक ने उसे बिठा दिया ऊँचे आसान से, उनको देखकर सबलोक ठाका मार के होस पड़े, की ये कौनसा प्राणी आ गया | ये बबलू कैसा आ गया | हे जनक गर्जना किया मै तो सुना था तुम्हारे यहाँ आत्मवेता विद्वानों की सभा है लेकिन यहाँ तो चमार सभाँल के बैठे है सब | पंडित बोलते ऐसा कैसा बोलते है – बोले तुम इस शरीर को देखकर मेरी मज्जक उड़ाते हो , खिल्ली उड़ाते हो शरीर तेढा – मेढा, टेढ़ी टांगे , टेढ़े हाथ, कुबड़ा ये सब शरीर है शरीर पर तुम्हारी नजर है शरीर तो चमड़े का है , हाड-मास का है, पंचभूतों का है | जैसे मिटटी के घरे अलग-अलग है और सुराग की डिझाईन अलग है | तो सूराई एक आकाश एक मोटा और गर्दन छोटी, मटका पेट मोटा तो गर्दन भी फिर मोटी | तो इसमें सूराई में और मटके में मिटटी का फरक है आकाश तो वही-वही है | ऐसे मै आत्मा तो सब मै वही-वही का हूँ | तो तुम आत्मदृष्टि से न देखकर शरीर से दृष्टी से देखकर के मेरे को आत्म मानकर हँसे बोलो … क्या बोले ॐ… ॐ….. ॐ….  आष्टावरक बोले जनक समज गये | वो मुझे आत्मज्ञान चाहिए था ये सब प्रकाश जगमगाता घर में बैठा भगवान मिला गया, गुरु मिल गया | जनक ने पूजन किया , राजा ने पूजा किया तो और लोक क्या विरोध करेंगे | जनक ने पूछा प्रभु जिवत्मा आता है वो मेरा ये तेरा करके सब मोह माया फसता है , जन्म-मरण में भटकता रहता है | मुक्ति का उपाय आप ही बता सकते है | अगर मोक्ष है तो क्या आता – विषय तद विषय पात्रे … सुनने का मजाक, खाने का मजाक, देखने का मजाक, काम इंदिय का मूत्र इन्द्रिय का मजाक ये तो फसाने वाले है | आर्ज्य, सरलता , क्षमा, संतोष ये सुधाजनक रात्रे ऐसा कहकर आष्टावरक ने उपदेश दिया | आष्टावरक उपदेश आष्टावरक संहिता बन गयी | जिसको जल्दी साक्षात्कार चाहिए आष्टावरक संहिता गीता है आरपार |

राजा मृग बड़ा बुद्धिमान था मरके किरकिट बन गया आप कौन निकाले उसको किरकिट में से निकाला औदावातर के किरकिट वर्मा फस गये श्रीकृष्ण आये श्रीकृष्ण ने निकलवाया आपने कृपा दृष्टी डाले तो किरकिट की गर्दन लुडक गई और उसमे से जो जीवात्मा था वो देवता के स्वरुप में प्रगट हो गया श्रीकृष्ण तो जानते थे लेकिन अंजान होकर पूछा क्या हम आज बाल गोपालों के बिच अन्तोदन दिन बिताते है |आप देवपुरुष कहाँ से पधारे तो वो बोलता है की माधव तुम सब जानते हो के भी अंजान होकर पूछते है तो मै इस धरती का सबसे प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट था | अभी भी मेरी यशगाथा इतिहास गाता है | आसमान के सारे तारे कोई गिन लेवे  लेकिन मैंने अपने यश के लिए बड़े-बड़े प्रसिद्ध विद्वान-ब्राम्हणों को जो गाय दान किई उसे मेरा यश अभी भी है | लेकिन खाली शरीर का यश जीव का बंधन नहीं काटता अगर मै संतोष से धनयान पाता, सत्संग सुनाता तो अभी ये दुर्गति नहीं होती | जिस शरीर का यश हुआ तो येही पड़ा रहा | उसकी आज्ञा भी कही होगी | आसमान के तारे कोई गिन सकता है जितनी मै गौ दान कीई वो कोई नहीं बता सकता | वो कृष्ण पहचान गये वोले राजन ! कोई नग है क्या?  बोले हा प्रभु , अरे तो तेरी यश अभि भी सुनाई पड़ती | हायती में सदगुरु का सान्निध्य न रहा, मरने के बाद यश रहा तो क्या हुआ |

सारे तीर्थोमे उसने स्नान कर लिया, सारे यज्ञं उसने कर लिए, सारा दान उसने दे दिया, सारे पितरों को तर्पण कर दिया, जिसने एक क्षण भी ब्रम्हज्ञान मन स्थिर किया – माततेंम सर्व तीर्थं,  दाततेम सर्व दानं | कृततेन सर्व यज्ञं येन क्षण मन: ब्रम्ह विचारे स्थिर करो |

एक क्षण के लिए ब्रम्ह परमात्मा के विचार में मन को लगा दिया कितना भारी पुण्य है | एकादशी व्रत का पुण्य है लेकिन इस पुण्य के आगे वा .. वा ..

हरि ॐ हरि ॐ …..

भक्त के ऊपर आपदा आती है तो और भगवान की कृपा बनी रहती है तो वो दिखती नहीं | सफलता अहंकार अपने शिर पे उठता है और विफलता भगवान को मर देते | नहीं नहीं वा प्रभु वा

हरि ॐ हरि ॐ …..

 

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One Comment on “भगवत प्राप्ति का काम सरल है”

  1. shubham dhakare Says:

    GURU SEWA HI SACHHI SEVA


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