गुरुज्ञान का मुरब्बा !!

मुंबई सत्संग अमृत; 3 जून 2012

 

श्रीमद् भागवत की बात है..राजा नेमी बड़े धर्मात्मा, पुण्यात्मा  थे…9 योगेश्वरों का उन्हों ने पूजन किया और प्रार्थना किया की मनुष्य सब दुखों से छूट जाए, भव रोग कैसे मिटे ?

9 योगेश्वरों में से पाँचवे योगेश्वर थे कवि..कवि योगेश्वर ने कहा की उत्तम वैद्य वो ही है की जो 4 बातें जान ले ..रोग का कारण क्या है?..फिर औषध क्या है?..और रोग का निमित्त क्या है?..और फिर स्वास्थ्य के क्या लक्षण है?..ये जानने वाला उत्तम वैद्य होता है..

 यह भव रोग है कोई  बुखार का रोग नही है..काम का रोग, क्रोध का रोग, लोभ का रोग, मोह  का रोग, चिंता का रोग और फिर सब छोड़ -छाड़ के मरेंगे, मरने के बाद  किधर जाएँगे पता नही इस भय का रोग – ऐसा यह महा रोग लगा है..माँ के गर्भ में आते है तो जन्म का दुख,फिर मुँह में दाँत आते तो दुख,पढ़ाई में फेल हुए तो दुख,पास हुए लेकिन नोकरी नही मिलती तो दुख..नोकरी मिली लेकिन बदली हो गयी तो दुख, प्रमोशन नही मिले तो दुख..

सी एम  हो अथवा पी एम  हो तो भी आप का दुख नही मिटता .. सी एम , पी एम  ये तो धरती पर है लेकिन स्वर्ग के राजा इंद्र जिन को 33 कोटि देवता नमस्कार करते, 12 मेघ जिन के आज्ञा में रहेते ऐसे इंद्र देव का भी दुख नही मिटता …कभी दैत्य चढ़ाई करते तो टेंशन और कभी अप्सरा ठीक से नही नाचे तो मज़ा नही आता..लेकिन ब्रम्‍ह ज्ञानी  गुरु को देख के इंद्र खड़े हो जाते, बड़ा सत्कार करते..क्योंकी ब्रम्‍ह ज्ञानी  की नूरानी निगाहो से, वाणी से, ब्रम्‍ह ज्ञानी  महापुरुष को छू कर जो हवा चलती उस से लोगों के पाप ताप मिटते और सदभाव जागृत होते…हृदय में भगवान की भक्ति मिलती है, भगवान का भाव जागृत होता है..

 

 

तो नेमी राजा ने पुछा की भव रोग कैसे मिटे ?

तो 9 योगेश्वर में से पाँचवे योगेश्वर कवि ने कहा की पहेले रोग का कारण समझो, रोग के लक्षण समझो, रोग की औषधि समझो और निरोग होने के लक्षण समझो..

ये आप हम सभी के लिए मानव मात्र के लिए प्रश्न उत्तर है.

भव रोग कैसे मिटे ?

ज़रा सा नोटीस आया डर गये!..ज़रा सा बेटा रुठ के चला गया तो डर गये..ज़रा पति/पत्नी ने नोटीस दिया अथवा इन्कम टॅक्स का नोटीस आया तो सारी एसी की ठंडक हवा हो जाती यह भव रोग है…

ज़रा ज़रा बात में भय आता,रोग आता, मृत्यु आती है..

हक़ीकत में हम है आत्मा..लेकिन उस को जानते नही..और जहाँ भय है उस को “मैं” मानते …

गुरु नानक ने कहा:-

निर्भव जपे  सकल भय मिटे l

संत कृपा ते प्राणी छूटे ll

आप निर्भय स्वभाव का ज्ञान पा लो…निर्भय स्वभाव की तरफ पहुँचने की तरकीब पा लो..तो सारे भय मिट जाएँगे…

आप चाहते है क्या भयभीत रहे?नही..

आप चाहते है क्या हम दुखी रहे?नही चाहते…

आप चाहते है क्या हम को नरक हो जाए..नही..

आप चाहते है क्या की हमारे जीवन में दुख आए, चिंता आए, हम बंधन में पड़े रहे? नही..

काम क्रोध मोह लोभ ये बदमाश आते और आप की पिटाई ठोकाई कर के आप को ठूस कर के चले जाते..आप मरे मराए हो जाते..

 वास्तव में आप के आत्मा परमात्मा के आनंद के आगे इंद्र का पद भी तुच्छ है..

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 सत्संग सुनने से हमारी 72 करोड़ 72 लाख नाडियाँ शूध्द होती है और 84 उपत्काए शुध्द  होती है..सत्संग में इतना लाभ होता है की अपने आप को बेच के भी बदला नही चुका सकते..सत्संग में ऐसा ज्ञान मिलता है जो स्कूल कॉलेजों में नही मिलता..

 हमारे 5 शरीर है..जो दिखता है उस को अन्न मय शरीर बोलते..इस के अंदर दूसरा शरीर है उस को बोलते प्राण मय शरीर..प्राण निकल जाते तो यह शरीर मुर्दा बन जाता है..प्राण मय शरीर के गहेराई में होता है मन-मय शरीर..मन सो जाता है तो प्राण चलते फिर भी मुर्दे जैसा…मुँह में लड्डू डाले तो भी स्वाद नही आएगा..आँख की पलके खुली होगी तो भी कुछ दिखेगा नही क्योंकी मन सोया है.. साप आ के पास में सो गया तो भी पता नही चलेगा.. और बापू आए, घर में खड़े हो जाए तो भी पुण्य नही होगा क्योंकी मन सोया है…तो यह मनोमय शरीर तीसरा शरीर है..इस के अंदर चौथा शरीर है..स्कूल कॉलेज में यह सब नही बताते..चौथा शरीर है मती-मय शरीर..पाँच ज्ञानेंद्रियाँ की तन मात्राएँ और बुध्दी से यह शरीर बनता है, इस को विज्ञान मय शरीर भी बोलते है..और पाँचवाँ है आनंद मय शरीर..आँख देखती, बढ़िया लगा तो आनंद हृदय में ही आता है..नाक ने सूँघा, अच्छा लगा तो आनंद नाक में नही हृदय में ही आता है, जिव्हा से स्वाद लिया तो भी आनंद जीभ में नही हृदय में ही आता है..आनंद मय शरीर से आनंद छलकता है, यह सब का अनुभव है..तो ज्ञान से आनंद आता है..कुत्ते को भी जब ब्रेड मिठाई दिखती तो  क्या क्या बोली(आवाज़) बोलता है और पूंछ हिलाता है..और नाराज़ हुआ तो भौकता है..तो ज्ञान तो उस में भी है..राज़ी नाराजी कुत्ते को भी होती है..लेकिन राज़ी नाराजी के ज्ञान  का ज्ञान  – बहुत उँची बात है…अनुकूलता से राज़ी होना और प्रतिकूलता से नाराज़ होना ये कुत्ता भी जानता है..सुविधा से आप राज़ी होते और कठिनाई से आप नाराज़ होते तो ये तो कुत्ता भी जानता है, ख़टमल भी जानता है, मच्छर भी जानता है..तो आप अनुकूलता को सुख मानते और प्रतिकूलता को दुख मानते..ये सुख दुख आप को थपड़े मारता रहेता है..

जान नही छूटती..जॉब करो, शादी करो, बच्चे को जन्म दो..बच्चे की विष्ठा साफ करो, नाक साफ करो..पति को राज़ी करो, पत्नी को राज़ी करो..क्या क्या करना पड़ता है..कितना घुटना टेकना पड़ता है..फिर भी सब छोड़ छाड़  के मरो..बंधन ही है..मरना नही चाहते तभी भी मरो..बोलना चाहते लेकिन बुढ़ापे में बोल नही सकते..चलना चाहते लेकिन घूटनों में दर्द है..दुख दर्द नही मिटेगा..

राजा नेमी ने पंचम योगेश्वर से प्रश्न पुछा की मनुष्य के दुख दर्द रोग कैसे मिटे ? और पंचम योगेश्वर कवि ने उत्तर दिया की 1)रोग का कारण समझ लेना चाहिए. 2)रोग का स्वरूप क्या है 3)रोग की दवा क्या है 4)निरोग होने के लक्षण क्या है..

 

तो भव रोग का सवाल है.

भव रोग क्यों होता है?

कारण है- बुध्दी  में उलटा ज्ञान  घुसा है..ज्यों नित्य है, जहा सुख है, आनंद है उस का पता नही..जहा अनित्य है, दुख है, जो क्लेश देता है और छोड़ के चला जाता है उसी को “मैं” मानते है- ऐसा बुध्दी में उलटा ज्ञान  है..हाड़ माँस के शरीर को मैं मानते है, असली “मैं” का पता नही..कोई आप को ‘हाड़ माँस हाथ पैर डबल सिंगल थूक लिट ब्लड चमड़ा इधर आओ’ ऐसे पुकारे तो आप को अच्छा नही लगेगा क्यो की वास्तव में आप ये है नही.. कोई आप को ‘प्रभुजी इधर आइए’… ‘नारायण  क्या हाल है?’ ..’ठाकुरजी पधारिये’ ऐसे बोलेंगे तो बहोत  अच्छा लगेगा..क्योंकी आप का असली स्वरूप नारायण है..नारायण किस को बोलते?

नराणाम  समूहम  इति नारायणा

नर नारी के समूह में जो दिख रहा है वो पर ब्रम्‍ह परमात्मा का नाम नारायण है.. ‘नारायण ऐसी बात है’ ..’देवी ऐसी बात है’…’माताजी ऐसी बात है’..तो अच्छा लगता है..तो वास्तव में आप शरीर नही थे, और शरीर नही रहेगा तो भी रहेते..अभी भी आप शरीर नही है; शरीर आप का साधन है… जैसे हम कार में बैठते तो हम कार नही है, कमरे में बैठते तो हम कमरा नही है..कमरा अथवा कार हमारे उपयोग के लिए है;  ऐसे यह शरीर हमारे उपयोग के लिए है..

उपयोग क्या करना है?

जो शरीर से संसार में सुखी होना चाहते है तो योगेश्वर कवि कहेते की बड़े में बड़े रोग का कारण यही है की दुखालय संसार से सुखी होना चाहते है..अनित्य संसार से नित्य रहेने वाला तृप्त नही रहेगा..भगवान राम के पिता भी संसार से दुखी हो के गये तो हम संसार से क्या सुख नोच के जाएँगे?

तो भव रोग का कारण है की जहा सुख नही है वहा सुख ढूँढना यह उलटा ज्ञान ही रोग का कारण है..इस संसार में जहा भी मज़ा है अंदर सज़ा ही सज़ा है

  जैसे बच्चे चॉकलेट खाते तो चॉकलेट से कितने नुकसान होते..जानोगे तो फ्री में भी कोई दे तो बच्चो को नही दोगे..ऐसे ही शराब पीते, अपनी पत्नी है तो भी दूसरे  की पत्नी की तरफ बुरी नज़र से देखते तो यह अधर्म है..यह आगे चल के दुख देगा..लेकिन अभी अच्छा लगता इसलिए करते तो यह बुध्दी में उलटा ज्ञान भरा है..यही रोगों का कारण है..तो उलटे ज्ञान को उलटा ज्ञान समझो..और

सच्चे ज्ञान को सच्चा सच्चा समझो..

सुबह जब नींद से उठो तो पुछो की कौन उठा?

शरीर उठा? यह तो हाड़ माँस का पुतला है यह कैसे उठा? तो आत्मा उठा? आत्मा तो नित्य है, चैत्यन्य  है..5 शरीर सो जाए तभी भी आत्मा की चेतना से श्वास चलता है..तो कौन उठा ? बोले मन उठा..मन तू उठा है..अब तू जहा दुख की कल्पना करेगा वहा दुख मिलेगा और जहा सुख की कल्पना करेगा वहा सुख मिलेगा..लेकिन सचमुच में कल्पना कर के तू सदियों से मर रहा है..सुख और दुख सब कल्पना है..सुख और दुख स्वपना है..उस को जानने वाला चैत्यन्य मेरा आत्मा अपना है..ओम ओम ओम ओम ओम..

 

जैसे पानी पर सेवाल (काई) चढ़ जाती तो पानी को ढकती है..ऐसे ही हमारे चैत्यन्य स्वभाव पर नासमझी  काई की परते  चढ़ गयी है..उलटी दिशा में भाग रहे है..ओंकार की गुंजन से उस परतों को हटाने में बल आएगा..

हरी————ओ ——–म्म्म्मममममममम

 

जो हर दम है, हर समय है, हर स्थान पर है उस हरी को हम पुकारते है..ऐसे उच्चारण रोज 10 मिनट करो तो थोड़े ही दिनों में आप का उलटा ज्ञान है वो क्षीण हो जाएगा और शुध्द ज्ञान प्रगट होने लगेगा..तो रोग का कारण मिटने लगेगा..

 फिर रोग का स्वरूप क्या है?

रोग का कारण है असत वस्तु में सत बुध्दी  करना..जब की नित्य चीज़ में नित्य बुध्दी हो..जो हम नही है उस को हम ‘मैं’ मानते है यह रोग का कारण है..

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सत्संग के समय ना इधर देखे ना उधर देखे ना ध्यान करे..भगवान का ध्यान तो सर्वोपरि है लेकिन भगवान के ध्यान से भी भगवान के स्वरूप का ज्ञान देनेवाला सत्संग  भगवान के ध्यान से भी बड़ा है..

सत्संग भगवान के दर्शन से भी बड़ा है..भगवान के दर्शन तो अर्जुन को हो रहे थे लेकिन अर्जुन का दुख नही मिटा..जब अर्जुन को सत्संग समझ में आया तो दुख टीका नही..

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तो रोग का कारण है की बुध्दी में उलटा ज्ञान होना और जहा दुख है वहा से सुखी होने की कोशिश करना..जैसे पतंगियां दिये से सुखी होने की कोशिश करता है..

भव रोग का दूसरा कारण है बुध्दी  में उद्वेग होना ….. जैसे कोई आदमी पागलपन  करता है, कूद फाँद रहा है, खिड़की से टक्कर मार रहा है, बे वजह इधर से उधर दौड़ भाग कर  रहा है..तो पागलपन  है..ऐसे ही कभी नाक के द्वारा  सुख के लिए कूदते कभी जीभ के द्वारा सुख के लिए कूदते कभी फिल्म देख के कूदते तो यह हमारा चित्त पागल के नाई कूद रहा है..उद्वेग में है..अपने घर में आनंद स्वरूप आत्मा का माधुर्य है उस का पता ही नही..

 

रोग का एक कारण है बुध्दी में उलटा ज्ञान  और दूसरा कारण है उद्वेग.. तो इस का उपाय क्या है?

बोले अच्युत प्रीति…अच्युत ध्यान..अच्युत स्मृति…

अच्युत – जो अपने पद से च्युत नही होता..प्रलय महा प्रलय में भी जो मिटा नही..शरीर मरने के बाद भी जो मिटता नही..

ये सूरज दिखता है वो पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है..लेकिन आकाश गंगा में तो 4 अरब(400 करोड़ ) सूरज है, जिस को अग्निलोक बोलते पुराणों में..उन में से यह सब से छोटा सूरज है..कुछ वर्षों की कतारे बितती तो दूसरा सूरज दिखने लगता है..तो पानी उखलने और लोगों का रक्त उखलने लगता है..फिर तीसरा, चौथा, पाँचवा ऐसे 12 सूरज चमकते..सब बाष्पीभूत हो जाता है..फिर वो बाष्प  पानी होकर बरसती है…सब जल मय  हो जाता है ..फिर भगवान सृष्टि करते..ऐसी कई बार सृष्टियाँ  होती…तो ये तुम्हारे मकान महेल सदा रहेने वाले नही..बोले अब्दुल पॅलेस ..अरे अब्दुल शरीर भी नही रहेगा, पॅलेस भी नही रहेगा..

आनी जानी दुनिया पानी ..

बाकी रहेगा अल्लाह जान

मेरा नाम अब्दुल रहेमान

पाकिस्तान वाला मैं हूँ पठान – ऐसा गाने वाले भी मर गये बेचारे सब..नरगिस चली थी, देवआनंद चला था..सब चला चली का मेला…कितना भी सम्भालो कितना भी सवारो कुछ  नही रहेगा.. जो बदलने वाला अशाश्वत संसार है उस में शाश्वत सुख कैसे मिल सकता है ? बदलने वाले का सतुपयोग करो और अबदल से प्रीति करो..दोनो हाथ में लड्डू…जो बहे रहा है, मिट रहा है उस का सत उपयोग करो..दूसरो की भलाई के लिए, अपने स्वास्थ्य के लिए, समाज के हीत के लिए..और बाकी का समय अंतरात्मा में गोता मारो…तो उपाय  क्या है की अच्युत की प्रीति..जो अच्युत अपनी महिमा से कभी च्युत नही होते..जो 12 मेघ बरसे, 12 सूरज तपे फिर भी जो ज्यों का त्यों रहेता है उस अंतरात्मा की शरण जाओ…

दुनिया में कितना भी कुछ पा लो लेकिन अच्युत की शांति नही पाई, परमात्मा की प्रीति नही पाई, सच्चा सुख नही पाया तो क्या पाया? कुत्ता कुत्ती का सुख तो वो भी पा रहे..खाना देख के खुश, डंडा देख के पुछ सीधी करना और अपनी लवरी के पिछे कुत्ता भी पुछ  हिलाता है..ये बड़ी बात नही है..

जहा में उस ने बड़ी बात कर ली

जिस ने अंतर्यामी प्रभु से मुलाकात कर ली

 

तो ये सारे दुख मिटाने का और परम सुख पाने का तरीका है अच्यूत का ध्यान, अच्युत की प्रीति और अच्युत की स्मृति..

उस से क्या होगा की भव रोग मिट जाएगा…भव रोग मिटाने से क्या फ़ायदा होगा ?  बोले किसी भी प्रकार का भय नही रहेगा..भूत काल का शोक नही होगा..भविष्य काल का भय नही होगा और वर्तमान में कोई भी परिस्थिति आए वो दबाएगी नही..आप निरलेप नारायण में रहेंगे..

