सोच समझ कर कर्म करना

परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी का सत्संग – Mauranipur– दिनांक – २२ सितम्बर २०१२

भगवान शिवजी पार्वती को अगस्त ऋषि के आश्रम ले जाते सत्संग को और भगवान राम सीताजी को वशिष्ट के चरणों में ले जाते थे | चौदा साल वनवास के हुए तभी भी जहाँ सत्संग मिल जाता था वहाँ-वहाँ रामजी सीताजी को ले जाते थे |

एक घडी आधि, आधि घडी आधि में पुनियाद | तुलसी संगत साधन की | हरि को जापराध | हरि हरि ॐ…… हरि ॐ …..

कबीरा दर्शन संत के, साहेब आवे याद , लेने में वही घडी, बाकी के दिन बाद | हरि हरि ॐ….. हरि ॐ…..

भयनाशन दुर्मति हरन, कली में हरि को नाम, निशिदिन जो साधक जपे, सफल होए सब काम |  हरि ॐ….. ॐ…..ॐ….. प्रभु ॐ …. प्यारे ॐ ….. हरि ॐ …..

नित्यउत्सव भव्येते श्याम, नित्यउत्सव भव्येते श्याम, नित्यउत्सव भव्येते श्याम … उनके जीवन में नित्य उत्सव, जिनके जीवन  में भगवान की प्रीति है, भगवान का नाम है, बड़ी-बड़ी आपदायें उनके आगे सिर झुकाके चली जाती है | हर विपदाओंको हराता है, जिनके जीवन में भगवान श्रीहरि का सुमरन है, भगवान श्रीहरि को अपना मानते है | हरि का मतलब ही है जो हर दिल में हो, हर जगा हो , हर स्थान पे हो, और जिसका सुमरन करने से पाप-ताप, दुःख-दरिद्रता हर ले उस एक परमेश्वर का नाम है हरि | हरिति पातकानी, दु:खानी, शोकानी इति श्रीहरि | तो शास्र कहते है – उनके जीवन में बड़े-बड़े अमंगल होनेवाले होते हो वो मंगल में बदल जाते है | जैसे भीम का अमंगल करने के लिए विष दे दिया लेकिन भगवान का सुमरन करनेवाले भोजन करनेवाले भीम को वो विष भी अमृततुल्य हो गया, पाचनतंत्र बढ़ गया | मीरा को दूध में जहर डालकर भेजा गया था लेकिन भगवान श्रीहरि को भोग लगाकर हरि ॐ कहकर दूध पीती है मीरा का बाल बाका नहीं हुआ | अकबर वेश बदलकर तानसेन के साथ मीरा के चरणों में सत्संग सुनता है | अकबर के पास तो ऐसा आराम की चीजे बहोत थी | सोने के बर्तोंनमे भोजन करता, चाँदी के सिंहासन उपर बैठता, लेकिन अंदर की  खुशी और शांति मीरा की चरणों में थी | नित्यउत्सव भव्येते श्याम – हे श्याम, भगवान हरि अपराध को सोते समय अपने ह्रदय में भगवान हरि का चिंतन करके सो जाओं आपकी नींद भक्ति में बदल जायेगी | तनाव से काय को रहना, बीमारी में क्यू गिरना, दु:खो में क्यू गडाना, किसीके बिगाड के बदला लेकर अपने कर्मबंधन क्यू बनाना | भगवान बोलते है – कर्म करने को कौसल शीतल हो | कर्म में बंधो मत, कर्मो से कर्मो की जाल को काटो | न जाने किस-किस जन्म के कर्मो का आप निसरण करके अभी इस कर्म बंधन में पड़े हो | नए कर्म ऐसे न बनाओ फिर अगले जनम में घोडा, गधा, पशु कुछ भी होकर कर्म भोगना पड़े ऐसे ना करो |अभी कर्म ऐसे करो की तुम्हारे कर्म; कर्म बंधन को काटनेवाले हो जाये | तुम्हारे कर्म-कर्म योग हो जाय, तुम्हारी भक्ति-भक्ति योग हो जाय, तुम्हारा ज्ञान-ज्ञान योग हो जाय | जो मुर्ख लोक है वो कर्म करते ना तो अभिमान करते | उस अभिमान को बढ़ावा देनेवाले कर्म मूर्खो को बांधते है | लेकिन शबरी भीलन जो करती है ! वा वा …. मीराबाई जो कर्म करती है, राजा जनक जो कर्म करते है, मेरे गुरुदेव जो कर्म करते है और भी जो लोग कर्म करते है, वा वा …. उनको कर्मो को देखकर ह्रदय उनके लिए सदभाव से भर जाता है |

