आत्मलाभात्‌ परंलाभं न विद्यते

Ghaziabad – 4th Sept ’12

 

बोल तो गये लेकिन फिर उनको ही बोलना पड़ा- छुपत नहीं कछु छुपे छुपाया । छुपता नहीं छुपाने से । जिन पाया तिन छुपाया; वो भी गुरवाणी है और फिर उसी वाणी का कट भी है – छुपत नहीं कछु छुपे छुपाया । जिन्होंने पाया उन्होंने छुपाया लेकिन छुपाने से भी छुपता नहीं है । ये परमात्म सुख अथवा समता का वैभव सर्वोपरि है । सबसे बड़े में बड़ा सुख, सबसे बड़े में बड़ा वैभव, सबसे बड़े में बड़ा ज्ञान, बस इससे बढ़ कर कुछ नहीं है । आप बोलो कई बार बुलवाया है मैंने

आत्मलाभात्‌ परम्‌ लाभं न विद्यते । आत्म लाभ से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है ।

आत्मज्ञानात्‌ परम्‌ ज्ञानं न विद्यते । आत्म ज्ञान से बढ़ कर कोई ज्ञान नहीं है ।

आत्मसुखात्‌ परम्‌ सुखं न विद्यते ।

 

ये आत्म लाभ, आत्म ज्ञान, आत्म सुख, इसकी बराबरी त्रिभुवन कोई भी चीज, वस्तु, अवस्था नहीं कर सकती । भगवद्दर्शन हो गया, इन्द्र बन गये, सोने की लंका बनाने वाले बन गये, हिरण्याकश्यपु बन गये, प्रह्लाद पैदा हुआ तो खुशी-खुशी में हिरण्याकश्यपु ने इन्द्र को अपने तपोबल से, ब्रह्मा जी को अपने तपोबल से नन्हे खिलौने बना दिया, बोला बेटे खेलो, ये ब्रह्मलोक के ब्रह्मा जी हैं, ये इन्द्रलोक के इन्द्र हैं, इनसे खेलो, इतना उसका भारी तप था । ब्रह्माजी को, इन्द्र को अपने तपोबल से बुला कर, उनको अपने तपोबल से नन्हा करके दे दिया उसको बोले बेटे खेलो, लेकिन मेरी बात मानो मैं ही भगवान हूँ । तो प्रह्लाद कहता है कि सर्वत्र भगवान हैं, हुँह… सर्वत्र नहीं, हिरण्याकश्यपु परमात्मा है । तो प्रह्लाद इसी पर अड़ा रहा और वो हिरण्याकश्यपु मैं भगवान हूँ इसी पर अड़ा रहा । प्रह्लाद कैसे अड़ा रहा, प्रह्लाद को पिता से दुश्मनी नहीं थी, लेकिन प्रह्लाद जब माँ के गर्भ में था, कयाधु के गर्भ में था तो नारदजी के आश्रम में रही थी कयाधु और नारद जी छोटी-छोटी कहानियाँ कयाधु को सुनाते थे कि कयाधु के गर्भ का बालक भक्त हो । और दूसरी बात है कि सनकादि ऋषियों में से एक भाई हिरण्याकश्यपु का अभिमान तोड़ने के लिये अवतार लेकर प्रह्लाद का आया था । तो दो लाभ हो गए ना – एक तो नारद जी, देखो नारद जी के तो गुरु हैं सनकादि ऋषि, मानस पुत्र हैं ब्रह्मा के, सृष्टि के आदि में जो उत्पन्न हुए ना मानस पुत्र उनमें से हैं , सबके ताऊ के ताऊ हैं लेकिन संकल्प किया कि हम पाँच वर्ष के बच्चे ही रहें । कुछ कपड़ा पहनना, ये करना, बड़ी उमर में विकार होता है तो पाँच वर्ष के रहे । नारद-वारद बाद में हुए । जब नारदजी को शोक हुआ तब सनकादि ऋषियों ने विशाला नगरी से जा रहे थे तो बुलाया कि क्यों आप इतना जल्दी-जल्दी जा रहे हैं । ऐसा तो क्या है किसी का कुछ डूब गया, कोई बेटा मर गया हो, शत्रु ने चढ़ाई कर ली हो तो जो विह्वल होते हैं ऐसी विह्वलता आप में क्यों है । आप तो देवऋषि हैं, आप तो नारद हैं । बोले वो भक्ति रो रही है, उसके बेटे बूढ़े हो गये हैं और मूर्च्छा में हैं और भक्ति जवान हो गई है । उनका दुःख मिटाने का मैंने संकल्प किया है कोई उपाय नहीं सूझता तो हिमालय में जा रहा हूँ, आप कोई कृपा करो । तो नारदजी को उपदेश दिया । उसके पहले भी नारदजी को जब आत्म लाभ पाना था तब सनकादि ऋषियों की शरण में गये थे । मैं अला विद्या जानता