ब्रम्‍ह किस को बोलते? ईश्वर किस को बोलते? जीव किस को बोलते?

18  एप्रिल 2012 – शाम; अयोध्या सत्संग अमृत

 

जो लोग सोचते ना की हम इतना भजन करेंगे तब भगवान मिलेंगे ये बड़ी में बड़ी बाधा है..अरे! अभी मौजूद है!..तब मिलेंगे सोच के आड़ा लकड़ा क्यूँ डालते ?  भगवान सर्वत्र है, तो यहा भी है..सब में है तो हम  में भी है…सदा है तो अब भी है..अभी मिले हुए है..हाजीरा हुजूर है…

भ-ग-वा-न :- भ-जिस की सत्ता से भरण पोषण होता है..ग-जिस की सत्ता से गमन-आगमन होता है..वा- जिस की सत्ता से वाणी उठती है..न-ये सब नही होने के बाद भी जो साथ नही छोड़ता है वो भगवान है तो  आत्मा ही तो भगवान है!मिलेगा क्या? मिले मिलाए है!

भगवान (आकृति) ‘मिलेंगे’ तो बिछड़ेंगे..

भगवान ‘आएँगे’ तो चले जाएँगे..

जो मौजूद है उस को अभी स्वीकार कर लो तो ही कल्याण है..मैं भी जब सोचता था ‘मिलेंगे मिलेंगे’ तब तक आपाधापी कर रहा था..जब गुरु जी का सत्संग समझा तो अरे!जो बिछड़े ही नही है तो मिलेंगे क्या? गये ही नही है तो आवेंगे क्या?अभी हाजीरा हुजुर है -मौजूद है..अपना अंतरात्मा भगवत स्वरूप है…ओम आनंद…ओम माधुर्य …यही तो भगवत रस है..भगवत माधुर्य  है…ना दुरे ना दुर्लभे..ना परे ना पराए…

मौजूद है उस को स्वीकार करना है बस..

देह सभी मिथ्या हुई..ये बदलने वाली देह है..जगत हुआ निस्सार, हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार…ठीक है?

…ब्राम्‍हि स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष…कर्ता बुध्दी  से काम नही करना है , सहेज बुध्दी से..मोह कभी ना ठग सगे, इच्छा नही लवलेश..ऐसा हो जाए वैसा हो जाए-इच्छा को मारो गोली..इच्छा ही तो बंधन है…इच्छा रहित हो…ये मिल जाए वो मिल जाए ऐसा नही..इच्छा रहीत हो..कुछ  चाहिए तो गद्दारी है, कम चाहिए खुदाई  है , कुछ  नही चाहिए तो शहेंशाही है!

ऐसा ईश्वर का ज्ञान गुरु ने दिया तो साक्षात्कार!..नही तो अपना मनमाने कल्पना कर के बहुत झक मारे हम ने..जवानी थी..रात को 12-1 बजे तक अनुष्ठान की माला पूरी करते..सोए तो एकदम पता ही नही चलता, छुछुंदर तलवे चाट जाती पैर के..फूँक  मार मार के पैरो के तलवों की चमड़ी खा जाती पता ही नही चलता..ऐसे हम भी ईश्वर के लिए तड़पे थे..नर्मदा किनारे क्या क्या किए..केदारनाथ गये..एक बार 40 दिन कमरे में बंद हो गये थे, थोड़ासा दूध लेते थे बास ..ध्यान करते..दूध पीते तो आधा घंटा ध्यान नही करना चाहिए, कुछ शास्त्र  पढ़ते..फिर ध्यान करते..37 वे दिन तो क्या क्या आनंद..क्या क्या अनुभव हुए..मौन में रहे कर , एकांत में रहे कर सात्विक आहार से जप ध्यान करे तो ईश्वर तो है ही है..अनुभव करने में क्या देर?..जहाँ बैठे वहा पानी है, लेकिन कंकड़ पत्थर हटाना है, कुवा खोदो  बोरिंग करो तो पानी ही पानी है…ऐसे ही अपने अंतरात्मा में जाओ तो ईश्वर ही ईश्वर है!..

 

ब्रम्‍ह किस को बोलते? ईश्वर किस को बोलते? जीव किस को बोलते?

अंतकरण में आया हुआ अवछिन्न चैत्यन्य ..जैसे घड़े में आया हुआ आकाश ऐसे अंतकरण में आया हुआ चिदघन चैत्यन्य  उस को बोलते है जीव..

माया में आया हुआ चैत्यन्य -उस को ईश्वर बोलते..

और व्यापक चैत्यन्य को ब्रम्‍ह बोलते..

राम ब्रम्‍ह परमारथ  रूपा..

चिदानंद रूपी देह तुम्हारी

विगत विकारी कोई जाने अधिकारी..

कोई कोई अधिकारी आप को जान सकता है..भारद्वाज के आश्रम में गये थे श्रीराम जी सीता जी को लेकर..लेकिन आश्रम में घुस नही गये..बाहर खड़े रहे..सेवक को बोले की दशरथ नंदन राम आप के दर्शन करने की इच्छा से बाहर खड़े है..देखो कैसे व्यवहार कुशल थे श्री राम..ऐसे घुस के नही चले गये..भरद्वाज जी ने सुना तो उन का खूब स्नेह से आदर सत्कार कर के ले गये आश्रम में..भरद्वाज जी से पुछते की हम को यहा रहेना है तो आप बताइए की कहाँ रहे?

भरद्वाज जी कहेते ऐसी कौन सी जगह है की जहाँ आप नही हो? फिर भी अगर पुछते  हो तो जिन को लोभ नही, मोह  नही, मत्सर नही, जगत की आसक्ति नही उन के हृदय में आप सदा निवास कीजिए..और भी विस्तार से कहा..

तो भगवान के ये साकार अवतार हमारी प्रेमाभक्ति, व्यवहार शुध्दी और ब्रम्‍ह की निष्ठा का मार्गदर्शन करते है..

बाकी भगवान तो मौजूद ही मौजूद है..कभी कभी मर्यादा अवतार, कभी प्रेमा अवतार, कभी ज्ञाना अवतार , कभी आवेश अवतार, कभी प्रवेश अवतार, कभी अंतरयामी अवतार ऐसे तो कई अवतार भगवान के होते रहेते …:)

 

 

कथा कीर्तन जा घर भयो

संत भाए मेहमान

वा घर प्रभु वासा किन्हो

वो घर वैकुंठ समान ll

 

कथा कीर्तन ज्या घर नही

संत नही मेहमान

वा घर जमडा डेरा दीना

सांझ पड़े समशान

 

समशान में मुर्दा जाता है ना ऐसे ही बीती हुई बातें होती..जहाँ सत्संग नही है वहा अशुध्द  आहार और बीती  हुयी बातें होती ….

 

जिन्ह हरि कथा सुनी नही काना

श्रवण रंध्र ये सर्पभवन समाना

जे नही करही राम गुण गाना

जीव्हा सो दादुर जिए समाना

 

तो भगवान के गुण जान लो..भगवान का स्वभाव जान लो..भगवान का स्वरूप जान लो..भगवान का स्वरूप जान लोगे तो आप नही रहोगे, भगवान के साथ एकाकार हो जाओगे..भगवान का स्वभाव जानोगे तो आप उन का भजन किए बिना नही रहोगे..जिस ने भगवान का स्वभाव जाना है वो उस का भजन छोड़ कर किसी भाव में , किसी अवस्था में फसेगा नही..

तो भजन किस को बोलते? माला घुमाने को भजन बोलते?गीत गाने को भजन बोलते की यात्रा करने को भजन बोलते?

उपनिषद् में सवाल आया है: कीं लक्षणम भजनम?

 बोले :  रसनम लक्षणम भजनम l

अंतरात्मा प्रभु का रस आने लगे तो वो भजन है!चाहे वो रस स्मरण से आए, चाहे सत्संग से आए, चाहे सेवा से आए..निर्विषय, निर्विकार अंतरात्मा का रस आना भजन है..भगवान रस स्वरूप है.. भगवान सत है, चैत्यन्य  स्वभाव है..आनंद स्वभाव है..अपना स्वभाव भी भगवान के स्वभाव से मिलता जुलता है..सत अमर है तो आप का शरीर मरता फिर भी आप रहेते…सत जो है वो चेतन है- बुध्दी का प्रकाशक है..तो आप बुध्दी के प्रकाशक है, और सब बुध्दियों के प्रकाशक भगवान है..जो सत है वो ही आनंद है-ज्ञान से ही आनंद आता है..मुँह में रसगुल्ला डालो, ज्ञान नही होगा तो स्वाद नही आएगा..

भगवान का स्वभाव सत-चित-आनंद है, प्राणी मात्र के सुहुर्द है, अकारण कृपालु है…परम दयालु है..कोई बदले की , यश की कोई भावना नही.. फिर भी हमारा मंगल करते..अनुकूलता प्रतिकूलता देकर हमारा मंगल करते..

उड़ीसा में एक साधु हो गये, उन का नाम जगन्नाथ दास था…. रामानंद संप्रदाय के थे..भगवान को सर्वस्व मानते..बड़ी उमर हो गयी..तो भक्त जैसी भावना करते ऐसा उन का आशीर्वाद भी फलता..जगन्नाथ दास बीमार पड गये..उपर के कमरे में रहेते थे और नीचे सेवक भक्त रहेते की बाबा बुलाए तो जाते…भगत तो भगत थे!..8-8 दिन की भगतों की ड्यूटी लग गयी की बाबा को शौच जाने के लिए भी सेवक चाहिए तो भगत बैठते थे सेवा के लिए..बाबा को डबल जाना है तो आवाज़ देते – “ए  भगत”… भगत जागे ना जागे..एक बार ऐसे ही बाबा को जाना था शौचालय.. “अरे कहाँ गये..जय  जय  सिया राम..ओ भगत…”  वो भगत तो सोया था..तो ठाकुर जी आए भगत के रूप में…  जगन्नाथ दास को ले गये शौचालय के लिए..बूढ़ा शरीर तो जाते जाते ही कपड़े गंदे हो गये..तो वो कपड़े धो डाले..किस ने? तुम्हारी सरकार ने! 🙂 ये कैसा स्वभाव है तुम्हारी सरकार का!!

कैसा स्वभाव है तुम्हारी सरकार का साधुबाबा..गंदे कपड़े भी धो लेती है.. द्रोपदी के जुते  भी उठा लेती है..अर्जुन का रथ  भी हांक लेती है!!ये कैसी सरकार बनाई तुमने?.. 🙂 महाराज हमने बनाई नही, सरकार का स्वभाव ही ऐसा है!!

 

अब तो जगन्नाथ दास को जब भी कोई ज़रूरत पड़े वो ही लड़का आ जाए…जब से वो लड़का सेवा में आया जगन्नाथ जी को बड़ा आनंद आनंद आए..बोले , “जब मैं भगत को बुलाता हूँ तो होठों पे नाम आने के पहेले तुम कैसे हाजिर हो जाते हो?”

बोले, “हाँ बाबा..सेवक का तो यही कर्तव्य है ना?..मैं तो सेवकों का भी सेवक हूँ!”

जगन्नाथ जी को हुआ की ये वाणी तो भगवान की है!..की जो मेरी सेवा करता है मैं उस का सेवक हूँ…तो उन्हो ने उस लड़के का हाथ पकड़ लिया..जगन्नाथ महाराज भी मजबूत संत थे..

बोले, “छोड़ो  बाबा ..छोड़ो ..जब बुलाएँगे तो आ जाऊंगा”

बाबा बोले, “हम नही छोड़ते..तुम जो हो प्रगट हो जाओ!”

ठाकुर जी प्रगट हो गये…

जगन्नाथजी फुट फुट कर रोए.. “ठाकुर जी आप हमारे डोल-डाल के कपड़े धोते..आप हमारे लिए ऐसी तकलीफ़ करते तो आप हमारा शरीर ठीक क्यूँ नही कर दिया?”

बोले, “जगन्नाथ तुम्हारा प्रारब्ध पूरा करना है ना..शरीर ठीक कर दूं और प्रारब्ध बच गया तो दुबारा जनम लेना पड़ेगा..जो मेरे को भजते मैं उन को भजता हूँ..तुम मेरे को भजते तो मेरे को भी तुम्हारी सेवा करने का आनंद है ना? प्रारब्ध ऐसा है तो सेवा का मोका मिला ना”

हे ठाकुर जी क्या स्वभाव है आप का!कैसा भगवान है!!

 

एक भक्त थे..साधु संतों की सेवा करते..जो भी संत उस गाँव में आते वे इस भक्त के घर ठहेरते..अब वो भक्त भक्तानी वृध्द  हो गये..पूजा के समय भगवान को बोले, हे ठाकुर जी कोई ऐसा नोकर भेज दो जो साधु संतो को जीमावे..आप ने बहुत दिया है..साधु संतो की सेवा हो जाए मेरे राम जी..”

उस भक्त का नाम था त्रिलोचन..त्रिलोचन ठाकुर जी की पूजा कर के चरणामृत लेके बाहर गये..बाहर एक युवक खड़ा था..बोले, “त्रिलोचन दासजी  नमस्कार.. “

बोले, ” कहो क्या चाहते हो?”

बोले,  “मेरे को काम धन्दा चाहिए… “

बोले,  “क्या काम करोगे?”

“सेठजी जो तुम बता दो.. “

अब है तो सेठों का सेठ और नोकर हो के खड़ा हो रहा है!

साधुबाबा ये तुम्हारी सरकार की बात बता रहा हूँ..समझ लो, ये समझने की सीजन है… 🙂

“युवक क्या नोकरी करोगे?”

बोले,  “आप जो बोलेंगे करूँगा.. “

त्रिलोचन जी बोले, “मेरे पास जो साधु संत आते उन को भोजन बना के खिलाना…”

युवक बोला, “ये तो मैं आनंद से करूँगा..भोजन बनाना साधुओं को जीमाना मेरे को तो बहुत अच्छा लगता है..साधु जिमते है तो मेरा दिल बहुत खुश होता है..”

कौन बोल रहे? तुम्हारी सरकार..

“साधु मेरे को खिलाते तो मैं साधुओं को खिलाता हूँ..”

“क्या बोलते हो?”

“आप मेरे को नोकर रख लो..”

“पगार क्या लोगे?”

साधुओं के लिए शीधा , भोजन सब काम करूँगा लेकिन मेरे लिए तो आप की पत्नी और आप मेरे को खिलाओगे..मैं अपने लिए नही बनाता..मैं साधुओं के लिए बनाऊंगा, आप के लिए भी बनाऊंगा..लेकिन मेरे लिए आप लोगों को ही खाना बनाना पड़ेगा..और जिस दिन तुम ने सोचा की ये नोकर  ज़्यादा खाता या ऐसा है, वैसा है तो मैं बिना बताए चला जाऊंगा..ये मेरी शर्त है..”

 

अब तो ठाकुर जी भोजन बनाए और साधु खाए तो फिर तो क्या कहेना…बात फैल गयी की त्रिलोचन दास के यहा ऐसा युवक छोरा है, ऐसा जिमाता है की उस का बनाया हुआ तो सब्जी हाथ चाटते जाओ, रोटी चाटते जाओ..भूक भी लग जाती और हजम भी हो जाता है..चलो वहा पाया जाय..ऐसे एक साधु दूसरे को बोले , दूसरा तीसरो को करते करते खूब साधु संत आने लगे..जहा साधुओं का सरकार सेवक बन के बैठा है वहा तो साधुओं को आना ही था..बहुत लोग आने लगे..

 

एक दिन त्रिलोचन दास की पत्नी ….(पूज्यश्री बापूजी ने त्रिलोचन दास की कथा सुनाई : http://wp.me/P6Ntr-T0 )

तीसरे दिन आकाश वाणी हुई की त्रिलोचन दास जिस की तुम पूजा करते थे मैं वो ही नारायण था..अब मैं सर्व व्यापक हूँ, अंतरात्मा हूँ इस का ज्ञान तुम अब ज्ञानेश्वर महाराज से जाकर लो..अभी तो तुम मुझे मूर्ति में मानते  हो अथवा वैकुंठ में मानते हो लेकिन मैं वाशुदेव सर्वं इति l स महात्मा स दुर्लभा ll

..सर्वत्र वाशुदेव है, सब में वाशुदेव है, सब वाशुदेव है..ऐसा ज्ञान  तुम ज्ञानेश्वर महाराज से लो..ज्ञानेश्वर महाराज के चरणों में त्रिलोचन दास गये..तब ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा की,

उपासक अपनी भावना के बल से भगवान को प्रगट कर देता है ..लेकिन द्वैत बना रहेता है..यह भगवान है अथवा वह  भगवान है..तो ‘यह’ और ‘वह’ जिस से सिध्द  होता है उस ‘मैं’ को भगवान रूप में जानो…यह और वह  को देखने के लिए ‘मैं’ चाहिए..लेकिन ‘मैं’ की असलियत  जानो तो भगवान तुम्हारा आत्मा है..विभु व्याप्त सर्वत्र समाना..जैसे घड़ा अपने को घड़ा ना मान कर घटाकाश अपने को महा आकाश माने ऐसे जीव अपने को परमेश्वर का , परमेश्वर को अपना माने तो उस के बंधन छूट जाते है..कर्मी ‘यह ‘ को शुध्द कर के भगवान को खोज रहा है..उपासक ‘वह’ में भावना कल्पना कर के उस को खोज रहा है ..लेकिन सच्चे संत का शिष्य ‘मैं’ में आ कर ‘मैं’ की शुध्द  रूपता जान लेता है..मैं शरीर हूँ? नही…मैं इंद्रिया हूँ? नही..मैं मन हूँ? नही..मैं शरीर, मन, बुध्दी को जानता हूँ..अहम को भी जानता हूँ..सब को जो जानता है वो कौन है? उस में विश्रान्ति पा कर ब्राम्‍हि स्थिती प्राप्त कर लेता है..’यह’ ‘वह’ में खोज खोज के कुछ चमत्कार देखते है कुछ संतुष्टी रहेती, कुछ असंतुष्टि बनी रहेती है.. ‘मैं’ को जानते ही जैसे तरंग अपने असलीपने को खोजे तो तरंग सागर है..ऐसे ही ये ‘मैं’ अपने असलियत को खोजे तो जानेगा की परमात्मा की सत्ता से ‘मैं’ स्फुरित होता है.. ‘मैं’ में अहंकार सत्य नही है लेकिन परमात्मा सत्य है.. 

कभी भगवान से अठखेलियाँ  करो..कभी चुप्पी साधो..कभी नाचो, कभी कूदो..कभी मौन तो कभी सेवा कार्य…सब थोड़ा थोड़ा…युक्त आहार विहारस्य..ये हठ का रास्ता नही है.. बेवकूफी का रास्ता नही है..ये तो प्रेम का रास्ता है…और प्रेम अपनत्व से होता है.

