शाश्वत संबंध की पहेचान ही सच्ची संपदा

15 एप्रिल 2012 – शाम; लखनौ सत्संग अमृत

 

 

3 चीज़ सब को सुलभ है ..

सूत (पुत्र), दारा(पत्नी) और संपदा (रुपये) ये पापी को भी मिलते है, धर्मात्मा को भी होते है..

सूत दारा और संपदा

पापी को भी होये

संत समागम हरि कथा

तुलसी दुर्लभ दोए

 संतों का समागम और हरि की कथा ये 2 चीज़ बहुत दुर्लभ है…और इस का फल शाश्वत है..सूत, दारा और संपदा ये शारीरिक संबंध है…संत समागम और हरि  कथा ये आत्मिक संबंध है ..हमारे 3 संबंध होते है..एक तो ये स्थूल शरीर से स्थूल भूतों के साथ हमारा संबंध है..बाहर का वायु और हमारे अंदर का वायु जुड़ा है..बाहर के वायु से संबंध टूट जाए, नही ले तो हम मर जाएँगे..ऐसे ही बाहर के जल से हमारे शरीर का जलीय अंश, बाहर की गरमी से हमारे शरीर का टेम्प्रेचर/गरमी आदि का संबंध है..अधिभौतिक शरीर को पाँच महाभूतो के साथ जुड़े रहेना पड़ता है…एक मिनट भी उन से हम पृथक नही हो पाते..सूरज वहा ठंडा हो जाए ना तो विज्ञानी  बोलेगा भी नही की सूरज वहा ठंडा हो गया तुम अपनी शरीर की गरमी का संतुलन संभालने की दूसरी व्यवस्था करो ऐसा बोलने से पहेले ही वो खुद  मर जाएगा, हम भी मर जाएँगे..

तो हम सूरज के साथ अग्नि से जुड़े है, जल से जुड़े है , तेज से जुड़े है, वायु से जुड़े है, पृथ्वी से जुड़े है..तो ये हम जुड़े नही, हमारा शरीर जुड़ा है..ये स्थूल जगत हुआ..

दूसरा है सूक्ष्म जगत ..मन, बुध्दी , अहंकार ये 5 सूक्ष्म भूतों से  हमारी 5 ज्ञानेन्द्रियाँ जुड़ी है..लेकिन हम इन 5 सूक्ष्म और 5 स्थूल से भी परे है…वास्तविक में सत-चित-आनंद स्वरूप परमात्मा से जुड़े जुड़ाए है..1 सेकेंड का हजारवां हिस्सा भी हम भगवान से अलग नही हो सकते..कोई कहे दे की मैं आकाश से अलग हो के दिखाता हूँ तो वो एक तो झूठ बोलता है या बेवकूफ़ है…आकाश से अलग हो के कोई दिखा सकता है? नही!..

ऐसे ही हम परमात्मा से अलग हो नही सकते..  किसी भी कीमत पे परमात्मा हम से अलग नही हो सकता और हम परमात्मा से अलग हो नही सकते…जैसे घड़े का आकाश महाआकाश से अलग नही हो सकता..और महाआकाश घड़े के आकाश को अपने से अलग नही कर सकता..ऐसे ही जीवात्मा परमात्मा से अलग नही हो सकता..परमात्मा जीवात्मा से अलग नही हो सकते..

तो आप का और परमात्मा का अविभाज्य संबंध है..

आप के पंचभौतिक शरीर का और 5 महाभूतों का अविभाज्य संबंध है.. ऐसे ही आप के सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियों का और सूक्ष्म भूतों का आपस में अविभाज्य संबंध है..

ईश्वरीय रहस्य को, ईश्वरीय लीला को, ईश्वरीय ज्ञान  को हम नही जानते..हमारी मन की कल्पनाओं से हम दुख बना लेते…सुख बना लेते..वास्तव में अनुकूलता जहाँ होती उस को हम सुख बोलते है..और प्रतिकूलता होती उस को हम दुख बोलते है…ये अनुकूलता और प्रतिकूलता विधायक का विधान है..विधाता  अनुकूलता देकर आप को उदार बनाते है  की आप उन की तरफ आओ..प्रतिकूलता देकर वो आप की आसक्ति मिटाते  है..तो विधान जो होता है ना वो मंगल के लिए होता है.. 