हूँ, बला विद्या जानता हूँ, लोक-लोकान्तर में पहुँचने की विद्या जानता हूँ लेकिन आत्मलाभात्‌ परम्‌ लाभम्‌ नहीं जानता हूँ । आत्म सुखात्‌ परम्‌ सुखम्‌ नहीं जानता हूँ । तब नारद जी पर कृपा करने के लिये सनकादि ऋषियों ने उनको आत्म ज्ञान दिया । तो आत्मलाभ और आत्मसुख मिल गया । तो नारदजी ठहरे शिष्य सनकादि ऋषियों के लेकिन वही सनकादि ऋषियों में से एक भाई । चारों भाई- एक वक्ता बनते थे तीन श्रोता बनते थे । जो श्रोता बनते थे वे नीचे बैठते थे, जो वक्ता बनते थे वो ऊपर बैठते थे । लेकिन ऊपर बैठने का अभिमान नहीं होता, सच्चे आत्मरामी को और नीचे बैठने का सच्चे शिष्य को मलान नहीं होता । उनको गर्व नहीं होता उनको मलान होता, आत्म विद्या में ऐसा है । आपको लगता होगा क्या कि बापू ऊपर बैठे हैं, वो बड़े हैं उनको अभिमान है? आपको नहीं लगता होगा । और आप नीचे बैठते हो तो आपको लगता है कि अरे नीचे बैठना पड़ रहा है, मलिनता मन में…. ऐसा नहीं होता है आपको । ये विद्या ही ऐसी है, न नीचे की मलिनता ना ऊपर का अहंकार- ये आत्मविद्या है । हालांकि शिष्यों के ये प्राप्त नहीं है फिर भी उस रास्ते गये तो ये सद्‌गुण तो आ गया ना । सनकादि ऋषियों का चार भाईयों में से एक भाई प्रह्लाद हुआ । तो माँ के गर्भ में था तो नारद जी ने कयाधु को अपने आश्रम में रखा । इन्द्र ले जा रहा चोटी पकड़ कर, ये मेरे दुश्मन की औरत है । दुश्मन के राज्य पर हमने विजय पाई है । इसके पेट में है हिरण्याकश्यपु का बीज । साँप, साँप का बच्चा भी तो साँप होता है । दुश्मन का बच्चा भी तो दुश्मन होता है । कयाधु को तो नहीं मारेंगे लेकिन इसके प्रसूति होगी तो इसके बच्चे को हम मार ड़ालेंगे । अब ध्यान देने योग्य है कि दैत्य लोग भगवान के विरोधी हैं, देवता भगवान के पक्ष में हैं । लेकिन नारद जी की बात देवता भी मानते हैं और दैत्य भी मानते हैं । कृष्ण के विरोध में है कंस लेकिन कंस नारदजी की बात मानता है कि देवकी का आठवां कौन सा । आठ भी हुए तो उनमें से पहला कौन सा और आठवां  कौनसा । आठ में से १-२-३ करो तो पहला वाला आठवां हो सकता है । ग्यारह हुए तो कौनसा आठवां । ऐसे करके उसको गुमराह कर दिया ताकी जल्दी पाप का घड़ा भरे । तो नारद जी की बात भगवान तो मानते हैं, भगवान के विरोधी भी मानते हैं । अब मेरा सत्संग बैलगांव में हुआ, कर्नाटक में । तो १४४ कलम थी, रामजन्मभूमि की फतवा थी । तो बैलगांव सरकार की भी हुआ कि बापू का सत्संग १४४ के कारण बंद कराना खतरे से खाली नहीं है । नाराज हो जायेंगे, भक्ता का दिल भी बद्‌दुआ देगा । उन्होंने १४४ कलम होते हुए भी बापूजी का सत्संग बरकरार रहेगा होने दो । १४४ के होते तो कई दुकानें भी बंद तो भीड़ तो और बढ़ी बैलगांव में, कर्नाटक में BJP शासित है । फिर जिन्दल स्टील कंपनी का जहाज था मेरी सेवा में । वहाँ सत्संग पूरा होते ही प्राईवेट जहाज से हम गोआ चले गये । शाम को चार बजे तो गोआ में था । तो गोआ तो कांग्रेस शासित था लेकिन उनको भी भगवान ने सूझबूझ दिया, बापू का सत्संग है बोले होने दो । अब उन्होंने होने दिया और ये ना करते तो लांलत पड़ती है । तो उन्होंने भी होने दिया । तो कोई BJP को मानते हैं तो कोई कांग्रेसियों को मानते हैं लेकिन मेरा सत्संग दोनों मानते हैं । BJP वाले भी सत्संग में होते हैं कांग्रेस वाले भी होते हैं ।

