आत्मचिंतन में विश्रांति योग

(प.पू. संत श्री आशारामजी बापूजी का एकांत सत्संग – रजोकरी  दिनांक -१२ सप्टेम्बर २०१२)

http://www.hariomgroup.org/hariomaudio/satsang/latest/2012/Sep/Rajokari-Ashram-Ekant_12Sep12_1.MP3

ॐ…. ॐ……ॐ….. ॐ……

संसाररूपी समुद्र में वास्तवरूपी जल भरा है | अनेक प्रकार की इच्छाए वास्तव में ये जीव डूबते, उतरते, तरते आकार बह जाते है संसार समुद्र में, जिसके पास सत्संग रूपी सतमती, उस सत्संग रूपी सतमती की नाव में बैठकर संसाररूपी सागर से तर जाता है | संग, संतोष, विचार और सत्संग या चार महाद्वारपाल है मोक्षरुपी राज्य से, मन को एकाग्र करके आत्मसुख ले तो बुद्धि विलक्षण संपन्न हो जाती है | सत्संग अच्छी तरह से समाज आ जायेगा | जीवन में अंतरात्मा का संतोष रहेगा, संतुष्टी, तुप्ती रहेगी और ये विचार उत्पन्न होगा की – किम्छं कश्य कामाये शरीर स्वजयते ……. ये नश्वर शरीर के लिए क्या-क्या इच्छा करे, क्या-क्या कामना करोगे, आकर्षण क्षणभंगूर शरीर है, तो इच्छाए, कामनाएँ छोड़कर अपने अनिश्यित पदार्थ पद में प्राप्त हो जावो, इच्छित हो जावो| एक श्लोक लग गया वो श्लोक पढते ही घर छोड़कर रवाना हो गया हूँ | वो श्लोक हर लगातार – सर्वमं आधितम तेन …… ये श्लोक था | हितोपनिषिध का हितोपदेष नाम का छोटासा पुस्तक संस्कृत भाषा का प्रारंभिक विद्यार्थियों के लिए, सर्वमं आधितम तेन–. उसके द्वारा सारा अध्ययन हो गया | तेनं सर्वेमं अनिश्चितमं – उसके द्वारा सारे अनुष्टान हो गये |

सर्वमं आधितम तेन | तेनं सर्वेमं अनिश्चितमं| येन आशा पृथवक्त्वा| नैराश्य अवलिबम्तम ||