हम है अपने आप , हर परिस्थिति के बाप…

कोई भी परिस्थिति आप को दबोचेगी नही..इस को बोलते है जीवन मुक्ति..जीते जी मुक्ति…और शरीर मरने के बाद ? .. जिस ने यह ज्ञान  नही पाया वो मरने के बाद घोड़ा होगा, गधा होगा, साप होगा, प्रेत होगा ..ना जाने कहा कहा जाएगा..जैसे अब्राहिम  लिंकन  वाइट हाउस मे प्रेत हो के भटक रहा है..तो जिस ने सदगुरु दे दीक्षा लेकर अच्युत का ज्ञान  नही पाया और मर गया तो मरने के बाद भी जान नही छूटती ..बैल बनते, सुवर बनते, मछली बनते..(84 लाख योनियों मे घूमते रहेते)..

कभी ना छूटे पिंड दुखों से जिसे आत्मा का ज्ञान  नही..

उस अंतरात्मा का ज्ञान , परमेश्वर की स्मृति , परमेश्वर की प्रीति ही केवल उपाय है..

भव रोग मिटने का लक्षण क्या है की बीते हुए का शोक नही होगा, आने वाले का भय नही होगा..और वर्तमान में कोई चीज़ वस्तु कोई परिस्थिति आप को उलझाएगी नही..

आप असली भगवान को अंतरयामी वाशुदेव भगवान को अपना आपा मानो..तो बाहर का अहम नही आएगा…असली भगवान का आप का जो संबंध है … तो वास्तव में आप भगवान है..लेकिन चाटुकार के द्वारा आप भगवान बने तो रावण की भी दुर्गति हो गयी…हीरण्यकश्यपू की भी दुर्गति हो गयी…खुशामतखोर  के द्वारा भगवान मत बनो..ना छोटे भगवान बनो ना बड़े भगवान बनो..वास्तविक में तुम भगवान हो और सभी भगवान का रूप है..

एवरी मैन इज  द गॉड  बट प्लेयिंग द फुल

 भगवान के सिवाय किसी का अस्तित्व था नही, है नही , हो सकता नही.. भ ग वा न..जिस की सत्ता से रण पोषण होता है, मन-आगमन होता है, जिस की सत्ता से वाणी उठती है और सब कुछ ना होने के बाद भी जो साथ ही छोड़ता है वो अंतरयामी भगवान तो आप हो..उस का ज्ञान हो जाएगा..मौत का भय नही रहेगा..दुख नही रहेगा..चिंता नही रहेगी..फिर भी सब कुछ रहेगा..मन भी रहेगा..बुध्दी भी रहेगी..सब कुछ  रहेगा लेकिन उस का मुरब्बा बन जाएगा ! 🙂

जैसे केसर आम भी रहेगा, कच्चा आम भी रहेगा,तोता आम भी रहेगा..सब आमों में शक्कर मिला दी..तो फिर खट्टे आम की खटास दिखेगी नही..मुरब्बे में सब एक हो जाएँगे..मुरब्बे में चीनी कौन सी ? चीनी है वाशुदेव की प्रीति..माना अपने मन को, बुध्दी को, विचारों को, चिंतन को, व्यवहार को भगवान की मिठास से मुरब्बा बना लो!

मुरब्बे में खाली शक्कर नही पड़ती, थोड़ा नमक डाल दो..प्रसन्न चित्त का..सिर्फ़ शक्कर और नमक ही नही इलायची भी पड़ती है..इलायची है हरि की सुवास…केसर भी और सौफ़ भी पड़ती है मुरब्बे में..

आप के मन को, बुध्दी को, कर्म को, अहम को सब का मुरब्बा बना दो..जैसे मैं ने मुरब्बा बना लिया तो मौज है ना? ऐसे आप भी बना लो… आप की भी मौज हो जाएगी..अगले साल का मुरब्बा बना तो अभी है..लेकिन आम रखते तो नही रहेता..कोल्ड स्टोरेज मे भी नही रहेता..

तो मैं ने मेरे मन का, चित्त का मुरब्बा बनाया है उस में भगवान के ध्यान की चासनी डाल दी है..तुम भी ये चासनी डालना सीखो..मन बुध्दी चित्त अहंकार काम क्रोध लोभ मोह ये सब मिश्रण में भगवत ध्यान की चासनी डाल दो…भगवान मेरे मैं भगवान का – ये मिठास डालो मन बुध्दी चित्त अहंकार में ओम ओम के गुंजन की…भगवान की स्मृति में शक्कर की चासनी से अधिक मिठास है..गन्ने में मिठास पृथ्वी के द्वारा उसी की है..माँ के भाव में हृदय में  मिठास उसी की है..गुरु की निगाहों में मिठास उसी की है..जो मेरा अंतरात्मा है..

मधूमय  प्रभु आज मैं धन्य  हुआ..मेरा मन बुध्दी चित्त अहंकार सब के मिश्रण में तुम्हारी मधूमय  चासनी डाल रहा हूँ प्रभुजी..प्यारे जी..मेरे जी… अब हमें बाहर के फिल्मों की ज़रूरत नही पड़ेगी..तेरे प्रीति रस से हम स्वयं तुम्हारे प्रीति रस का, परम माधुर्य का  मुरब्बा पा रहे है मेरे प्रभुजी ..ओम प्यारेजी…आनंद देवा…ओम ओम ..संसार के रोग का कारण पता चल गया..और उपाय भी पता चल गया..की तेरे मधूमय प्रीति की चासनी से सारे रोग मिटते है ..रोग मिटने का लक्षण भी आ गया-हृदय में आनंद आया..हृदय में भय, शोक, काम, क्रोध , संताप, चिंता का प्रभाव कम हो रहा है.. प्रभुजी प्यारेजी…माझ्या  देवाय..पांडुरंगाय….ये मुरब्बा बन रहा है… 🙂 ओम ओम ओम … आनंद आ रहा है..मन भी वो ही है..बुध्दी भी वो ही है..चित्त भी वो ही है..हाड़ माँस भी वो ही है..लेकिन अच्युत की स्मृति वाली चासनी मिल गयी ऐ हई !…ओम ओम ओम ओम ओम ….हरि गोविंदा…गोपाला..माझ्या  देवा..परमात्म देवा…जो मैं बोलू वो ही बोलना ज़रूरी नही;  आप जो भी नाम से पुकारो..किसी भी मिल की शक्कर से चासनी बन जाएगी.. 🙂 आप अपने ढंग से बोलो / ना बोलो…  बस चासनी बनाओ…शक्कर से ही चासनी बनती ऐसा नही….  मिशरी से भी बन जाती…..  शहेद  से भी मुरब्बा बन जाता..जैसा भी जिस के पास हो ..शहेद  से भी मुरब्बा बनता, खराब नही होता, लंबा समय टिकता..श्वास अंदर जाए ओम बाहर आए तो गिनती ये शहेद  का मुरब्बा है..और क्या है ? 🙂 ओम ओम ओम ओम गुरु माउली ….  माझी माउली …ओम ओम … बन गयी ना चासनी ? ..बन गया ना मुरब्बा ? है क्या चिंता ? है क्या दुख ? 🙂

 

ओम शांति.

सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

ग़लतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे…

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

mumbai 3rd June 2012

 

shrimad bhaagavat ki baat hai..raja nemi bade dharmaatmaa, punyaatmaa the…9 yogeshwaron ka unhon ne pujan kiyaa aur praarthanaa kiyaa ki manushya sab dukhon se chhut jaaye, bhav rog kaise mite?

9 yogeshwaron men se paanchave yogeshwar the kavi..kavi yogeshwar ne kahaa ki uttam vaidya wo hi hai ki jo 4 baaten jaan le ..rog kaa kaaran kya hai?..phir aushadh kya hai?..aur rog kaa nimitt kyaa hai?..aur phir swaasthy ke kya lakshan hai?..ye jaanane waalaa uttam vaidya hotaa hai..

 

aise hi yah bhav rog hai; ye bukhaar ka rog nahi hai..kaam ka rog, krodh ka rog, lobh ka rog, moh ka rog, chintaa ka rog aur phir sab chhod-chhaad ke marenge, kidhar jaayenge pataa nahi is bhay ka rog aisaa mahaa rog lagaa hai..maa ke garbh men aate hai to janm ka dukh,phir daant aate to dukh,padhaayi men fail huye to dukh,pass huye lekin nokari nahi milati to dukh..nokari mili lekin badali ho gayi to dukh, pramoshan nahi mile to dukh..

CM ho athavaa PM ho to bhi aap ka dukh nahi mitataa..ye to dharati par hai lekin swarg ke raja indra jin ko 33 koti devataa namaskar karate, 12 megh jin ke aagyaa men rahete aise indra dev kaa bhi dukh nahi mitataa…kabhi daity chadhaayi karate to tenshan aur kabhi apsaraa thik se nahi naache to majaa nahi aataa..lekin bramhgyaani guru ko dekh ke indr khade ho jaate, badaa satkaar karate..kyon ki bramhagyaani ki nuraani nigaaho se, vaani se, bramhagyaani mahaapurush ko chhu kar jo havaa chalati us se logon ke paap taap mitate aur sadbhaav jaagrut hote…hruday men bhagavaan ki bhakti milati hai, bhagavaan kaa bhaav jaagrut hotaa hai..

 to nemi raajaa ne puchhaa ki bhav rog kaise mite?

to 9 yogeshwar men se paanchave yogeshwar kavi ne kahaa ki pahele rog ka kaaran samajho, rog ke lakshan samajho, rog ki aushadhi samajho aur nirog hone ke lakshan samajho..

ye aap ham sabhi ke liye maanav maatr ke liye prashn uttar hai.

bhav rog kaise mite?

jaraa saa notice aayaa dar gaye!..jaraa saa betaa ruth ke chalaa gayaa to dar gaye..jaraa pati/patni ne notice diyaa athavaa income tax ka notice aayaa to saari AC ki thandak havaa ho jaati yah bhav rog hai…

jaraa jaraa baat men bhay aataa,rog aataa, mrutyu aati hai..

hakikat men ham hai aatmaa..lekin us ko jaanate nahi..aur jahaan bhay hai us ko “main”maanate …

guru naanak ne kahaa:-

nirbhav jape sakal bhay mite l

sant krupaa te praani chhute ll

aap nirbhay swabhaav kaa gyaan paa lo…nirbhay swabhaav ki taraf pahunchane ki tarakib paa lo..to saare bhay mit jaayenge…aap chaahate hai kya bhayabhit rahe?nahi..aap chaahate hai kya ham dukhi rahe?nahi chaahate…aap chaahate hai kya ham ko narak ho jaaye..nahi..aap chaahate hai kya ki hamaare jeevan men dukh aaye chintaa aaye ham bandhan men pade rahe? nahi..kaam krodh moh lobh ye badamaash aate aur aap ki pitaayi thukaayi kar ke aap ko thus kar ke chale jaate..aap mare maraaye ho jaate..

 

vaastav men aap ke aatmaa paramaatmaa ke aanand ke aage indr ka pad bhi tuchha hai..par jaanate nahi ….

 

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satsang sunane se hamaari 72 karod 72 laakh naadiyaan shudh hoti hai aur 84 upatkaaye shudhd hoti hai..satsang men itanaa laabh hotaa hai ki apane aap ko bech ke bhi badalaa nahi chukaa sakate..satsang men aisa gyaan milataa hai jo school colllegon men nahi milataa..

 

hamaare 5 sharir hai..jo dikhataa hai us ko ann may sharir bolate..is ke andar dusaraa sharir hai us ko bolate praan may sharir..praan nikal jaate to yah sharir murda ban jata hai..praan may sharir ke gaheraayi men hotaa hai man-may sharir..man so jaataa hai to praan chalate phir bhi murde jaisaa…munh men laddu daale to bhi swaad nahi aayegaa..aankh ki palake khuli hogi to bhi kuchh dikhegaa nahi kyo ki man soyaa hai.. saap aa ke paas men so gayaa to bhi pataa nahi chalegaa.. aur baapu aaye, ghar men khade ho jaaye to bhi punya nahi hoga kyo ki man soya hai…to yah manomay sharir tisaraa sharir hai..is ke andar chauthaa sharir hai..school college men yah sab nahi bataate..chauthaa sharir hai mati-may sharir..paanch gyaanendriyaa ki tan maatraayen aur budhdi se yah sharir banataa hai, is ko vigyaan may sharir bhi bolate hai..aur paanchavaan hai aanand may sharir..aankh dekhati, badhiyaa lagaa to aanand hruday men hi aataa hai..naak ne sunghaa, achhaa lagaa to aanand naak men nahi hruday men hi aataa hai, jivha se swaad liya to bhi aanand jibh men nahi hruday men hi aataa hai..aanand may sharir se aanand chhalakataa hai, yah sab ka anubhav hai..to gyaan se aanand aataa hai..kutte ko bhi jab bread mithaayi dikhati t kya kya boli(aawaaj) bolataa hai aur punchh hilaataa hai..aur naaraaj huaa to bhaukataa hai..to gyaan to us men bhi hai..raaji naaraaji kutte ko bhi hoti hai..lekin raaji naaraaji ke gyaan kaa gyaan – bahut unchi baat hai…anukulataa se raaji hona aur pratikulataa se naaraaj honaa ye kuttaa bhi jaanataa hai..suvidhaa se aap raaji hote aur kathinaayi se aap naaraaj hote to ye to kuttaa bhi jaanataa hai, khatamal bhi jaanataa hai, machchhar bhi jaanataa hai..to aap anukulataa ko sukh maanate aur pratikulataa ko dukh maanate..ye sukh dukh aap ko thapade maarataa rahetaa hai..

jaan nahi chhutati..job karo, shaadi karo, bachhe ko janm do..bachhe ki vishtaa saph karo, naak saaph karo..pati ko raaji karo, patni ko raaji karo..kya kya karanaa padataa hai..kitanaa ghutanaa tekanaa padataa hai..phir bhi sab chhod chhad ke maro..bandhan hi hai..maranaa nahi chaahate tabhi bhi maro..bolanaa chaahate lekin budhaape men bol nahi sakate..chalanaa chaahate lekin gutanon men dard hai..dukh dard nahi mitegaa..

raja nemi ne pancham yogeshwar se prashn puchhaa ki manushy ke dukh dard rog kaise mite? aur pancham yogeshwar kavi ne uttar diyaa ki 1)rog kaa kaaran samajh lenaa chaahiye. 2)rog ka swarup kya hai 3)rog ki dawaa kyaa hai 4)nirog hone ke lakshan kya hai..

 to bhav rog ka sawaal hai.

bhav rog kyon hotaa hai?

kaaran hai- budhdi men ulataa gyaan ghusaa hai..jyon nitya hai, jahaa sukh hai, aanand hai us kaa pataa nahi..jahaa anity hai, dukh hai, jo klesh detaa hai aur chhod ke chalaa jaataa hai usi ko “main” maanate hai- aisaa budhdi men ulataa gyaan hai..haad maans ke sharir ko main maanate hai, asali “main” kaa pataa nahi..koyi aap ko ‘haad maans haath pair double single thuk lit blood chamdaa idhar aao’ aise pukaare to aap ko achhaa nahi lagegaa kyo ki vaastav men aap ye hai nahi.. koyi aap ko ‘prabhuji idhar aayiye’… ‘naarayaan kya haal hai?’ ..’thaakurji padhaariye’ aise bolenge to bahot achhaa lagegaa..kyo ki aap ka asali swarup naaraayan hai..naaraayan kis ko bolate?

naraanaam samuham iti naaraayanam

nar naari ke samuh men jo dikh rahaa hai vo par bramh paramaatmaa kaa naam naaraayan hai.. ‘naaraayan aisi baat hai’ ..’devi aisi baat hai’…’maataaji aisi baat hai’..to achhaa lagataa hai..to vaastav men aap sharir nahi the, aur sharir nahi rahegaa to bhi rahete..abhi bhi aap sharir nahi hai; sharir aap kaa saadhan hai… jaise ham car men baithate to ham car nahi hai, kamare men baithate to ham kamaraa nahi hai..kamaraa athavaa car hamaare upyog ke liye hai;  aise yah sharir hamaare upyog ke liye hai..

upyog kyaa karanaa hai?

jo sharir se sansaar men sukhi honaa chaahate hai to yogeshwar kavi kahete ki bade men bade rog kaa kaaran yahi hai ki dukhaalay sansaar se sukhi honaa chaahate hai..anity sansaar se nitya rahene waalaa trupt nahi rahegaa..bhagavaan ram ke pitaa bhi sansaar se dukhi ho ke gaye to ham sansaar se kya sukh noch ke jaayenge?

to bhav rog ka kaaran hai ki jahaa sukh nahi hai wahaa sukh dhundhanaa ya ulataa gyaan hi rog kaa kaaran hai..is sansaar men jahaa bhi majaa hai andar sajaa hi sajaa hai..jaise bachhe chocolate khaate to chocolate se kitane nuksaan hote..jaanoge to free men bhi koyi de to bachcho ko nahi doge..aise hi sharaab pite, apani patni hai to bhi dusari ki patni ki taraf buri najar se dekhate to yah adharm hai..yah aage chal ke dukh degaa..lekin abhi achha lagataa isliye karate to yah budhdi men ulataa gyaan bharaa hai..yahi rogon kaa kaaran hai..to ulate gyaan ko ulataa gyaan samajho..aur

sachche gyaan ko sachchaa gyaan samajho..

subah jab nind se utho to puchho ki kaun uthaa?

sharir uthaa? yah to haad maans ka putalaa hai yah kaise uthaa? to aatmaa uthaa? aatmaa to nitya hai, chaityanya hai..5 sharir so jaaye tabhi bhi aatmaa ki chetanaa se shwaas chalataa hai..to kaun uthaa? bole man uthaa..man tu uthaa hai..ab tu jahaa dukh ki kalpanaa karegaa wahaa dukh milegaa aur jahaa sukh ki kalpanaa karegaa wahaa sukh milegaa..lekin sachamuch men kalpanaa kar ke tu sadiyon se mar rahaa hai..sukh aur dukh sab kalpanaa hai..sukh aur dukh swapanaa hai..us ko jaanane waalaa chaityanya meraa aatmaa apanaa hai..om om om om om..

 

jaise paani par sewaal (kaayi) chadh jaati to paani ko dhakati hai..aise hi hamaare chaityany swabhaav par naasamajhi ki kaayi ki part chadh gayi hai..ulati dishaa men bhaag rahe hai..omkaar ki gunjan se us part ko hataane men bal aayegaa..

hariiiiii oooooooooooommmmmmmmmmm

 

jo har dam hai, har samay hai, har sthaan par hai us hari ko ham pukaarate hai..aise uchchaaran roj 10 minat karo to thode hi dinon men aap kaa ulataa gyaan hai vo kshin ho jaayegaa aur shudhd gyaan pragat hone lagegaa..to rog kaa kaaran mitane lagegaa..

 

phir rog kaa swarup kyaa hai?

rog kaa kaaran hai asat vastu men sat budhdi karanaa..nitya chij men nitya budhdi ho..jo ham nahi hai us ko ham ‘main’ maanate hai yah rog kaa kaaran hai..

****

satsang ke samay naa idhar dekhe naa udhar dekhe naa dhyaan kare..bhagavaan ka dhyaan to sarvopari hai lekin bhagavaan kaa dhyaan se bhi bhagavaan ke swarup kaa gyaan denewaalaa satsang  bhagavaan ke dhyaan se bhi badaa hai..

satsang bhagavaan ke darshan se bhi badaa hai..bhagavaan ke darshan to arjun ko ho rahe the lekin arjun ka dukh nahi mitaa..jab arjun ko satsang samajh men aayaa to dukh tikaa nahi..

******

to rog ka kaaran hai ki budhdi men ulataa gyaan hona aur jahaa dukh hai wahaa se sukhi hone ki koshish karanaa..jaise patangiyaa diye se sukhi hone ki koshish karataa hai..

budhdi men udweg hai.. jaise koyi aadami paagal pan karataa hai kud phaand rahaa hai, khidaki se takkar maar rahaa hai, idhar se udhar daud bhaag kar  raha hai..to paagal pan hai..aise hi kabhi naak ke dwara  sukh ke liye kudate kabhi jibh ke dwara sukh ke liye kudate kabhi film dekh ke kudate to yah hamaaraa chitt paagal ke naayi kud rahaa hai..udweg men hai..apane ghar men aanand swarup aatmaa kaa maadhury hai us ka pataa hi nahi..

 

rog kaa ek kaaran hai budhdi men ulataa gyaan aur dusaraa kaaran hai udweg.. to is kaa upaay kyaa hai?

bole achyut priti…achyut dhyaan..achyut smriti…

achyut – jo apane pad se chyut nahi hotaa..pralay mahaa pralay men bhi jo mitaa nahi..sharir marane ke baad bhi jo mitataa nahi..

ye suraj dikhataa hai vo pruthvi se 13 laakh gunaa badaa hai..lekin aakaash gangaa men to 4 arab(400 crore) suraj hai, jis ko agni lok bolate puraanon men..un men se yah sab se chhotaa suraj hai..kuchh varshon ki kataare bitati to dusaraa suraj dikhane lagataa hai..to paani ukhalane aur logon kaa rakt ukhalane lagataa hai..phir tisaraa, chauthaa, paanchavaa aise 12 suraj chamakate..sab baashpibhut ho jaataa hai..phir vo baashp paani hokar barasati hai…sab jal may ho jaataa hai ..phir bhagavaan srushti karate..aisi kayo baar srushiyaa hoti…to ye tumhaare makaan mahel sadaa rahene waale nahi..bole abdul palace ..are abdul sharir bhi nahi rahegaa, palace bhi nahi rahegaa..aani jaani duniyaa paani ..baaki rahegaa alaah jaan mera naam abdul rahemaan pakisthaan wala main hun pathaan gaane waale mar gaye bechaare sab..nargis chali thi, devaanand chalaa thaa..sab chalaa chali ka melaa…kitanaa bhi sambhaalo kitanaa bhi sawaaro kuchh nahi rahegaa.. jo badalane waalaa ashaashwat sansaar hai us men shaashwat sukh kaise mil sakataa hai?badalane waale ka satupyog karo aur abadal se priti karo..dono haath men laddu…jo bahe rahaa hai, mit rahaa hai us ka sat upyog karo..dusaro ki bhalayi ke liye, apane swaasthy ke liye, samaaj ke heet ke liye..aur baaki kaa samay antaraatmaa men gotaa maaro…to upaay  kyaa hai ki achyut ki priti..jo achyut apani mahimaase kabhi chyut nahi hote..jo 12 megh barase, 12 suraj tape phir bhi jo jyon kaa tyon rahetaa hai us antaraatmaa ki sharan jaao…

duniyaa men kitana abhi kuchh paa lo lekin achyut ki shaanti nahi paayi, paramaatmaa ki priti nahi paayi, sachchaa sukh nahi paayaa to kyaa paayaa? kuttaa kutti ka sukh to vo bhi paa rahe..khana dekh ke khush, dandaa dekh ke puchh sidhi karanaa aur apani lovery ke pichhe kuttaa bhi puchh hilaataa hai..ye badi baat nahi hai..

jahaa men us ne badi baat kar li

jis ne antaryaami prabhu se mulaakaat kar li

 

to ye saare dukh mitaane kaa aur param sukh paane kaa tarikaa hai achyu ka dhyan, achyut ki priti aur achyut ki smruti..us se kyaa hogaa ki bhav rog mit jaayegaa…bhav rog mitane se kyaa phaaydaa hogaa? bole kisi bhi prakaar kaa bhay nahi rahegaa..bhut kaal kaa shok nahi hogaa..bhavishy kaal kaa bhay nahi hogaa aur vartamaan men koyi bhi paristhiti aaye vo dabaayegi nahi..aap nirlep naaraayan men rahenge..ham hai apane aap , har paristhiti ke baap…koyi bhi paristhiti aap ko dabochegi nahi..is ko bolate hai jeevan mukti..jite jee mukti…aur sharir marane ke baad jis ne yah gyaan nahi paayaa vo marane ke baad ghoda hogaa, gadhaa hogaa, saap hogaa, pret hogaa ..naa jaane kahaa kahaa jaayegaa..jaise abrahim linkon white house me pret ho ke bhatak rahaa hai..to jis ne sadguru de dikshaa lekar achyut kaa gyaan nahi paayaa aur mar gayaa to marane ke baad bhi jaan nahi chhutati..bail banate, suwar banate, machhali banate..(84 laakh yoniyon me ghumate rahete)..

kabhi naa chhute pind dukhon se jise aatmaa kaa gyaan nahi..

us antaraatmaa kaa gyaan, parameshwar ki smruti , parameshwar ki priti hi kewal upaay hai..

bhav rog mitane kaa lakshan kyaa hai ki bite huye shok nahi hogaa, aane waale kaa bhay nahi hogaa..aur vartmaan men koyi chij vastu koyi paristhiti aap ko ulajhaayegi nahi..

aap asali bhagavaan ko antarayaami vaashudev bhagavaan ko apanaa aapaa maano..to baahar kaa aham nahi aayegaa…asali bhagavaan kaa aap kaa jo sambandh hai to vaastav men aap bhagavaan hai..lekin chaatukaar ke dwaaraa aap bhagavaan bane to raawan ki bhi durgati ho gayi…hiranyakashyapu ki bhi durgati ho gayi…khushaamatkhor ke dwara bhagavaan mat bano..naa chhote bhagavaan bano naa bade bhagavaan bano..vaastavik men tum bhagavaan ho aur sabhi bhagavaan kaa rup hai..

everyman is the god but playing the fool

 bhagavaan ke siwaay kisi kaa asthitv thaa nahi, hai nahi , ho sakataa nahi.. bh ga vaa na..jis ki sattaa se bharan poshan hotaa hai, gaman aagaman hotaa hai, jis ki sattaa se waani uthati hai aur sab kuchh naa hone ke baad bhi jo saath nahi chhodataa hai vo antarayaami bhagavaan to aap ho..us kaa gyaan ho jaayegaa..maut kaa bhay nahi rahegaa..dukh nahi rahegaa..chintaa nahi rahegaa..phir bhi sab kuchh rahegaa..man bhi rahegaa..budhdi bhi rahegi..sab kuchh rahegaa lekin us ka murabbaa ban jaayegaa ! 🙂

jaise kesar aam bhi rahegaa, kachchaa aam bhi rahegaa,totaa aam bhi rahegaa..sab aamo men shakkar milaa di..to phir khatte aam ki khataas dikhegi nahi..murabbe men sab ek ho jaayenge..murabbe men chini kaun si ? chini hai vaashudev ki priti..maanaa apane mano ko, budhdi ko, vichaaron ko, chintan ko, vyavahaar ko bhagavaan ki mithaas se murabaa banaa lo!

murabbe men khaali shakkar nahi padati, thoda namak daal do..prasann chitt ka..sirf shakkar aur namak hi nahi ilaayachi bhi padati hai..ilaayachi hai hari ki suwaas…kesar bhi aur sauf bhi padati hai murabbe men..

aap ke man ko, budhdi ko, karm ko, aham ko sab ka murabbaa banaa do..jaise maine murabbaa banaa liyaa to mauj hai na? aise aap bhi banaa lo… aap ki bhi mauj ho jaayegi..agale saal kaa murabbaa banaa to abhi hai..lekin aam rakhate to nahi rahetaa..cold storage me bhi nahi rahetaa..

to maine mere man ka, chitt ka murabbaa banaayaa hai us men bhagavaan ke dhyaan ki chaasani daal di hai..tum bhi ye chaasani dalanaa sikho..man budhdi chitt ahanakaar kaam krodh lobh moh ye sab mishran men bhagavat dhyaan ki chaasani daal do…bhagavaan mere main bhagavaan ka ye mithaas daalo man budhdi chitt ahankaar men om om ke gunjan ki…bhagavaan ki smruti men shakkar ki chaasani se adhik mithaas hai..ganne men mithaas pruthvi ke dwara usi ki hai..maa ke bhaav men hurday me mithaas usi ki hai..guru ki nigaahon men mithaas usi ki hai..jo meraa antaraatmaa hai..

madhumay prabhu aaj main dhany huaa..mera man budhdi chitt ahanakaar sab ke mishran men tumhaari madhumay chaasani daal rahaa hun prabhuji..pyaare ji..mere ji… ab hamen baahar ke filmon ki jarurat nahi padegi..tere priti ras se ham swayam tumhaare priti ras kaa, param maadhury kaa  murabbaa paa rahe hai mere prabhuji ..om pyaareji…aanand evaa…om om ..sansaar ke rog kaa kaaran pataa chal gayaa..aur upaay bhi pataa chal gayaa..ki tere madhumay priti ki chaasani se saare rog mitate hai ..rog mitane kaa lakshan bhi aa gayaa-hruday men aanand aayaa..hruday men bhay, shok, kaam, krodh , santaap, chintaa kaa prabhaav cum ho rahaa hai.. prabhuji pyaareji…majhya devaay..pandurangaay….ye murabbaa ban rahaa hai… 🙂 om om om … aanand aa rahaa hai..man bhi vo hi hai..budhdi bhi wo hi hai..chitt bhi wo hi hai..haad maans bhi wo hi hai..lekin achyut ki smruti waali chaasani mil gayi aii hai…om om om om om ….hari govindaa…gopaalaa..maajhya devaa..paramaatm devaa…jo main bolu wo hi jaruri nahi aap jo bhi naam se pukaro..kisi bhi mil ki shakkar se chaasani ban jaayegi.. 🙂 aap apane dhang se bolo na abolo bas chaasani banaao…shakkar se hi chaasani banati aisaa nahi mishri se bhi ban jaati. shahed se bhi murabbaa ban jaataa..jaisaa bhi jis ke paas..shahed se bhi murabbaa banataa, kharaab nahi hotaa, lambaa samay tikataa..shwaas andar jaaye om baahar aaye to ginati ye shahed ka murabbaa hai..aur kya hai ? 🙂 om om om om guru maauli maajhi maauli…om om ban gayi naa chaasani ..ban gayaa naa murabbaa? hai kya chinta? hai kya dukh? 🙂

 

 

om shaanti.

Sadgurudev ji Bhagavaan ki Mahaa Jayjayakaar ho !!!!!

galatiyon ke liye prabhuji kshamaa kare…

 

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One Comment on “गुरुज्ञान का मुरब्बा !!”


  1. Hari Om !

    Guru dev ka murabaa hamare janam-janam ke payas ko bujhati hai, latest satsang ki aati sewa ke liye dhanayawaad prabhu ji!

    Hari Hari Om!!!


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