  हम को जो अच्छा नही लगता वो भी होता है तो समझो की विधान कल्याणकारी है..और जो हम को अच्छा लगता है और वो हम से छिन लेता है तो समझो विधान की कृपा है..लेकिन हम क्या करते की जो अच्छा लगता वो छीना जाता है तो हमारी दुखाकार वृत्ति बनती है..हम सोचते की ‘मैं दुखी है,मैं  परेशान हूँ’ -लेकिन ऐसा दुख और परेशानी कोई नही है जिस में हमारा कल्याण छुपा ना हो…

इसलिए हम आप को हाथ जोड़ के प्रार्थना करते है की कभी भी दुख और परेशानी आए तो आप समझ लेना की विधायक का विधान है..हमारा कल्याण करने के लिए आया है…आसक्ति छुड़ाने के लिए आया है..संसार से मोह ममता छुड़ाने के लिए आया है ..वाह प्रभु वाह!..तेरी जय  हो!..

तो दुख आप भजन में बदल सकते है..दुख को आप ज्ञान  में बदल सकते है ..दुख को विवेक में बदल सकते है..दुख को दुखहारी परमात्मा में बदल सकते है…तो दुख आप के लिए भगवान की प्राप्ति का साधन हो जाएगा..

अगर सुख आया और आप उस के भोगी बनोगे तो सुख आप को खोकला बना देगा..जो भी सुख आया और भोगी बने  है वो नरकों में पड़े है , उन को अकारण बीमारियाँ  हुई है..जो सुख को ज़्यादा भोगते वो तेज़ी से एड्स और ना जाने क्या क्या बीमारियों के शिकार होते..

तो आप को अगर जल्दी दुखों से पार होना है तो सुख की लालच छोड़ दो..सुख की लालच छोड़ते ही आप के अंतरात्मा का जो संबंध है वो स्पष्ट होगा..जैसे पानी पर की सेवाल हटाने से पानी दिखता है ऐसे ही सुख की लालच हटाने से सुख का मधूमय आनंद का दरिया ल़हेराने लगता है..

दुख के भय से आप भयभीत ना हो..दुख आए तो उत्सव मनाओ..वाह आ गया!अच्छा है..भला हुआ..ये दुख और कष्ट आसक्ति मिटा कर हरि में प्रीति जगानेवाले है ..वाह प्रभुजी वाह!..बाहर से दुख दिखेगा लेकिन तुम्हारा ईश्वर संबंधी स्मरण से  दुख भी स्वपना हो जाएगा, सुख भी स्वपना हो जाएगा..आनंद स्वरूप परमात्मा अपना हो जाएगा..

सुख स्वपना दुख बुलबुला

दोनो है मेहमान

दोनो भी तन दीजिए

अपने आत्मदेव को पहेचान

 http://youtu.be/WqdLoUwSKsA 

एक होता है क्रिया प्रधान, दूसरा होता है  भाव प्रधान और तीसरा होता है क्रिया प्रधान..

गीता में भगवान बोलते मेरा स्मरण करो और युध्द करते जाओ तो ये क्रिया प्रधान स्मरण है..जैसे ड्राइवर ड्राइविंग करता तो ब्रेक पर, क्लच पर, स्टेरिंग पर सब पर ध्यान है…सेठ से या साथी से बात करता हुआ भी जाता है, लेकिन सड़क का भी पूरा ध्यान है..कल की परसो की बात भी करता है लेकिन सड़क पर ध्यान की प्रधानता है..क्रिया की गौणता है..अथवा कभी क्रिया की प्रधानता होती है, ध्यान की गौणता होती है..

दूसरा होता है की हम ने जान लिया की हमारा भगवान के साथ शाश्वत संबंध है..तो उस में क्रिया की प्रधानता नही है..समझ की प्रधानता है..जैसे आप ने देख लिया की पंखे चल रहे, ट्यूब लाइट जल रहे, स्क्रीन में बापू का सत्संग दिखाई दे रहा है..इस के पिछे बिजली (विद्युत ) है..तो आप को रटना नही पड़ेगा की पंखे में लाइट है..ट्यूब में लाइट है..स्क्रीन मेन लाईट है – ऐसा रटना नही पड़ेगा..सब में विद्युत है विद्युत है ऐसा आप को रटना नही पड़ता है..ये ज्ञानजन्य स्मृति हुई..

