शादीवालों के मंगल ग्रह शांती का मंत्र और उपाय

19 एप्रिल 2012सुबह ; गोरखपुरसत्संग अमृत

 

मधुरम मधूरे भ्योपी

मंगले भ्योपी मंगलम

पावनम पावने भ्योपी

हरि नामेव केवलं ll


 

ह——रि———ओम्म्ममममम—- हरि  ओम…

 

जो हर दिल में है, हर देश में है, हर काल में है, हर परिस्थिति में है वह परब्रम्‍ह परमात्मा हरि नाम से पुकारे जाते है..हरि नित्य है, शाश्वत  है और जगत उस की सत्ता से चलता है..जगत बदल बदल के , दुख दे देके नष्ट हो जाता है लेकिन हरि ज्यों के त्यों रहेते..संसार उसे कहेते जो सरकता जाए, प्रति पल बदलता जाए..कितना भी संभाल के रखो ना टीके- उस का नाम है संसार..और कितने भी भूले भुलाए रहो, छुड़े  छुड़ाए रहो फिर भी ना छूटे उस का नाम है परमात्मा!..जो तुम्हारा साथ नही छोड़ता, जिस का तुम साथ नही छोड़ सकते उस का नाम हरि है-परमात्मा है..

 

(पूज्यश्री बापूजी ने भक्त प्रल्हाद की कथा सुनाई ,प्लीज पढ़िये : https://latestsatsang.wordpress.com/2010/02/23/holi-utsav-kyo-manaate/ )

भगवान सब में है,किसी एक आकृति में नही..

अग्नि रूप में, जल रूप में, वायु रूप में सभी की गहेराई में जो नारायण है वो भक्त प्रल्हाद की रक्षा के लिए स्तंभ से नरसिंह अवतार में प्रगट हुए…

“प्रल्हाद तुम ने मुझ पर दृढ़ विश्वास रखा..मुझे आने में देर हुई..इस दुष्ट हीरण्यकश्यपू ने तपस्या कर के आधिदैविक शक्तियाँ पाई लेकिन अध्यात्म शांति, अध्यात्म ज्ञान – जो हर दिल में है, हर जगह जो है, हर अंतकरण के मूल में जो है उस आत्म हरि  का अनादर किया..”

हीरण्यकषयपू का नाश हुआ..

मूल  तो वो भगवान के  पार्षद(जय-विजय) थे, अभिमान के कारण उस को श्राप मिला था 3 बार दैत्य बनने का..तीनो बार हरि ने उन को स्वधाम पहुँचाया- नरसिंह अवतार लेकर हीरण्याक्ष-हीरण्यकश्यपू को, श्री राम बन कर रावण-कुंभकर्ण को, श्री कृष्ण बन कर शिशुपाल और दन्तवक्र को..ये हरि की कैसी अनोखी लीला है..

 

हृदय में हरि है…  आप अपनी वासना से, अपनी नासमझी से हृदय को गंदा मत करो..हृदय हरि का घर है..हे वाशुदेव जो तेरी मर्ज़ी..पति आप को माने तो अच्छा है, नही माने तो तेरी मर्ज़ी महाराज..बेटा आप को माने तो अच्छा है, नही माने तो तेरी मर्ज़ी महाराज..हम तो तुम्हारे है महाराज..आप ही मनवाओ , ना मनवाओ..मैं अपने सीर पर बोज़ा क्यू उठाऊँ ?..

पुज्यश्री बापुजी ने कथा सुनाई  :  सारा बोजा भगवान ने उठा रखा है

बोली बेटी की शादी नही होती…उस को मंगल का ग्रह है..

अरे चिंता फेंक कुवे में… मंगल का ग्रह हो चाहे कुछ हो..

उपाय : तेल और सिंदूर का चोला हनुमान जी को 7 मंगलवार को चढ़ा दो..और एक मंत्र है

अं राम अं  .. अं राम अं  

..इस मंत्र की 21 -21 माला करे..तो मंगल ग्रह शांत हो जाएगा…मंगली छोरा हो या  मंगली छोरी  हो.. उस की चिंता मत करो…..भगवान मेरे है.. मैं तो भगवान की हूँ … बच्चे भी भगवान के है..वाशुदेव सर्वं इति …

प्रल्हाद  ने ये पक्का कर दिया तो उसको प्रेमा भक्ति , सामर्थ्य भक्ति, तात्विक भक्ति सभी के सभी भगवान ने दे डाली..

भक्ति से भी भगवान का सामर्थ्य आता है, योग से भी भगवान का सामर्थ्य आता है..भगवत शांती में शांत होने से भी भगवान का रस और सामर्थ्य आता है..और उसी की ओर ध्यान नही देते, कूर-कपट से सुखी होना चाहते..धोखेधड़ी से सुखी होना चाहते..जिस किसी की खुशामत कर के सुखी होना चाहते…सुख तो ज़रा सा मिला ना मिला दुख ही ज्यादा मिलता है..

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

( पुज्यश्री बापुजी ने बुध्दी योग करानेवाली कृष्ण यशोदा युक्ति का रसपान कराया ..)

श्रीकृष्ण ने यशोदा को कृपा कर के हरि-रस प्राप्ति की युक्ति बता दी..हरि माना जो हर दिल में है और ओंकार जिस का स्वाभाविक नाम है..कृष्ण ने यशोदा के कान में कहा उम्म्म्म (ओम कंठ में)..यशोदा भी बोलती है…उम्म्म्म (कंठ में प्रीति से ओम )..इस से अंतरात्मा हरि  प्रसन्न होते है..यशोदा आनंदित हुई..वो यशोदा तुम्हारे पास है-भगवान को यश देनेवाली बुध्दी  का नाम यशोदा है..और बुध्दी  का जो साक्षी अंतर्यामी है वो कृष्ण है..इस रस का सभी पान करो…भगवान ऐसे रसवान साधको को बुध्दी  योग देते है..

भज़ामी प्रीतिपूर्वकम

ददामी बुध्दीयोगम तम

येन  माम उपयान्तीते…

भगवान का वचन है की मुझे जो प्रीतीपूर्वक भजता है उसे मैं बुध्दीयोग देता हूँ.. बुध्दी तो मच्छर में भी है पेट भरने की.. बुध्दी तो बुध्दीमानो के पास भी है द्रव्य पाने की..लेकिन बुध्दी से भगवान नही मिलते…प्रीति करो तो बुध्दी में भगवान की कृपा का योग आता है.. “बुध्दी -योग” बनता है तब काम होता है…ये बुध्दीयोग की उपासना है..

संत रहिदास जी बोलते की अंतरात्मा प्रभु के रस में जाना सहज समाधि है…और देव तो मनुष्यों के बनाए हुए है लेकिन आत्मदेव तुम तो स्वतः सिध्द  हो प्रभु…सभी से मधुर व्यवहार करना ही इस ठाकुर जी की सेवा हो जाती है..सभी के हृदय में बैठे परमात्मा का सन्मान  करता हूँ तो मानो उस देवता का स्नान हो गया.. हृदय का स्नेह ही उस अंतरात्मा का चंदन है…  ‘हे हरी, हे प्रभु, हे गोविंद’…ऐसे नम्रता और प्रेम से बोले ये मीठे वचन ही फूल है..आठों प्रहर भगवान की मधूमय  स्मृति…रात को सोते समय, सुबह उठते ही, काम के पहेले-काम के बाद में प्रभु का सुमिरन..ॐ  प्रभुजी… ॐ प्यारेजी ..ऐसे करते करते यशोदा के कान में कृष्ण ने मार दी फूँक..यशोदा का ‘मैं यशोदा हूँ’यह देह अभिमान गायब हो गया..ऐसा प्यार उमड़ा की ..ओह्हो…:)

 ..कृष्ण को हृदय से लगाया..देवकी ने कृष्ण को पेट में रखा..लेकिन यशोदा ने कृष्ण को हृदय में ही रख लिया..आप भी भगवान को यश देकर अपनी बुध्दी  को यशोदा बना दो…

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 

भगवान ने देखा की गरुड़ को ज़रा अभिमान हो गया है..अभिमान से मेरा रस नही पा सकता है..गरुड़ को कहा की जाओ हनुमान जी को बुला के लाओ..सत्यभामा का भी अभिमान तोड़ना था..बोले, “हनुमान तो ऐसे तुम को प्रणाम नही करेंगे सत्यभामा…मेरे संकेत से हनुमान जी मान लेंगे की कृष्ण और राम एक ही है..लेकिन तुम क्या करोगी?”