ये संसार कर्मभूमि है | पुण्य का फल सुखस्वर्ग में मिलता है | बहोत पुण्य होता है ना!… तो स्वर्ग में जाता है, और पाप का फल नरक में जाना पडता है | यहाँ पुण्य-पाप का थोडासा जो असर है, वो सुख-दुःख भोगाकर जिव अपने नई जिंदगी बना सकता है | छोटे से छोटे, गिरे से गिरा ब्यक्ति भी अगर उसको सत्संग मिला जाय, गुरुदीक्षा मिल जाय तो उसके कर्म कर्मयोग हो जाते है |

विजयनगर के राजा अपनी मंत्री की मजाक उडाता था | मंत्री का आदर भी करता था | मंत्री धार्मिक था, सच्चा था, कर्मनिष्ठ था इसलिये मंत्री के लिए अपने ह्रदय में आदर भी था लेकिन राजा होने की हेगडी थी | अरे सब तुम बोलते सत्संग से सत्संगी हो जाता है ऐसा थोड़े है ! गुरूमंत्र से सब हो जाता है | चाँदनी रात थी, छत पर टहल रहा था, विजयनगर का नरेश मंत्रीजी जी हुजूर करते हुए सत्संग की बाते सुना रहा था | तो जो सत्संग की बाते सुनाता है अथवा सत्संग में ले जाता है , सत्संग में जाने की व्यवस्था करने में कुल मिलाकर लोगोंको सत्संग मिले उसमे जो विसहयोग करता है उसकी सात-सात पीढियाँ सदगति को प्राप्त होती है | तो मंत्री राजा को सत्संग सुनाता था की राजन बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अबर अजू | तुलसी हुई राम को राम भजे तदी को संभाल | तो समाज, लोफरों का संग, शराबी-जुवारी का संग छोडकर संतो का संग करे अनेक जन्मों के कर्मबंधन कट जाते और जीव  महान हो जाता है | ईश्वर को पा सकता है | ऐसी बाते राजा को तो अच्छी लगाती थी |अरे ऐसा कैसा हो सकता है | पढ़ेगा, लिखेगा, शिकेगा, हुशार होगा, अभी कुछ मिलेगा चाहे कैसा भी हो खाली सत्संग मिल जाय और गुरु की दीक्षा मिल जाय, तो आदमी को सबकुछ मिल जाता है |मंत्री तू बात कैसा करता है? अब सत्संग सुना रहा है तू कर के बोल क्योंकि राजा तो हेकड़ी है | बोले जहापनाह ! राजन मै तो बात सच्ची करता हूँ | इतने में लड़का महल से निचे गुजरता हुआ देखा| उसने जान देखा विजयनगर नरेश का मन उसमे लगा बोले छोरा हाथ में क्या है ? बोले तेल ले जा रहू हूँ जुतेमे राजा हंसा और उससे ज्यादा मुर्ख कोई नहीं होगा, इधर आओ | जा मंत्री उसको ले आओ, तुम्हारे लिए आइटम मिल गई है |क्या नाम है ? बोले मेरा नाम श्रीधर है, ब्राम्हण हूँ | तू जूते में तेल क्यू ले जा रहा हूँ, बोले मै बर्तन लेना भूल गया | फिर क्या करू वापस कौन जाए | इसलिए तेल जूते में ले जा रहू | विजयनगर के राजा ने मजाक कहा की इस लड़के को तुम महान बनाके दिखावो |सत्संग से और गुरुमंत्र से ये कैसे महान बनेगा | जूते में ये तेल ले जा रहा है, बुद्धि तो है नहीं, किसको महान बनावो , बोले हाँ राजन जरुर | लड़के के माँ-बाप को बुलाकर उसको पढाने-लिखाने का वचन दिया| लड़के को गुरुकुल में भरती कर दिया | हरेक गुरुसे उसको विष्णु, नरसिंहताप्निद उपनिसिद उसने अपने गुरुमंत्र दिया | वो लड़का पढ़े-लिखे और माला जप करे कभी वो सत्संग में जाए | ऐसे करते करते सत्संग में जाने से तो बुद्धि बढती है | मै दुनिया भर की सारे स्कुल, कॉलेज में घूम घूम करे सारी डिग्रियाँ मिलकर इतना ज्ञान नहीं मिलता उतना मुझे सत्संग से मिला | सत्संग सुनने से २१ पीढियाँ तर जाती है और सत्संग में कैसा भी आदमी जाय चाहे अंधा चला जाए सत्संग में |

