हाथ जोड़ कर परम उपलब्धि देनेवाले परमदेव

ग़ाज़ियाबाद 1सप्टेंबर 12; (शाम का सत्र)

 

हरि ओम …

ओम..

सर्वदा सर्व कालेशू

नास्ति तेशाम अमंगलम

एशाम हृदयस्थ भगवान

मंगलाय तन्नो हरि ..

हरि  ओम………

सर्वस्तर तू दुर्गाणी

सर्व भद्राणी पश्यतु

सर्व सद्बुध्दी माप्नेतु

सर्वसर्वस्त नंदतू

हरि  ओम…

 

नास्ति तेशाम अमंगलम

एशाम हृदयस्थ भगवान

 

सर्वदा सर्व कालेशू नास्ति तेशाम अमंगलम…

सदा सर्व काल में उन का कभी अमंगल नही होता..

 

इस श्लोक को पक्का कर लो तो बहुत अच्छा होगा.. इस का अर्थ समझ  लो..

सर्वदा सर्व काल में उन का अमंगल नही होता, जिन के हृदय  में मंगलाय तन श्रीहरी की स्मृति है, हरि का चिंतन हो…

ये पक्का करो:

2 चीज़े  है..एक है  माया- मिथ्या  ..जो पैदा हो हो के बदले  वो है माया…और उस में दूसरा तत्व है ओत -प्रोत सत-चित-आनंद हरि!..जो हर दिल में है, हर समय है, हर स्थान में है..तो ऐसा नही की माया के हिस्से में ही भगवान है..नही!

जैसे विशाल समुद्र हो और समुद्र के एक हिस्से में काई(सेवाल) हो..तो समुद्र के पानी को ढकी हुई काई में भी समुद्र के जल का  अंश है..और जल से ही बनी है , जल को ही ढक रही है..ऐसे ही परब्रम्‍ह परमात्मा हरि, उसी की सत्ता से अष्टदा प्रकृति बनी…अष्टदा प्रकृति में  पृथ्वी, जल, तेज,वायु, आकाश ये 5 भूत  और सूक्ष्म प्रकृति का हिस्सा- मन, बुध्दी, अहंकार..तो 5 भूत, मन, बुध्दी  और अहंकार ये आठों (8) मिल कर अष्टदा प्रकृति है..और वो परब्रम्‍ह परमात्मा के किसी हिस्से में है..और उसी से यह सारा जगत और पसारा है..

आप का अंतरात्मा परब्रम्‍ह परमात्मा है..आप का शरीर पाँच भौतिक है-स्थूल पाँच भौतिक, मन, बुध्दी और  अहंकार सूक्ष्म 5 भौतिक के हिस्सो से बना है..

तो भगवान ने कृपा कर के मानव मात्र का परम मंगल शीघ्र- अती शीघ्र सहेज में हो जाए  ये गीता में परम मंगलकारी बात खोल के रख दी…भगवान के श्री मुख से जो वचन निकले है वो आप उच्चारण करो और उसी में खाली स्वीकृति दे दो बस!भगवान के पास जाना नही पड़ेगा, भगवान को बनाना नही है, कहीं से बुलाना नही है..जगत को बदलना नही है, सजाना नही है, सँवारना नही है, बिगाड़ना नही है..बस जो जैसा है उस को खाली आप स्वीकार कर लो….आप का तो मंगल होगा, आप की अनुभव संपन्न वाणी सुन कर लोगों का भी सहेज में मंगल हो जाएगा..

60 हज़ार वर्ष तपस्या कर के भी इतना मंगल नही हुआ रावण का, जितना मंगल शबरी का हो गया – गुरु की बात स्वीकार करने से….

 60 हज़ार वर्ष तपस्या करने से हिरण्य कश्यपू में शक्तियाँ तो आई लेकिन इतना मंगल नही हुआ जो मीरा का रहिदास गुरु की बात मान कर हो गया..मीरा के गुरु मोची थे..चमड़े  का काम करते थे..लेकिन उन को अपने गुरु से जो ज्ञान मिला था उस में टीक गये थे रहिदास..रहिदास गुरु की बात मानने से मीरा को जो मिला, मतंग ऋषि की बात मानने से जो शबरी को मिला, तोतापुरी गुरु की बात मानने से जो  गदाधर  पुजारी को मिला और गदाधर पुजारी में से राम कृष्ण परम हंस नाम पड़ा..

नामदेव को विठ्ठल ने प्रगट हो कर आदेश दिया की शिओबा खेचर के पास जा कर तुम उपदेश लो..शिओबा खेचर के उपदेश को जो नामदेव को मिला और नामदेव जहाँ पहुँचा वहा 60 हज़ार तपस्या वाला हिरण्य कश्यपू और रावण नही पहुँच पाए..

ईश्वर का रास्ता कठिन नही है..दुर्लभ नही है..दूर नही है, परे नही है…पराया नही है..ईश्वर परे नही, पराया नही..ईश्वर का रास्ता इतना सुगम है की जहाँ से तुम चलते हो वही मंज़िल है..जहाँ से तुम शुरूवात करते हो वोही वो  मौजूद है..इतना सुगम है!इतना रसदायी है!!

लेकिन अभागी अष्टदा प्रकृति के विषय विकार और झमेले में मानवता को उलझा दिया है..

आप के अंदर ऐसी ऐसी ईश्वरीय सत्ता की योग्यता भरी है की उस का लाखवाँ हिस्सा विकसित हुआ तो आप समाज में  बुध्दीज़ीवी हो कर उभरते है..बाकी की सारी योग्यताए सुषुप्त पड़ी रहेती है..स्वामी विवेकानंद ने ये अपने भाषणों में कहा..

