आदिभौतिक जगत का कोई महत्त्व नहीं है….

 

 परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू  का एकांत सत्संग – रजोकरी दिनांक-८ सप्टेम्बर २०१२

http://www.hariomgroup.org/hariomaudio/satsang/latest/2012/Sep/Rajokari-Ashram-Ekant_8Sep12_1.MP3 

 

हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ  प्रभुजी ॐ प्यारेजी ॐ  मेरेजी ॐ ….हा हा हा हा … नारायण नारायण ….

 

नाम जपत मंगल दश दिशाए ….  भगवान नाम से दश दिशों में मंगल होता है | नाम प्रसादे साज संभु को जो है, वस्त्रहरणकार जो है, अमंगल है, लेकिन शिवजियों की राशि क्यों की ॐकारस्वरुप में विश्रांति पाये ॐकार स्वरुप में विश्रांतिसे, ईश्वर के सत्ता से, ईश्वर के रस से, ईश्वर के स्वभाव से, ईश्वर के सामर्थ्य से आपको एकाकार कर देते है | ईश्वर की सत्ता, ईश्वर की महता, ईश्वर का स्वभाव, ईश्वर का सामर्थ्य प्रगट होने लगेगा, क्यों की आप ईश्वर के अंश है| जैसे हर तरंग पानी का अंश है सागर का भरा है | ऐसे हर जीव ब्रम्ह परमात्मा वंशज है | भगवान कहते है – मैमयी वंश क्यू जिव | लोके जीव भुत सनातनः | आप सब मेरे वंशज हो | वंशज वंश का ही स्वरुप होता है |एक बाजरी का दाना और बड का वृक्ष बिज अपने में समजाये हुए है | ऐसे ही सभी मनुष्य अपने में परब्रम्ह परमात्मा समजाये हुए है |शून्य सकल कोई नहीं – कोई दीन-हीन कंगाल नहीं है |

 

इन सबके के पीछे मूल कारण है, की हम आदिभौतिक जगह को इतना महत्व देते बैठे है | आदिदैवी जगत ला फायदा उठाने की योग्यता मर गई आदिभौतिक जगत का फायदा उठाने की योग्यता मर गई आदिभौतिक जगत का प्रभाव इतना नहीं है | जितना आदिदैवी जगत का है | जैसे पानी एक बूंद आप उसको बाष्पभुत करो की, मेरा सगुणी ताकद होती जाती है | और उसमे मंत्र जपत हुए नजर डालो तो उंसकी ताकद तो कुछ और हो जाती है, अगर द्रव्य है द्रब्य में नि:स्वार्थ भाव से मंत्र शक्ति का मेल कर दे स्व: स्व: कर तो मोटी आखों पत्ता चले तो धुवा ही, ही हुआ | लेकिन एअरकंडीशन से ये और पोलुशन से जो आकाश में हानिकारक लेअर है उस लेअर को भी तोड़कर उड़ने की शक्ति गाय के घी, पीपल की लकडियाँ, जव,तिल और भी लकडियाँ पीपल के शिवाय वो हमारे प्रदुषण को दूर करने की ताकद रखते है |

 

तो ये जगत अपना आदिभौतिक है, इससे बहोत सारी उन्नत शक्तिया आदिदैवी जगत में होती है | और आदिदैवी जगत और आदिभौतिक जगत किसको दिखता है , परिवर्तित होता है, वो है अध्यात्म तत्व | अध्यात्मतत्व तप नित्य हमारे साथ है | आदिभौतिक शरीर नुत्य नहीं है | आदिदैवी मन भी नित्य नहीं है की हमारा मन सो जाता है | शरीर भी सो जाता है, शरीर को पता नहीं मै शरीर हूँ | आदि भौतिक और मन को भी सो जाना है लेकिन फिर अध्यात्मतत्व के चेतना से रक्तवाहिनियों से रक्त चलता है, स्वास चलता है | २४ घंटो अध्यात्मिकतत्व हमारे साथ रहता है | मरने के बाद शरीर साथ में नहीं रहता, मुक्त होने के बाद मन साथ में नहीं रहता लेकिन अध्यात्मतत्व तो एकदम खुल्लम-खुल्ला ज्यो का त्यों भागता है, और मुक्त नहीं तभी भी ये अध्यात्मतत्व के सदा साथ में है | आप बीमार नहीं पड़ते , आप अध्यात्म हैम मै दुखी हूँ तो मन दुखी है, मै बीमार हूँ तो शरीर बीमार होता है | तो जो कुछ गडबड होती है वो आदिभौतिक और आदिदैविक न होती अध्यात्म ज्यों-त्यों है तो वास्तव में आप अध्यात्म है | आपको काम विकार आया तो आप पानी बनी बन गये, राग आया तो क्रोधी बन गये, लोभ आया तो लोभी बन गये, मोह आया तो मोहित बन गये लकिन ये विकार है आये चले गये आप ज्यों की त्यों रहे है | उसकी स्मृति हुई ऐसी अनुसंधान करो उसी को महत्व दो और उसकी अनुसंधान और उसी के महत्व से आपके आदिभौतिक, दैवी जगत आपके अनुभव हो जायेंगे | आदिभौतिक जगत, आदिदैविक जगत आपके अनुकूल ही जायेंगे | आदिभौतिक जगत का कोई महत्त्व नहीं है | आदिदैविक के आगे और अध्यात्म के आगे आदुदैविक जगत का भी ज्यादा महत्त्व नहीं, जैसा तुम्हारा अध्यात्म तत्वकारण और अध्यात्मतत्व तो तुम्हारे साथ नित्य है | आदिभौतिक शरीर तुम्हारे साथ नित्य नहीं है बदलता रहता है | लेकिन अध्यात्मतत्व को नित्य है केवल उसकी प्रीति उसमे विश्रांति उसकी को अपना वही रूप में जान लो उसीसे अपने परमात्मारूप में जानो तो आपको तो लाभ होगा, लेकिन आपके द्वारा कितने लोगों के लाभ होंगे आप गिन नहीं सकते |

 

हरि ॐ हरि ॐ ………..

 

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