तो अब बात आई कि प्रह्लाद बोलता है कि जल में रस उसी का है, पक्षियों में किल्लोल उसी की है, वृक्षों में जीवनीशक्ति उसी जीवन दाता की है और वही आत्मरूप में है । आप भी ईश्वर हैं । भी हटा दे, आप ही ईश्वर हैं । भी और ही बस दो ही का झगड़ा था ।  प्रह्लाद बोलता आप भी ईश्वर हैं, कीट-पतंग भी ईश्वर हैं बस जानते नहीं हैं । नहीं….हिरण्याकश्यपु ही ईश्वर है । भी और ही …. तो वो यातना करता, कुछ का कुछ दंड़ देने की करता लेकिन प्रह्लाद की आत्मदृष्टि दृढ़ थी और पूर्वकाल के सनकादि ऋषि थे । सर्वत्र वासुदेव की दृढ़ निष्ठा से पंचभूत अनुकूल हो जाते हैं । पानी में डुबावे तो पानी डूबने नहीं  देवे । आग में धकेला तो आग जलने नहीं देवे । पत्थरे से पहड़ों से गिरावे तो पत्थर-पहाड़ चोट ना करें । हिरण्याकश्यपु खफा हो गया । आखिर अपनी बहन को कहा कि तेरे को आग नहीं जालाये ये तपस्या का वरदान है । तू प्रह्लाद को लेकर लकड़ी के ढ़ेर पर बैठ जा और मेरे जल्लाद चारों तरफ से आग लगायेंगे । तू तो जलती अग्नि में से बाहर निकलती है, होलिका मात की जय, तेरा तो पूजन होता है और प्रह्लाद जल मरेगा । तो प्रह्लाद को लेकर बैठ गई वो । तो हुआ क्या कि प्रह्लाद भगवान के पक्ष में था तो अग्नि का वरदान भी उल्टा हो गया । जिसको न जलने का वरदान था अग्नि ने उसको जला मारा और प्रह्लाद हेम-खेम । और मैं जब बच्चा था ५-६ साल का तो मेरी माँ होली मनाने की त्यारी कर रही थी तो रोट बनाया, मोटे आटे का रोट बनाया और रोट को कच्चा धागा बाँधा, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण…. चार हिस्से हो गये रोट के काफी धागा लगा । मेरी माँ ने कहा देखना तू, अभी देखना तू, अभी तुम्हारा बापू उसका तो बबलू था । आसाराम बापू भगवान तो बाद में बोलने लगी, वो समय तो बबलू के नाईं व्यवहार करती थी । देखना ये रोट डालूँगी तो ये रोट तो सिक जायेगा लेकिन ये धागा कच्चा रहेगा । मैं कहा कि धागा कैसे कच्चा रहेगा, अग्नि में रोट सिक जायेगा और धागा कच्चा रहेगा, बोली तू आयेगा तभी निकालूँगी । जब रोट ड़ाला तभी भी हम थे और जभी निकाला तभी भी हम थे । तो जब वो रोट निकाला तो मेरेको अभी भी वो चित्र आँखों के आगे है कि धागा कच्चा ज्यों का त्यों और रोट सिक गया । होली की आग में, धधकती आग में रोट बराबर काला कलूट सिक गया और धागा कच्चा । तो मेरी माँ ने समझाया कि ये धागा प्रह्लाद का प्रतीक है जो सर्वत्र वासुदेव… अब माँ ने ऐसा विस्तार से नहीं समझाया था मैं आपको आपको व्याख्या करके बताता हूँ । जब सर्वत्र वासुदेव की दृष्टि पक्की हो जाती है तब वासुदेव के ही पाँच भूत हैं । तो पाँच भूतों में भी परमात्मा की ही सत्ता है । जैसे हर तरंग में पानी है, हर दिये की लौ में अग्नि तत्व है । हर प्राणी के अंदर ये महावायु का ही हिस्सा है ये प्राणवायु । आपको भूख लगती है और आप ईश्वर पे आधारित हैं तो