अगर आप को आप के सत्य स्वरूप, चेतन स्वरूप, आनंद स्वरूप अपने ईश्वरत्व की प्यास जग जाए और जिन को पता चला है उन की बात पर आप डट जाओ तो  उसी समय – नही, अभी!इसी समय! सदा के लिए आप के दुख दूर हो जाएँगे!…दुख कोई भेजेगा अथवा दुखद परिस्थिति आएगी लेकिन आप के यहा टीक नही सकती..सुख मिट नही सकता, दुख टीक नही सकता..आप केवल इस बात को स्वीकार कर लो…सच्ची बात को केवल समझ लो.. जैसे रात्रि के स्वप्ने  भूत, भैरव, एक्सिडेंट,पुत्र की मृत्यु, बहू का विधवापन-रुदन और बहू बेटे के बच्चों का आक्रांत, आप के उपर कर्ज़ और आप का एक्सिडेंट ये रात्रि की सभी पीडाएँ उसी क्षण दूर हो जाएगी जब स्वप्ने से आप जाग गये..स्वप्ने की सारी मुसीबते मिटाने के लिए केवल जगना है..ऐसे ही ये जागतिक सारी मुसीबते मिटाने के लिए आप को सत्य में जगना नही; खाली स्वीकार करना है…

आप के अनुभव को आप केवल स्वीकार कर लो बस!ज़रूरी नही की आप मैं कहेता हूँ तो मान लो…शास्त्र कहेता तो मान लो यह दबाव भी नही है हिंदू धर्म में..और मज़हबों में तो लिखा है की नही मानो तो नरक की आग में जल जाओगे..लेकिन गीता-कार ऐसा धौंस नही देते..ऐसा भय नही देते…जो तुम्हारी इच्छा हो वो करो!

केवल समझा दिया- सांख्य योग में ऐसा है, उप-निषद में ऐसा है..अब अर्जुन जो तेरे को ठीक लगे वो कर..मनुष्य की बुध्दी का, साधक की स्वतंत्रता का आदर करना जितना सनातन धर्म में है उतना और किसी मज़हब में नही है…और साधक की स्वतंत्रता और उँचाई को छू ने की व्यवस्था जितनी वैदिक संस्कृति में है उतनी किसी में नही..आप जिस को भगवान बोलते- कृष्ण बोलते, राम बोलते अथवा कोई और भगवान बोलते – आप को उपासना की रीत बताने वाले गुरु आप को भगवान का बाप बना सकते है!  राम जी के बाप मनुष्य बने है..कृष्ण जी के बाप मनुष्य बने है… और राम और कृष्ण के गुरु भी मनुष्य बने है..कितनी उँची उपलब्धि है!!लेकिन भगवान का माय-बाप या गुरु बनना यह भी पराकाष्ठा नही है..

भगवान जिस से भगवान है, माँ जिस से माँ  है, बाप जिस से बाप है, गुरु जिस से गुरु है  – उस तत्व स्वरूप ब्रम्‍ह को खाली स्वीकार करना है…

जैसे रस्सी में साँप दिख रहा है – दूर से देखते तो साँप है की ज़मीन में दरार है अथवा किसी ने पेशाब किया है शंका है..ज़रा सी बॅटरी लगाई तो देखा की रस्सी है तो उठा के फेंक दी अब वो साँप दिख रही है लेकिन वो साँप आप के लिए सच्चा नही है…फटी हुई ज़मीन दिख रही वो आप के लिए सच्ची नही है..क्यों की आप ने रस्सी को ज्यो का त्यो जान लिया  तो साँप की कल्पना, पानी के रेले की कल्पना , टेढ़ी मेढी लकड़ी की कल्पना , टेढ़ी मेढी  दरार की कल्पना जो सता रही है उस को आप बस देख लो आँख उठा कर तो वो सताने वाली आकृतीयाँ दिखती है लेकिन आप के लिए विनोद हो जाएगी…मज़ाक हो जाएगी…जैसे फिल्म की डरावनी आकृतीयाँ, भिभत्स आकृतियाँ, विर-रस की आकृतियाँ आदि जो भी रस दिखते है वो दर्शक के आल्हाद के लिए है, आनंद के लिए है..ऐसे ही ये सारा जगत आप के आल्हाद के लिए है.. आप के आनंद के लिए है..आप के विनोद के लिए है..जिस दुनिया को नरक रूप जानते है वो ही दुनिया वास्तव में वाशुदेव स्वरूप है!.. संसार दुखालय है ये शास्त्र कहेते है… और संसार वाशुदेव स्वरूप है ये भी शास्त्र कहेते है..

मैं ऐसी बात सुना रहा हूँ की इस को केवल स्वीकार कर लोगे तो पूर्णता आ जाएगी..और खाली सुनोगे तो भी सारे तीर्थों में स्नान करने का फल हो जाएगा, सारे यज्ञ  करने का फल हो जाएगा, सब कुछ दान करने का फल हो जाएगा, सारे पितरों को तारने का तर्पण हो जाएगा..ये ऐसी उँची परमेश्वर तत्व की रहस्यमई बात है..

स्नातम तेन सर्व तीर्थम -उस ने सारे तीर्थों मे स्नान कर लिया..

दातम तेन सर्व दानम् -उस ने सारे दान कर लिए..

कृतम तेन सर्व यज्ञम  -उस ने सर्व यज्ञ कर लिए..

भगवान जिस से भगवान है, अल्लाह जिस से अल्लाह है, इंसान जिस से इंसान है इस रहस्यमय विज्ञान का नाम है ब्रम्‍ह विद्या! इस ब्रम्‍ह विद्या को सुनने वाला व्यक्ति युध्द के मैदान में भी सब दुखों से पार हो जाता है…गलाडूब राज-काज के व्यवहार में व्यस्त शिवाजी इस उँचे सत्संग से आत्म परमात्मा को पा लेता है…शिवाजी महाराज जीतने बिज़ी थे उतने आज के जमाने के पी .एम. अथवा राष्ट्रपति , सी.एम. बिज़ी नही है..अभी इतनी व्यस्तता नही है जितनी शिवाजी के समय थी..उस व्यस्तता में और शत्रुता मे डूबा हुआ, कर्त्यव्यता में डूबा हुआ शिवाजी  जिस बात को जान सकता है, स्वीकार कर सकता है , पा सकता है उस बात को आप आराम से जान सकते है, पा सकते है, स्वीकार कर सकते है..केवल लगन लग जाए!