ये मील जा, वो मील जा ये दुष्ट आशों को त्याग दिया और इच्छा रहीम अवस्थामे आ गया, उसदिन सारे अनुष्ठान कर लिए, सारा अध्ययन कर लिया| सर्वमं आधितम तेन – सब अध्ययन हो गया उसका तेनं सर्वेमं अनिश्चितमं – उसके द्वारा सारे अनुष्ठान हो गये, येन आशा पृथवक्त्वा – इच्छा, वासानों उसका पृथक कर दिया| नैराश्य अवलिबम्तम – नहीं तो बाबा ये तो संसार सागर में वासनारूपी जल है | कैसे गोते खाता है, जन्म-मरण की परंपरा में जा डूब मरते है | रामतीर्थ ने बड़ा सुंदर भजन गाया था – कोई हाल मस्त …. ऐसे ऐसे स्थित बन जाए – गाड़ी हो, बंगला हो, यश हो बस … और क्या चाहिए? अरे मुर्ख मौत शीर पर है ! कोई हाल मस्त – कुछ मील गया मस्त लेकिन कब तक, सुख के लिए भटकेगा, आत्मसुख नहीं मिला तो कैसा भी हाल हो जाय, कैसा भी माल आ जाय, कौनसा भी तोता-तोती, पक्षी पालो, कुत्ते-बिल्लियाँ पालो उनसे मस्ती लोगे, मारे जावोगे बुरी तरह से  ‘गुंडी’ नाम के जंतु निकलते है बिल्ली के शरीर से, जो बिल्ली पालते तो उनके और कई बिमारियों और बिल्ली के जन्म में जाना पड़ता है | जो कुत्ता, बिल्ली पालकर उनसे खुशी ले रहे है लेकिन अपने आपको बंधन में डालने का ही तरीका है | रामतीर्थ का भजन है – कोई हाल मस्त, कोई माल मस्त, कोई तिवती मैना सुये में एक खुद मस्ती बीन और सदगद पड़े अविद्या कुवे में | कोई योग मस्त- योग आसन कर लिया शरीर हलका–फुलका हो गया अरे बड़ी मस्ती है | ठीक से खाया-पीया स्वस्थ रहा ये अभ्यासजन्य मस्ती है | आत्ममस्ती अलग है | जो कोई योग मस्त, कोई भोग मस्त, अच्छा खाते पीने को मिला बड़े मस्त हो गये, संतुष्ट हो गये ठीक है, लेकिन आत्ममस्ती के बीना ये सारी मस्तियाँ क्षणभंगुर है, कोई योग मस्त को, कोई भोग मस्त, कोई रिद्धि मस्त, कोई सिद्धि मस्त, रिद्धि-सिद्धि ऐसे पुरुषों को मै जानता हूँ – जिनके पास रिद्धि-सिद्धियाँ थी बहोत सारे ऊँच कोटि रिद्धि-सिद्धि के वालोंमे मेरा संपर्क रहा, लेकिन आत्मसिद्धि के बीना ये सब खिलवाड़ मात्र है | आत्म हुआ कर मनोवंछित वास्तु दे दिए आपको ऐसे लोग मेरे मित्र है | अदृश्य हो जाये इसी योगिंको संपर्क किया | पृथ्वीतत्व कई सिद्धि, जलतत्व कई सिद्धि, वायुतत्व कई सिद्धि, वायु में मिलकर वायु हो जाये | ऐसे पुरुष को संपर्क नही हुआ लेकिन ये सिद्धियाँ भी होती है | अष्टसिद्धि और नवविधियाँ होती है | सामान्य राजे-महाराजे तो ऐसे व्यक्ति के दास बनकर आपना भाग्य बना लेते | ये अष्टसिद्धि, नवविधियां हनुमान के पास थी, लेकिन हनुमानजी उनमे रुके नहीं, रामजी के शरण गये आत्मसाक्षात्कार के लिए | आत्मसाक्षात्कार बहोत ऊँची चीज है | कोई योग मस्त, कोई भोग मस्त, कोई रिद्धि मस्त, कोई सिद्धि मस्त ऐसी रिद्धि-सिद्धि हो की आप जो चाहे तो और रात को दस बजे भी मालपुवा चाहे तो मंगवाके खिला दे, लेकिन फिर पता चला की मालपुवा किसीके घर से प्रेत उठा लाये ये तो छोटी तुच्छ सिद्धियों होते है, प्रेत के द्वारा और तांत्रिक, मांत्रिक वो सुना जाता है उसमे मैंने ये कभी नहीं सुना की बच्चोंको बली देते, ये करते है, ये नीचता तो हमें सुनी नहीं, जो झूटे आरोप करते है, उनको उल्लू सीधा करना होता है | घटना तो कैसे हुआ दे लेकिन तांत्रिक, वो हुआ ये सब बकवास है | तो योग सर्व सिद्धिया भी हमने त्याज्य मणि तो तांत्रिक की बहोत शुद्र होती होगी प्रक्रिया, उसने हमारी रूचि भी नहीं थी और हमारे गुरुदेव भी उस दिशा के, और भगवान शिवजी ने ही गुरुगीता में जो तांत्रिक रिद्धि-सिद्धियाँ और तांत्रिक कुछ करते है उनको तो झाडा और गुरुगीता अपने आश्रम का खास ग्रंथ है | अपने आश्रमवासी सभी पढते है | उसको शिवगीता बोलते है, गुरुगीता बोलते है | उसमे तांत्रिक बातों की निंदा की है,  वो तो अपने पड़ते है | लेकिन हनुमानजी के पास ये तांत्रिक-पांत्रिक तुच्छ चीजे नहीं थी, ऊँची सिद्धियाँ थी, ऊँची सिद्धियाँ होने के बाद भी हनुमानजी रुके नहीं आत्मसिद्धि पाने गये | नारदजी के पास ऊँच सिद्धियाँ थी, लोक लोकांतर जाने की वो बदलने की, दूसरे की बात जानकर उसका उपाय खोजकर समाधान करने की दैत्य, देवता और असुर भी नारदजी की बात मानते थे | दैत्य भी मानते थे, राक्षस भी मानते थे ऐसी सर्वहितकारी सिद्धियों के धनी नारदजी | आत्मसिद्धि के लिए सनकादजी ऋषियों को शरण गये | योगत भूमात सुखां भूमा – व्याप्त परमेंश्वर को जानोगे तो पूर्ण संतुष्टि होगी, ऐसा सनकादजी ऋषि ने नारदजी को उपदेश दिया और नारदजी आत्मसिद्धियों का आत्मलाभात परम लाभात न विद्यते | आत्मसुखात परम सुखात न विद्यते | आत्मज्ञानात परम ज्ञान विद्यते || आपना वो मार्ग है इसलिए आपन बड़े तृप्त है अभी ये हेलीकाप्टर की दुर्घटना आत्मसिद्धि बीना टल नहीं सकती | ये सब ईश्वर की अलौकिक लीला है | तो किमती भी उपलब्धियों हो जाये लेकिन आत्म उपलब्धियां जीना जिव आत्म की तपन नहीं जाती | रामायण में आता है – आत्म के बिना आत्म की कुछ ना कुछ कमी जाती नहीं | अपने दिलबर को दिलबर के ज्ञान से, दिलबर के माधुर्य से, दिलबर के आनंद से, दिलबर के सामर्थ्य से संपन्न करना है | दिलरुबा दिल की सुनाऊ सुननेवाला कौन है ? जहाँ में हक भर में हकभर पिलाऊ पिनेवाला कौन है? हक माना सत्यस्वरूप ईश्वरीय रस | ये ईश्वरीय रस आड़ा आता है | संसार की तुच्छ वासंनाये ……. बुद्धि प्रखर हो तो संसाररूपी समुद्र में वासना के जल में डूबते-तरके, डूबते-तराने दबा हो जाये लेकिन तीव्रबुद्धि हो उसमे बैठ के जिव तर जाता है | योगवासिष्ठ में आया – सम संतोष विचार तत् निति बुद्धि को संपन्न करने देते, मन को रोख देते | मुझे वेदपुराण से क्या, मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई, मुझे मंदिर, मस्जिद जाना नहीं, ह्रदय मंदिर में जो शांति दिला दे जहाँ ऊँच और नीच का भेद नहीं |  ॐ….. ॐ….. ॐ…..

तीन घंटा प्रतिदिन ॐकार जप करे, तीन घंटा परमात्मा का ध्यान एक प्रहार, तीन घंटे योगवाशिष्ठ का भी, तीन घंटे सदगुरु की वे युँ उतर गए संसार सबसे ऊँची पद मिल जाए, उससे बड़ी कोई पदवी नही | भगवान दर्शन अष्टसिद्धि, नवविधि, चक्रवर्तीराज, इंद्र का पद सब छोटे हो जायेंगे |

हे हरि…. हे हरि…. हे हरि…….

राजा बलि का बड़ा प्रभाव बन गया | इस समय प्रखर प्रभावशाली कोई व्यक्ति होता तो इदग्रिदावाले भी खुमारी में आते है | उपद्रव कने लगे युग-युग में अलग-अलग कथाएँ होती है | इसी कल्प में तो वामन भगवान आये बलि का सब कुछ लेके गए | किसी कल्पतेने बलिराजा के साथ इंद्र भीड़ गए और इंद्र ने बलि के परास्त कर दिया और बलिराजा सत्ता छोड़कर चले गए | इंद्र उसके खोजकर मारना चाहता था | इंद्र के पास दैवी शक्तियाँ थी तो सारी पृथ्वी छान मारी और स्वर्ग में तो बलि कहाँ पहुंचे अत्तल-बित्तल, तलातल, स्वर्गतल, भूलोक, जानलोक, तपलोक सब देवताओ के द्वारा और अपने अनुचरों के द्वारा छान मारा, कही बलि का पता नहीं चलता, आखिर थककर इंद्र देवता ब्रम्हाजी के पास गए की बलि का राज्य वैभव मैंने पा लिया, लेकिन बलि मिलते नहीं, आप सृष्टि के कर्ता हो, भुवानोंसे रास्ते जानते हो, पितामह कृपा करो | बलि मुझे कहा मिलेगा ? तो ब्रम्हाजी कहा बलि मारने योग्य नहीं है ? तुम मारोगे नहीं बलि को, मै बताता हूँ | बोले नही मारूँगा ब्रम्हाजी मै वचन देता हूँ | बोले जहाँ उज्जाड घर कही पड़ा हो उज्जाड घर कोई ढोर-धाकड मनुष्य आना जाना न हो और अकेले में गधा दिखे, समझ लेना बलि में मै गधे का रूप धारण करू कोई संकल्प करके गधे का रूप धारण करके ब्रम्ह परमात्मा का चिंतन करता है | कोई मेरे को विघ्न न करे इसलिए गधा का रूप धारण किया | उसने जहाँ भी उज्जाड एकांति में कोई घर दिखे और उसमे गधा दिखे तो समज लेना ये बलि है | तो इंद्र को पता चला गया घुमने जानने कहा पर उज्जाड घर खोज ने लगा और उसने खी गधा दिखा तो इंद्र ने डाका मारकर मजाक उड़ाई की क्या रूप बनाया है | कहा तू राजाधिराज महाराज और कहा उज्जाड घरमे गधे के रूप में आकर छपे हो ? कहा गया तुम्हारा राज्य और कहा तू ललनाओ से छवैसे आते हो ?, कहा तू सुवर्ण के बरतने में भोजन खाते थे और अब गधे बनकर यहाँ उज्जाड घर में खड़े हो ? क्या तुम्हारा दुर्भाग्य हुआ | ये कथा योगवासिष्ठ में आती है पढ़ लेना विस्तारसे | बलि ने कहा इंद्र गर्व मत करो | ऐसा राज्य तुमको भी कही बार मिला और फिर शत्रुने छीन लिए और मृत्युने तुमसे छीन लिया मुझे भी मिला अबा मै लाचार, मौताज होकर डरकर गधे के रुप पर यहाँ छुपकर जीवन व्यापन नहीं करता हूँ , लेकिन लोकसंपर्क न रहे इसलिए मैंने गधे की धारणा करके गधे का शरीर बनाया है और उस पद को पाऊंगा जहाँ से कोई पतन नहीं है | समझे वो कौनसा पद है | यद गतानि वर्तते तत् धामो पर्मोतम्म – जहाँ जाने के बाद पतन नहीं होता, इंद्र गर्व मत करो ऐसे राज्य तो कई बार मुझे मिले और कई बाद छूटे और खाते-खाते सीधे स्वर्ग में पहुँच जावेगो तो दुबारा आने का नाम न लो | अभी भी मेरे में वो बल है | लेकिन ये वक्त बल दिखाने का नहीं है | बाकी को बलदाता पहचानो को लगाना है | इसलिए मैंने गधे का रूप धारण किया है | गधा बनकर उज्जाड घरमे रहकर भी आत्मचिंतन में विश्रांति मिले तो सौदा स्वस्ता है, ऐसा बुद्धिमान बलि के जीवन से जानने को मिलता है | जहाँ भगवान स्वयं वामनरूप लेकर बलि से मागते है, ऐसे बुद्धिमान बलि आखिर इस राज-काज से व्यर्थ समय बरबाद करना पड़ेगा | परमात्मा चिंतन करो वो परमात्मा में स्थिति करो, ब्राह्मी स्थिति करो | गुरुनानक ६० वर्ष में ऐसे उग्ररूप धारण किये कई कोई नजिक न आये | मै भी ५८-६० साल के उम्र से ये सोच रहा हूँ, आपन भी एकांत में जायेंगे | लोकसंपर्क बंद करे, लेकिन कोई पात्र ढूंढता हूँ, मिल जाये तो वो ढेरा उसको संभालू और आपन निवृति जीवन जिवू | जो कोई मिलाता नहीं है और ये पूनम व्रत धारियों को ठेका ऐसा लग पड़ा है के बिचारोंको तकलिब ना हो | बिचारो-बिचारो में मै ही बिचारा बनकर भागता फिरता हूँ | ये २-३ दिनोंमे बड़ा पुराना स्वभाव जागृत हुआ निवृतिका ………ॐ.. ॐ… ॐ…. एकांत का क्या फायदा मिलाता है और भगवत चिंतन में क्या-क्या खजाने पड़े है ये अभादाभी वालों को, बिचारोंको पता ही नहीं | वासना के समुद्र में तराने तराने, रागद्वेष में अहंकार कितना बड़ा है | बड़े-बड़े परमात्मा में विश्रांति पाने के लिए सत्कर्म करो, तत्परता से सत्कर्म करो, फिर एकांत मसे अंतरात्मा के आ जावो, शांति-खुशी से मोडे पर खुश देखो बाहरसे लेकिन अंदर समजो ये भी हर्ष मन का है और हर्ष भोगों के तो सुख भी भोगना पड़ेगा | सुख-दुःख में जाननेवाले परमात्मा में अपने में लो | ये बहोत ऊँची उपलब्धियाँ है, कठिन नहीं थोडा एकांत चाहिए | ॐकार का जप, ध्यान, योगवाशिष्ठ, मौन, सात्विक भोजन बस ! ये बार महीना बहोत हो गया और ४० दिन बहोत काम करते है | नहीं मिलते किसीसे ऐसा वो मिलते है वो जमाना आएगा की हर महीने में दस बार दर्शन होगा, वो जमाना जल्दी ला दूँगा | तुम चिंता मत करो | हप्ते में एक बार दर्शन, फिर महीने में एक बार, फिर साल में एक बार दर्शन हुआ न हुआ अदृश्य | ऐसे दिन भी आ जायेंगे | चिंता मत करना ॐ…. ॐ…. ॐ….

हुआ तो फकीर, तो रहा नाता किसीसे | क्या छोड़ अपने दिलबर, को मिल न किसीसे क्या ||

तू बड़ी बेल पर, अपनी दिलबर से खेल | भव ना रखना, किसीसे मोल ||

कोन किसके साथ जायेगा कौन किसके साथ आया था अकेले आये अकेले जाना है तो अपने रहो अपने ईश्वर में रहो |

ॐ…. ॐ…. ॐ…. ॐ….. ॐ…….

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One Comment on “आत्मचिंतन में विश्रांति योग”

  1. Rahul Says:

    ॐ…. ॐ…. ॐ…. ॐ….. ॐ…….


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