कैसे भी भगवान के साथ आप का संबंध हो फिर तो सब मंगल है… 

प्लीज औडियो सत्संग का लाभ ले..

 

ॐ शांती

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे…

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

18  April 2012- sham ;Ayodhyaa Satsang Amrut

 please audio satsang kaa bhi laabh awashy lijiye..

jo log sochate naa ki ham itanaa bhajan karenge tab bhagavaan milenge ye badi men badi baadhaa hai..are! abhi maujud hai!..bhagavaan sarvatr hai, to yahaa bhi hai..sab men hai to man men bhi hai…sadaa hai to ab bhi hai..abhi mile huye hai..haajiraa hujur hai…

bha-ga-vaa-n :- bha-jis ki sattaa se bharan poshan hotaa hai..ga-jis ki sattaa se gamanaa-gaman hotaa hai..va- jis ki sattaa se waani uthati hai..na- ye sab nahi hone ke baad bhi jo saath nahi chhodataa hai vo bhagavaan to aatmaa hi to bhagavaan hai!milegaa kyaa? mile milaaye hai!

bhagavaan ‘milenge’ to bichhadenge..

bhagavaan ‘aayenge’ to chale jaayenge..

jo maujud hai us ko abhi sweekaar kar lo to hi kalyaan hai..main bhi jab sochataa thaa ‘milenge milenge’ tab tak jhak maar rahaa thaa..jab guru ji kaa satsang samajhaa to are!jo bichhade hi nahi hai to milenge kyaa? gaye hi nahi hai to aawenge kyaa?abhi haajiraa huru hai -maujud hai..apanaa antaraatmaa bhagavat swarup hai…om aanand…om maadhury…yahi to bhagavat ras hai..bhagavat maadhury hai…naa dure naa durlabhe..naa pare naa paraaye…

maujud hai us ko sweekaar karanaa hai bas..

deh sabhi mithyaa huyi..ye badalane waali deh hai..jagat huaa nissaar, huaa aatmaa se tabhi apanaa saakshaatkaar…thik hai?…braamhi sthiti praapt kar, kaary rahe naa shesh…kartaa budhdi se kaam nahi karanaa hai , sahej budhdi se..moh kabhi naa thag sage, ichhaa nahi lavalesh..aisaa ho jaaye waisaa ho jaaye-ichhaa ko maaro goli..ichhaa hi to bandhan hai…ichhaa rahit ho…ye mil jaaye vo mil jaaye aisaa nahi..ichhaa raheet ho..kuchh chaahiye to gaddaari hai, kam chaahiye khudaaii hai , kuchh nahi chaahiye to shahenshaahi hai!

aisaa iishwar kaa gyaan guru ne diyaa to saakshaatkaar!..nahi to apanaa manmaane kalpanaa kar ke bahut aapaadhaapi kiye ham ne..jawaani thi..raat ko 12-1 baje tak anushthaan ki mala puri karate..soye to ekadam pataa hi nahi chalataa, chhuchhundar talave chaat jaati pair ke..phunk maar maar ke pairo ke talavon ki chamadi khaa jaati pataa hi nahi chalataa..aise ham bhi iishwar ke liye tadape the..narmadaa kinaare kyaa kyaa kiye..kedaaranaath gaye..ek baar 40 din kamare men band ho gaye the, thodasa dudh lete the baas..dhyaan karate..dudh pite to aadhaa ghantaa dhyaan nahi karanaa chaahiye, kuchh padhate..phir dhyaan karate..37 ve din to kyaa kyaa aanand..kyaa kyaa anubhav huye..maun men rahe kar , ekaant men rahe kar saatvik aahaar se jap dhyaan kare to iishwar to hai hi hai..anubhav karane men kyaa der?..jahaan baithe wahaa paani hai, lekin kankad paththar hataanaa hai, kuwaa khodo boring karo to paani hi paani hai…aise hi apane antaraatmaa men jaao to iishwar hi iishwar hai!..

 

bramh kis ko bolate?iishwar kis ko bolate? jeev kis ko bolate?

antakaran men aayaa huaa avachhinn chaityanya..jaise ghade men aayaa huaa aakaash aise antakaran men aayaa huaa chidghan chaityany us ko bolate hai jeev..

maayaa men aayaa huaa chaityanya -us ko iishwar bolate..

aur vyaapak chaityany ko bramh bolate..

raam bramh paramaarath rupaa..

chidaanand rupi deh tumhaari

vigat vikaari koyi jaane adhikaari..

koyi koyi adhikaari aap ko jaan sakataa hai..bharadwaaj ke aashram men gayr the shriram ji..sitaa ji ko lekar..lekin aashram men ghus nahi gaye..baahar khade rahe..sewak ko bole ki dasharath nandan raam aap ke darshan karane ki ichhaa se baahar khade hai..dekho kaise vyavahaar kushal the shri raam..aise ghus ke nahi chale gaye..bhaaradwaaj ji ne sunaa to un kaa khub sneh se aadar satkaar kar ke le gaye aashram men..bhaaradwaaj ji se puchhate ki ham ko yahaa rahenaa hai to aap bataayiye ki kahaan rahe?

bhaaradwaaj ji kahete aisi kaun si jagah hai ki jahaan aap nahi ho? phir bhi agar puchhate ho to jin ko lobh nahi, moh nahi, matsar nahi, jagat ki aasakti nahi un ke hruday men aap sadaa niwaas kijiye..aur bhi vistaar se kahaa..

to bhagavaan ke ye saakaar awataar hamaari premaabhakti, vyavahaar shudhdi aur bramh ki nishthaa kaa margdarshan karate hai..baaki bhagavaan to maujud hi maujud hai..kabhi kabhi maryaadaa awataar, kabhi premaa awataar, kabhi gyaanaa awataar , kabhi aawesh awataar, kabhi pravesh awataar, kabhi antarayaami awataar aise to kayi awataar bhagavaan ke hote rahete …:)

 

 

kathaa kirtan jaa ghar bhayo

sant bhaye mehamaan

vaa ghar prabhu waasaa kinho

vo ghar vaikunth samaan ll

 

kathaa kirtan jyaa ghar nahi

sant nahi mehamaan

vaa ghar jamadaa deraa dinaa

saanjh pade samashaan

 

samashaan men murdaa jaataa hai naa aise hi biti huyi baaten hoti..jahaan satsang nahi hai wahaa ashudh aahaar  hotaa..

 

jinh hari kathaa suni nahi kaanaa

shravan randr ye bhavan samaanaa

je nahi karahi raam gun gaanaa

javhaa so daadur jiye samaanaa

 

to bhagavaan ke gun jaan lo..bhagavaan kaa swabhaav jaan lo..bhagavaan kaa swarup jaan lo..bhagavaan kaa swarup jaan loge to aap nahi rahoge, bhagavaan ke saath ekaakaar ho jaaoge..bhagavaan kaa swabhaav jaanoge to aap un kaa bhajan kiye binaa nahi rahoge..jis ne bhagavaan kaa swabhaav jaanaa hai vo us kaa bhajan chhod kar kisi bhaav men , kisi awasthaa men phasegaa nahi..to bhajan kis ko bolate? mala ghumaane ko bhajan bolate?geet gaane ko bhajan bolate ki yaatraa karane ko bhajan bolate?

upnishad men sawaal aayaa hai: kim lakshanam bhajanam?

 bole :  rasanam lakshanam bhajanam

antaraatmaa prabhu kaa ras aane lage to vo bhajan hai!chaahe vo ras smaran se aaye, chaahe satsang se aaye, chaahe sewaa se aaye..nirvishay, nirvikaar antaraatmaa kaa ras aanaa bhajan hai..bhagavaan ras swarup hai.. bhagavaan sat hai, chaityanya swabhaav hai..aanand swabhaav hai..apanaa swabhaav bhi bhagavaan ke swabhaav se milataa julataa hai..sat amar hai to aap kaa sharir marataa phir bhi aap rahete…sat jo hai vo chetan hai-budhdi kaa prakaashak hai..to aap budhdi ke prakaashak hai, aur sab budhdiyon ke prakaashak bhagavaan hai..jo sat hai vo hi aanand hai-gyaan se hi aanand aataa hai..munh men rasgullaa daalo, gyaan nahi hogaa to swaad nahi aayegaa..

bhagavaan kaa swabhaav sat-chit-aanand hai, praani maatr ke suhurd hai, akaaran krupaalu hai…param dayaalu hai..koyi badale ki , yash ki koyi bhaavanaa nahi.. phir bhi hamaaraa mangal karate..anukulataa pratikulatalaa dekar hamaaraa mangal karate..

udisaa men ek saadhu ho gaye, un kaa naam jagannaath daas thaa.raamaanand sampradaay ke the..bhagavaan ko sarvasw maanate..badi umar ho gayi..to bhakt jaisi bhaavanaa karate aisaa un kaa aashirwaad bhi phalataa..jagannaath daas bimaar pad gaye..upar ke kamare men rahete the aur niche sewak bhakt rahete ki baba bulaaye to jaate…bhagat to bhagat the!..8-8 din ki bhagaton ki duty lag gayi ki baba ko shauch jaane ke liye bhi sewak chaahiye to bhagat baithate the sewaa ke liye..baabaa ko double jaanaa hai to aawaaj dete ae bhagat…bhagat jage naa jage..ek baar aise hi baabaa ko jaanaa thaa shauchaalay.. “are kahaan gaye..jay jay siyaa raam..o bhagat…”  vo bhagat to soyaa thaa..to thaakur ji aaye bhagat ke rup men jagannaath daas ko le gaye shauchaalay ke liye..budhaa sharir to jaate jaate hi kapade gande ho gaye..to vo kapade dho daale..kis ne? tumhaari sarakaar ne! 🙂 ye kaisaa swabhaav hai tumhaari sarakaar kaa!!

kaisaa swabhaav hai tumhaari sarakaar kaa saadhubaabaa..gande kapade bhi dho leti hai.. dropadi ke jute bhi uthaa leti hai..arjun kaa rath bhi haank leti hai!!ye kaisi sarkaar banaayi tumane?.. 🙂 mahaaraaj hamane banaayi nahi, sarakaar kaa swabhaav hi aisaa hai!!

 

ab to jagannaath daas ko jab bhi koyi jarurat pade vo hi ladakaa aa jaaye…jab se vo ladakaa sewaa men aayaa jagannaath ji ko badaa aanand aanand aaye..bole , “jab main bhagat ko bulaataa hun to hothon pe naam aane ke pahele tum kaise haajir ho jaate ho?”

bole, “haan baabaa..sewak kaa to yahi kartavya hai naa?..main to sewakon kaa bhi sewak hun!”

jagannaath ji ko huaa ki ye waani to bhagavaan ki hai!..ki jo meri sewaa karataa hai main us kaa sewak hun…to unho ne us ladake kaa haath pakad liyaa..jagannaath mahaaraaj bhi majabut sant the..

bole, “chhode baabaa ..chhodo..jab bulaayenge to aa jaaungaa”

baabaa bole, “ham nahi chhodate..tum jo ho pragat ho jaao!”

thaakur ji pragat ho gaye…

jagannaathji phut phut kar roye.. “thaakur ji aap hamaare dol-daal ke kapade dhote..aap hamaare liye aisi takalif karate to aap hamaaraa sharir thik kyun nahi kar diyaa?”

bole, “jagannaath tumhaaraa praarabdh puraa karanaa hai naa..sharir thik kar dun aur praarabdh bach gayaa to dubaaraa janam lenaa padegaa..jo mere ko bhajate main un ko bhajataa hun..tum mere ko bhajate to mere ko bhi tumhaari sewaa karane kaa aanand hai naa? praarabdh aisaa hai to sewaa kaa mokaa milaa naa”

hey thaakur ji kyaa swabhaav hai aap kaa!kaisaa bhagavaan hai!!

 

ek bhakt the..saadhu santo ki sewaa karate..jo bhi sant us gaanv men aate ve is bhakt ke ghar thaherate..ab vo bhakt bhaktaani vrudhd ho gaye..pujaa ke samay bhagavaan ko bole, hey thaakur ji koyi aisaa nokar bhej do jo saadhu santo ko jimaave..aap ne bahut diyaa hai..saadhu santo ki sewaa ho jaaye mere raam ji..”

us bhakt kaa naam thaa trilochan..trilochan ji thaakur ji ki pujaa kar ke charanaamrut leke baahar gaye..baahar ek yuwak khadaa thaa..bole trilochan daas wak namaskaar..

bole kaho kyaa chaahate ho?

bole mere ko kaam dhandaa chaahiye

bole kyaa kaam karoge?

sethaji jo tum bataa do..

ab hai to sethon kaa seth aur nokar ho ke khadaa ho rahaa hai!

saadhubaabaa ye tumhaari sarakaar ki baat bataa rahaa hun..samajh lo, ye samajhane ki sijan hai… 🙂

yuwak kyaa nokari karoge?

bole aap jo bolenge karungaa..

trilochan ji bole, “mere paas jo saadhu sant aate un ko bhojan banaa ke khilaanaa…”

yuwak bolaa, “ye to main aanand se karungaa..bhojan banaanaa saadhuon ko jimaanaa mere ko to bahut achhaa lagataa hai..saadhu jimate hai to meraa dil bahut khush hotaa hai..”

kaun bol rahe? tumhaari sarakaar..

“saadhu mere ko khilaate to main sadhun ko khilaataa hun..”

“kyaa bolate ho?”

“aap mere ko nokar rakh lo..”

“pagaar kyaa loge?”

saadhuon ke liye shidhaa , bhojan sab kaam karungaa lekin mere liye to aap ki patni aur aap mere ko khilaaoge..main apane liye nahi banaataa..main saadhuon ke liye banaaungaa, aap ke liye bhi banaaungaa..lekin mere liye aap logon ko  banaanaa padegaa..aur jis din tum ne sochaa ki ye nokar  jyaadaa khaataa ya aisaa hai, waisaa hai to main binaa bataaye chalaa jaaungaa..ye meri shart hai..”

 

ab to thaakur ji bhojan banaaye aur saadhu khaaye to phir to kyaa kahenaa…baat fail gayi ki trilochan daas ke yahaa aisaa yuwak chhoraa hai, aisaa jimaataa hai ki us kaa banaayaa huaa to sabji chaatate jaao, roti chaatate jaao..bhuk bhi lag jaati aur hajam bhi ho jaataa hai..chalo wahaa paayaa jaay..aise ek saadhu dusare ko , dusaraa tisaro ko karate karate khub saadhu sant aane lage..jahaa saadhuon kaa sarakaar sewak ban ke baithaa hai wahaa to saadhuon ko aanaa hi thaa..bahut log aane lage..

 

ek din trilochan daas ki patni ….

 

(pujyashri baapuji ne trilochan daas ki kathaa sunaayi)

tisare din aakaash waani huyi ki trilochan daas jis ki tum pujaa karate the main wo hi naaraayan thaa..ab main sarv vyaapak hun, antaraatmaa hun is kaa gyaan tum ab gyaaneshwar mahaaraaj se jaakar lo..abhi to tum mujhe murti men maanat ho athavaa vaikunth men maanate ho lekin main vaashudev sarvam iti saa mahtmaa saa durlabhaa..sarvatr vashudev hai, sab men vaashudev hai, sab vaashudev hai..aisaa gyaan tum gyaaneshwar mahaaraj se lo..gyaaneshwar mahaaraj ke charanon men trilochan daas gaye..tab gyaneshwar ne kahaa ki,

upaasak apani bhaavanaa ke bal se bhagavaan ko pragat kar detaa hai ..lekin dwait banaa rahetaa hai..yah bhagavaan hai athavaa wah bhagavaan hai..to ‘yah’ aur ‘wah’ jis se sidhd hotaa hai us ‘main’ ko bhagavaan rup men jaano…yah aur wah ko dekhane ke liye ‘main’chaahiye..lekin ‘main’ ki asaliyat  jaano to bhagavaan tumhaaraa aatmaa hai..vibhu vyaapt sarvatr samaanaa..jaise ghadaa apane ko ghadaa naa maan kar ghataakaash apane ko mahaa aakaash maane aise jeev apane ko parameshwar kaa parameshwar ko apanaa maane to us ke bandhan chhut jaate hai..karmi ‘yah ‘ ko shudhd kar ke bhagavaan ko khoj rahaa hai..upaasak ‘wah’ men bhaavanaa kalpanaa kar ke us ko khoj rahaa hai ..lekin sachche sant kaa shishy ‘main’ men aa kaar ‘main’ ki shudhd rupataa jaan letaa hai..main sharir hun? nahi…main indriyaa hun? nahi..main man hun? nahi..main sharir, man, budhdi ko jaanataa hun..aham ko bhi jaanataa hun..sab ko jo jaanataa hai vo kaun hai? us men vishraanti paa kar braamhi shtiti praapt kar letaa hai..’yah’ ‘wah’ men khoj khoj ke kuchh chamatkaar dekhate hai kuchh santushi raheti, kuchh asantushti bani raheti hai.. ‘main’ ko jaanate hi jaise tarang apane asali pane ko khoje to tarang saagar hai..aise hi ye ‘main’ apane asaliyat ko khoje to jaanegaa ki paramaatmaa ki sattaa se ‘main’ sfurit hotaa hai.. ‘main’ men ahankaar saty nahi hai lekin paramaatmaa saty hai.. 

kabhi bhagavaan se athkheliyaa karo..kabhi chuppi saadho..kabhi naacho, kabhi kudo..kabhi maun to kabhi sewaa kaary…sab thodaa thodaa…yukt aahaar vihaarasy..ye hath kaa raastaa nahi hai.. bewkufi

kaa raastaa nahi hai..ye to prem kaa raastaa hai…aur prem apanatv se hotaa hai..kaise bhi bhagavaan ke saath aap kaa sambandh ho phir to sab mangal hai…

OM SHAANTI.

 

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare….   

Advertisements
Explore posts in the same categories: Pujya Bapuji

2 Comments on “ब्रम्‍ह किस को बोलते? ईश्वर किस को बोलते? जीव किस को बोलते?”


  1. हरी ॐ प्रभु जी !

    प्रभु आपकी सेवा बहुत ही उतम है मै किन शब्दो से आपका आभार व्यक्त करू इसकेलिए मुझे शब्द नहीं मिल रहें
    आपकी वर्डप्रेस की ये सेवा बहुत लोगो तक पहुचे इसी प्रार्थना के साथ!

    हरी हरी ॐ !!!!!!

  2. Mahesh Says:

    Excellent अति उत्‍तम सेवा कर रहे हो. तुम पर ईश्‍वर की बहुत कृपा है.


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


%d bloggers like this: