तुम्हरी कृपा में सुख घनेरे

देल्ही पूनम सत्संग अमृत ; 4 जून 2012

आप भगवान को खेती मत समझना की दाना बोएंगे , समय पा कर फल देगा..पेड़ लगाएँगे , समय पा कर फल देगा..भगवान ऐसे नही है…अथवा आप भगवान को कोई बॅंक मत समझना की इतना दिन रखेंगे तो कुछ सूद आएगा..या भगवान को कोई बिजिनेस मैन नही मानना की इतना इतना करेंगे तो हम को इतना कमिशन का पुण्य मिलेगा..नही नही…भगवान तो तुरंत देते..रोनेवाले का रोना छुड़ाते..

एक बार एक भिकारी रास्ते पर अपना फटा झोला लेकर अल्ला-ताला को कोस रहा था..की अल्लाह क्या मेरी बदकिस्मती है..एक तो फटा झोला और उस में रखने को भी कुछ नही मेरे पास…कैसी तेरी दुनिया..उस के विलाप सुन कर मुल्ला नसरूद्दीन ने सोचा  की यह अल्ला को कोस रहा है..नसरूद्दीन को क्या सूझी की उस ग़रीब का झोला झपट लिया..झोला लेकर  भागा..भिखारी बिलखने लगा की ये मेरा फटा झोला भी छीन गया!अरे मेरा झोला…मेरा झोला..मुल्ला थोड़ा दूर भागा और ऐसे एंगल से झोला एक जगह रखा ताकी उस को दिखे..और खुद पिछे झाड़ियों में छूप गया…वो भिखारी दौड़ता दौड़ता आया..झोला मिला तो बड़ा खुश हुआ..’अल्ला अल्ला !छीना हुआ झोला वापस तो दे दिया!!कैसी तेरी रहेमत!!’

..मुल्ला नसारूद्दीन ने पक्का समझ लिया की दुखी आदमी जो है उस की कदर नही करता, जो नही है उस के लिए रोता है…तो जो है उस को छीन लो, फिर लौटा दो तो दुखी भी सुखी हो जाता है..वाह!क्या तरकीब है तुम्हारी अल्ला! 🙂 नसरूद्दीन तब से सयाना होने लगा..की दुख मन की कल्पना है..सुख भी मन की कल्पना है..ये संत लोग कहेते लेकिन मुल्ला को तो प्रॅक्टिकल हो गया की कैसे कल्पना से कल्पना कटती है..

तो आप ऐसा कभी नही मानो की भगवान कोई खेती है..अभी भजन करे और बाद में फल मिलेगा, नही!अभी के अभी ..इसी समय…जो ऐसा सोचते की भगवान को पाने के लिए हम अयोग्य है वो अपनी अयोग्यता बढ़ाते..हर परिस्थिति में भगवान के ज्ञान , भगवान की प्रीति का मसाला डाल कर मुरब्बा बना दो बस..

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जो लोग डॉक्टर के बोलने से उपवास रखते तो यह उन की मजबूरी है, उन को उपवास का पुण्य नही होता..डॉक्टर कहे उपवास रखो तो रखना चाहिए..स्वास्थ्य में फ़ायदा होगा, अच्छी बात है..लेकिन जो ईश्वर के प्रीति के लिए व्रत रखते , उपवास करते है उस को स्वास्थ्य लाभ तो होगा और मनोबल भी बढ़ेगा, बुध्दी बल भी बढ़ेगा , उस की सहनशक्ति भी बढ़ेगी..उस का तप, तेज और प्रभाव भी बढ़ेगा..उपवास और व्रत सुषुप्त उर्जा को जगाने के लिए एक सुंदर साधन है..व्रत से जीवन में दृढ़ता आती है..दृढ़ता से अपने पर, भगवान पर , शास्त्र पर श्रध्दा होती है..और उसी श्रध्दा के बल से मनुष्य सत्य स्वरूप ईश्वर को पा कर मुक्तात्मा हो जाता है..

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सुधारक लोग भले ही भाषण करे, हमारा ऐतराज नही है..लेकिन जो कोई भाषण करेंगे तो किसी की निंदा करेंगे और किसी की प्रशंसा करेंगे..अपने सिध्दांत की उपयोगिता और महानता बताएँगे और दूसरों के बेवकूफी का चित्रण करेंगे..जिन को उन के भाषणों में जाना है, हमारी मना नही है, लेकिन समय अपना जाता है..भाषण उन का सुनते उन के अपने अपने मन की वमन है..हम अपने मन में उन की वमन डाले या तो हे वाशुदेव, हे गोविंद, हे अच्युत, हे पार ब्रम्‍ह..हे ठाकुर..सब के अंदर ठाकुर तुम ही हो!तुम पीयर दास..तुम माता-पिता..हम बालक तेरे..तुम्हारी कृपा में सुख घनेरे..कोई ना जाने तुम्हरा अंत..उँचे से उँचा भगवंत….ना राग रहेगा , ना भय रहेगा, ना द्वेष रहेगा, ना चिंता रहेगी..भगवान का रस आने लगेगा..

इस प्रकार भगवान की भक्ति से भगवत मय हो जाओ अथवा राग द्वेष में उलझो तुम्हारे हाथ की बात है..

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लोग भीड़ जुटाने के लिए क्या क्या मेहनत करते..लेकिन भीड़ जुटती नही, और जुटती तो ऐसी तपस्या वाली भीड़ मिलती नही ..मेरे पास ये भीड़ नही है, मेरे पास तो भक्तों का जमावड़ा है..प्रेमियों का जमावड़ा !

प्रेमियों का स्नान क्या है?

भगवान और संत के लिए ललक और तड़प होना ये प्रेमियों का स्नान है..

प्रेमियों का ध्यान क्या है?

अपने अहम को और अपनी वासनाओं को मिटाना ही प्रेमियों का ध्यान है..

प्रेमियों की पूजा क्या है?

व्याकुलता, तड़प ही उन की पूजा है..ईश्वर के लिए इंतजारी, बेकरारी..

प्रेमियों का भोजन क्या है?

कभी गुरु की, भगवान की बात सुन कर हर्षित होते है और कभी उन के मिलन में देर होती तो शोकातूर होते.. ऐसे प्रेमी मीरा की सब अवस्था भक्ति हो जाती है..भैस चरानेवाले नानक जी की सब हरकते भक्ति हो जाती है..उपदेश देना भी भक्ति हो जाता है, भैस चराना भी भक्ति हो जाता है..प्रेमी का जो कुछ होता है, भगवान  की महत्ता में सब भजन बन जाता है…

प्रेमी का निवास कहाँ होता है?

प्रेमी का निवास ऐसी जगह होता है जहा कोई ना हो..भले ही आस-पास में सब बैठे हो..

प्रेमी पाठ कौन सा पढ़ता है?

चुप्पी -मौन उस का पाठ है..

मुझे वेद पुराण क़ुरान से क्या?

मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई

मुझे मंदिर मस्जिद जाना नही

मुझे हृदय मंदिर में पहुँचा दे कोई

जहा उँच  नीच की बात नही

ना हो मंदिर मस्जिद चर्च जहाँ

ना हो पूजा नमाज़ में फ़र्क वहा

बस प्रेम ही प्रेम की सृष्टि मिले

अब नाव को खे के चलो वहाँ

जीवन की नैय्या वहाँ ही ले चलो.. ये ऐसा है, वो वैसा है की सोच ये सरोवर में उपर की तरंगे समान है जो उछलती है, कूदती है, मिलती है और फिर बुलबुले झाग सब बनता है लेकिन गहेरे पानी में कुछ नही…ऐसे ही प्रेम की गहेराई में देखो तो बस ऐ है..क्या कहे!!ओह्हो

वासुदेव सर्वं इति ll

और प्रेमी?अपने प्रेमास्पद को मिलने का एहसास करता है तो योग होता है..एकता का एहसास करता है तो ब्रम्‍हज्ञान होता है..और अ-भिन्नता का एहसास करता है तो नित्य नवीन रस बरसता रहेता है..ये प्रेम की पराकाष्ठा है..ब्रम्हज्ञान की पराकाष्ठा है..

अब तुम को ब्रम्हज्ञान  हो ना हो..नित्य नविन रस मिले ना मिले.. मैं इंतजार नही करूँगा..अभी बीज बोए फिर फल मिले ऐसी कस्तकारी मुझे अच्छी नही लगती..मैं तो ‘चट मंगनी  पट विवाह’ – उसी समय मंगनी , उसी समय  शादी और उसी समय शाद आबादी की खुशी!मैं ये बाते पसंद करता हूँ..इसलिए भगवान से पंगा लिया और भगवान को सस्ता कर दिया..:) और भगवान को भी इस में आनंद है!

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 भजन में मन लगता नही, भगवान की विस्मृति हो जाती..तो होने दो, डरो नही..

हनुमान प्रसाद पोतदार बड़े उच्च कोटि के प्रेमी भक्त हो गये.. अखंडानंद स्वामी को बोले की , महाराज कभी कभी ऐसी अभागी घड़ी आती की भगवान की स्मृति नही रहेती..भगवान का चिंतन भूल जाता हूँ..

अखंडानंद जी ने कहा: अच्छा!आप भगवान का स्मरण भूल जाते है!

पोतदार  जी विद्वान तो थे, गीता प्रेस गोरखपुर से कल्याण मॅगज़ीन निकलती उन की..

अखंडानंद जी बोले, अरेरे ! आप भगवान की स्मृति भूल जाते..आप को पता है स्मरण कौन देता है?

बोले वो ही देता है..

स्वपना कहाँ से आता है?स्मृति की प्रधानता से ?

बोले हाँ !

जागृत कहाँ से आती?संस्कार की प्रधानता से..और स्मृति कौन देता है? नींद तुम लाते हो की वो देता है?

बोले नींद वो देता है..

नींद में स्मृति रहेती है?

बोले नही

बोले विस्मृति नींद की कौन देता है?

विस्मृति तू ही देता है, जागृत तू ही देता है, स्वपना तू ही देता है..तू ही तो है सब देनेवाला…सब होनेवाला तू ही तो है..वृक्षों में वृक्ष हो कर दिखता है..फूलों में सुगंध..मन में वात्सल्य और पिता में अनुशासन तेरी  ही तो लीला है ना!समुंदर में ल़हेरा कर आल्हादित तू ही करता है..शरीर में रक्त का संचार तू ही करता है..हे कर्ता धर्ता तू ही तो है..जिधर देखता हूँ खुदा ही खुदा है!..सारी विद्वत्ता पा लो..सारी सिध्दीयां पा लो.. सारे जप तप कर लो ..अंत में यही आना पड़ेगा..सर्वत्र वाशुदेव है और सब में वाशुदेव है..और सब का हर्ता,भर्ता , भोक्ता,शासन कर्ता वाशुदेव है..यहा ही आना पड़ेगा…तुम ठाकुर तुम पीयर दास..जीय पिंड सब तेरी रास..चल-अचल सब तेरा ही स्वरूप है..इस ज्ञान  में आना ही पड़ेगा…

पोतदार जी महाराज खो गये! ऐ है!!..जिस को सच्चे संत और गुरु मिल गये ना वो काम को, क्रोध को, लोभ को, मोह को, भय को, शोक को, चिंता को, भूत भविष्य वर्तमान को ..सब को भगवत भाव की चासनी में मुरब्बा बना देता है.. 🙂

आप के काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, चिंता का मुरब्बा बना लो..एक तो भगवत रस की चासनी डाल दो और दूसरी जो भी परिस्थितियाँ आए उस प्रकार के मसाले डाल दो!

अहिंसा समता तुष्टि

तपो दानम् यशोपयश

भवंती भाव भूतानाम

मत एव पृथक विधान

अहिंसा, समता, तुष्टि , ताप, दान, यश, अपयश ये प्राणियों के अनेक प्रकार के अलग अलग भाव मेरे से ही प्रकाशित होते है..ऐसा भगवान बोलते..तो महाराज तो ये सब आप से प्रकाशित होते तो आप ही की लीला है..इस प्रकार की समझ की चासनी डाल दो..जो भगवान बोले है वो ही स्वीकार कर रहे..अपन कोई नया मुरब्बा थोड़े ही बना रहे!..हमारी कमियां , ये, वो- जो भी हो..है तो खारा नमक लेकिन मुरब्बे में टेस्ट ले आता है..है तो तीखी मिर्ची लेकिन मुरब्बे में टेस्टी हो जाते..है तो दालचीनी अकेली परेशान कर दे लेकिन मुरब्बे में रंग ले आती है..

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वेद में बहुत उँची बात कही है..वेद भगवान कहेते है : हे मनुष्य ! तू अपने दिल को भगवान के भाव से, भगवान के प्रेम से भर दे…प्रभु हम तेरे है, तू हमारा है…बस!ऐसा कहे के तू अपना जीवन जीवनदाता के साथ एक तान  कर दे..काम क्रोध मद मात्सर्य भय रोग चिंता ये लोफर आते है,और तुम को मार-पीट के चले जाते है..क्रोध आया, तपा के चला गया..काम आया तो नोच के चला गया..मोह  आया तो फिसला के चला गया.. अहंकार आया तो उद्विग्न कर के चला गया..तुम बस प्रभु प्रीति की चासनी तैयार रखो..जो आए उस को डुबाते जाओ उस चासनी में..सब मुरब्बा बनते जाएगा..प्रभु भाव से मन को भर दो..प्रभु ज्ञान से मन को भर दो..प्रभु के  साथ तुम्हारा अपनत्व था, अपनत्व है और अपनत्व ही रहेगा..

तुम यह नही मानते तो दुख है, और मान लिया तो उसी समय माधुर्य ..

तो वेद कहेता है की ‘प्रभु हम आप के है और आप हमारे’ ये हमारी स्मृति बनी रहे…भयानक दृश्य,करूण प्रसंग, भिभत्स, कही हास्य तो कही शृंगार..सब में भगवान की स्मृति का रस डाल दो…जैसे फिल्म में सभी प्रकार के प्रसंग होते हास्य भी होता, रुद्र रस भी होता, कारुण्य और शृंगार भी होता..एक ही प्रकार का रस होगा तो मज़ा नही आएगा..ऐसे ही इस दुनिया को भगवान ने तुम्हारी उन्नति के लिए रचा है..वाह वाह प्रभु..

तो ऋग वेद का भय , भिभत्स रस और साम वेद का संगीत, शृंगार, अद्भुत  ये सब रस तुम्हारी लीला है..

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मुल्ला नसरूद्दीन एक जगह बैठा था, कोई आया और धड़ाक से तमाचा मार दिया!

मुल्ला ने कहा : हद हो गयी!

वो आदमी बोला: नही नही..सॉरी सॉरी..

मुल्ला ने समझ लिया की ये भी इस की मज़ाक है..मुल्ला ने उस का हाथ पकड़ा और बोला चल काज़ी साब के पास..

काज़ी को फरियाद की ‘मैं बेगुनाह था, इस ने मुझे तमाचा रख दिया..’

काज़ी ने उस व्यक्ति को देखा और हंसा, वो व्यक्ति भी हंसा..मुल्ला समझ गया की ये दोनो आपस में मिले भगत है..बोले आप मेरा फ़ैसला करिए..

काज़ी बोला: तुम को तमाचा मारा था ना?

मुल्ला बोला : हाँ ..

व्यक्ति बोला: लेकिन मैं ने माफी माँग ली..

काज़ी बोला : बस इस ने माफी माँग ली तो हो गयी बात पूरी..

मुल्ला बोला: कोई बेगुनाह को तमाचा मार दे और माफी माँग ले तो ये तो नाटक बाजी हुई..कोई जुर्माना होना चाहिए..

काज़ी ने फ़ैसला सुनाया की एक रूपिया जुर्माना ये व्यक्ति तुम को इनाम में देगा..उस ने कहा रूपिया मेरे पास नही है, मैं घर पे लेने जाता हूँ..घर गया तो आया ही नही!..मुल्ला इंतजार कर कर के थक गया..फिर काज़ी को पुछा की  “काज़ी साब.. किसी बेगुनाह को  थप्पड़ लगे तो क्या उस का जुर्माना सिर्फ़ एक रूपिया है?”

काज़ी बोला: ये काफ़ी है..

मुल्ला ने कस के एक तमाचा काज़ी के मुँह पे रख दिया, और बोला वो व्यक्ति एक रूपिया लाएगा, अब वो रूपिया तुम ही ले लेना!! 🙂

अब ये बात चुटकुला है तो पैदा करने वाला भी तू ही और मज़ा देनेवाला भी तू ही..उस पे नज़र रखो..है तो गप लेकिन तेरी लीला है..तुम ठाकुर तुम पीयर  दास..जीय  पिंड सब तेरी रास..तुम माता-पिता हम बालक तेरे..तुम्हारे कृपा में सुख घनेरे ..यह सब सुख ही सुख है…नसीरूद्दीन और तमाचा हो गया तब हो गया लेकिन अभी भी मज़ा तो आ रहा है!..तो मज़े की गहेराई में कौन है? तू ही तो है नाथ..ऐ है!

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क्षति होती है भोग भोगने से और भगवान को जानने की जिज्ञासा  से पूर्ति होती है..प्रेम में क्षति नही, पूर्ति नही, निवृत्ति नही…उत्तरोत्तर वृध्दी होती..ईश्वर के प्रति प्रेम बढ़ता जाता है..

भगवान से मिलने में 5 विघ्न है उस से बचो..

1) पहेले के दुष्कृत्यों से हम अपने आप को भगवान से मिलने में अयोग्य मानते उस से बचो..पहेले हुआ तो हुआ लेकिन अभी सत्संग सुना तो अयोग्य काहे के हुए ? सत्संग में एक एक कदम चल के आए तो एक एक यज्ञ करने का फल मिला..हम संसारी है हम अयोग्य है ऐसा नही माने..इधर तक पहुँचे हो तो अयोग्य कैसे हो? पाप वासना हीन भावना पैदा कर देती है..

2) सुकृत भाव आप को पुण्यात्मा होने का अहम दे देता है.. पुण्यात्मा होने का अहम भी ना करो..

3) विषय भोग ये तीसरा विघ्न है..सूंघने का मज़ा, चखने का मज़ा, पति/पत्नी के काला मुँह करने का मज़ा ये वासना भी भगवान के प्रेम से आप को गिरा देती है..

4) जिस को ईश्वर से कोई लेना देना नही ऐसे व्यक्ति के साथ हाथ मिलाएँगे, उस के हाथ का खाया, उन के मेहमान बने,उन को मेहमान बनाया यह दुसंग है ; इस दुसंग से बचो..

5) मोक्ष विस्मरण  

ये पाँचो भावों से बच कर  मनोबल बढ़ाओ..जो कष्ट सहे कर उपवास करता है, नियम करता है उस का मनोबल बढ़ता है..जो शास्त्र के विधान के अनुसार गुरुदेव का सत्संग सुनता है उन का मनोबल और मन की प्रसन्नता बढ़ती है ….उन की वाणी का प्रभाव दूसरो पर पड़ता है..ईश्वर की सहायता मिलती है..

फरियाद करना ईश्वर के रास्ते चलने वालो को शोभा नही देता..संकट में भी अपने से भी नीचे अधिक संकट वालों को देखो..और प्रेम पूर्वक भगवान का नाम लो..विवश हो कर नही…

ओम ओम ओम ओम ओम हे काम क्रोध भय शोक चिंता सब का मुरब्बा बना के तेरी भक्ति का दान देनेवाले ओम ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ……

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ॐ शांती।

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे…..

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

aap bhagavaan ko kheti mat samajhanaa ki daanaa boyenge , samay paa kar phal degaa..ped lagaayenge , samay paa kar phal degaa..bhagavaan aise nahi hai…athavaa aap bhagavaan ko koyi bank mat samajhanaa ki itanaa din rakhenge to kuchh sud aayegaa..yaa bhagavaan ko koyi bissuiness man nahi maananaa ki itanaa itanaa karenge to ham ko itanaa commission punya milegaa..nahi nahi…bhagavaan to turant dete..ronewaale kaa ronaa chhudaate..

ek baar ek bhikaari raaste par apanaa phataa jholaa lekar allaa-taalaa ko kos rahaa thaa..ki allaah kya meri bad kismati hai..ek to phataa jholaa aur us men rakhane ko bhi kuchh nahi mere paas…kaisi teri duniya..us ke vilaap sun kar mullaa nasaruddin ne sochaa  ki yah allaa ko kos rahaa hai..nasaruddin ne kyaa kiyaa ki us garib ka jholaa jhapat liyaa..jholaa lekar  bhaagaa..bhikaari bilakhane lagaa ki ye mera phataa jholaa bhi chhin gayaa!are mera jholaa…meraa jholaa..mullaa thoda dur bhaagaa aur aise angle se jholaa ek jagah jholaa rakhaa taa ki us ko dikhe..aur khud pichhe jhaadiyon men chhup gayaa…vo daudataa daudataa aayaa..jholaa milaa to badaa khush huaa..’allaa allaa !chhinaa huaa jholaa waapas to de diyaa!!kaisi teri rahemat!!’ ..mullaa nasaruddin ne pakkaa samajh liyaa ki dukhi aadami jo hai us ki kadar nahi karataa, jo nahi hai us ke liye rotaa hai…to jo hai us ko chhin lo, phir lautaa do to dukhi bhi sukhi ho jaataa hai..waah!kya tarkib hai tumhaari allaa! 🙂 nasaruddin tab se sayaanaa hone lagaa..ki dukh man ki kalpanaa hai..sukh bhi man ki kalpanaa hai..ye sant log kahete lekin mullaa ko to practical ho gayaa ki kaise kalpanaa se kalpanaa katati hai..

to aap aisa kabhi nahi maano ki bhagavaan koyi kheti hai..abhi bhajan kare aur baad men phal milegaa, nahi!abhi ke abhi ..isi samay…jo aisaa sochate ki bhagavaan ko paane ke liye ham ayogy hai vo apani ayogyataa badhaate..har paristhiti men bhagavaan ke gyaan, bhagavaan ki priti ka masaalaa daal kar murabbaa banaa do bas..

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jo log doctor ke bolane se upawaas rakhate to yah un ki majaburi hai, un ko upwaas ka punya nahi hotaa..doctor kahe upawaas rakho to rakhanaa chaahiye..swaasthy men phaayadaa hogaa, achhi baat hai..lekin jo iihswar ke priti ke liye vrat lekar upawaas karate hai us ko swaasthy laabh to hogaa aur manobal bhi badhegaa, budhdi bal bhi badhegaa , us ki sahanshakti bhi badhegi..us kaa tap, tej aur prabhaav bhi badhegaa..upawaas aur vrat sushupt urjaa ko jagaane ke liye ek sundar saadhan hai..vrat se jeevan men drudhataa aati hai..drudhataa se apane par, bhagavaan par , shaashtr par shradhdaa hoti hai..aur usi shradhdaa ke bal se manushy saty swarup iishwar ko paa kar muktaatmaa ho jaataa hai..

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sudhaarak log bhale hi bhaashan kare, hamaaraa aitaraaj nahi hai..lekin jo koyi bhaashan karenge to kisi ki nindaa karenge aur kisi ki prashansaa karenge..apane sidhdaant ki upyogitaa aur mahaanataa bataayenge aur dusaron ki sidhdaanto ki bewkufi chitran karenge..jin ko un ki bhaashanon men jaanaa hai, hamaari manaa nahi hai, lekin samay apanaa jaataa hai..bhaashan un ka sunate un ke apane apane man ki waman hai..ham apane man men un ki waman daale yaa to hey vaashudev, hey govind, hey achyut, hey paar bramh..hey thaakur..sab ke andar thaakur tum hi ho!tum paiyar daas..tum maat-pitaa..ham baalak tere..tumhari krupaa men sukh ghanere..koyi naa jaane tumharaa ant..unche se unchaa bhagavant….naa raag rahegaa , naa bhay rahegaa, naa dwesh rahegaa, naa chintaa rahegi..bhagawaan kaa ras aane lagegaa..

is prakaar bhagavaan ki bhakti se bhagavat may ho jaao athavaa raag dwesh men ulajho tumhaare haath ki baat hai..

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log bhid jutaane ke liye kya kya mehanat karate..lekin bhid jutati nahi, aur jutati to aisi tapasyaa waali bhid milati nahi ..mere paas ye bhid nahi hai, mere paas to bhakton kaa jamaawadaa hai..premiyon kaa!

premiyon kaa snaan kyaa hai?

bhagavaan aur sant ke liye lalak aur tadap hona ye premiyon ka snaan hai..

premiyon kaa dhyaan kyaa hai?

apane aham ko aur apani waasanaaon ko mitaanaa hi premiyon kaa dhyaan hai..

premiyon ki pujaa kyaa hai?

vyaakultaa, tadap hi un ki pujaa hai..intjaari, bekaraari..

premiyon kaa bhojan kyaa hai?

kabhi guru ki, bhagavaan ki baat sun kar harshit hote hai aur kabhi un ke milan men der hoti to shokaatur hote.. aise premi miraa ki sab awasthaa bhakti ho jaati hai..bhais charaanewaale naanak ji ki sab harakate bhakti ho jaati hai..upadesh denaa bhi bhakti ho jaataa hai, bhais charaanaa bhi bhakti ho jaataa hai..premi ka jo kuchh hotaa hai, bhagavaan ki mahattaa men sab bhajan ban jaataa hai…

premi kaa niwaas kahaa hotaa hai?

premi kaa niwaas aisi jagah hotaa hai jahaa koyi naa ho..bhale hi aas-paas men sab baithe ho..

premi paath kaun saa padhataa hai?

chuppi -maun us ka paath hai..

mujhe ved puraan kuraan se kya?

mujhe prem ka paath padhaa de koyi

mujhe mandir masjid jaanaa nahi

mujhe hruday mandir men pahunchaa de koyi

jahaa unch nich ki baat nahi

naa ho mandir masjid charch jahaa

naa ho pujaa namaaj men phark wahaa

bas prem hi prem ki srushti mile

ab naav ko khe ke chalo wahaa

jeevan ki naiyya wahaa hi le chalo..ye aisaa hai, vo waisaa hai ye sarovar men upar ki tarange uchhalati hai, kudati hai, milati hai aur phir bulbule jhaag sab banataa hai lekin gahere paani men kuchh nahi…aise hi prem ki gaheraayi men dekho to bas ai hai..kya kahe!ohho!!

vaasudev sarvam iti ll

aur premi?apane premaaspad ko milane ka ehsaas karataa hai to yog hotaa hai..ekataa kaa ehasaas karataa hai to bramhgyaan hotaa hai..aur a-bhinnataa ka ehasaas karataa hai to nitya navin ras barasataa rahetaa hai..ye prem ki paraakaasthaa hai..bramhagyaan ki paraakaasthaa hai..

ab tum ko bramhagyaan ho naa ho..nitya mavin ras mile naa mile main intjaar nahi karungaa..abhi bij boye phir phal mile aisi kastakaari mujhe achhi nahi lagati..main to ‘chat mangani pat vivaah’..usi samay mangani usi samay  shaadi aur usi samay shaad aabaadi ki khushi!main ye baate pasand karataa hun..isliye bhagavaan se pangaa liyaa aur bhagavaan ko sastaa kar diyaa..:) aur bhagavaan ko bhi aanand hai!

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 bhajan men man lagataa nahi, bhagavaan ki vismruti ho jaati..to hone do, daro nahi..

hanumaan prasaad potadar bade uchch koti ke premi bhakt ho gaye.. akhandaanand swami ko bole ki , mahaaraaj kabhi kabhi aisi abhaagi ghadi aati ki bhagavaan ki smruti nahi raheti..bhagavaan ka chintan bhul jaataa hun..

akhandaanand ji ne kahaa: achhaa!aap bhagavan ka smaran bhul jaate hai!

potdaar ji vidwaan to the, gitaapur gorakhpur se kalyaan magazine nikalati un ki..

akhandaanand ji bole, arere aap bhagavaan ki smruti bhul jaate..aap ko pataa hai smaran kaun detaa hai?

bole wo hi detaa hai..

swapnaa kahaa se aataa hai?smruti ki pradhaanataa se..

bole haa!

jaagrut kahaa se aati?sanskaar ki pradhaanataa se..aur smruti kaun detaa hai? nind tum laate ho ki vo detaa hai?

bole nind vo detaa hai..

nind men smruti raheti hai?

bole nahi

bole vismruti nind ki kaun detaa hai?

vismruti tu hi detaa hai, jaagrut tu hi detaa hai, swapnaa tu hi detaa hai..tu hi to hai sab denewaalaa…sab honewala tu hi to hai..vrukshon men vruksh ho kar dikhataa hai..phulon men sugandh..maan men vaatsalya aur pitaa men anushaasan teri  hi to lilaa hai naa!samundar men laheraa kar aalhaadit tu hi karataa hai..sharir men rakt ka sanchaar tu hi karataa hai..hey kartaa dhartaa tu hi to hai..jidhar dekhataa hun khudaa hi khudaa hai!..saari vidwattaa paa lo..saari sidhdiyaa paa lo saare jap tap kar lo ..ant men yahi aanaa padegaa..sarvatr vaashudev hai aur sab men vashudev hai..aur sab ka hartaa,bharataa, bhoktaa,shaasan kartaa vaashudev hai..yahaa hi aanaa padegaa…tum thaakur tum paiyar daas..jiy pind sab teri raas..chal-achal sab teraa hi swarup hai..is gyaan men aanaa hi padegaa…

potadaar ji mahaaraaj kho gaye!ai hai!!..jis ko sachche sant aur guru mil gaye naa vo kaam ko krodh ko lobh ko moh ko bhay ko shok ko chintaa ko..bhut bhavishy vartamaan ko ..sab ko bhagavat bhaav ki chaasani men murabbaa banaa detaa hai.. 🙂

aap ke kaam, krodh, lobh, moh, bhay, chintaa kaa murabbaa banaa lo..ek to bhagavat ras ki chaasani daal do aur dusari jo bhi paristhitiyaan aaye us prakaar ke masaale daal do!

ahinsaa samataa tushti

tapo daanam yashopyash

bhavanti bhaav bhutaanaam

mat ev pruthak vidhan

ahinsaa, samataa, tushti , tap, daan, yash, apayash ye praaniyon ke anek prakaar ke alag alag bhaav mere se hi prakaashit hote hai..aisaa bhagavaan bolate..to mahaaraaj to ye sab aap se prakaashit hote to aap hi ki lilaa hai..is prakaar ki samajh ki chaasani daal do..jo bhagavana bole hai wo hi sweekaar kar rahe..apan koyi nayaa murabbaa thode hi banaa rahe!..hamaari kamiyaa , ye vo jo bhi ho..hai to khara namak lekin murabbe men test le aataa hai..hai to tikhi mirchi lekin murabbe men testy ho jaate..hai to daalachini akeli pareshaan kar de lekin murabbe men rang le aati hai..

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ved men bahut unchi baat kahi hai..ved bhagavaan kahete hai hey manushy tu apane dil ko bhagavaan ke bhaav se, bhagavaan ke prem se bhar de…prabhu ham tere hai, tu hamaaraa hai…bas!aisaa kahe ke tu apanaa jeevan jeevan daataa ke saath ek taan kar de..kaam krodh mad maatsary bhay rog chintaa ye lofar aate hai,aur tum ko maar-pit ke chale jaate hai..krodh aayaa, tapaa ke chalaa gayaa..kaam aayaa to noch ke chalaa gayaa..moh aayaa to phisalaa ke chalaa gayaa.. ahankaar aayaa to udwign kar ke chalaa gayaa..tum bas prabhu priti ki chaasani taiyyar rakho..jo aaye us ko dubaate jaao us chaasani men..sab murabbaa banate jaayegaa..prabhu bhaav se man ko bhar do..prabhu gyaan se man ko bhar do..prabhu ke saath tumhaaraa apanatv thaa, apanatv hai aur apanatv hi rahegaa..

tum yah nahi maanate to dukh hai, aur maan liyaa to usi samay maadhury..

to ved kahetaa hai ki ‘prabhu ham aap ke hai aur aap hamaare’ye hamaari smruti bani rahe…bhayaanak drushy,karun prasang, bhibhats, kahi haasya to kahi shringaar..sab men bhagavaan ki smruti kaa ras daal do…jaise film men sabhi prakaar ke prasang hote hasya bhi hota, rudr ras bhi hotaa, kaarunya aur shringaar bhi hotaa..ek hi prakaar ka ras hoga to majaa nahi aayegaa..aise hi is duniyaa ko bhagavaan ne tumhaari unnati ke liye rachaa hai..waah waah prabhu..

to rig ved kahetaa hai bhay , bhibhats ras saam ved ka sangit shringara adbhut  ye sab ras tumhaari lilaa hai..

*******

mullaa nasaruddin ek jagah baithaa tha, koyi aayaa aur dhadaak se tamaachaa maar diyaa!

mullaa ne kahaa : had ho gayi!

vo aadami bola: nahi nahi..sorry sorry..

mullaa ne samajh liyaa ki ye bhi is ki majaak hai..mullaa ne us ka haath pakadaa aur bolaa chal kaazi saab ke paas..

kaazi ko fariyaad ki ‘main begunaah thaa, is ne mujhe tamaachaa rakh diyaa..’

kaazi ne us vyakti ko dekhaa aur hansaa, vo vyakti bhi hansaa..mullaa samajh gayaa ki ye dono aapas men mile bhagat hai..bole aap mera phaisalaa kariye..

kaazi bola: tum ko tamaachaa maaraa tha na?

mulaa bolaa : haan..

vyakti bola: lekin maine maafi maang li..

kaazi bola : bas is ne maafi maang li to ho gayi baat puri..

mullaa bolaa: koyi begunaah ko tamaachaa maar de aur maafi maang le to ye to naatak baaji huyi..koyi jurmaanaa honaa chaahiye..

kaazi ne faisalaa sunaayaa ki ek rupiyaa jurmaanaa ye vyakti tum ko inaam men degaa..us ne kahaa rupiyaa mere paas nahi hai, main ghar pe lene jaataa hun..ghar gayaa to aayaa hi nahi!..mullaa intajaar kar kar ke thak gayaa..phir kaazi ko puchhaa ki “kaazi saab.. kisi begunaah thappad lage to kya us ka jurmaanaa sirf ek rupiyaa hai?”

kaazi bola: ye kaafi hai..

mullaa ne kas ke ek tamaachaa kaazi ke munh pe rakh diyaa, aur bola vo vyakti ek rupiyaa laayegaa, ab vo rupiyaa tum hi le lenaa!! 🙂

ab ye baat chutakulaa hai to paidaa karane waalaa bhi tu hi aur majaa denewaalaa bhi tu hi..us pe najar rakho..hai to gup lekin teri lila hai..tum thaakur tum paiyar daas..jiy pind sab teri raas..tum maat-pitaa ham baalak tere..tumhare krupaa men sukh ghanere..yah sab sukh hi sukh hai…nasiruddin aur tamaachaa ho gayaa tab ho gayaa lekin abhi bhi majaa to aa rahaa hai!..to maje ki gaheraayi men kaun hai? tu hi to hai naath..ai hai!

*******

kshati hoti hai bhog bhogane se aur bhagavaan ko jaanane ki jigyaasaa se purti hoti hai..prem men kshati nahi, purti nahi, nivrutti nahi…uttarottar vrudhdi hoti..ishwar ke prati prem badhataa jaataa hai..

bhagavaan se milane men 5 adachan hai us se bacho..

1) pahele ke dushkruto se ham apane aap ko bhagavaan se milane men ayogy maanate us se bacho..pahele huaa to huaa lekin abhi satsang sunaa to ayogy kaahe ke huye?satsang men ek ek kadam chal ke aaye to ek ek yagy karane ka phal milaa..ham sansaari hai ham ayogya hai aisaa nahi maane..idhar tak pahunche ho to ayogya kaise ho? paap waasanaa heen bhaavanaa paidaa kar deti hai..

2) sukrut bhaav aap ko punyaatmaa hone ka aham de detaa hai..punyaatmaa hone ka aham bhi naa karo..

3) vishay bhog ye tisaraa vighn hai..sunghane ka majaa, chakhane kaa majaa, pati/patni ke kaalaa munh karane kaa majaa ye waasanaa bhi aap ko bhagavaan ke prem se aap ko giraa deti hai..

4) jis ko iishwar se koyi lena denaa nahi aise vyakti ke haath milaayenge , us ke haath kaa khaayaa, un ke mehamaan bane,un ko mehamaan banaayaa yah dusang hai ; is dusang se bacho..

5) moksh srujan

ye paancho bhaavon se bach kar  manobal badhaao..jo kasht sahe kar upawaas karataa hai, niyam karataa hai us ka manobal badhataa hai..jo shaashtr ke vidhaan ke anusaar gurudev ka satsang sunataa hai un kaa manobal aur man ki prasannataa badhati hai ….un ki waani kaa prabhaav dusaro par padataa hai..iishwar ki sahaayataa milati hai..

fariyaad karanaa iishwar ke raaste chalane waalo ko shobhaa nahi detaa..sankat men bhi apane se bhi niche adhik sankat waalon ko dekho..aur prem purvak bhagavaan ka naam lo..vivash ho kar nahi…

om om om om om hey kaam krodh bhay shok chintaa sab kaa murabba banaa ke teri bhakti kaa daan denewaale om om om om om …haa haa haa..

*******

OM SHAANTI.

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYAKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare…

 

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One Comment on “तुम्हरी कृपा में सुख घनेरे”

  1. K K Gupta Says:

    Bhaiya aapki is seva ke liye aapko bahut bahut sadhuvad ! ! ! !


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