बचपन में माँ-बाप मर गए और प्रीतम नाम का भिक मंगा, अहमदाबाद स्टेशन पर भिक मागंता और लोकल ट्रेन में बैठता बडोदा तक जाता और फिर आता | नडीयालमें किसी संत का सत्संग था वो सूरदास भिक मांगने के लिए पेसेंजर में बोलता माय-बाप दो पैसे दे दो | अरे बेटा क्यू भिक मागंता है, बोले, माँ मर गई, बाप मर गए मेरा कोई नहीं है | अरे कोई नहीं ऐसा नहीं सबका है वो तेरा है | चल हमारे साथ सत्संग में भोजन मिल जायेगा | और कुछ चाहिए तो दे देंगे | दो-चार दिन उस प्रीतम सूरदास को सत्संग सनियों ने सत्संग सुनने में मदत किई |

अब प्रतापसिंग का पुत्र जयकुंवर बाई का बेटा महंत भाईदास जी से गुरुमंत्र मांगता है कि बाबा सत्संग से और गुरुमंत्र से भला होता है मुझे सूरदास को गुरुमंत्र दो | महंत भाईदास ने कहा नहीं, मै तो कथा करता हूँ |कथाकार मंत्रदीक्षा देगा तो खाली चेला बनोगे, सच्चे संत से दीक्षा लोगे तो अंदर की चेतना जगेगी, शक्तियाँ जगेगी और परमात्मा की अनुभूतियाँ होगी | खोजो सच्चे संत को, खोजते-खोजते गुरु गोविन्द रामजी मिल गए | गुरु गोविन्द रामने दीक्षा दीई, किसको प्रीतम सूरदास को | प्रीतम कहा का था ? अहमदाबाद से २५ किलोमीटर दूरीपर बावला गाव का सूरदास बालक | जो बावला गाव और अहमदाबाद ये स्थित हो गए | मंत्र लिया और गुरु ने बताया बेटा! श्वास रोको सव्वा मिनट  और मंत्र जपो और छोडो, बाहर श्वास रोको ५० सेकंड और मंत्र जपो तो शक्तियाँ जागृत हुई, और उसका कंठ मधुर हो गया और भिक मांगने के लिए उसके हाथ लंबा नहीं करना पडता है | ऐसेही भगवान के कीर्तन मधुर स्वर से करता है लोग पैसे डाल जाते थे | अब पैसे कि इतनी पर्वा नहीं रही | धीरे-धीरे वो सूरदास प्रीतम संत बन गए और ५२ आश्रम है उसके | संदेशसर समाधी है उनकी | गुजरात में आरती चलती है प्रीतमदास कि – आनंद मंगल करू आरती हरी गुरु सेवक संत सूरदास की |

जो भगवान धन्यवाद देती है आपकी बुद्धि त्यों-त्यों भगवान योग आ जाता है | भगवान कहते है – जो मुझे प्रीतिपूर्वक भजता है , मै इसके बुद्धि में अपना योग, अपना सामर्थ्य देता |

हरि ॐ हरि ॐ ….

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One Comment on “सोच समझ कर कर्म करना”


  1. Sat sang is like a PARAS which converts Gold from iron like this a average mind person change in to super intellectual person .


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