आपका समष्टि प्राण हुआ । तो समष्टि प्राण में जैसे आप को कहीं चुबता है तो शरीर के बाकी अंग सहायत में लग जाते हैं ना ऐसे ही आप भूखे हैं तो समष्टि प्राण में कुछ ऐसी क्रिया होती है । तो किसी न किसी की कैसी व्यवस्था करके आपको खिलाने में आ जायेगा | जैसे आप जा रहे हैं रास्ते से और ३-४ आदमी लड़ रहे हैं । आपने देखा कि एक बेचारा निर्दोष है और तीन उसपे हावी हो रहे हैं । तो आपकी सहानुभूति निर्दोष व्यक्ति की तरफ जायेगी । कोई पीटा जा रहा है तो पीटने वाले की तरफ आपकी सहानुभूति नहीं जायेगी, जो पीटा जा रहा है उसकी तरफ जायेगी । ऐसे किसी ने किसी को मारा ड़ाला है तो उस अकेले ने नहीं मारा है । जो मर गया है अथ्वा तो बुरी तरह घायल हुआ है तो उसने किसी-न-किसी को ऐसा किया है उसकी बद्दुआ और दूसरों की बद्दुआ कि इसको कोई मिले, इसको कोई मिले, तो ये बहुत संकल्प एकत्रित होकर उसको सजा मिली है । ऐसा भी व्यवस्था है सृष्टि में । अपने साधक तो लाखों हैं । किसी साधक ने गाय पाली । कुछ दिनों के बाद गाय गिर गई कुँए में । कुँए में गिरी हुई गाय बहुत मुश्किल से निकाली गई । और गाय ने २ दिन के बाद बछड़ा दिया । गाय की रीढ़ की हड्डी टूट गई तो फ्रेक्चर हो गया था । अब इलाज तो करे लेकिन फ्रेक्चर की पीड़ा से गाय दुखी थी । अब खड़ी ना रह सकी तो बछड़े को स्नहे न कर सकी । दूध भी नहीं पिला पाई । तो बच्चा मर गया । तो अपनी पीड़ा और बच्चे की मौत की पीड़ा तो गाय के आँसू झर रहे थे । एक शाम संध्या हो रही थी तो साधक ने गाय के शरीर को सहलाया कि गौ माता तेरेको इतना दुख क्यों सहना पड़ा । तूने तो किसी के ऊपर झूठा मुक्दमा नहीं किया । तूने किसी को गाली नहीं दी आदि आदि जो भी । हे गाय माता मैं तेरी पीड़ा नहीं देख सकता, तो भाव में भर गया और अपने कमरे में गया तो चल पड़ी संस्कारों की रील । देखता है कि दो बहुयें हैं बड़ी और छोटी । छोटी बहू पानी भरने जाती है कुँए में  । बड़ी बहू जरा लुच्ची है, उसने मार दिया धक्का छोटी बहू को । छोटी बहू गर्भवती है । उसको निकालते हैं और दो दिन के बाद उसको बच्चा होता है । उसको रीढ़ की हड्ड़ी मे चोट आई है, फ्रेक्चर होता है । दूध नहीं पिला सकी, बच्चा मर जाता है । अब छोटी बहू आँसू बहा रही है और आँसू बहाते-बहाते २१वें दिन मरी । तो उस साधक ने अपनी माँ को बोला माँ ये १० दिन तो हो गये गौ माता के, १० दिन और ऐसा ही रहेगा, २१वें दिन जायेगी क्योंकि जो बड़ी बहू ने छोटी बहू पे जुल्म किया था, छोटी बहू की चेतना ने, बड़ी बहू गौ होकर आई है, छोटी बहू ने उसको धक्का लगा दिया । आपको कोई सताता है और वो बड़ा आदमी है, आप गम खा जाते हैं, हाथा-जोड़ी कर लेते हैं लेकिन गहरे मन में; मौका मिले ना इसको कोई ठीक करे या तो आप ठीक करें ऐसा संकल्प हो जाता है । ये संकल्पों की सारी दुनिया है । हिरण्याकश्यपु अहंकार में कईयों को कुछ-का-कुछ करता था । तो कईयों के संकल्प इकठ्ठे हुए । तो इसीलिये उसके संकल्प को काटने के लिये सनकादि ऋषियों ने कहा कि चलो अपन जाते हैं । फिर नारदजी ने हवा दी इस बात को । आखिर देखा कि बहन के जल जाने पर भी प्रह्लाद ज्यों-का-त्यों रहा ज्यादा खफा हो गया । एक दिन लोहे का खंब खूब तपवाया । प्रह्लाद को बोलता है कि तू बोलता है ना कि वासुदेव सर्वत्र है, भगवान सबमें है तो इस खम्बे में भी तो होगा । बोले है । खम्बे में भी तेरा भगवान है, बोले वास्तव में है । चतुर्भुजी नहीं, जो वास्तव में भगवान है वो सर्वत्र है वो मैं बताऊँगा कि कैसे । तो खम्बे में भी भगवान है तो आलिंगन कर तेरे परमात्मा को । कुछ-का-कुछ बोला । आलिंगन कर भगवान को, प्रह्लाद ने कहा जो आज्ञा प्रभु और और ज्यों ही आलिंगन किया तो प्रकट हो गये नरसिंह अवतार गुर्राते हुए । झपेट लिया हिरण्याकश्यपु को और बैठ गये चौखट पे । तूने वरदान माँगा था कि मैं न अन्दर मरूँ, न बाहर तो ये चौखट है । न दिन में मरूँ, न रात में तो ये संध्या है । न अस्त्र से मरूँ, न शस्त्र से तो ये नाखून है । न मनुष्य से मरूँ, न पशु से तो मैं न मनुष्य हूँ, न पशु, तेरे लिये नया अवतार आ गया नरसिंह, नर भी हैं और सिंह भी । फाड़ दिया… प्रह्लाद सताया गया तो उसपे कोपायमान हुए, हिरण्याकश्यपु पे । अब उनका कोप शांत करने की किसी में ताकत नहीं है । जो भी जाये तो उनको गुर्रा के देखें तो भाग जाये । तो आखिर देवताओं ने प्रह्लाद को आगे किया । प्रह्लाद को देख के नरसिंह भगवान -पुत्र पुत्र तूने बहुत कष्ट सहे । पानी में फिंकवाया गया, पहाड़ों से गिरवाया गया, आग में फिंकवाया गया, मेरेको आने में देर हुई । पुत्र तू कुशल तो है ना ? क्या चाहिये, क्या चाहिये । बोले मेरे पिता ने जो अपराध किया है उनकी दुर्गति से रक्षा करो । अरे तेरा जैसा बेटा जिसके घर में पैदा हुआ है उसकी दुर्गति क्या होगी । प्रह्लाद निश्चिंत रहो । वास्तव में हिरण्याकश्यपु भी भगवान का ही शिष्य था, सेवक था । जय-विजय दो भगवान के सेवक थे, उद्दंड हो गये थे । सनकादि ऋषि जा रहे थे भगवान नारायण से मिलने, उनको बेंत से धकेल दिया । नारायण का दर्शन करने के बाद भी तुम्हारी धृष्टता नही गई । आत्मज्ञान के बिना धृष्टता नहीं जाती चाहे नारायण के पार्शद बन जाओ । आत्मलाभ के बिना खतरे से पूरी सुरक्षा नहीं होती । आत्मज्ञान के बिना समता नहीं आती । वही सनकादि ऋषियों ने उनको श्राप दे दिया कि दुष्टों जाओ, हमको धकेलते हो नारायण के पास रहते हुए भी, दैत्य बनोगे, राक्षस बनोगे । तो हिरण्याक्ष और हिरण्याकश्यपु दो भाई राक्षस बने । वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष को मारा और नरसिंह अवतार लेकर हिरण्याकश्यपु को मारा । शिशुपाल और दंतवक्र बने तो कृष्ण अवतार लेकर उनको मारा । कुंभकरण और रावण बने तो राम अवतार लेकर उनको मारा और अपने धाम भेजा ।

अब भगवान सर्वत्र है तो क्या है । परब्रह्म परमात्मा की चार अवस्था होती हैं । जो पर्वत, पहाड़, लोहा, जो ठोस दिख रहा है ना, उसमें वो चैतन्य घन सुषुप्ति में है । प्रगाढ़ नींद में है । जैसे कोई खूब थका हो, या फिर दही में शक्कर ड़ाल के भोजन कराया हो, या फिर नींद के इन्जेकशन लगा गये हों वैसा प्रगाढ़ नींद में जाये तो उसको कुछ भी पता नहीं । ये चैतन्य की प्रगाढ़ अवस्था है । आइनस्टीन ने गांधी से बात करते करते बोले कि हमने अणु बनाया परमाणु बनाया उसमें भी सपंदन है । गांधी जी ने बोला बस वही चैतन्य है, वही राम है । रोम रोम में रम रहा है । मिस्टर आइनस्टीन, आइनस्टीन नहीं है और गांधी नहीं है ये बात मैं मान सकता हूँ लेकिन वो परम सत्ता है । इसी को नानक जी ने अकाल पुरुष कहा । उसी को शंकराचार्य ने अद्वेत ब्रह्म कहा । कुछ बोलते हैं कि आखिरी में बस कुछ नहीं रहता एक सन्नाटा बच जाता है । कथाकार लोग, किताब-विताब पढ़ कर अपने बड़े-बड़े आवाज से अपने भाषण ठोक देते हैं । अखिरी में बस कुछ भी नहीं, इन्द्रियाँ नहीं, मन नहीं, बुद्धि नहीं बस एक सन्नाटा बच जाता है मानो अनुभव करके आये हैं । पढ़ के जोर मारके बोल देते हैं । अरे सन्नाट रह जाता है तो सन्नाटे को पता है क्या कि मैं सन्नाटा हूँ । सन्नाटा रह जाता है तो सन्नाटा स्वयं प्रकाश है कि पर प्रकाश है । कुछ नहीं रहता बुद्धिष्ट बोलते हैं तो बुद्धिष्ट के शिष्यों ने आखिरी में शून्य है । शंकराचार्य ने बोला शून्य को पता है कि मैं शून्या हूँ, सन्नाटे को पता कि मैं सन्नाटा हूँ । सन्नाटा और शून्य जड़ है, परब्रह्म परमात्मा चेतन है । सन्नाटे को जो जानता है वह आखिरी में है । सिक्ख धर्म ने इस बात को अच्छी तरह से वर्णन किया- मन तू ज्योतिस्वरूप है; सन्नाटा-वन्नाटा नहीं, सन्नाटे का भी तू साक्षी है । रात को गहरी नींद आई, कुछ नहीं था, सन्नाटा था लेकिन कुछ नहीं था उसका अनुभव तुम्हारे पास है । कुछ नहीं को पता नहीं होता कि मैं हूँ, लेकिन आप को पता है कि कुछ नहीं था । कुछ नहीं था, वो जो जानता है वही तुम हो । वही सर्वत्र है । बोले सर्वत्र है तो सब में बोलता क्यों नहीं है । अरे भई देखो, आपकी दस लाख के हीरे वाली अँगूठी गिर गई और आप उतरे तालाब में, कुँए में । अब अँगूठी तो आपके हाथ लग गई लेकिन पानी में हैं तो आप बोल नहीं सकते कि अँगूठी मिल गई । अँगूठी मेरे हाथ में आ गई है ऐसा उस समय नहीं बोल सकते । ऐसे ही गहरी नींद में या जो इन्द्रियों में मन में नहीं हैं वो बोल नहीं सकते कि मैं ऐसा हूँ । जब इन्द्रियों में आते, मन में आते तभी वाणि विलास होता है । मूर्च्छा में भी नहीं होता वाणि विलास, गहरी नींद में भी नहीं होता, समाधि में भी नहीं होता वाणि विलास, घन सुष्प्ति में भी नहीं होता । तो एक परब्रह्म परमात्मा की घन सुष्प्ति है, दूसरी है क्षीण सुषुप्ति । जैसे सोया है, पंखा बंद हो गई, खराब हो गई, कुछ हो गई तो ऊमस के कारण पसीना आया तो चादर फेंक दी, मच्छर काटा तो उड़ा दिया । याद नहीं रहेगा बाद में लेकिन प्रतिकूलता क्प हटाने वाली हरकते चालू रहेंगीं । गहरी नींद में नहीं रहेगी हरकत; क्षीण सुषुप्ति । तो ये पेड़ पौधे जो हैं ना उनमें परब्रह्म परमात्मा की क्षीण सुषुप्ति है । पेड़-पौधों को काटो तो उनको थोड़ी सी पीड़ा होगी और जल पिलाने वाले के प्रति उनको सहानुभूति होती है । एक माली को रख दिया १० मील दूर । पेड़ पौधों को २-३ दिन पानी नहीं दिया । चौथे दिन जब माली छूटेगा तो उसको बोला कि तुम सोचो कि मैं जाते ही पेड़ पौधों को पानी पिलाऊँगा । तो माली ने १० मील दूर से सोचा तो पेड़-पौधों को एहसास होने लगा, यंत्रों से नापा गया । फिर एक कमरे में चार पौधे रखे हुए थे । चार व्यक्तियों को भेजा चक्कर मारने को । दूसरी बार भेजा । एक व्यक्ति को लिख दिया कि तुम एक पौधा कुचल देना और बाकी तीन व्यक्तियों को पता नहीं चले कि किसने कुचला है । तो जब चारों के चारों व्यक्ति जाते हैं तो तीन व्यक्ति जिन्होंने हत्या नहीं की पौधे की उनको तीन व्यक्तियों के आते वो पौधे ज्यों-के-त्यों हैं । लेकिन जो एक पौधा मार गया था उसके कमरे में घुसते ही बाकी के पौधे काँपने लगे, यंत्रो के द्वारा पता चला । तो पेड़ के हत्यारे को दूसरे पेड़ पहचाने लेते हैं । समझो आपको तो उसने कुछ नहीं किया लेकिन भीड़ में से एक आदमी पर छुरा घुमा दिया तो पूरी भीड़ उसे पहचानेगी । तो उस आदमी के नजदीक आते ही सबको कँपन होता है । वैसे ही पेड़ पौधों को भी होता है लेकिन क्षीण । तो एक घन सुषुप्ति है, दूसरी क्षीण सुषुप्ति है और तीसरी उस परब्रह्म परमात्मा की स्वप्न अवस्था है ।

आप हम जो हैं ये स्वप्न अवस्था में जी रहे हैं । बचपन स्वप्ना हो गया, कार्यक्रम होगा, होगा, होगा, स्वप्ना हो गया । तो पशु-पक्षी, मनुष्य-देवता स्वप्न अवस्था में जी रहे हैं । ज्ञानी जो है वो परमात्मा की जाग्रत अवस्था में है, चौथी अवस्था । घन सुषुप्ति, क्षीण सुषुप्ति, स्वप्ना और जाग्रत अवस्था । ये देवता भी जगे हुए नहीं हैं । जैसे अर्जुन श्रीकृष्ण को तो देख रहे हैं लेकिन मैं अर्जुन हूँ और ये श्रीकृष्ण हैं, मेरे हितैषी हैं, सखा हैं आदर भी है । लेकिन श्री कृष्ण अपने आत्म स्वरूप में जगे हुए हैं । तो जो सृष्टि के आदि में एक में से बहुत होने का संकल्प हुआ तो जिनको अपने स्वभाव की जानकारी ज्यों-की-त्यों रही वो सब ईश्वर कोटि में रहे । और जो अपने स्वरूप से फिर अहं में आये, अहं फिर बुद्धि में आया, बुद्धि फिर मन में आई, मन इन्द्रियों में आया, इन्द्रियाँ संसार में आईं, वो अपने को जो भूल गये वो जीव कोटी में आये । और जीव कोटि में भी कोई तामसी हुए, कोई राजसी हुए, कोई सात्त्विक हुए, कोई राक्षसी हुए, कोई दैत्य वृत्ति के हुए, कोई मोहिनी वृत्ति के हुए । मोहिनी वृत्ति किसको बोलते हैं कि अपने को कोई फायदा नहीं लेकिन किसी को कुछ नुक्सान होता है तो मजा लें, वो मोहिनी वृत्ति है । और अपने फायदे में दूसरे की हानि भी करलें वो राक्षसी वृत्ति है । अपना भी भला उसका भी भला वो मानवी वृत्ति है । और दूसरे का भला और अपना थोड़ा कष्ट भी सह ले वो दैविक वृत्ति है । और ये सब भला-बुरा-मानवी सब खेल है । एक आकाश रूप परब्रह्म में ही है । जय जय जगे हुए ब्रह्मवेत्ता की वृत्ति । जिसकी जैसी वृत्ति और जैसी समझ होती है उसको उअतना ही ऊच्चाई-बड़ाई मिलती है । ब्रह्मज्ञानी की वढ़ी-वढ़याई । जैसा भगवान नारायाण अपने को जानते हैं, भगवान शिव अपने को जानते हैं, भगवान गणपति अपने को जानते हैं, काली माता अपने को जानती हैं वैसा ही ब्रह्मस्वरूप अपने को जानता है । वो महापुरुष होता है । तो जड़ भरत ऐसे ही थे । राजा भरत, फिर हिरण बन गये, फिर जड़भरत । वो जाग गये थे अपने आत्म ज्ञान में  । एक राजा ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया । पुत्रेष्टि यज्ञ में किसी की बलि दो तो उसका जीवात्मा आपका पुत्र होकर आयेगा ऐसी धारणा है । तो जड़ भरत जंगल में घूम रहे थे । काली की मूर्ति लगाई, जंगल का जो मुखिया था उसने यज्ञ कराया । तो जाओ किसी आदमी को पकड़ के ले आओ तो जड़ भरत को पकड़ के ले आये । चुप-चाप आ गये । स्नान करा दिया, जंगली फूलों की माला पहना दी, जलेबी खिला दी, कुल्ला करवा दिया । अब जो मुखिया था जिसको पुत्र चाहिये था, हाथ में चमचमाती तलवार लेकर जड़भरत की बलि देने को हुआ । तो काली माता की मूर्ति में कँपन हुआ और मूर्ति में से देवि प्रकट हुई गुर्राती हुई, कि ये आत्मवेत्ता, हमारा आत्मा… इनकी बलि दे रहो निर्दोष संत की!! तुम्हारे यज्ञ के लिये बलि चाहिये तो मैं देती हूँ । तो जिसने जड़ भरत की बलि देने के लिये तलवार उठाई थी उस की तलवार खींच कर उसी की गर्दन काट दी । तो ब्रह्मज्ञानी कुछ भी ना करे तो भी प्रकृति सब कुछ ब्रह्ज्ञानी के पक्ष में कर देती है । ये ब्रह्मपरमात्मा से ही पाँच भूत हैं । जो ब्रह्मज्ञानी के अनुकूल सोचता है उसकी बुद्धि में प्रकाश होता है  और जो ब्रह्मज्ञानी के खिलाफ सोचता है, निन्दा सोचता है उसकी बुद्धि मारी जाती है । फिर ऐसे निर्णय होते हैं कि धे-धमाधम!! खूब धुलाई पिटाई हो जाती है । तो

आत्मलाभात्‌ परम्‌ लाभम्‌ न विद्यते ।

आत्मज्ञानात्‌ परम्‌ ज्ञानम्‌ न विद्यते ।

आत्मसुखात्‌ परम्‌ सुखम्‌ न विद्यते ।

सबसे ऊँचा आत्म सुख है । स्वर्ग के सुख की महिमा है लेकिन स्वर्ग का सुख पुण्यनाश कर देता है । फिर गिराता है । स्वर्ग के सुख में भी राग-द्वेष है । आत्मसुख ज्यों-का-त्यों है । बोले सुख में और आनंद में क्या फर्क है । सुख दुःख को दबाता है और भोगी बनाता है और आनंद दुख-सुख के प्रभाव से पार करके ब्रह्मानंद में मिला देता है । इसीलिये राजाओं को तो कोई कमी नहीं थी, फिर भी राज्य सुख छोड़ कर गुरु के द्वार पर झाड़ू लगाते थे, बर्तन माँझते थे । हमने भी माँझे । उन दिनों में घर छोड़ के गये तब एक दिन में हम १०-२० तोला सोना कमा लेते थे । पैसे कमाते, १२-२० तोला सोना खरीद सके ऐसा । और घर छोड़ के गये । और वहाँ जो सीनियर थे मुझ जूनियर के प्रति जहर फैला एक विशेष सीनियर ने, मेरा प्रभाव देखा कर कि कहीं मेरी गद्दी ना चली जाये । पर मेरा तो उद्देश्य नहीं था कि गुरुजी आश्रम मुझे मिले या फलाना । तो ऐसी-ऐसी आपदायें उसने रचीं । तो मेरेको तो उसकी आपदायें नहीं लगीं, कभी-कभी गुरुजी से ड़ाँट भी खिला देता था अच्छी तरह…। एक दोपरह को क्या पता गुरुजी को क्या बताया, बाहर आया बोला अपना बिस्तर गोल करो, जाओ, देखते क्या हो? और बिस्तर गोल करा मेरेको जल्दी से जल्दी, गुरुजी से भी मिलने नहीं दिया, जल्दी से जल्दी पहाड़ी में से सीधा, बस अड्डे पे नहीं जाने दिया, पहाड़ी पे से सीधा उतरने को बाध्य किया और बरसात पड़ रही है और जाना है हाटगोदाम । मुश्किल से कोई बस मिले । स्टेशन पे ही पड़े रहे सुबह ६ बजे गाडी है । आज ६ बजे उतारा, १७-१८ किलोमीटर दूर स्टेशन है । २६ घंटे भटकता रहा उसके बाद मेरेको ट्रेन मिली । ऐसे तो कई मजे चखाये उसने मेरेको । और भी कई …। लेकिन महिमा बताता हूँ, आत्मज्ञान पाने से ये जो भी हमने सहा सब वसूल हो गया ना । आप लोगों को तो ऐसा कोई हरीफ मिलेगा नहीं लेकिन मैं उन हरीफों से गुजर ले आया हूँ तो मैं सबको सीधी मुलाकात दे देता हूँ । आश्रम में भी कोई १९-२० होवे तो मैं बहुत अनुभवों से गुजरा हूँ । तो सब ठीक हो जाता है ।

आत्मलाभात्‌ परम्‌ लाभम्‌ न विद्यते ।

आत्मज्ञानात्‌ परम्‌ ज्ञानम्‌ न विद्यते ।

आत्मसुखात्‌ परम्‌ सुखम्‌ न विद्यते ।

आत्मसुख से बड़ा कोई सुख नहीं, आत्मलाभ से बड़ा कोई लाभ नहीं, आत्मज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नहीं ।

 

पता नहीं था कि इतना बढ़िया सत्संग हो जायेगा और इतने बजे होगा । आई मौज फकीर की । इसीलिये राजे-महाराजे सब छोड़ के गुरु के द्वार पर पड़े रहते थे, ना जाने किस घड़ी क्या वचन निकले । किस घड़ी कैसी रहमत हो । ऐसे होते-होते-होते करोड़ों जन्मों के संस्कार हैं वो सब हटते-हटते एक दिन लग जाये धक्का तो हो जाये पार । नारायाण हरि ।

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