बात क्या जाननी है?..क्या पाना है?…किस लिए पाना है? की सदा के लिए सब दुख मीट जाए इसलिए..सदा के लिए शाश्वत सुख मिल जाए इसलिए…जिस को पाने के बाद कुछ पाना बाकी नही रहेता, जिस को जानने के बाद कुछ जानना बाकी नही रहेता  और जिस लाभ से बड़ा कोई लाभ नही है …

आत्म ज्ञानात परम ज्ञानम ना विद्यते l

आत्म लाभात परम लाभं ना विद्यते l

आत्म सुखात परम सुखम ना विद्यते ll

 

आत्म ज्ञान  से बड़ा कोई ज्ञान नही…आत्म लाभ से बड़ा कोई लाभ नही..आत्म सुख से बड़ा कोई सुख नही…सभी चाहते है बड़ा ज्ञान, बड़ा सुख, बड़ा लाभ..

अर्जुन के साथ भगवान है तो भी अर्जुन का दुख नही मिटा.., विराट रूप का दर्शन कराया भगवान ने तो भी अर्जुन का भय नही मिटा..अर्जुन को जब भगवान ने उलाहना दिया, मेणा मार दिया की आधी भौतिक क्या है?आधी दैविक क्या है? अध्यात्म क्या है?..तब अर्जुन महेसुस करता है की जो मैने पा लिया है, जो जान लिया है  वो पर्याप्त नही है..अभी पाना-जानना बाकी है..भगवान ने अर्जुन को महेसुस कराया की इस लाभ के बिना सारे लाभ बौने है..इस सुख के बिना सारे सुख बौने है..इस ज्ञान के बिना सारे ज्ञान बौने है..अर्जुन ने महेसुस किया और भूख जागी तो आदर से सुना तो साक्षातकार हो गया युध्द के मैदान में..तो वो ही अर्जुन जो कहेता था की मैं युध्द नही करूँगा, भीख मांग कर टुकड़ा खा लूँगा, सन्यासी बन जाऊंगा- वो ही अर्जुन बोलता है की मैं युध्द करूँगा…तुम्हारी आज्ञा  मानता हूँ.. क्यो?

नष्टों मोहा , स्मृतिम लब्ध्वा l

मोह  बोलते उलटे ज्ञान  को…विपरीत ज्ञान को..जो हम है उस को हम जानते नही है और जो हम नही है उस को हम “मैं” मानते है…ये है मोह .

अब कितना मोह परेशान करता है !..यह पाँच भौतिक शरीर है, अष्टदा प्रकृति का है- उस को हम “मैं” मानते… और जो वास्तविक में हम है उस का पता ही नही!!

कितनी भी आपाधापी कर लो, कितनी सजावटे कर लो और उपलब्धियाँ कर लो लेकिन दुख नही मिटेंगे..

कभी ना छुटे पिंड दुखों से जिसे ब्रम्‍ह का ज्ञान नही…

चाहे 60 हज़ार वर्ष तपस्या कर के अपने समर्थकों के लिए सोने की लंका बना दे रावण बन कर, चाहे हिरण्य  कश्यपू बन कर अपनी प्रजा के लिए सोने का हिरण्यपूर बना ले..लेकिन तेरे भी दुख और वासना नही मिटेंगे और प्रजा के भी नही मिटेंगे..

शबरी ने जो गुरुजी  की बात मान कर अष्टदा प्रकृति से पार तत्व में  विश्रान्ति पा ली, मीरा ने जो विश्रान्ति पा ली, शिवाजी ने जो विश्रान्ति पा ली उस विश्रान्ति को तू अभी , यहा पा सकता है..

नेता बोलते हम ये कर देंगे, वो कर देंगे और उस ने सब वो कर भी दिया मान लो तो भी रावण ने जितना किया उतना प्रजा के लिए तुम नही कर सकते!उस ने सोने के घर बना दिए थे, आप तो हाउस टॅक्स  भी माफ़ नही कर सकते!! :)..कोई पार्टी नही कहे सकती की सेल  टॅक्स, हाउस टॅक्स, इनकम टॅक्स हटा दे ..

काला धन वापिस देश में आ भी जाए तो भी निर्दुख नही हो सकते..सोने के मकान नही बन सकते…और सोने के मकान भी बन जाए फिर भी निर्दुख नही हो

 

सकते..समझो किसी पार्टी के सारे वायदे पूरे हो गये की ये हो गया, वो हो गया फिर भी मानवता दुख के दल दल से बाहर नही निकल सकती….आप के अंदर ऐसी योग्यता आ जाए की अर्जुन की नाई आप स-शरीर स्वर्ग पहुँच जाए और उर्वंशी जैसी अप्सरा आप को आलिंगन करना चाहती हो और आप उस को ठुकरा दे इतना संयम आप के पास हो फिर भी आप निर्दुख नही हो सकते…कृष्ण आप की घोड़ा गाड़ी चला दे फिर भी आप निर्दुख नही हो सकते..लेकिन कृष्ण का ज्ञान आप पा लो तो आप दुखी नही रहे सकते!

तो क्या आप निर्दुख होना चाहते है? अवश्य!