..तो सत्यभामा बोली, “मैं सीता बन जाऊंगी” ..सत्यभामा को भी थोड़ा गर्व था..

“जाओ गरुड़..हनुमान जी को बुला लाओ..”

गरुड़ गर्व से गया..”हनुमान जी चलो..प्रभु बुला रहे..”

हनुमान जी बोले, “आप चलो , मैं पहुँच जाऊंगा.. “

“अरे तुम कैसे पहुँचोगे कूदते फांदते बंदर जैसे?बैठो मेरे पँखो पर मैं पहुँचा देता हूँ.. “

“नही आप चलो मैं आप के पहेले पहुँच जाऊंगा..”

“अरे पहेले कैसे आओगे..गरुड़ से तेज  कोई नही होता..आप मुझे नही पहेचानते?”

हनुमान जी समझ गये की प्रभु जी ने गरुड़ का अभिमान मिटाने के लिए इधर भेजा है..

बोले, “मैं आप को पहेचानता हूँ..आप गरुड़ हो…पक्षीराज हो..”

गरुड़  पंख फैलाते बोला, “हाँ मैं पक्षी राज हूँ..”

हनुमानजी ने उस के पंख पकड़ के दूर समंदर में फेंक दिया..

सुदर्शन को भी अभिमान हो गया था की मैं द्वारिका का पहेरा करता हूँ..

हनुमान जी तो वायुवेग से आ गये..ज्यूँ ही द्वारिका में जाते तो सुदर्शन भुं भुं  भुं कर के उन को आने नही देवे..

हनुमान जी कहेते, “अरे भाई जाने दो ..प्रभुजी ने मुझे बुलाया है..”

सुदर्शन बोले, “नही.. मेरे इजाज़त के बिना नही जा  सकते..”

“ठाकुर जी ने बुलाया है..”

“नही जाने दूँगा..मैं तो जिस किसी का सीर काट सकता हूँ..तुम मेरा महत्व नही जानते हो..”

हनुमान जी बोले ..”अच्छा ? जय श्री राम!!” हनुमान जी ने मुँह मोटा कर दिया और सुदर्शन को मुँह में डाल लिया..

गये ठाकुरजी के पास..भगवान को किया प्रणाम…लेकिन जो सीता जी बनी थी उस की तरफ देखे ही नही..

ठाकुर जी को तो इन का अभिमान तोड़ना था..

बोले, “हनुमान आज तुम चुप चुप क्यूँ हो? कुछ बोलते नही हो?..”

हनुमान जी ने मुँह खोला, सुदर्शन को बाहर निकाला और रखा..बोले, “ये आने नही देते थे..इन को मुँह में डाला था इसलिए चुप था..और ये बाजू में सीता जी नही है..ये कौन सी दासी को ला कर रखा है ठाकुर जी?..इसलिए मैं उधर नही देखता हूँ..”

सत्यभामा का गर्व चूर हो गया..सुदर्शन का भी गर्व चूर हो गया..इतने में गरुड़ समुद्र से कैसे भी पंख सूखा के पहुँचा..भगवान बोले, “तुम को तो हनुमान जी को बुलाने भेजा था..”

गरुड़ बोला, “प्रभु उन की चाल धीमी थी..अभी आता होगा..” देखा की हनुमान जी वहाँ  ही खड़े थे..तो अब गरुड़ शरम के मारे क्या बोले?..

भगवान देखते की किसी प्रकार का गर्व ना रखो..

मत कर रे गर्व गुमान गुलाबी रंग उड़ी जावे गो..

उड़ी जावे गो, फीको पड़ी जावे गो, माटी में मली जावे गो..

काई रे लायो भाया , काई लई जावे गो..

धन जोबन थारा ज़ोर जवानी अठे मिली जावे गो..

..मेरे बाल कितने अच्छे-लेकिन एक दिन जल जाएँगे आंटी…मेरी नाक कितनी बढ़िया- लेकिन उस में लिट पड़ा है आंटे..मेरा बबलू कितना सुंदर-लेकिन वो परमात्मा की  सुंदरता से सुंदर लगता है उस को याद कर..नही तो वोही बबलू तुम को ठूंगा दिखाएगा..ईश्वर कैसे है ये याद करो..जो भी हो उस में ईश्वर की कृपा का समीक्षा करो…

 

ओम शांति.

 

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करें ….. 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

19 April 2012; Gorakhpur Satsang Amrut

madhuram madhure bhyopi

mangale bhyopi mangalam

paawanam paawane bhyopi

hari naamaiv  kewalam

 

hariiiiiii ooooooommmmmmmm hari om…

 

jo har dil men hai, har desh men hai, har kaal men hai, har paristhiti men hai vah parabramh paramaatmaa hari naam se pukaare jaate hai..hari nitya hai, shaashwar hai aur jagat us ki sattaa se chalataa hai..jagat badal badal  ke,dukh deke deke nasht ho jaataa hai lekin hari jyon ke tyon rahete..sansaar use kahete jo sarakataa jaaye, prati pal badalataa jaaye..kitanaa bhi sambhaal ke rakho naa tike us kaa naam hai sansaar..aur kitane bhi bhule bhulaaye raho, chude chhudaaye raho phir bhi naa chhute us kaa naam hai paramaatmaa!..jo tumhaaraa saath nahi chhodataa jis kaa tum saath nahi chhod sakate us kaa naam hari hai-paramaatmaa hai..

 

(pujyashri baapuji ne prahlaad ki kathaa sunaayi , please visit : https://latestsatsang.wordpress.com/2010/02/23/holi-utsav-kyo-manaate/  )

bhagavaan sab men hai,kisi ek aakruti men nahi..

 agni rup men, jal rup men, vaayu rup men sabhi ki gaheraayi men jo naaraayan hai vo bhakt pralhaad ki rakshaa ke liye stambh se narasinh awataar men pragat huye…

“pralhaad tum ne mujh par drudh vishwaas rakhaa..mujhe aane men der huyi..is dusht hiranyakashyapu ne tapasayaa kar ke aadhidaivik shaktiyaan paayi lekin adhyaat shaanti, aadhyatm gyaan- jo har dil men hai, har jagah jo hai, har antakaran ke mul men jo hai us aatm hari kaa anaadar kiyaa..” hiranyakshyapu kaa naash huaa..

mul  to vo bhagavaan kaa paarshad(jay-vijay) tha, abhimaan ke kaaran us ko shraap milaa thaa 3 baar daity banane kaa..tino baar hari ne un ko swadhaam pahunchaayaa- narasinh awataar lekar hiranyaaksh-hiranyakashyapu ko, Shri ram ban kar raawan-kumbhkarn ko, shri krushn ban kar shishupaal aur dantvakr ko..ye hari ki kaisi anokhi leelaa hai..

 

hruday men hari hai, aap apani waasanaa se, apani naasamajhi se hruday ko gandaa mat karo..hruday hari kaa ghar hai..hey vashudev jo teri marji..pati aap ko maane to achhaa hai, nahi maane to teri marji mahaaraaj..betaa aap ko maane to achhaa hai, nahi maane to teri marji mahaaraaj..ham to tumhaare hai mahaaraaj..aap hi manavaao , naa manavaao..main apane seer par bojaa kyu uthaau?..Pujyashri baapuji ne kathaa sunaayi : sara boja bhagavaan ne uthaa rakhaa hai..   

boli beti ki shaadi nahi hoti…us ko mangal kaa grah hai..

are chintaa phenk kuwe men… mangal kaa grah ho chaahe kuchh ho..

upaay : tel aur sindur kaa cholaa hanumaan ji ko 7 mangalwaar ko chadhaa do..aur ek mantr hai :

am raam am ..am raam am.. अं राम अं  .. अं राम अं  

21 -21 maalaa kare..to mangal grah shaant ho jaayegaa…mangali chhoraa ho, mangali chhori ho.. us ki chintaa mat karo…main to bhagavaan ki hun..bhagavaan mere hai..bachche bhi bhagavaan ke hai..vaashudev sarvam iti …

pralhaad ne ye pakkaa kar diyaa to usko premaa bhakti , saamarthy bhakti, taatvik bhakti sabhi ke sabhi bhagavaan ne de daali..

bhakti se bhi bhgavaan kaa saamarthy aataa hai, yog se bhi bhagavaan kaa samarthy aataa hai..bhagavat shaanti men shaant hone se bhi bhagavaan kaa ras aur saamarthy aataa hai..aur usi ki aor dhyaan nahi dete, kur-kapat se sukhi honaa chaahate..dhokhedhadi se sukhi honaa chaahate..jis kisi ki khushaamat kar ke sukhi honaa chaahate…sukh to jaraa saa milaa naa milaa dukh hi milataa hai..

 

krushn yashodaa yukti kaa rasapaan dhyaan karaayaa..

shrikrushn ne yashodaa ko krupaa kar ke hari-ras praapti ki yukti bataa di..hari maanaa jo har dil men hai aur omkaar jis kaa swaabhaavik naam hai..krushn ne yashodaa ke kaan men kahaa ummmm (om kanth men)..yashodaa bhi bolati hai…ummmm (kanth men priti se om )..is se antaraatmaa hari prasann hote hai..yashodaa aanandit huyi..vo yashodaa tumhaare paas hai-bhagavaan ko yash denewaali budhdi kaa naam yashodaa hai..aur budhdi kaa jo saakshi antaryaami hai vo krushn hai..is ras kaa sabhi paan karo…bhagavaan aise raswaan saadhako ko budhdi yog dete hai..

bhajaami pritipurvakam

dadaami budhdiyogam

tam yen maam upayaantite…

bhagavaan kaa vachan hai ki mujhe jo pritipurvak bhajataa hai use main budhdiyog detaa hun..budhdi to machhar men bhi hai pet bharane ki..budhdi to budhdimaano ke paas bhi hai dravy paane ki..lekin budhdi se bhagavaan nahi milate…priti karo to budhdi men bhagavaan ki krupaa kaa yog aataa hai.. “budhdi-yog” banataa hai tab kaam hotaa hai…ye budhdi yog ki upaasanaa hai..

sant rahidaas ji bolate ki antaraatmaa prabhu ke ras men jaanaa sahaj samaadhi hai…aur dev to manushyon ke banaaye huye hai lekin aatm dev tum to swatah sidhd ho prabhu…sabhi se madhur vyavahaar karanaa hi is thakur ji ki sewaa ho jaati hai..sabhi ke hruday men baithe paramaatmaa kaa sanmaan karataa hun to maano us devataa kaa snaan ho gayaa.. hruday kaa sneh hi us antaraatmaa kaa chandan hai…  ‘he hari, he prabhu, he govind’…aise namrataa aur prem se bole ye mithe vachan hi phul hai..aathon prahar bhagavaan ki madhumay smruti…raat ko sote samay, subah uthate hi, kaam ke pahele-kaam ke baad men prabhu kaa sumiran..ummm prabhuji…pyaareji ummm..aise karate karate yashodaa ke kaan men krushn ne maar di phunk..yashodaa kaa ‘main yashodaa hun’yah deh abhimaan gaayab ho gayaa..aisaa pyaar umadaa ohhhhhh…:) ..krushn ko hruday se lagaayaa..devaki ne krushn ko pet men rakhaa..lekin yashodaa ne krushn ko hruday men hi rakh liyaa..aap bhi bhagavaan ko yash dekar apani budhdi ko yashodaa banaa do…

 

******

bhagavaan ne dekhaa ki garud ko jaraa abhimaan ho gayaa hai..abhimaan se meraa ras nahi paa sakataa hai..garud ko kahaa ki jaao hanumaan ji ko bulaa ke laao..satyabhaamaa ka bhi abhimaan todanaa thaa..bole, “hanumaan to aise tum ko pranaam nahi karenge satyabhaamaa…mere sanket se hanumaan ji maan lenge ki krushn aur raam ek hi hai..lekin tum kyaa karogi?”

..to satyabhaamaa boli, “main sita ban jaaungi” ..satyabhaamaa ko bhi thodaa garv thaa..

“jaao garud ..hanumaan ji ko bulaa laao..”

garud garv se gayaa..”hanumaan ji chalo..prabhu bulaa rahe..”

hanumaan ji boel aap chalo , main pahunch jaaungaa..

are tum kaise pahunchoge kudate phaandate bandar jaise?baitho mere pankho par main pahunchaa detaa hun..

“nahi aap chalo main aap ke pahele pahunch jaaungaa..”

“are pahele kaise aaoge..garud se tej  koyi nahi hotaa..aap mujhe nahi pahechaanate?”

hanumaan ji samajh gaye ki prabhu ji ne garud kaa abhimaan mitaane ke liye idhar bhejaa hai..

bole, “main aap ko pahechaanataa hun..aap garud ho…pakshiraaj ho..”

garud  pankh phailaate bolaa, “haan main pakshi raaj hun..”

hanumaanji ne us ke pankh pakad ke dur phenk diyaa..

sudarshan ko bhi abhimaan ho gayaa thaa ki main dwaarikaa kaa paheraa karataa hun..

hanumaan ji to vaayuveg se aa gaye..jyun dwaarikaa jaate to sudarshan bhun bhun bhun kar ke un ko aane nahi dewe..

hanumaan ji kahete, “are bhai jaan edo..prabhuji ne mujhe bulaayaa hai..”

sudarshan bole, “nahi mere ijaajat ke binaa nahi jaa sakate..”

“thaakur ji ne bulaayaa hai..”

“nahi jaane dungaa..main to jis kisi kaa seer kaat sakataa hun..tum meraa mahatv nahi jaanate ho..”

hanumaan ji ble..”achhaa! jay shri raam!!” hanumaan ji ne munh motaa kar diyaa aur sudrashan ko munh men daal liyaa..

gaye thaakurji ke paas..bhagavaan ko kiyaa pranaam…lekin jo sitaa ji bani thi us ki taraf dekhe hi nahi..

thaakur ji ko to in kaa abhimaan todanaa thaa..

bole, “hanumaan aaj tum chup chup kyun ho? kuchh bolate nahi ho?..”

hanumaan ji ne munh kholaa, sudarshan ko baahar nikaalaa aur rakhaa..bole, “ye aane nahi dete the..in ko munh men daalaa thaa isliye chup thaa..aur ye baaju men sitaa ji nahi hai..ye kaun si daasi ko laa kar rakhaa hai thaakur ji?..isliye main udhar nahi dekhataa hun..”

satyabhaamaa kaa garv chur ho gayaa..sudarshan kaa bhi garv chur ho gayaa..itane men garud samudr se kaise bhi pankh sukhaa ke pahunchaa..bole, “tum ko to hanumaan ji ko bulaane bhejaa thaa..”

garud bolaa, “prabhu un ki chaal dhimi thi..abhi aataa hogaa..” hanumaan ji wo hi khade the..to ab garud sharam ke maare kyaa bole?..

bhagavaan dekhate ki kisi prakaar kaa garv naa rakho..

mat kar re garv gumaan gulaabi rang udi jaave go..

udi jaave go, phiko padi jaave go, maati men mali jaave go..

kaayi re laayo bhaayaa , kaayi layi jaave go..

dhan joban thaaraa jor jawaani aathe mili jaave go..

..mere baal kitane achhe-lekin ek din jal jaayenge aunty…meri naak kitani badhiyaa- lekin us men lit padaa hai aunte..meraa babalu kitanaa sundar-lekin vo paramaatmaa ki  sundarataa se sundar lagataa hai us ko yaad kar..nahi to wohi babalu tum ko thungaa dikhaayegaa..iishwar kaise hai ye yaad karo..jo bhi ho us men iishwar ki krupaa kaa samikshaa karo…

 

OM SHAANTI.

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare…..

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One Comment on “शादीवालों के मंगल ग्रह शांती का मंत्र और उपाय”


  1. Hari Om!

    Sadgurudev bhagwaan ki jai ho

    Hari hari om!


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