प्रभु के मंगलमयी विधान

द्वारिका सत्संग अमृत; 5 एप्रिल 2012 (सुबह का सत्र)

 

 प्रत्येक विषय में, प्रत्येक भोग में, प्रत्येक कर्म में ज्ञान  अग्रभाग पर रहेता है..सुखद वस्तु में भी ज्ञान होता है … और दुखद वस्तु में सुखद की भ्रमणा से सुख होता है…और सुखद वस्तु में दुखद भ्रमणा से दुख होता है..लेकिन भ्रमणा जिस चैत्यन्य के आगे खड़ी होती है…. वो हो हो के बदल जाती है लेकिन चैत्यन्य  ज्यूँ का त्यों रहेता है…

दुख का मूल क्या है?

की हम मंगलमय प्रभु के विधान की महिमा नही जानते..विधान यह है की सब का कैसे मंगल हो? और विधान करनेवाला कोई पार्टी का गुलाम नही है और कोई लालच का चमचा नही है..वो विधान करने वाला स्वयं सर्व समर्थ है जो सर्व देश में , सर्व काल में, सर्व वस्तु में उस की अपनी स्वतंत्र सत्ता है और परम हीत करनेवाले प्रभु का यह विधान है..

सुख आता है फिर चला जाता है यह उस का विधान है..कोई कितना भी प्रयत्न करे की दुख ना आए ,लेकिन विधान का कोई उल्लंघन नही कर सकता है- दुखद अवस्था आएगी.

सुख ना आए ऐसा कोई प्रयत्न करे तो भी सुख आएगा…

प्रतिकूलता नही चाहो तो भी आएगी और अनुकूलता नही चाहो तो भी आएगी…लेकिन अनुकूलता में राग कर के फंसो  अथवा साक्षी हो कर ईश्वर में आओ तुम्हारे हाथ की बात है..प्रतिकूलता में तपो, दुखी हो तुम्हारे हाथ की बात है..और प्रतिकूलता को साधन मान कर विवेक वैराग्य जगा कर जीवन मुक्त हो जाओ तुम्हारे हाथ  की बात है…लेकिन विधान मंगलमय है..

अगर श्रम के बाद आदमी को थकान नही होती तो अथवा मिली हुई चीज़ बिछड़ती  नही तो ये संसार संसार ही नही रहेता, महा घोर नरक  हो जाता…

हम मृत्यु नही चाहते लेकिन विधान में मृत्यु है..हम दुख नही चाहते लेकिन विधान में दुख है…तो विधान में सुखद दुखद अवस्था, जन्म -मृत्यु ये जो व्यवस्था है वो हमारे विकास के लिए आत्यांतिक आवश्यक है..उस व्यवस्था के आड़े आते तब ही दुखी होते…ईश्वर की हाँ  में हाँ अगर नही करते तो दुख पैदा होता है..बच्चा माँ बाप की हाँ में हाँ  नही करता- माँ  बाप उसे स्कूल ले जाना चाहते है…तो ऐसा बच्चा ज़्यादा मार खाता है, ज़्यादा दुखी होता है..लेकिन जो बच्चे माँ-बाप के कहेने से स्कूल जाते, जो बताए वो करते है तो उन को इतना मार नही खाना पड़ता..जो हठी है वो परेशान हो कर पढ़ता  है और जो समझदार है वो हसते खेलते पढ़ लेता है..ऐसे ही ये संसार उस परम स्वरूप ईश्वर का है…

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

 

एक तो ईश्वर का स्वरूप होता है ; दूसरा ईश्वर का स्वभाव होता है और तीसरा ईश्वर का गुण होता है..

ईश्वर के स्वरूप का पता चले तो आप ईश्वर से अलग नही हो सकते..घड़े के आकाश को महा आकाश का पता चले तो घड़े का आकाश बोलेगा , ‘मैं घड़ा नही हूँ, घड़ा तो बाहर का है..मैं तो आकाश ही हूँ’…तरंग को पता चले पानी का तो वो पानी से मिलने नही जाएगी, वो स्वयं पानी है… ऐसे ही भगवान के स्वरूप का पता चले की भगवान क्या है? तो जीव अपने को जीव मान कर दुखी-सुखी होने के झंझट से पार हो जाएगा ! ईश्वर से एक हो जाएगा!!

और ईश्वर के स्वभाव को अगर जान ले तो ईश्वर के शरणापन्न हो जाएगा..ईश्वर का स्वभाव रसमय  है, चिन्मय है, सुखमय  है, करुणामय है ,  भक्त-वत्सल है…निर्गुण  निराकार ईश्वर होते हुए भी भक्त की भावना से साकार हो जाता है…असीम होते हुए भी सीमित हो जाता है…अ-चाह होते हुए भी चाह वाला बन जाता है..

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

 कृष्ण की माँ का नाम यशोदा है..और राधा की माँ  का नाम कीर्ति है…यश और कीर्ति पर्याय वाचक है.. यशोदा ने श्री कृष्ण को जन्म नही दिया था लेकिन यशोदा के साथ श्री कृष्ण की इतनी… इतनी एक तानता है की देवकी की उतनी नही है…धन्य है यशोदा!..देवकी ने श्री कृष्ण को जन्म दिया था, यशोदा ने जन्म नही दिया था फिर भी यशोदा कृष्ण के साथ  एकमेक हो गयी की यश भगवान को देनेवाली वृत्ति है…तो जन्म देनेवाली देवकी से भी यश देनेवाली यशोदा विशेष लाभ उठाती है..देवकी क्यूँ नही लाभ ले पाती की चतुर्भुजी नारायण प्रगट हुए..अरे!इतने विराट भगवान मेरे बेटे कैसे हो सकते है?…तो देवकी को तो चतुर्भुजी दिखे बाद में नन्हे बने..देवकी जानती थी की ये चतुर्भुजी आदि नारायण है ..मैं उन को पुत्र कैसे मानूँगी?…लेकिन यशोदा ने आँख खोली तो उन को पुत्र रूप में ही पाया..यशोदा ने कोई संदेह नही किया, कोई चतुर्भुजी रूप देखा ही नही..मेरा मान लिया सीधा!

तो जिस की बुध्दी भगवान को अपना मान लेती है उस की बुध्दी में भगवान एक-मेक हो जाते है..

तो कितना भी दुख आए, कितनी भी हमारे विपरीत परिस्थिति आए समय की धारा में सब परिवर्तन होते होते सभी का मंगल ही मंगल है..जैसे बोलते – साधु से हो ना कारज हानि..ऐसे साधुओं के साधु परमात्मा से भी हमारी हानि नही होती..भले ही हमारी दुखद अवस्था आती है लेकिन उस में भी विकास है…सुखद अवस्था आती है , उस के लोलुप ना बने तो उस में भी विकास है..सुखद अवस्था उदार बनाने के लिए और दुखद अवस्था संयमी और विवेकी बनाने के लिए आती है..और कोई भी अवस्था सदा नही रहेती है..

  ‘मेरा ऐसा रहे , ऐसा रहे’ -ऐसा नही सोचे..प्रेमी भक्त को मेरा ऐसा रहे सोचने की ज़रूरत क्या है? ये तो विपरीत जा रहे हो..वाह प्रभु ! जो थारी मर्ज़ी ते म्हारी मर्ज़ी!!वाह प्रभुजी वाह!!

 

एक संत ने व्रत लेके रखा था की सर्वत्र तू है तो अब हम मौन रहेंगे..बोलेंगे तो आखरी दम पर बोलेंगे..वो सीमा पर टहेल रहे थे..टहेलते टहेलते शत्रु पक्ष की सीमा में चले गये..मिलिटरी की सीमा सुरक्षा वालों ने संत को पकड़ लिया..पुछे की कौन हो? तो संत का तो मौन था..बोलते नही तो खूब हिलाये  डुलाये ..चलो ले चलो इन को कर्नल के पास..कर्नल ने बोला नही बोलता है तो इस को दंड दो..नही कैसे बोलेगा, मुँह खोलो… भाला रखो…बोलो बोलो खूब किए..लेकिन बाबा नही बोले..कर्नल दारू पिया होगा या नियती ऐसी होगी तो वो बोला भाला भोंक दो.. तो साधु के शरीर से रक्त की धार बही..तब साधु बोलता है, “यार! तू भाला बन के आएगा तो भी मैं तुझे पहेचान लूँगा! मृत्यु भी तू है..अमरता भी तू है!! इस शरीर का यही प्रारब्ध होगा…ओम ओम ओम ओम ओम… ” इतना बोला और संत ने चोला छोड़ दिया…

अब इस बात पर दोषारोपण करने वाले बोलेंगे की संत की कैसी दुर्दशा हुई…कोई कैसे बोले तो कोई कैसे..लेकिन जो आता है वो जाता है..ये संत तो भाले में भी प्रभु की व्यवस्था देख रहे है!..कितनी उँची नज़रिया है…

 

सभी प्राणी भय और शोक से आक्रांत है..

भय क्यों होता है की मिली हुई चीज़ चली ना जाए..अथवा हमारे प्रतिकूल अवस्था ना आए..

और दुख क्यो होता है की जैसा चाहते वैसा नही होता है इसलिए दुखी होते..तो ईश्वर के मंगलमय विधान का भान नही है…इसलिए भय और शोक बना रहेता है..जो बीत गया तो  ऐसा क्यों हुआ, ऐसा नही होना चाहिए था..पिताजी मर गये..शोक कर रहे..पत्नी मर गयी..शोक कर रहे.. शोक करने से वो जिंदी हो के तो आएगी नही..शोक बेवकूफी का कारण है…भय भी बेवकूफी कारण है…आत्मा तो अमर है, भगवान भी उस को नही मार सकते और शरीर मरने वाला है, भगवान ने भी इस को नही रखा तो भय किस बात का? ये नासमझी है की ये चला ना जाए इस का भय..अथवा ऐसा ना हो इस का भय..हो हो के होगा तो प्रकृति में होगा और अपने मन माना होगा तो भी प्रकृति में होगा..प्रकृति में तो परिवर्तन है..मन-माना हो के भी मीट जाएगा और मन -माना ना होने पर भी मीट जाएगा..अमीट तो मेरा आत्मा है- परमात्मा है!..ओम आनंद!वाह प्रभुजी!!वाह!.. भगवान को यश दे दो..यशोदा हो जाओ..मौज हो गयी! 🙂

 

देवकी ने तो प्रसूति का दुखड़ा सहा फिर भी श्रीकृष्ण का आनंद माधुर्य यशोदा जी ने ज़्यादा पाया..भगवान को यश दो..जो भी परिस्थिति आई बोलो वाह प्रभु  वाह!…

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

 

 कितनी भी विपरीत परिस्थिति आए, कितना भी दुख आए लेकिन धीरज रखोगे तो पता चलेगा की अपने मन की तो होते होते आदमी को मन का गुलाम बनने की आदत हो जाती है..मन की हो तो खुश नही होंगे तो चलेगा लेकिन अपने मन की ना हो तब ज़्यादा खुश होना चाहिए की वाह प्रभु वाह!प्रभु के विधान की हुई है..हमारी मनमुखता नही बढ़े इसलिए भगवान ने अपनी तरफ से किया है ..वाह प्रभु वाह!..अपनी मन की होने पर तो कुत्ता भी पुंछ हिलाता है लेकिन अपनी मन की ना हो तो भी प्रसन्न रहो..

ना भय करो, ना शोक करो , ना बेईमानी करो..वाह प्रभु वाह!

कबीरा आप ठगाइए

और ना ठगिए कोई

आप ठगे सुख उपजे

और ठगे दुख होई

 

आप भले ठगे जाए, औरों को बेईमानी कर के ठगे नही..तो नश्वर जाएगा, शाश्वत हृदय का विकास होगा..तो सारे जप, सारे तीर्थ, सारे उपवास का फल यही है की हमारी विषय विकारो वाली, वासना वाली मती बदल जाए…निर-विषय नारायण में, नित्य नवीन रस में, नित्य नवीन सामर्थ्य में, नित्य नवीन आरोग्य के अद्भुत अंतरतम चैत्यन्य में पहुँचे….

 

 तो काम विकार से बचे, क्रोध से बचे,लोभ से बचे, शोक से बचे, मोह से बचे, अभिमान से बचे, भय से बचे..इन सब से तपस्या कर के बल पूर्वक बचे और भगवान का रस नही आए तो सब व्यर्थ्य हो गया!लेकिन इन से बच के भगवान का रस पाते गये तो सब सार्थक हो गया.. 🙂

रस-हीन जीवन गड़बड़ करेगा…अभिमान होता है..पुण्य का भी अभिमान होता है और पाप का भी अभिमान होता है..

ये समझना है की विषय विकारों के आकर्षण में अपने को घसीटना नही है लेकिन निर्विकार नारायण की , साकार नारायण की भक्ति, प्रीति, ज्ञान और उन के संविधान में हो के हृदय में हरि का रस पान करो.. मन की निरसता जाती रहे.. 

अहंकार से मूढ़ात्मा अपने को कर्ता मानता है..होता प्रकृति में है..

उमा राम स्वभाव जे ही जाना

ताही भजन बीन भाव ना आना ll

भगवान का स्वरूप, भगवान का स्वभाव और भगवान के गुण जान लो..भगवान का स्वभाव जो जानेगा तो वो भजन नही छोड़ेगा..

भगवान कहेते : सुहुर्दम सर्व भूतानां…

प्राणी मात्र का मैं सुहुर्द हूँ ..ऐसा मानोगे तो प्रत्यय आएगा..इसलिए मान लीजिए ना…की भगवान सुहुर्द है, शाश्वत है..ऐसा मानने से तुम्हारा भय, शोक, निरसता जाकर  निर्भयता, निशोकता और अंतरात्मा की सरलता आएगी…

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

अनित्यानी शरीरानी

वैभवनैव शाश्वत

नित्य संहीतो मृत्यु

कर्तव्य धर्मसंग्रह

 

शरीर अनित्य है..वैभव शाश्वत नही है..और नित्य श्वासोशवास में मृत्यु की तरफ हम जा रहे..कर्तव्य यह  है की धर्म संग्रह करे…धर्म क्या है? जिस ने सारे ब्रम्‍हांडो को धारण कर रखा है…उसी ने हमारे शरीर को भी धारण कर रखा है..उसी की सत्ता से श्वासोशवास चलते है..उसी की सत्ता से बाल बढ़ते है..उसी की सत्ता से मन के संकल्प विकल्प होते है..बुध्दी के निर्णय होते है..निर्णय बदलते फिर भी वो ज्यों का त्यों जानता है..उस को जानना ही धर्म है…जिस ने सब को धारण किया है उस में विश्रान्ति पाना ही धर्म है..

यतो  धर्म ततो  जय  ll

जहा धरम है, इंद्रिय संयम है,एकाग्रता है, दूसरे को ठगने का भाव नही है,शरीर में अहंता नही, ममता नही, भगवान में अपनापन-भगवान मेरे, मैं भगवान का ऐसा भाव है ..इस से बहोत  कल्याण हो जाता है..  

 

 

हरि ओम … हरि ओम.

 

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो!!!!!

ग़लतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे…

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

Dwarikaa Satsang Amrut; 5 April 2012 (subah ka satr)

pratyek vishay men, pratyek bhog men, pratyek karm men  gyaan agrabhaag par rahetaa hai..sukhad vastu men bhi gyaan hotaa hai … aur dukhad vastu men sukhad ki bhramanaa se sukh hotaa hai…aur sukhad vastu men dukhad bhramanaa se dukh hotaa hai..lekin bhramanaa jis chaityany ke aage khadi hoti hai…. vo ho ho ke badal jaati hai lekin chaityanya jyun kaa tyon rahetaa hai…

dukh kaa mul kyaa hai?

ki ham mangalamay prabhu ke vidhaan ki mahimaa nahi jaanate..vidhaan yah hai ki sab ka kaise mangal ho? aur vidhaan karanewaalaa koyi paarty ka gulaam nahi hai aur koyi laalach ka chamachaa nahi hai..vo vidhaan karane waalaa swayam sarv samarth hai jo sarv desh men , sarv kaal men, sarv vastu men us ki apani swatantr sattaa hai aur param heet karanewaale prabhu kaa yah vidhaan hai..

sukh aataa hai phir chalaa jaataa hai yah us kaa vidhaan hai..koyi kitanaa bhi prayatn kare ki dukh naa aaye ,lekin vidhaan kaa koyi ullanghan nahi kar sakataa hai- dukhad awasthaa aayegi.

sukh naa aaye aisaa koyi prayatn kare to bhi sukh aayegaa…

pratikulataa nahi chaaho to bhi aayegi aur anukulataa nahi chaaho to bhi aayegi…lekin anukulataa men raag kar ke phanso athavaa saakshi ho kar iishwar men aao tumhaare haath ki baat hai..pratikulataa men tapo, dukhi ho tumhaare haath ki baat hai..aur pratikulataa ko saadhan maan kar vivek vairaagy jagaa kar jeevan mukt ho jaao tumhaare jaath ki baat hai…lekin vidhaan mangalamay hai..

agar shram ke baad aadami ko thakaan nahi hoti to athavaa mili huyi chij bichhadati nahi to ye sansaar sansaar hi nahi rahetaa, mahaa ghor narak  ho jaataa…

ham mrutyu nahi chaahate lekin vidhaan men mrutyu hai..ham dukh nahi chaahate lekin vidhaan men dukh hai…to vidhaan men sukhad dukhad awasthaa, janm -mrutyu ye jo vyavasthaa hai vo hamaare vikaas ke liye aatyantik aawashyak hai..us vyavasthaa ke aade aate tab hi dukhi hote…iishwar ki haan men haan agar nahi karate to dukh paidaa hotaa hai..bachchaa maa baap ki haan men haan nahi karataa- maan baap use skul le jaanaa chaahate hai…to aisaa bachchaa jyaadaa maar khaataa hai, jyaadaa dukhi hotaa hai..lekin jo bachche maan-baap ke kahene se skul jaate, jo bataaye vo karate hai to un ko itanaa maar nahi khaanaa padataa..jo hathi hai vo pareshaan ho kar bhi karataa hai aur jo samajhdaar hai vo hasate khelate padh letaa hai..aise hi ye sansaar us param swarup iishwar kaa hai…

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

 

ek to iishwar kaa swarup hotaa hai ; dusaraa iishwar kaa swabhaav hotaa hai aur tisaraa iishwar kaa gun hotaa hai..

iishwar ke swarup kaa pataa chale to aap iishwar se alag nahi ho sakate..ghade ke aakaash ko mahaa aakaash kaa pataa chale to ghade kaa aakaash bolegaa , ‘main ghadaa nahi hun, ghadaa to baahar kaa hai..main to aakaash hi hun’…tarang ko pataa chale paani kaa to vo paani se milane nahi jaayegi, vo swayam paani hai… aise hi bhagavaan ke swarup kaa pataa chale ki bhagavaan kyaa hai? to jeev apane ko jeev maan kar dukhi-sukhi hone ke jhanjhat se paar ho jaayegaa!iishwar se ek ho jaayegaa!!

aur iishwar ke swabhaav ko agar jaan le to iishwar ke sharanaapann ho jaayegaa..iishwar kaa swabhaav rasamay hai, chinmay hai, sukhamay hai, karunaamay hai, bhakt-vatsal hai…nirgun niraakaar iishwar hote huye bhi bhakt ki bhaavanaa se saakaar ho jaataa hai…aseem hote huye bhi simit ho jaataa hai…a-chaah hote huye bhi chaah waalaa ban jaataa hai..

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

 krishn ki maa kaa naam yashodaa hai..aur raadhaa ki maa kaa naam kirti hai…yash aur kirti paryaay vaachak hai.. yashoda ne shri krishn ko janm nahi diyaa thaa lekin yashodaa ke saath shri krushn ki itani itani ek taanataa hai ki devaki ki utani nahi hai…dhany hai yashodaa!..devaki ne shri krushn ko janm diyaa thaa, yashodaa ne janm nahi diyaa thaa phir bhi yashodaa krushn ke saath  ekmek ho gayi ki yash bhagavaan ko denewaali vrutti hai…to janm denewaali devaki se bhi yash denewaali yashodaa vishesh laabh uthaati hai..devaki kyun nahi laabh le paati ki chaturbhuji narayan pragat huye..are!itane veeraat bhagavaan mere bete kaise ho sakate hai?…to devaki ko to chaturbhuji dikhe baad men nanhe bane..devaki jaanati thi ki ye chaturbhuji aadi naaraayan hai ..main un ko putr kaise maanungi?…lekin yashodaa ne aankh kholi to un ko putr rup men hi paayaa..yashodaa ne koyi sandeh nahi kiyaa, koyi chaturbhuji rup dekhaa hi nahi..meraa maan liya sidhaa!

to jis ki budhdi bhagavaan ko apanaa maan leti hai us ki budhdi men bhagavaan ek-mek ho jaate hai..

to kitanaa bhi dukh aaye, kitani bhi hamaare viparit parishiti aaye 

samay ki dhaaraa men sab parivartan hote hote sabhi kaa mangal hi mangal hai..jaise bolate saadhu se howe naa kaaraj haani..aise sadhuon ke saadhu paramaatmaa se bhi hamaari haani nahi hoti..bhale hi hamaari dukhad awasthaa aati hai lekin us men bhi vikaas hai…sukhad awasthaa aati hai , us ke lolup naa bane to us men bhi vikaas hai..sukhad awasthaa udaar banane ke liye aur dukhad awasthaa sanyami aur viveki banane ke liye aati hai..aur koyi bhi awasthaa sadaa nahi raheti hai..

meraa aisaa rahe aisaa rahe nahi soche..premi bhakt ko mera aisa rahe sochane ki jarurat kya hai? ye to viparit jaa rahe ho..waah prabhu ! jo thaari marji te mhaari marji!!waah prabhuji waah!!

 

ek sant ne vrat leke rakhaa thaa ki sarvatr tu hai to ab ham maun rahenge..bolenge to aakhari dam par bolenge..vo simaa par tahel rahe the..tahelate tahelate shatru paksh ki seemaa men chale gaye..military ki simaa surakshaa waalon ne sant ko pakad liyaa..puchhe ki kaun ho? to sant ka to maun thaa..bolate nahi to khub hilaayaa dulaayaa..chalo le chalo in ko karnal ke paas..karnal ne bolaa nahi bolataa hai to is ko dand do..nahi kaise bolegaa, munh kholo bhaalaa rakho…bolo bolo khub kiye..lekin baba nahi bole..karnal daaru piyaa hoga yaa niyati aisi hogi to vo bolaa bhaalaa bhonk do.. to saadhu ke sharir se rakt ki dhaar bahi..tab saadhu bolataa hai, “yaar!ti bhaalaa ban ke aayegaa to bhi main tujhe pahechaan lungaa! mrutyu bhi tu hai..amarataa bhi tu hai!! is sharir kaa yahi praarabdh hogaa…om om om om om… ” itanaa bolaa aur sant ne cholaa chhod diyaa…

ab is baat par doshaaropan karane waale bolenge ki sant ki kaisi durdashaa huyi…koyi kaise bole to koyi kaise..lekin jo aataa hai vo jaataa hai..ye sant to bhaale men bhi prabhu ki vyavasthaa dekh rahe hai!..kitani unchi najariyaa hai…

 

sabhi praani bhay aur shok se aakraant hai..

bhay kyon hotaa hai ki mili huyi chij chali naa jaaye..athavaa haamaare pratikul awasthaa naa aaye..

aur dukh kyo hotaa hai ki jaisaa chaahate waisaa nahi hotaa hai isliye dukhi hote..to iishwar ke mangalmay vidhaan kaa bhaan nahi hai…isliye bhay aur shok banaa rahetaa hai..jo beet gayaa aisaa kyon huaa, aisaa nahi honaa chaahiye thaa..pitaaji mar gaye..shok kar rahe..patni mar gayi..shok kar rahe.. shok karane se vo jindi ho ke to aayegi nahi..shok bewkufi kaa kaaran hai…bhay bhi bewkufi kaaran hai…aatmaa to amar hai, bhagavaan bhi us ko nahi maar sakate aur sharir marane waalaa hai, bhagavaan ne bhi is ko nahi rakhaa to bhay kis baat ka? ye naasamajhi hai ki ye chalaa naa jaaye is kaa bhay..athavaa aisaa naa ho is ka bhay..ho ho ke hogaa to prakruti men hogaa aur apane man maanaa hogaa to bhi prakruti men hogaa..prakruti men to parivartan hai..man-maanaa ho ke bhi meet jaayegaa aur man -maanaa na hone par bh i meet jaayegaa..ameet to meraa aatmaa hai- paramaatmaa hai!..om aanand!waah prabhuji!!waah!.. bhagavaan ko yash de do..yashodaa ho jaao..mauj ho gayi! 🙂

 

devaki ne to prasuti kaa dukhadaa sahaa phir bhi shrikrushn kaa aanand maadhury yashodaa ji ne jyaadaa paayaa..bhagavaan ko yash do..jo bhi paristiti aayi waah prabhu  waah!…

 

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

 

 kitani bhi viparit paristhiti aaye, kitana abhi dukh aaye lekin dhiraj rakhoge to pataa chalegaa ki apane man ki to hote hote aadami ko man kaa gulaam banane ki aadat ho jaati hai..man ki ho to khush nahi honge to chalegaa lekin apan eman ki naa ho tab jyaadaa khush honaa chaahiye ki waah prabhu waah!prabhu ke vidhaan ki huyi hai..hamaari man mukhataa nahi badhe isliye bhagavaan ne apani taraf se kiyaa hai ..waah prabhu waah!..apani man ki hone par to kuttaa bhi puchh hilaataa hai lekin apani man ki naa ho to bhi prasann raho..

naa bhay karo, naa shok karo , naa beiimaani karo..waah prabhu waah!

kabiraa aap thagaayiye

aur naa thagiye koyi

aap thage sukh upaje

aur thage dukh hoyi

 

aap bhale thage jaaye, aurn ko beiimaani kar ke thage nahi..to nashwar jaayegaa, shaashwat hruday kaa vikaas hogaa..to saare jap, saare tirth, saare upawaas ka phal yahi hai ki hamaari vishay vikaaro waali, waasanaa waali mati badal jaaye…nir-vishay naaraayan men, nitya navin ras men, nitya navin saamarthy men, nitya navin aarogy ke adbhut antartam chaityany men pahunche….

 

 to kaam vikaar se bache, krodh se bache,lobh se bache, shok se bache, moh se bache, abhimaan se bache, bhay se bache..in sab se tapasyaa kar ke bal purvak bache aur  bhagavaan ka ras nahi aaye to sab vyarthya ho gayaa!lekin in se bach ke bhagavaan ka ras paate gaye to sab saarthak ho gayaa.. 🙂

ras-heen jeevan gadbad karegaa…abhimaan hotaa hai..punya kaa bhi abhimaan hotaa hai aur paap ka bhi abhimaan hotaa hai..

ye samajhanaa hai ki vishay vikaaron ka aakarshan men ghasitanaa nahi hai lekin nirvikaar naaraayan ki , saakaar naaraayan ki bhakti, priti gyaan aur un ke savidhaan men ho ke hruday men hari kaa ras paan karo.. man ki nirasataa jaati rahe.. 

ahankaar se mudhaatmaa apane ko kartaa maanataa hai..hotaa prakruti men hai..

umaa raam swabhaav je hi jaanaa

tehi bhajan binu bhaav naa aanaa ll

bhagavaan kaa swarup, bhagavana ka swabhaav aur bhagavaan ke gun jaan lo..bhagavaan ka swabhaav jo jaanegaa to vo bhajan nahi chhodegaa..

 

suhurdam sarv bhutaanaam…praani maatr ka main suhurd hun ..aisaa maanoge to pratyay aayegaa..isliye maan lijiye naa…ki bhagavaan suhurd hai, shaashwat hai..aisaa maanane se tumhaaraa bhay, shok, nirasataa jaakar  nirbhayataa, nishokataa aur antaraatmaa ki saralataa aayegi…

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

anityaani shariraani

vaibhavnaiv shaashwat

nitya sanhito mrutyu

kartyavya dharmsangrah

 

sharir anity hai..vaibhav shaashwat nahi hai..aur nitya shwaasoshwaas men mrutyu ki taraf ham jaa rahe..kartyavya hai dharm sangrah kare…dharm kyaa hai? jis ne saare bramhaando ko dhaaran kar rakhaa hai…usi ne hamaare sharir ko bhi dhaaran kar rakhaa hai..usi ki sattaa se shwasoshwaas chalate hai..usi ki sattaa se baal badhate hai..usi ki sattaa se man ke sankalp vikalp hote hai..budhdi ke nirnay hote hai..badalate phir bhi vo jyon kaa tyon jaanataa hai..us ko jaananaa hi dharm hai…jis ne sab ko dhaaran kiyaa hai us men vishraanti paanaa hi dharm hai..

yato dharm tato jay ll

jahaa dharam hai, indriy sanyam hai,ekaagrataa hai, dusare ko thagane kaa bhaav nahi hai,sharir men ahantaa nahi, mamataa nahi, bhagavaan men apanaapan-bhagavaan mere, main bhagavaan kaa..is se bahot kalyaan ho jaataa hai..  

 Hari Om Hari Om.

 SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare…

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