हमारा हेलीकैप्टर ऐसा बुरी तरह नीचे आ गिरा था (पाइलट हड़बड़ा गया था इसलिए) तो हेलीकैप्टर के तो 3 टुकड़े और एक टुकड़े के कुछ पुर्ज़े बिखर गये और हम ज्यो के त्यो निकल आए बाहर! ..उस समय अगर इस (ब्रम्‍ह) विद्या का और गुरु कृपा का  कुछ  अंश हमारे हाथ में नही होता तो..!… हेलीकैप्टर के टुकड़े देख कर वायु सेना के बड़े बड़े अधिकारी प्रतिभा पाटील  को फोन पर बताते है की इंपॉसिबल है आदमी ज़िंदा निकले… 

तो कुछ भी उपलब्धियाँ कर लो लेकिन जो भी होगा पाँच भौतिक में होगी, अष्टदा में होगी..मतलब विशाल समुद्र की कल्पना करो..उस के विशाल हिस्से में मान लो की 5 लाख वर्ग किलो मीटर में  काई से ढाका है और बाकी का समुद्र खुला है..तो 5लाख वर्ग किलो मीटर विशाल तो दिखेगी लेकिन वो काई(सेवाल)  भी पानी से ही बनी है, पानी को ही ढक रही है और पानी के जीव जंतुओं की  उस में अपनी अपनी दुनिया बसी है..उस काई(सेवाल) में कई किस्म के जो जीव जन्तु रहते उन को उतना ही हिस्सा सच लगता है..तो जीव, जन्तु, काई(सेवाल) पानी से बनी है, पानी पर टिकी है , जीव जन्तु में भी पानी का अंश है..तो अगर ये सब अपने को तत्व रूप से पानी जाने तो मूल समुद्र है..और नही जानते तो तुच्छ है..काई(सेवाल)  के हिस्से में अपनी अपनी कल्पना से आपा-धापी कर रहे है… ये राज़ समझ तो आता है ..लेकिन आम आदमी को समझाया नही जाता..कोई ख़ास साधक तत्पर हो जाए तो राज छूपा कर रखा नही जाता..

गुरुवाणी कहेती है:

जिन पाया तिन छुपाया l

जिस ने ये राज़ पा लिया उस ने छूपा लिया..छूपा तो लिया फिर भी जगत की पीड़ा देख कर की खामखा लोग परेशान हो रहे तो करुणा वश वो महापुरुष जगत में आते और कुछ ना कुछ उपाय करते की उस राज़ को समझ के समाज सुखी हो जाए…

जिन पाया तिन छूपाया l

छुपत नही कछू छूपे छूपाया ll

 

उस आत्म ज्ञान के राज़ को पाया , कोई समझ नही पाएगा तो चुप रहे..लेकिन कुछ कुछ महापुरुष चुप नही रहे पाते..इधर से उधर करते कराते हमारी बुध्दी की ऐसी उँचाइयाँ ले आते की हमारी बुध्दी में परमात्मा की प्राप्ति का एक तत्व जाग जाए! परमात्मा प्राप्ति की ललक लग जाए..

दुनिया की सारी तपस्याएँ, सारी विद्याएँ , सारा धन दौलत पा लो फिर भी आप की योग्यता इतनी उँची नही होती जितना केवल भगवान को पाने का  दृढ़ इरादा करने से आप का मन पवित्र हो जाता है, आप पवित्र हो जाते है..ईश्वर को पाने की इच्छा मात्र से आप का मन पवित्र हो जाएगा..और संसार की चीज़े पाने की इच्छा मात्र से आप का मन बदमाश हो जाएगा..बदमाशी कर के मन आप को उपलब्धियाँ तो करा देगा लेकिन निर्दुख  नही कर सकता..

कल्पना करो की उस काई (सेवाल) के जन्तु कितनी भी चालाकी कर के दूसरे जंतुओ का शोषण कर के अपने लिए एरिया बढ़ा दे, लेकिन आप समुद्र है यह ज्ञान  आप के पास नही , आप जल तत्व है यह ज्ञान आप के पास नही है ना.. अपने आप को जन्तु ही मानेगा और दूसरे जंतुओं के आगे अपने आप को बड़ा मानेगा!

तो निर्धन के आगे आप को धन का अहंकार होता है, अविद्वान के आगे आप को विद्वत्ता का अहंकार होता है.. कुरूप के आगे आप को सुंदरता का अहंकार होता है..दुर्बल के आगे आप को बल का अहंकार होता है..लेकिन अहंकार भी तो विकार है..आप क्या है वो तो पता नही चला है..कमजोर व्यक्तियों के आगे आप पहेलवान है; लेकिन बड़े पहेलवान के आगे आप कुछ  भी नही!

यहा जो बड़े बड़े सेठ दिखते वे अमेरिका के मिलियनरो -टीलियनरो के आगे कुछ भी नही..

तो ये सभी माया है!

“मा या”!!

अघटना घटियसी यस्या समाया अव्यभिचारती l

जिस की सत्ता एक जैसी रहेती वो है परमात्मा..

अघटना घटित कर दिखा दे और दम कुछ भी नही वो है माया.

जैसे फिल्म में दरिया ल़हेरा रहा है.. हलवाई के यहा मिठाइयाँ बन रही है, लोग चाट पकोड़ा खा रहे है..आप को भी कुर्सी पे बैठे बैठे मुँह में पानी आ जाए ऐसी व्हरायटियाँ दिख गयी है.. और आप पर्दे के तरफ जाते है तो लोग हँसी उड़ाते है!!..तो आप हँसी के पात्र बन जाते है..क्यो की परदा ही है, प्लास्टिक की पट्टियाँ और लाइट है..ऐसे ही अष्टदा प्रकृति और चैत्यन्य की सत्ता है सारा संसार…

तो इस बात को खाली आप स्वीकार कर लोगे , उस का फिर मनन , चिंतन , नित अध्यासन करेंगे, इस बात में टीक जाएँगे तो आप सीधे ज्ञानी हो जाओगे!!… 🙂

 इंद्र बनने में भी बहुत परिश्रम है, इंद्र बनने के बाद भी ब्रम्‍हज्ञानियों के आगे मथ्था टेकता है.. पी . एम. बनने के बाद भी लाचार मोहताज जिंदगी है अटल जी की..