तो जिस को ज्ञानजन्य ईश्वर की स्मृति हो जाती है वो हसते खेलते , खाते-पीते ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है!..

नानक वो सदगुरु मोहे भावे…

 हसंदिया, खावंदिया, पहेनंदिया विच कर दे मुगत..

हसते खेलते खाते पहेनते हमें मुक्त कर देते…काहे से मुक्त कर देते? दुखों से मुक्त करते..चिंताओं से मुक्त करते..वासनाओ से मुक्त करते..अहंकार से मुक्त करते..जन्म मरण से मुक्त करते..

श्रीकृष्ण कहेते है : कर्म जो भी होते प्रकृति में होते..

प्रकृति कैसे होती की पृथ्वी, तेज, वायु आकाश, जल ये पाँच महाभूत, मन, बुध्दी और अहंकार ये सूक्ष्म भूत इन के मिश्रण से अष्टदा प्रकृति  चलती है..श्रीकृष्ण ने कृपा कर के युध्द के मैदान में बहुत उँची बात बता दी..की अष्टदा प्रकृति से मैं भिन्न हूँ..ये बता कर कृष्ण ने मानव समाज पर बड़ी कृपा की है की आप भी भिन्न है…शरीर बीमार होता आप उस को जानते है, हाथ आप को नही जानता आप हाथ को जानते है..पैर आप को नही जानता आप पैरो को जानते है..तो पंचभौतिक शरीर को आप जानते है..तो मूर्ख आदमी जिस को सत्संग नही मिला वो शरीर बीमार होता है तो बोलता है ‘मैं बीमार हूँ’..मन में दुख आया तो बोले ‘मैं दुखी हूँ’..चित्त में चिंता आती तो बोलता की मैं चिंतित हूँ..लेकिन जिस ने गुरु की दीक्षा ली है, और सत्संग सुना है वो समझता की शरीर बीमार हुआ..शरीर को ठीकठाक करेगा लेकिन ‘मैं बीमार हूँ’मानने से शरीर की बीमारी गहेरी उतरती है..मन दुखी है तो उस का उपाय करेगा लेकिन ‘मैं दुखी हूँ सोचने से दुख गहेरा उतरता ये समझता है..चित्त में चिंता आई तो मिटाने का प्रयास करेगा लेकिन ‘मैं चिंतित हूँ’ ऐसी सोच की बेवकूफी नही करेगा..

और जिस को दीक्षा मिली और सत्संग मिला उस को भी संसार में ही देखते हम लेकिन वो संसार में इतना दुखी नही होता जितना नीगुरा होता है..(क्यो की सत्संग से समझ मिलती है, भ्रम दूर होता है..)

 भ्रम और नासमझी रख के कितने भी तीरथ करो, कितना अभी धन इकठ्ठा करो, कितनी भी कुर्सियों की उँचाई  पर पहुँचो..लेकिन निरसता नही जाएगी..

परमात्मा के संबंध की पहेचान नही थी तो रावण ललनाओं से रस की भीक माँगते माँगते गिर गया..और हीरण्यकश्यपू अहंकार को रसीला बनाते बनाते गिर गया..लेकिन रस-स्वरूप तो अपना आत्मा है!..खाली स्थूल शरीर को ‘मैं’ मत मानो…सूक्ष्म शरीर के साथ जूडो नही…जिस के साथ तुम्हारा शाश्वत संबंध है खाली उस को जान लो तो अभी अभी आप रसमय  हो जाते है…

आप को घर में सभी सुविधा होते हुए भी यहा असुविधा में बैठे हो तो रस के प्यासे हो ना? वो बढ़िया सुविधाए तो स्थूल शरीर को थी, मन को थी…आप को रस की ज़रूरत है ..सत्संग से आप को चिन्मय तरंग आ रहे इसलिए घंटो भर इंतजार करते..आज जीवन सफल हो गया..महेसुस हो गया ऐसा सोचते..ये सत्संग जीवन में ना जाने कितने कितने मोडों पर काम देता है…

बीती हुई को पकडो मत..वर्तमान में रसमय जीवन करो..भगवान रस-स्वरूप है, आप उन्ही की संतान हो..आप भी रसमय रहो..जो वर्तमान को रसमय  बनाता है उस का भूतकाल रसमय हो जाता है क्योकि भूत काल तो बीत गया, जो है ही नही उस का कोई वजूद ही नही..अभी आनंद है…और भविष्य भी रसमय  हो जाता है क्यो की भविष्य वर्तमान से ही तो बनेगा..

ना खुशी अच्छी है ना मलाल अच्छा है

हम राज़ी है उसी में जिस में तेरी रजा है..

अन्यथा भगवान कृष्ण घोड़ा गाड़ी चलाते है अर्जुन की, अर्जुन को विराट रूप का दर्शन कराते फिर भी अर्जुन का भय नही जाता, अज्ञान नही जाता..जब अर्जुन पर कृपा कर के भगवान सत्संग सुनाते है तब अर्जुन कहेता है :

नष्टों मोहा स्मृतिमलब्धवा

तव प्रसादात मय अच्युत स्थिरो अस्मि…

अब मैं अपने आपे में स्थिर हो गया हूँ..मेरा और चैत्यन्य  स्वभाव परमेश्वर का शाश्वत संबंध है…और ये कर्म और क्रिया प्रकृति का है…

 तो संसारी संपदा वास्तव में संपदा नही है..संसारी विपदा वास्तव में विपदा नही है..भगवान के साथ के संबंध की विस्मृति ही वास्तव में विपदा है और भगवान के साथ का संबंध का ज्ञान  होना ही वास्तव में संपदा है…

भगवान की भक्ति भगवान का ज्ञान और भगवान के साथ आप का जो शाश्वत संबंध है उस के आगे किसी का महत्व नही….उस के आगे ना बीमारी का महत्व है   ना मृत्यु का महत्व है..ना कंगालियत का महत्व है ना धन का महत्व है….

आप का भगवान के साथ का शाश्वत संबंध बड़ा महत्व पूर्ण है….

भगवान से हुज्जत करने वाले भक्त बोलते हमारा कुछ  और ही अंदाज  है..हमें उस पर नाज़ है तो उसे  हम पर भी नाज़ है..

ये कहावत अब लखनौ वाले लालाओं पर लागू हो रही है…लखनौ वालो का भी कुछ और ही अंदाज है..उन्हे बापू पर नाज़ है तो बापू को भी उन पर नाज़ है…

 

 http://youtu.be/x2HEeihy03A

ॐ शांती

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे…

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

15 April 2012- sham ;Lakhanau Satsang Amrut

 

 3 chij sab ko sulabh hai ..

sut (putr), daaraa(patni) aur sampatti (rupaye) ye paapi ko bhi milate hai, dharmaatmaa ko bhi hote hai..

sut daaraa aur sampadaa

paapi ko bhi hoye

sant samaagam hari kathaa

tulasi durlabh doye

 

 santon kaa samaagam aur hari ki kathaa ye 2 chij bahut durlabh hai…aur is ka phal shaashwat hai..sut daaraa aur sampadaa ye shaaririk sambandh hai…sant samaagam aur hari kathaa ye aatmik sambandh hai ..hamaare 3 sambandh hote hai..ek to ye sthul sharir se shtul bhuton ke saath hamaaraa sambandh hai..baahar kaa vaayu aur hamaare andar kaa vaayu judaa hai..baahar ke vaayu se sambandh tut jaaye, nahi le to ham mar jaayenge..aise hi baahar ke jal se hamaare sharir kaa jaliy ansh, baahar ki garami se hamaare sharir kaa temprechar/garami aadi kaa sambandh hai..adhibhautik sharir ko panch mahaabhuto ke saath jude rahenaa padataa hai…ek minat bhi un se ham pruthak nahi ho paate..suraj wahaa thandaa ho jaaye naa to vigyaani bolegaa bhi nahi ki suraj wahaa thandaa ho gayaa tum apani sharir ki garami ka santulan sambhaalane ki dusari vyavasthaa karo aisaa bolane se pahele hi vo khud hi mar jaayegaa, ham bhi mar jaayenge..

to ham suraj ke saath agni se jude hai, jal se jude hai ,tej se jude hai, vaayu se jude hai, pruthvi se jude hai..to ye ham jude nahi, hamaaraa sharir judaa hai..ye sthul jagat huaa..

dusaraa hai sukshm jagat ..man, budhdi , ahankaar ye 5 sukshm bhuton se  hamaari 5 gyaanendriyaa  judi hai..lekin ham in 5 sukshm aur 5 sthul se bhi pare hai…waastavik men sat-chit-aanand swarup paramaatmaa se jude judaaye hai..1 second kaa hajaarawaa hissaa bhi ham bhagavaan se alag nahi ho sakate..koyi kahe de ki main aakaash se alag ho ke dikhaataa hun to vo ek to jhuth bolataa hai yaa bewkuf hai…aakaash se alag ho ke koyi dikhaa sakataa hai? nahi!..

aise hi ham paramaatmaa se alag ho nahi sakate..  kisi bhi kimat pe paramaatmaa ham se alag nahi ho sakataa aur ham paramaatmaa se alag ho nahi sakate…jaise ghade kaa aakaash mahaa aakaash se alag nahi ho sakataa..aur mahaa aakaash ghade ke aakaash ko apane se alag nahi kar sakataa..aise hi jivaatmaa paramaatmaa se alag nahi ho sakataa..paramaatmaa jivaatmaa se alag nahi ho sakate..

to aap kaa aur paramaatmaa kaa avibhaajy sambandh hai..

aap ke panch bhautik sharir kaa aur 5 mahaabhuto kaa avibhaajy sambandh hai.. aise hi aap ke sukshm gyaanendriyon kaa aur sukshm bhuton kaa aapas men avibhaajy sambandh hai..


iishwariy rahasy ko, iishwariy lila ko, iishwariy gyaan ko ham nahi jaanate..hamaari man ki kalpanaaon se ham dukh banaa lete…sukh banaa lete..waastav men anukulataa jahaan hoti us ko ham sukh bolate hai..aur pratikulataa hoti us ko ham dukh bolate hai…ye anukulataa aur pratikulataa vidhaayak kaa vidhaan hai..vidhaataa  anukulataa dekar aap ko udaar banaate hai  ki aap un ki taraf aao..pratikulataa dekar vo aap ki aasakti mitaati hai..to vidhaan jo hotaa hai naa vo mangal ke liye hotaa hai.. 

  ham ko jo achhaa nahi lagataa vo bhi hotaa hai to samajho ki vidhaan kalyaan kaari hai..aur jo ham ko achhaa lagataa hai aur vo ham se chhin letaa hai to samajho vidhaan kaa krupaa hai..lekin ham kyaa karate ki jo achhaa lagataa vo chhinaa jaataa hai to hamaari dukhaakaar vrutti banati hai..ham sochate ki ‘main dukhi hai,main  pareshaan hun’ -lekin aisaa dukh aur pareshaani koyi nahi hai jis men hamaaraa kalyaan chhupaa naa ho…isliye ham aap ko haath jod ke praarthanaa karate hai ki kabhi bhi dukh aur pareshaani aaye to aap samajh lenaa ki vidhaayak kaa vidhaan hai..hamaaraa kalyaan karane ke liye aayaa hai…aasakti chhudaane ke liye aayaa hai..sansaar se moh mamataa chhudaane ke liye aayaa hai ..waah prabhu waah!..teri jay ho!..to dukh aap bhajan men badal sakate hai..dukh ko aap gyaan men badal sakate hai ..dukh ko vivek men badal sakate hai..dukh ko dukh haari paramaatmaa men badal sakate hai…to dukh aap ke liye bhagavaan ki praapti kaa saadhan ho jaayegaa..

agar sukh aayaa aur aap us ke bhogi banoge to sukh aap ko khokalaa banaa degaa..jo bhi sukh aayaa aur bhogi bane  hai vo narakon men pade hai , un ko akaaran bimaariyaa huyi hai..jo sukh ko jyaadaa bhogate teji se aids aur naa jaane kyaa kyaa bimaariyon ke shikaar hote..

to aap ko agar jaldi dukhon se paar honaa hai to sukh ki laalach chhod do..sukh ki laalach chhodate hi aap ke antaraatmaa kaa jo sambandh hai vo spasht hogaa..jaise paani par ki sewaal hataane se paani dikhataa hai aise hi sukh ki laalach hataane se sukh kaa madhumay aanand kaa dariyaa laheraane lagataa hai..

dukh ke bhay se aap bhayabhit naa ho..dukh aaye to utsav manaao..waah aa gayaa!achhaa hai..bhalaa huaa..ye dukh aur kasht aasakti mitaa kar hari men priti jagaanewaale hai ..waah prabhuji waah!..baahar se dukh dikhegaa lekin tumhaaraa ishwar sambandhi smaran se  dukh bhi swapnaa ho jaayegaa, sukh bhi swapnaa ho jaayegaa..aanand swarup paramaatmaa apanaa ho jaayegaa..

 

sukh swapnaa dukh bulbulaa

dono hai mehamaan

dono bhi taj dijiye

apane aatm dev ko pahechaan

 

ek hotaa hai kriyaa pradhaan, dusaraa hotaa hai  bhaav pradhaan aur tisaraa hotaa hai kriyaa pradhaan..

 

gitaa men bhagavaan bolate meraa smaran karo aur yudhd karate jaao to ye kriyaa pradhaan smaran hai..jaise driver driving karataa to break par, clach par, staring par sab par dhyaan hai…seth se yaa saathi se baat karataa huaa bhi jaataa hai, lekin sadak kaa bhi puraa dhyaan hai..kal ki paraso ki baat bhi karataa hai lekin sadak par dhyaan ki pradhaanataa hai..kriyaa ki gaunataa hai..athavaa kabhi kriyaa ki pradhaanataa hoti hai, dhyaan ki gaunataa hoti hai..

 

dusaraa hotaa hai ki ham ne jaan liyaa ki hamaaraa bhagavaan ke saath shaaswat sambandh hai..to us men kriyaa ki pradhaanataa nahi hai..samajh ki pradhaanataa hai..jaise aap ne dekh liyaa ki pankhe chal rahe, tube light jal rahe, screen men baapu ka satsang dikhaayi de rahaa hai..is ke pichhe bijali (vidyut ) hai..to aap ko ratanaa nahi padegaa ki pankhe men light hai..tube men light hai..aisaa ratanaa nahi padegaa..sab men vidyut hai vidyut hai aisaa aap ko ratanaa nahi padataa hai..ye gyaan jany smruti huyi..

to jis ko gyaan jany iishwar ki smruti ho jaati hai vo hasate khelate , khaate-pite iishwar ke saath ekaakaar ho jaataa hai!..

naanak vo sadguru mohe bhaave, hasandiyaa, khaavandiyaa, pahenandiyaa wich kar de mugat..

hasate khelate khaate pahenate hamen mukt kar dete…kaahe se mukt kar dete? dukhon se mukt karate..chintaaon se mukt karate..waasanaao se mukt karate..ahankaar se mukt karate..janm maran se mukt karate..

 shrikrushn kahete hai :

karm jo bhi hote prakruti men hote..

 prakruti kaise hoti ki pruthvi, tej, vaayu aakaash, jal ye panch mahaabhut, man budhdi aur ahankaar ye sukshm bhut in ke mishran se ashtadaa prakruti  chalati hai..shrikrushn ne krupaa kar ke yudhd ke maidaan men bahut unchi baat bataa di..ki ashtadaa prakruti se main bhinn hun..ye bataa kar krushn ne maanav samaaj par badi krupaa ki hai ki aap bhi bhinn hai…sharir bimaar hotaa aap us ko jaanate hai, haath aap ko nahi jaanataa aap haath ko jaanate hai..pair aap ko nahi jaanataa aap pairo ko jaanate hai..to panch bhautik sharir ko aap jaanate hai..to murkh aadami jis ko satsang nahi milaa vo sharir bimaar hotaa hai to bolataa hai ‘main bimaar hun’..man men dukh aayaa to bole ‘main dukhi hun’..chitt men chintaa aati to bolataa ki main chintit hun..lekin jis ne guru ki dikshaa li hai, aur satsang sunaa hai vo samajhataa ki sharir bimaar huaa..sharir ko thikthaak karegaa lekin ‘main bimaar hun’maanane se sharir ki bimaari gaheri uatarati hai..man dukhi hai to us kaa upaay karegaa lekin ‘main dukhi hun sochane se dukh gaheraa utarataa ye samajhataa hai..chitt men chintaa aayi to mitaane kaa prayaas karegaa lekin ‘main chintit hun’ aisi bewkufi nahi karegaa..

aur jis ko dikshaa mili aur satsang milaa us ko bhi sansaar men hi dekhate ham lekin vo sansaar men itanaa dukhi nahi hotaa jitanaa niguraa hotaa hai..(kyo ki satsang se samajh milati hai, bhram dur hotaa hai..)

 

bhram aur naasamajhi rakh ke kitane bhi tirath karo, kitana abhi dhan ikaththaa karo, kitani bhi kursiyon ki unchaaii par pahuncho..lekin nirasataa nahi jaayegi..

paramaatmaa ke sambandh ki pahechaan nahi thi to raawan lalanaaon se ras ki bhik maangate maangate gir gayaa..aur hiranyakshyapu ahankaar ko rasilaa banaate banaate gir gayaa..lekin ras-swarup to apanaa aatmaa hai!..khaali sthul sharir ko ‘main’ mat maano…sukshm sharir ke saath judo nahi…jis ke saath tumhaaraa shaashwat sambandh hai khaali us ko jaan lo to abhi abhi aap rasamay ho jaate hai…

aise aap ko bhi ghar men sabhi suvidhaa hote huye bhi yahaa asuvidhaa men baithe ho to ras ke pyaase ho naa? vo badhiyaa suvidhaaye to sthul sharir ko thi, man ko thi…aap ko ras ki jarurat hai ..satsang se aap ko chinmay tarang aa rahe isliye ghanto bhar injaar karate..aaj jeevan saphal ho gayaa..mahesus ho gayaa aisaa sochate..ye satsang jeevan men naa jaane kitane kitane modon par kaam detaa hai…

biti huyi ko pakado mat..vartmaan men ras may jeevan karo..bhagavaan ras-swarup hai, aap unhi ki santaan ho..aap bhi ras may raho..jo vartmaan ko ras may banaataa hai us ka bhut kaal rasmay ho jaataa hai kyoki bhut kaal to beet gayaa, jo hai hi nahi us ka koyi vajud hi nahi..abhi aanand hai…aur bhavishy bhi ras may ho jaataa hai kyo ki bhavishy vartmaan se hi to banegaa..

naa khushi achhi hai naa malaal achhaa hai

ham raaji hai usi men jis men teri rajaa hai..

 

anyathaa bhagavaan krushn ghodaa gaadi chalaate hai arjun ki, arjun ko viraat rup kaa darshan karaate phir bhi arjun kaa bhay nahi jaataa, agyaan nahi jaataa..jab arjun par krupaa kar ke bhagavaan satsang sunaate hai tab arjun kahetaa hai :

nashto moh smrutim labdhvaa

tav prasaadaat mayaa achyut sthiro asmi…

ab main apane aape men sthir ho gayaa hun..meraa aur chaityany swabhaav parameshwar kaa shaashwat sambandh hai…aur ye karm aur kriyaa prakruti kaa hai…

 

to sansaari sampadaa waastav men sampadaa nahi hai..sansaari vipadaa waastav men vipadaa nahi hai..bhagavaan ke saath ke sambandh ki vismruti hi waastav men vipadaa hai aur bhagavaan ke saath kaa sambandh kaa gyaan honaa hi waastav men sampadaa hai…

 bhagavaan ki bhakti bhagavaan kaa gyan aur bhagavaan ke saath aap kaa jo shaashwat sambandh hai us ke aage kisi kaa mahatv nahi….us ke aage naa bimaari ka mahatv hai  naa naa mrutyu kaa mahatv hai..naa kangaaliyat kaa mahatv hai naa dhan kaa mahatv hai….

aap kaa bhagavaan ke saath kaa shaashwat sambandh badaa mahatv purn hai…

bhagavaan se hujjat karane waale bhakt bolate hamaaraa kuchh aur hi andaaj  hai..hamen us par naaj hai to use ham par bhi naaj hai..

ye kahaavat ab lakhanau waale lalaon par laagu ho rahi hai…lakhano waalo kaa bhi kuchh aur hi andaaj hai..unhe baapu par naaj hai to baapu ko bhi un par naaj hai…

 

OM SHAANTI.

 

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare….   

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