शरीर बीमार है तो अपने को बीमार मानना बिल्कुल बेवकूफी है.. 🙂 हम बीमारी को जानते है..मन दुखी है तो अपने को दुखी मानने की बेवकूफी छोड़ दो, नही तो दुख पिछा नही छोड़ेगा…थोड़ी देर के लिए बीमारी दबेगी, दुख दबेगा लेकिन आप निर्दुख नही होंगे..

मैं हाथ जोड़ के प्रार्थना करता हूँ :

मुझे हसते खेलते गुरुजी ने दे दिया वो मैं आप को हसते खेलते और हाथ जोड़ कर देना चाहता हूँ…केवल आप लेने को तैयार हो जाओ बस!

वाह प्रभुजी वाह!!

ऐसी उपलब्धि!!ऐसी अनुभव वाली अमृतवाणी !! और वो भी हाथ जोड़ कर…सभी प्रकार से मदद करने का वायदा और उपर से हाथ जोड़ कर मिल रही है!!…

जय हो! सद्गुरुदेव जी भगवान आप की महा जयजयकार हो!!!!!

हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ  ….

 

********************

gaziyabad 1sept 12 sham ka satr

 

Hari om …

om..sarvadaa sarv kaaleshu

naasti teshaam amangalam

yeshaam hrudayasth bhagavaan

mangalaay tanno hari..

hari om………

sarv star tu durgani

sarv bhadrani pashyatu

sarv sadbudhdi maapnetu

sarv sarvast nand tu

hari om…

 

naasti teshaam amangalam

yeshaam hrudayasth bhagavaan

 

sarvadaa sarv kaaleshu nasti tesham amangalam…

sadaa sarv kaal men un ka kabhi amangal nahi hotaa..

 

is shlok ko pakka kar lo to bahut achhaa hogaa.. is ka arth samajh  lo..

sarvadaa sarv kaal men un kaa amangal nahi hota, jin ke hruday  men mangalaay tan shri hari ki smruti hai, hari ka chintan ho…

ye pakka karo:

2 chije  hai..ek hai  maya- mithya  ..jo paidaa ho ho ke badale  wo hai maya…aur us men dusaraa tatv hai ot-prot sat-chit-aanand hari!..jo har dil men hai, har samay hai, har sthaan men hai..to aisaa nahi ki maya ke hisse men hi bhagavaan hai..nahi!

jaise vishaal samudr ho aur samudr ke ek hisse men kaayi ho..to samudr ke paani ko dhaki huyi kaayi men bhi samudr ke jal ka  ansh hai..aur jal se hi bani hai , jal ko hi dhak rahi hai..aise hi par bramh paramaatmaa hari, usi ki sattaa se ashtadaa prakruti bani…ashtadaa prakruti men  pruthvi, jal, tej,vayu, aakaash ye 5 bhut  aur sukshm prakruti ka hissaa- man, budhdi ahankaar..to 5 bhut, man, budhdi aur ahankaar ye aathon (8) mil kar ashtadaa prakruti hai..aur vo parabramh paramaatmaa ke kisi hisse men hai..aur usi se yah sara jagat aur pasaaraa hai..

aap ka antaraatmaa par bramh paramaatmaa hai..aap ka sharir panch bhautik hai-sthul panch bhautik. man, budhdi uar ahankaar sukshm 5 bhautik ke hisso se banaa hai..

to bhagavaan ne krupaa kar ke maanav maatr kaa param mangal shighr-ati shighr sahej men ho jaaye  ye gitaa men param mangalkaari baat khol ke rakh di…bhagavaan ke shri mukh se jo vachan nikale hai vo aap uchchaaran karo aur usi men khaali swikruti de do bas!bhagavaan ke paas jaanaa nahi padegaa, bhagavaan ko banaanaa nahi hai, kahin se bulaanaa nahi hai..jagat ko badalanaa nahi hai, sajaanaa nahi hai, sawaaranaa nahi hai, bigaadanaa nahi hai..bas jo jaisaa hai us ko khaali aap sweekar kar lo….aap kaa to mangal hogaa, aap ki anubhav sampann waani sun kar logon kaa bhi sahej men mangal ho jaayegaa..

60 hajaar varsh tapasyaa kar ke bhi itanaa mangal nahi huaa raawan kaa, jitanaa mangal shabari kaa ho gayaa – guru ki baat sweekaar karane se….

 60 hajaar varsh tapasyaa karane se hiranya kashyapu men shaktiyaan to aayi lekin itanaa mangal nahi huaa jo mira ka rahidaas guru ki baat maan kar ho gayaa..miraa ke guru mochi the..chamade  ka kaam karate the..lekin un ko apane guru se jo gyaan milaa tha us men teek gaye the rahidaas..rahidaas guru ki baat maanane se mira ko jo milaa, matang rishi ki baat maanane se jo shabari ko milaa, totapuri guru ki baat maanane se jo  gadaadhar pujaari ko mila aur gadaadhar pujaari men se ram krushn param hans naam padaa..

naamdev ko viththal ne pragat ho kar aadesh diyaa ki shivobaa khechar ke paas jaa kar tum updesh lo..shivoba khechar ke updesh ko jo naamdev ko mila aur naamdev jahaan pahunchaa wahaa 60 hajaar tapasyaa waalaa hirany kashyapu aur raawan nahi pahunch paaye..

iishwar kaa raastaa kathin nahi hai..durlabh nahi hai..door nahi hai, pare nahi hai…paraayaa nahi hai..ishwar pare nahi, paraayaa nahi..ishwar ka rasta itanaa sugam hai ki jahaan se tum chalate ho wahi manjil hai..jahaan se tum shuruwaat karate ho wohi vo  maujud hai..itanaa sugam hai!itanaa ras daayi hai!!

lekin abhaagi ashtadaa prakruti ke vishay vikaar aur jhamele men maanavataa ko ulajhaa diyaa hai..

aap ke andar aisi aisi ishwariy sattaa ki yogyataa bhari hai ki us ka laakh vaan hissaa vikasit huaa to aap samaaj men  budhdi jivi ho kar ubharate hai..baaki ki saari yogyataaye sushupt padi raheti hai..swami vivekaanand ne ye apane bhaashano men kahaa..

agar aap ko aap ke satya swarup, chetan swarup, aanand swarup apane ishwaratv ki pyaas jag jaaye aur jin ko pataa chalaa hai un ki baat par aap dant jaao to  usi samay – nahi, abhi!isi samay! sadaa ke liye aap ke dukh door ho jaayenge!…dukh koyi bhejegaa athavaa dukhad paristhiti aayegi lekin aap ke yahaa teek nahi sakati..sukh mit nahi sakataa, dukh teek nahi sakataa..aap kewal is baat ko sweekaar kar lo…sachchi baat ko kewal samajh lo.. jaise raatri ke swapne  bhut, bhairav, accident,putr ki mrutyu, bahu ka vidhavaa pan-rudan aur bahu bete ke bachchon ka aakraant, aap ke upar karj aur aap ka accident ye raatri ki sabhi pidaayen usi kshan door ho jaayegi jab swapne se aap jag gaye..swapne ki saari musibate mitaane ke liye kewal jaganaa hai..aise hi ye jaagatik saari musibate mitaane ke liye aap ko satya men jaganaa nahi; khaali sweekaar karanaa hai…

aap ke anubhav ko aap kewal sweekar kar lo bas!jaruri nahi ki aap main kahetaa hun to maan lo…shaastr kahetaa to maan lo yah dabaav bhi nahi hai hindu dharm men..aur majahabon me to likhaa hai ki nahi maano to narak ki aag men jal jaaoge..lekin geetaa-kaar aisaa dhauns nahi dete..aisaa bhay nahi dete…jo tumhaari ichchaa ho wo karo!

kewal samajhaa diyaa- saankhy yog men aisa hai, up-nishad men aisa hai..ab arjun jo tere ko thik lage vo kar..manushy ki budhdi kaa, saadhak ki swatantrataa kaa aadar karanaa jitanaa sanaatan dharm hai utanaa aur kisi majahab men nahi hai…aur saadhak ki swatantrataa aur unchaaii ko chhune ki vyavasthaa jitani vaidik sanskruti men hai utani kisi men nahi..aap jis ko bhagavaan bolate- krushn bolate, raam bolate athavaa koyi aur bhagavaan bolate – aap ko upaasanaa ki reet bataane waale guru aap ko bhagavaan kaa baap banaa sakate hai!  raam ji ke baap manushy bane hai..krushn ji ke baap manushy bane hai… aur raam aur krushn ke guru bhi manushy bane hai..kitani unchi upalabdhi hai!!lekin bhagavaan kaa maay-baap yaa guru bananaa yah bhi paraakaasthaa nahi hai..

bhagavaan jis se bhagavaan hai, maa jis se maa hai, baap jis se baap hai, guru jis se guru hai  – us tatv swarup bramh ko khaali sweekaar karanaa hai…

jaise rassi men saap dikh rahaa hai – door se dekhate to saap hai ki jamin men daraar hai athavaa kisi ne peshaab kiyaa hai shankaa hai..jaraa si battery lagaayi to dekhaa ki rassi hai to uthaa ke phenk di ab vo saap dikh rahi hai lekin vo saap aap ke liye sachchaa nahi hai…phati huyi jamin dikh rahi vo aap ke liye sachchi nahi hai..kyon ki aap ne rassi ko jyo ka tyo jaan jaan liyaa  to saap ki kalpanaa, paani ke rele ki kalpanaa , tedhi medhi lakadi ki kalapanaa, tedhi medhi daraar ki kalpanaa jo sataa rahi hai us ko aap bas dekh lo aankh uthaa kar to vo sataane waali aakrutiyaa dikhati hai lekin aap ke liye vinod ho jaayegaa…majaak ho jaayegi…jaise film ki daraawani aakrutiyaa, bhibhats aakrutiyaan, veer-ras ki aakrutiyaan aadi jo bhi ras dikhate hai vo darshak ke aalhaad ke liye hai, aanand ke liye hai..aise hi ye sara jagat aap ke aalhaad ke liye hai.. aap ke aanand ke liye hai..aap ke vinod ke liye hai..jis duniyaa ko narak roop jaanate hai vo hi duniyaa wastav men vashudev swarup hai!.. sansaar dukhaalay hai ye shaastr kahete hai… aur sansaar vashudev swarup hai ye bhi shaashtr kahete hai..

main aisi baat sunaa rahaa hun ki is ko kewal sweekar kar loge to purnataa aa jaayegi..aur khaali sunoge to bhi saare tirthon men snaan karane ka phal ho jaayegaa, saare yagy karane ka phal ho jaayegaa, sab kuchh daan karane ka phal ho jaayegaa, saare pitaron ko taarane ka tarpan ho jaayegaa..ye aisi unchi parameshwar tatv ki rahasy mayi baat hai..

snaatam ten sarv tirtham-us ne saare tirthon me snan kar liya..

daatam ten sarv daanam-us ne sare daan kar liye..

krutam ten sarv yagyam-us ne sarv yagy kar liye..

bhagavaan jis se bhagavaan hai, allaah jis se allaah hai, insaan jis se insaan hai is rahasyamay vigyaan kaa naam hai bramh vidyaa!is bramh vidya ko sunane wala vyakti yudhd ke maidaan men bhi sab dukhon se paar ho jata hai…galaadub raaj-kaaj ke vyavahaar men vyast shivaaji is unche satsang se aatm paramaatmaa ko paa letaa hai…shivaaji maharaj jitane busy the utane aaj ke jamaane ke P.M. athavaa rashtrapati , C.M. busy nahi hai..abhi itani vyastataa nahi hai jitani shivaaji ke samay thi..us vystataa men aur shatrutaa me dubaa huaa, kartyavyataa men dubaa huaa shivaaji  jis baat ko jaan sakataa hai, sweekaar kar sakataa hai , paa sakataa hai us baat ko aap aaraam se jaan sakate hai, paa sakate hai, sweekaar kar sakate hai..kewal lagan lag jaaye!

baat kyaa jaanani hai?..kyaa paanaa hai?…kis liye paanaa hai? ki sadaa ke liye sab dukh meet jaaye isliye..sadaa ke liye shashwar sukh mil jaaye isliye…jis ko paane ke baad kuchh pana baaki nahi rahetaa, jis ko jaanane ke baad kuchh jaananaa baaki nahi rahetaa  aur jis laabh se badaa koyi laab nahi hai …

aatm gyaanaat param gyaanam na vidyate l

aatm laabhaat param laabham na vidyate l

aatm sukhaat param sukham na vidyate l

 

aatm gyaan se badaa koyi gyaan nahi…aatm laabh se badaa koyi laabh nahi..aatm sukh se badaa koyi sukh nahi…sabhi chaahate hai badaa gyaan, badaa sukh, badaa laabh..

arjun ke sath bhagavan hai to bhi arjun ka dukh nahi mitaa.., viraat roop ka darshan karaayaa bhagavaan ne to bhi arjun ka bhay nahi mitaa..arjun ko jab bhagavaan ne ulaahanaa diyaa, menaa maar diyaa ki adhi bhautik kya hai?adhi daivik kya hai? adhyaatm kya hai?..tab arjun mahesus karataa hai ki jo maine paa liya hai, jo jaan liyaa hai  vo paryaapt nahi hai..abhi pana-jaananaa baaki hai..bhagavaan ne arjun ko mahesus karaayaa ki is laabh ke bina saare laabh baune hai..is sukh ke binaa saare sukh baune hai..is gyaan ke bina saare gyaan baune hai..arjun ne mahesus kiya aur bhukh jagi to aadar se sunaa to saakshaatakaar ho gayaa yudhd ke maidaan men..to wo hi arjun jo kahetaa tha ki main yudhd nahi karungaa, bhikh manag kar tukadaa khaa lungaa, sanyaasi ban jaaungaa- vo hi arjun bolataa hai ki main yudhd karungaa…tumhaari aagyaa maanataa hun.. kyo?

nashto moh, smruti labdhwaa l

moh bolate ulate gyaan ko…viparit gyaan ko..jo ham hai us ko ham jaanate nahi hai aur jo ham nahi hai us ko ham “main” maanate hai…ye hai moh.

ab kitana moh pareshaan karataa hai !..yah panch bhautik sharir hai, ashtadaa prakruti ka hai- us ko ham “main” maanate… aur jo vaastavik men ham hai us ka pataa hi nahi!!

kitani bhi aapaadhaapi kar lo, kitani sajaavate kar lo aur uplabdhiyaan kar lo lekin dukh nahi mitenge..

kabhi na chhute pind dukhon se jise bramh ka gyaan nahi…

chaahe 60 hajaar varsh tapasyaa kar ke apane samarthakon ke liye sone ki lankaa banaa de raawan ban kar, chaahe hiranya kashyapu ban kar apani prajaa ke liye sone ka hiranya pur banaa le..lekin tere bhi dukh aur waasanaa nahi mitenge aur prajaa ke bhi nahi mitenge..shabari ne jo guruji  ki baat maan kar ashtadaa prakruti se paar tatv men  vishraanti paa li, miraa ne jo vishraanti paa li, shivaaji ne jo vishraanti paa li us vishraanti ko tu abhi , yahaa paa sakataa hai..

neta bolate ham ye kar denge, vo kar denge aur us ne sab vo kar bhi diyaa maan to bhi raawan ne jitanaa kiyaa utanaa prajaa ke liye tum nahi kar sakate!us ne sone ke ghar banaa diye the, aap to house tax  bhi maaf nahi kar sakate!! :)..koyi party nahi kahe sakati ki sale tax, house tax, income tax hataa de..kaalaa dhan waapis desh men aa bhi jaaye to bhi nirdukh nahi ho sakate..sone ke makaan nahi ban sakate…aur sone ke makaan bhi ban jaaye phir bhi nirdukh nahi ho sakate..samajho kisi party ke saare waayade pure ho gaye ki ye ho gayaa, vo ho gayaa phir bhi maanavataa dukh ke dal dal se baahar nahi nikal sakati….aap ke andar aisi yogyataa aa jaaye ki arjun ki naayi aap sa-sharir swarg pahunch jaaye aur urvanshi jaisi apsaraa aap ko aalingan karanaa chaahati ho aur aap us ko thukaraa de itanaa sanyam aap ke paas ho phir bhi aap nirdukh nahi ho sakate…krishn aap ki ghodaa gaadi chalaa de phir bhi aap nirdukh nahi ho sakate..lekin krishn ka gyan aap paa lo to aap dukhi nahi rahe sakate!

to kyaa aap nirdukh honaa chaahate hai? AWASHYA!

hamaare helicaptor aisaa buri tarah niche aa giraa thaa (pilot hadabadaa gayaa thaa isliye) to helicaptor ke to 3 tukade aur ek tukade ke kuchh purje bikhar gaye aur ham jyo ke tyo nikal aaye baahar! ..us samay agar is (bramh) vidya ka aur guru krupaa ka  kuchh ansh hamaare haath men nahi hotaa to..!… helicaptor ke tukade  dekh kar vaayu senaa ke bade bade adhikaari pratibhaa patil ko phone par bataate hai ki impossible hai aadami jindaa nikale… 

kuchh bhi upalabdhiyaa kar lo lekin jo bhi hogaa panch bhautik men hogi, ashtadaa men hogi..matalab vishaal samudra ki kalpanaa karo..us ke vishaal hisse men maan lo ki 5 laakh varg kilo metre men  kaayi se dhakaa hai aur baaki ka samudr khulaa hai..to 5lakh varg kilo metre vishaal to dikhegi lekin vo kaayi bhi paani se hi bani hai, paani ko hi dhak rahi hai aur paani ke jeev jantuon ki  us men apani apani duniyaa basi hai..us kaayi men kayi kism ke jo jeev jantu rahate un ko utanaa hi hissaa sach lagataa hai..to jeev, jantu, kaayi paani se bani hai, paani par tiki hai , jeev jantu men bhi paani ka ansh hai..to agar ye sab apane ko tatv rup se paani jaane to mul samudr hai..aur nahi jaanate to tuchh hai..kaayi ke hisse men apani apani kalpanaa se aapaa-dhaapi kar rahe hai… ye raaz samajh to aataa hai ..lekin aam aadami ko samajhaayaa nahi jaataa..koyi khaas saadhak tatpar ho jaaye to raaj chhupaa kar rakhaa nahi jaataa..

gurubaani kaheti hai:

jin paayaa tin chhupaayaa l

jis ne ye raaz paa liyaa us ne chhupaa liyaa..chhupaa to liyaa phir bhi jagat ki pidaa dekh kar ki khaamkhaa log pareshaan ho rahe to karunaa vash vo mahaa purush jagat men aate aur kuchh na kuchh upaay karate ki us raaz ko samajh ke samaaj sukhi ho jaaye…

jin paayaa tin chhupaayaa l

chhupat nahi kachhu chhupe chhupaayaa ll

 

us aatm gyaan ko raaz ko paayaa , koyi samajh nahi paayegaa to chup rahe..lekin kuchh kuchh mahaa purush chup nahi rahe paate..idhar se udhar karate karaate hamaari budhdi ki aisi unchaayiyaa le aate ki hamaari budhdi men paramaatmaa ki praapti ka ek tatv jag jaaye! praapti ki lalak lag jaaye..

duniyaa ke saari tapasyaaye, saari vidyaaye, sara dhan daulat paa lo phir bhi aap ki yogyataa itani unchi nahi hoti jitanaa kewal bhagavaan ko paane ka  drudh iraadaa karane se aap ka man pavitr ho jaate hai, aap pavitr ho jaate hai..ishwar ko paane ki ichhaa maatr se aap ka man pavitr ho jaayegaa..aur sansaar ki chije paane ki ichhaa maatr se aap ka man badamaash ho jaayegaa..badamaashi kar ke man aap ko upalabdhiyaa to karaa degaa lekin nirdukh nahi kar sakataa..

kalpanaa karo ki us kaayi (sewaal) ke jantu kitani bhi chaalaaki kar ke dusare jantuo ka shoshan kar ke apane liye area badhaa de, lekin aap samudr hai yah gyaan aap ke paas nahi , aap jal tatv hai yah gyaan aap ke paas nahi hai naa.. apane aap ko jantu hi manegaa aur dusare jantuon ke aage apane aap ko badaa jantu maanegaa!

to nirdhan ke aage aap ko dhan kaa ahankaar hotaa hai, avidwaan ke aage aap ko vidwattaa ka ahankaar hotaa hai.. kurup ke aage aap ko sundarataa ka ahankaar hotaa hai..durbal ke aage aap ko bal ka ahankaar hotaa hai..lekin ahankaar bhi to vikaar hai..aap kya hai vo to pataa nahi chalaa hai..kamjor vyaktiyon ke aag eaap pahelawaan hai; lekin bade pahelawaan ke aage aap kuchh bhi nahi!

yahaa jo bade bade seth dikhate ve amerikaa ke miliyano-tiliyanaro ke aage kuchh bhi nahi..

to ye sabhi maayaa hai!

maa yaa!!

aghatanaa patiyasi yasya saa maayaa avibhacharati..

jis ki satataa ek jaisi raheti wo hai paramaatmaa..

aghatanaa ghatit kar dikhaa de aur dam kuchh bhi nahi vo hai maya.

jaise film men dariyaa laheraa rahaa hai.. halavaayi ke yahaa mithaayiyaa ban rahi hai, log chaat pakoda khaa rahe hai..aap ko bhi kursi pe baithe baithe munh men pani aa jaaye aisi varitiyaa dikh gayi hai.. aur parde ke taraf jaate hai to log hansi udaate hai!!..to aap hansi ke paatr ban jaate hai..kyo ki pardaa hi hai, plastic ki pattiyaa aur light hai..aise hi ashtadaa prakruti aur chaityany ki sattaa hai sara sansaar…

to is baat ko khali aap swikaar kar loge , us ka phir manan , chintan , nit adhyaasan karenge, is baat men teek jaayenge   to aap sidhe gyaani ho jaaoge!!… 🙂 indr banane men bhi bahut parishram hai, indr banane ke baad bhi bramhgyaanion ke aage maththaa tekataa hai.. P. M. banane ke baad bhi laachaar mohataaj jindagi hai atal ji ki..sharir bimaar hai to apane ko bimaar maananaa bilkul bewkufi hai.. 🙂 ham bimaari ko jaanate hai..man dukhi hai to apane ko dukhi maanane ki bewkufi chhod do, nahi to dukh pichha nahi chhodegaa…thodi der ke liye bimari dabegi, dukh dabegaa lekin aap nirdukh nahi honge..

main haath jod ke praarthanaa karataa hun :

mujhe hasate khelate guruji ne de diyaa vo main aap ko hasate khelate aur haath jod kar denaa chaahataa hun…kewal aap lene ko taiyyar ho jaao bas!

waah prabhuji waah!!

aisi upalabdhi!!aisi anubhav waali amrutwaani!! aur vo bhi haath jod kar…sabhi prakaar se madad karane kaa waayadaa aur upar se haath jod kar mil rahi hai!!…jay ho sadgurudev ji bhagavaan aap ki mahaa jayjayakaar ho!!!!!

 

hari om om om om ….

 

 GALATIYON KE LIYE PRABHUJI KSHAMAA KARE….

Advertisements
Explore posts in the same categories: Pujya Bapuji

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


%d bloggers like this: