अभ्यास-रुचि–रति

 

द्वारिका सत्संग अमृत; 3 एप्रिल 2012

शाम का सत्र

 

 

(पूज्यश्री बापूजी ने दिव्य विश्रान्ति योग का ध्यान कराया..)

 

जो सर्व मंगल में रत है ऐसे पुरुषों का संपर्क, सर्व मंगलमय परमात्मा है उस में विश्रान्ति, सर्व मंगलमय परमात्मा का नाम और सर्व मंगलमय नज़रिया से सब मंगलमय है, सब वाशुदेव है…अ-मंगल भी गहेराई में मंगल के लिए ही आता है – ऐसी सूझ-बुझ सर्व मंगल में टीके हुए महा पुरुषों को प्राप्त हो जाती है..उस में बुध्द , अ-बुध्द, नि-बुध्द सर्व का साथ-सहकार मिलता और सभी भागीदार हो जाते है..सब प्रभु प्रेमी हो जाते है..प्रभु में विश्रान्ति पाते है..अभिमान नही टिकता,आत्म ज्ञान  टिकता है.. ‘मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे है’ ये स्वमानतीकता है; अभिमान नही…नम्रता आती है..सहजता आती है..जन-बल, बुध्दी-बल, शरीर-बल, द्रव्य-बल ये सच्चा नही है; लेकिन भगवत प्रेम-बल मंगलमय बल है – सच्चा बल है..उस के आगे  ‘सर्प विषैले बाबा तेरे वश में’ हो जाते है…ये सर्व – सर्वसुमंगल की पहेचान है…ऐसे सर्वमंगल से प्रेम, सेवा, स्नेह, समर्पण सहेज में हो जाता है…

तो पहेले अभ्यास करना पड़ता है भगवत भक्ति का, जप-ध्यान का…यही अभ्यास रूचि हो जाता है..रूचि में सुख मिलने लगता है..फिर वो रूचि परिपक्व हो कर रति बन जाता है..

योग की भाषा में कहे तो अभ्यास को धारणा बोलते है…रूचि अवस्था आए तो ध्यान बोलते है…और रति अवस्था आए तो समाधि सुख में स्थिति…

 

ज्ञान  की भाषा में कहे तो परमात्म प्राप्ति की प्रथम भूमिका है  अभ्यास, रूचि दूसरी भूमिका है और रति तीसरी भूमिका है..

 

भक्ति की भाषा में कहे तो अभ्यास वैदि भक्ति है, रूचि साधन भक्ति है और रति प्रेमा भक्ति है…

 

अभी जिस को ध्यान में विलक्षण अनायास सुख मिला ये आयास का सुख नही है… ये प्रयास का सुख नही, विकारों का सुख नही है..ये भगवत अभ्यास का सुख है…ये भगवत रूचि का सुख है, किसी को भगवत रति का सुख मिला ..जिस की जैसी आंतरिक अवस्था हो ऐसा सुख मिला…बहुत लाभ हुआ..भगवान में शांत होना, भगवान को अपना मानना ऐसा अभ्यास होने से सुख के बड़े बड़े आकर्षण तुम को संसार में नही फिसलाएँगे..दुख के बड़े बड़े पहाड़ तुम को दबाएँगे नही..तुम्हारी तो वो नज़रिया रहेगी की,  “संसार स्वपना है, इस को जाननेवाला चैत्यन्य प्रभु अपना है” …ओम ..ओम..ओम…फिर मन कही इधर उधर गया तो थोड़ा  कीर्तन कर लिया, थोड़ा ध्यान कर लिया…तो बड़ा रस-मय  जीवन होता है..

ये अभ्यास जब रूचि बन जाता है तब कही जा कर बैठे जैसे समुद्र तट पर पानी को देखते-देखते, चंद्रमा को देखते-देखते हृदय रस-मय  हो जाएगा…जिस को भगवान की भक्ति का अभ्यास हो जाता है उस के जीवन में दुख विघ्न बाधा  भी भगवान की भक्ति हो जाते है..

नरसी मेहता के जीवन मे ये देखने को मिलता है..

नरसी मेहता की पत्नी भगवान को प्राप्त हुई..नरसी  मेहता जी से  ईर्षा करनेवाले  पंडे बोलने लगे की तुम ने बहोत  जगह भोजन कर लिया , अब तुम्हारी बारी है की पत्नी के सद्गति निमित्त 12 वे/13वे दिन समाज को भोजन के लिए आमंत्रित करो…नरसी मेहता के पास तो कोई पैसे नही थे..7 आदमी को भी नही जिमा सकते तो पूरे गाँव को – 7 हज़ार आदमी को कहा से खाना खिलावेंगे?…चंड ब्राम्हणो ने कहा , ‘नही, ये फ़ैसला है..जीमाना ही पड़ेगा..’

नरसी  मेहता जी थोड़ी देर शांत हो गये..अभ्यास था भगवान में शांत होने का…अंदर से प्रेरणा हुई…बोले, ‘अच्छा जो आप बोलते ठीक है..’

वो जो चंड ब्राम्हण थे सोचे की आज अच्छा फ़साया नरसी मेहता को…ग़रीब है..कहाँ से शीधा लाएगा, कहाँ से पूरे गाँव को जिमाएगा…

इतने में उस गाँव (जूनागढ़) में  4 यात्री आए..गाँव में पूछने लगे की हम जाएँगे द्वारिका..हमारे पास 700 रूपीए है..(आज के 70 हज़ार मान लो)…रास्ते में चोर-लुटेरे लूट लेंगे..ऐसा कोई है जो हमें द्वारिका में ये पैसा दे , हम इधर जमा करा देते है..

चंड ब्राम्‍हणों ने देखा की नरसी मेहता को बदनाम करने का अच्छा मोका है..

बोले, ‘अरे नरसी मेहता की तो द्वारिका में पेढ़ियाँ चलती है..उधर जमा कराओ  तो द्वारिका में मिलेगा…’.. चंड ब्राम्‍हण सोचे की ये 4 ब्राम्‍हण यात्री इधर नरसी मेहता को पैसे दे देंगे, उधर द्वारिका में पैसे मिलेंगे नही तो यहा आकर नरसी मेहता को मारेंगे..अच्छी मार खिलाएँगे नरसी मेहता को..

चारो ब्राम्‍हण नरसी मेहता जी के पास आए..बोले आप ये 700 रूपिया ले लो और हम को चिठ्ठी लिख दो..जूनागढ में आप की जो पेढ़ियाँ चलती है उधर हम को ये पैसा मिले ऐसा हमारा काम कर दो…नरसी मेहता जी ने कहा , ‘मेरी तो कोई पेढ़ी  नही..मैं तो ग़रीब ब्राम्‍हण हूँ..कीर्तन करता हूँ..रूखा सूखा खाता हूँ..’

4 ब्राम्‍हण यात्री बोले, ‘अच्छे आदमी ऐसा ही कहेते है..’

हाँ ना बहुत किया लेकिन वे यात्री माने ही नही..हाथा जोड़ी कर के प्रार्थना करने लगे… तो नरसी मेहता जी सोचे ये भी कोई ईश्वर की लीला है, व्यवस्था है..700 रूपिया ले लेंगे, गाँव में भंडारा कर देंगे…बाकी का काम ठाकुर जी द्वारिकाधीश कर लेंगे!

द्वार माने तुम्हारा हृदय..उस का धिश ईश्वर का संकल्प उठा है… ब्राम्‍हण तो चलते बने..पैदल का जमाना था..

नरसी मेहता जी ने चंड ब्राम्हणो के कहेने में आ कर पत्नी के मृत्यु के 12वे,13वे दिन का भंडारे का न्यौता दे दिया..700 रूपिया वो जमाने में बहुत था.. खूब लड्डू बने और भंडारा हुआ..

नरसी मेहता सोचने लगे की वो ब्राम्‍हण तो अभी द्वारिका पहुँचेंगे..मैने तो लिख दिया- ‘साँवरिया सेठ वासुदेव’… हे वाशुदेव तू सर्वत्र है..मेरी लाज रखना..

म्हारी हुंडी स्वीकार जो महाराज रे शामडा गिरिधारी..तुम ने भक्तो के दुख हारे है, भक्तों के मनोरथ पूर्ण किए है..तुम ने प्रहलाद के लिए स्तंभ में प्रगट हो कर नरसिंह रूप दिखाया, मीरा के लिए विष की प्याली को अमृत कर दिया..शामडा गिरिधारी म्हारी हुंडी स्वीकार जो महाराज रे !!

हृदय पासिजता तो संकल्प फलता है ये योगियों का अनुभव है..वेदांती आत्मारामी भी विश्रान्ति पा कर संकल्प करते  तो फलता है..नरसी मेहता जी यह प्रार्थना करते करते शांत हो गये..म्हारी हुंडी स्वीकार जो महाराज रे…शामडा गिरिधारी..

भजन गाए जा रहे..भगवान को प्रीति पूर्वक कहे जा रहे….700 रूपीए तो मैने यात्रियों से ले लिए अब भरपाई तो मैं क्या करूँगा?तुम ही कोई रूप धारण कर के भरपाई कर सकते हो…हे सुभद्रा बाई के वीर तुम ने पांडवो की बाजी सवारी, द्रोपदी को वस्त्र हरण ने बचाया..मेरे घर में तो खाने को जवार नही, मैं  कैसे 700 रूपिया दूँगा? आप ही भरपाई कर देना शामडा गिरिधारी…

उधर यात्री द्वारिका में नरसी मेहता की चिठ्ठी लेकर पुछने लगे तो वहा के लोग कहेने लगे ऐसा तो कोई नही..ना कोई साँवरिया सेठ की पेढ़ी है ना वासुदेव है..ये तुम्हारी हुंडी (चिठ्ठी) बोगस है, झूठी है..

उन 4 यात्री ब्राम्‍हणों ने देखा की क्या करे…अब तो खाने पीने के लिए भी पैसा नही..700 रूपीए तो क्या हमारे 7 पैसा भी कोई देनेवाला नही मिला..अब तो द्वारिकाधीश जी के दर्शन कर के जाएँगे और नरसी मेहता को पकड़ेंगे की ऐसी झूठी चिठ्ठी लिख दी..

वो यात्री ब्राम्‍हण द्वारिकाधीश जी के दर्शन कर के बाहर आए तो देखा की बोर्ड लगा था: ‘साँवरिया सेठ शामडा  गिरिधारी की पेढी’ ..4 यात्रियों ने उस पेढी  पर चिठ्ठी दिखाई..सेठ बोले , ‘हाँ! नरसी मेहता तो हमारे खूब आदरणीय है..वो जो भी चिठ्ठी लिखते हम भरपाई करते..उन की हमारे पर बड़ी कृपा है!..उन को हमारे से बड़ा स्नेह है..लो मुनीम ये चिठ्ठी..और इन को 700 रूपीए दे दो..’

मुनीम ने 700 रूपीए दिए और ब्राम्‍हण  खुश खुश हो गये..इधर के पंडे  बोलते थे की नरसी मेहता बड़े कंगाल है लेकिन ये तो बड़े आमिर है!..

 

ये कैसी भगवान की लीला है!जो वस्तु है उस को तो उपासना प्रगट कर देती है लेकिन उपासना में वो ताकद है  जो वस्तु अस्तित्व में नही है वो उपासना के बल से बन भी जाती है! पेढी  नही थी तो बन गयी ..मुनीम नही थे तो बन गये…वो ही तुम्हारा अंतरात्मा साँवरिया सेठ स्वप्ने में कुछ भी नही होता तो भी सब कुछ बन जाता है..ऐसे ही दृढ़ प्रेमा भक्ति हो तो इस जगत में भी तुम्हारे संकल्प से, तुम्हारे भाव से , तुम्हारी प्रार्थना से, तुम्हारी विश्रान्ति से बन जाता है…तुम्हारा चैत्यन्य आत्मा तुम्हारे संकल्प साकार करने के लिए रूप भी धारण कर सकता है..इसलिए आप भगवान पर निर्भर रहे, अपना पुरुषार्थ करे और विश्रान्ति योग पाए…जहा अपना पुरुषार्थ हो सके , करे..बाकी भगवान का सहयोग ले ..बड़े का आश्रय लेने से छोटा आदमी भी बड़े बड़े काम कर लेता है तो सब से बड़े में बड़े अंतरात्मा भगवान है..उन का आश्रय लेते हुए अपने जीवन को अभ्यास, रूचि और रति में बदल दो..जीवन सार स्वरूप हो जाएगा.. ये योगियों की  समाधि है..भक्तो की प्रेमा भक्ति है..और तत्ववेत्ताओं की तीसरी भूमिका है…फिर चौथी भूमिका में “ब्राम्‍हि स्थिति प्राप्त कर..”

चमत्कार तो होते है, लेकिन इस अवस्था के बाद तो  चमत्कार की भी रूचि नही रहेती…ऐसे ही सहेज स्वभाव में हो जाता है…

प्रथमा भक्ति संतन कर संगा..गंगा का स्नान करते तो पाप नाश होते..पूनम का चाँद देखते तो तपन मिट जाती है, शीतलता मिलती है ..कल्पवृक्ष मिलता है तो दरिद्रता हट जाती है ..लेकिन संत मिलते तो हृदय की दरिद्रता, पाप, ताप, संताप और दीनता मीट कर भगवान का सुख, शांति और माधुर्य  मिलने लगता है…

 

ओम ओम नारायण…

 

 

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो!!!!!

ग़लतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे….

***********************

 

Dwaarika Satsang Amrut; 3April 2012

Shaam ka satr

 

 

(Pujyashri Baapuji ne divya vishraanti yog kaa dhyaan karaayaa..)

 

jo sarv mangal men rat hai aise purushon kaa sampark, sarv mangalmay paramaatmaa hai us men vishranti, sarv mangalamay paramaatmaa kaa naam aur sarv mangalamay najariyaa se sab mangalamay hai,sab vaashudev hai…a-mangal bhi gaheraayi men mangal ke liye hi aataa hai aisi sujh-bujh sarv mangal men tike huye mahaa purushon ko praapt ho jaati hai..us men budhd, a-budhd, nibudhd sarv kaa saath-sahakaar milataaaur sabhi bhaagidaar ho jaate hai..sab prabhu premi ho jaate hai..prabhu men vishranti paate hai..abhimaan nahi tikataa,aatm gyaan tikataa hai.. ‘main bhagavaan ka hun, bhagavaan mere hai’ye swa-maantikataa hai; abhimaan nahi…namrataa aati hai..sahajataa aati hai..jan-bal, budhdi-bal, sharir-bal,dravya-bal ye sachchaa nahi hai; lekin bhagavat prem-bal mangalamay bal hai-sachchaa bal hai..us ke aage ‘sarp vishaile baba tere vash men’ ho jaate hai…ye sarv-sarv sumangal ki pahechaan hai…aise sarv mangal se prem, sewaa, sneh, samarpan sahej men ho jaataa hai…

to pahele abhyaas karanaa padataa hai bhagavat bhakti kaa, jap-dhyaan kaa…yahi abhyaas ruchi ho jaataa hai..ruchi men sukh milane lagataa hai..phir vo ruchi paripakv ho kar rati ban jaataa hai..

yog ki bhaashaa men kahe to abhyaas ko dhaaranaa bolate hai…ruchi awasthaa aaye to dhyaan bolate hai…aur rati awasthaa aaye to samaadhi sukh men sthiti…

 

gyaan ki bhaashaa men kahe to paramaatm praapti ki pratham bhumikaa hai  abhyaas, ruchi dusari bhumikaa hai aur rati tisari bhumikaa hai..

 

bhakti ki bhaashaa men kahe to abhyaas vaidi bhakti hai, ruchi saadhan bhakti hai aur rati premaa bhakti hai…

 

abhi jis ko dhyaan men vilakshan anaayaas sukh milaa ye aayaas ka sukh nahi hai… ye prayaas ka sukh nahi, vikaaron kaa sukh nahi hai..ye bhagavat abhyaas ka sukh hai…ye bhagavat ruchi ka sukh hai, kisi ko bhagavat rati ka sukh milaa ..jis ki jaisi antarik awasthaa ho aisa sukh milaa…bahut laabh huaa..bhagavaan men shaant honaa, bhagavaan ko apanaa maananaa aisaa abhyaas hone se sukh ke bade bade aakarshan tum ko sansaar nahi phisalaayenge..dukh ke bade bade pahaad tum ko dabaayenge nahi..tumhaari to vo najariyaa rahegi ki sansaar swapnaa hai, is ko jaananewaalaa chaityany prabhu apanaa hai…om ..om..om…phir man kahi idhar udhar gayaa to thdaa kirtan kar liyaa, thoda dhyan kar liyaa…to badaa ras-may jeevan hotaa hai..

ye abhyaas jab ruchi ban jaataa hai tab kahi jaa kar baithe jaise samudr tat par paani ko dekhate-dekhate, chandramaa ko dekhate-dekhate hruday ras-may ho jaayegaa…jis ko bhagavaan ki bhakti kaa abhyaas ho jaataa hai us ke jeevan men dukh vighn baadhaa  bhi bhagavaan ki bhakti ho jaate hai..

Narasi mehataa ke jeevan me ye dekhane ko milataa hai..

Narasi mehataa ki patni bhagavaan ko praapt huyi..narsai mehataa ji se  irshaa karanewaale  pande bolane lage ki tum ne bahot jagah bhojan kar liyaa , ab tumhaari baari hai ki patni ke sadgati nimitt 12 ve/13ve din samaaj ko bhojan ke liye aamantrit karo…narasi mehataa ke paas to koyi paise nahi the..7 aadami ko bhi nahi jimaa sakate to pure gaanv ko – 7 hajaar aadami ko kahaa se khaanaa khilaawenge?…braamhano ne kahaa , ‘nahi, ye phaisalaa hai..jimaanaa padegaa..’

Narsai Mehataa ji thodi der shaant ho gaye..abhyaas thaa bhagavaan men shaant hone kaa…andar se preranaa huyi…bole, ‘achhaa jo aap bolate thik hai..’

vo jo chand braamhan the soche ki aaj achhaa phasaayaa narasi mehataa ko…garib hai..kahaa se shidhaa laayegaa, kahaan se pure gaanv ko jimaayegaa…

itane men us gaanv men(junaagardh) 4 yaatri aaye..gaanv men puchhane lage ki ham jaayenge dwaarikaa..hamaare paas 700 rupiye hai..(aaj ke 70hajaar maan lo)…raaste men chor-lutere loot lenge..hamen dwaarikaa men ye paisaa de, ham idhar jamaa karaa dete hai..

chand braamhanon ne dekhaa ki Narasi Mehataa ko badanaam karane kaa achchaa mokaa hai..

bole, ‘are Narasi Mehataa ki to Dwaarikaa men pedhiyaa chalati hai..udhar jamaa karaao to dwaarikaa men milegaa…’..chand braamhan soche ki narasi mehataa ko paise de denge, udhar dwarikaa men paise milenge nahi to yahaa aakar narasi mehataa ko maarenge..achhi maar khilaayenge narasi mehataa ko..

chaaro braamhan narasi mehataa ji ke paas aaye..bole aap ye 700 rupiyaa le lo aur ham ko chiththi likh do..junaagardh men aap ki jo pedhiyaa chalati hai udhar ham ko ye paisaa mile aisaa hamaaraa kaam kar do…Narasi Mehataa ji ne kahaa , ‘meri to koyi pedhi nahi..main to garib braamhan hun..kirtan karataa hun..rukhaa sukhaa khaataa hun..’

4yaatri bole, ‘achhe aadami aisaa hi kahete hai..’

haa naa bahut kiyaa lekin ve yaatri maane hi nahi..haathaa jodi kar ke praarthanaa karane lage… to Narasi Mehataa ji soche ye bhi koyi iishwar ki leela hai, vyavasthaa hai..700 rupiyaa le lenge, gaanv men bhandaaraa kar denge…baaki kaa kaam thaakur ji dwaarikaadhish kar lenge!

Dwaar maane tumhaaraa hruday..us kaa dhish iishwar ka sankalp uthaa hai…braamhan to chalate bane..paidal kaa jamaanaa thaa..

Narasi mehataa ji ne chand bramhano ke kahene men aa kar patni ke mrutyu ke 12ve,13ve din ka bhandaare ka nyoutaa de diyaa..700 rupiyaa vo jamaane men bahut thaa.. khub laddu bane aur bhandaaraa huaa..

Narasi Mehataa sochane lage ki vo braamhan to abhi dwaarika pahunchenge..maine to likh diyaa- ‘saawariyaa seth vasudev’… hey vashudev tu sarvatr hai..meri laaj rakhanaa..

mhaari hundi sweekaar jo mahaaraaj re shaamadaa giridhaari..tum ne bhakto ke dukh haare hai, bhakton ke manorath purn kiye hai..tum ne pralhaad ke liye stambh men pragat ho kar narasinh roop dikhaayaa, miraa ke liye vish ki pyaali ko amrut kar diyaa..shaamadaa giridhaari mhaari hundi sweekaar jo mahaaraaj!!

hruday pasijataa to sankalp phalataa hai ye yogiyon kaa anubhav hai..vedaanti aatmaaraami bhi vishraanti paa kar sankalp karate  to phalataa hai..Narasi Mehataa ji yah prarthanaa karate karate shaant ho gaye..mhaari hundi sweekaar jo mahaaraaj re…shaamadaa giridhaari..

bhajan gaaye jaa rahe..bhagavaan ko priti purvak kahe jaa rahe….700 rupiye to maine yaatriyon se le liye ab bharapaayi to main kyaa karungaa?tum hi koyi roop dhaaran kar ke bharapaayi kar sakate ho…hey subhadraa baai na veer tum ne pandavo ki baaji sawaari, dropadi ka vastr haran ne bachaayaa..mere ghar men to khaane ko jawaar nahi mai kaise 700 rupiyaa dungaa? aap hi bharapaayi kar denaa shaamadaa giridhaari…

udhar yaatri dwaarikaa men narasi Mehataa ki chiththi lekar puchhane lage to wahaa ke log kahene lage aisaa to koyi nahi..naa koyi saawariyaa seth ki pedhi hai naa vasudev hai..ye tumhaari hundi(chiththi) bogas hai, jhuthi hai..

un 4 yaatri braamhanon ne dekhaa ki kyaa kare…ab to khaane pine ke liye bhi paisaa nahi..700 rupiye to kyaa hamaare 7 paisaa bhi koyi denewaalaa nahi milaa..ab to dwaarikaadhish ji ke darshan kar ke jaayenge aur Narasi Mehataa ko pakadenge ki aisi jhuthi chiththi likh di..

vo yaatri braamhan darshan kar ke baahar aaye to dekhaa ki bord lagaa thaa: ‘saawariyaa seth shaamadaa giridhaari ki pedhi’ ..4 yaatriyon ne us pedhi par chiththi dikhaayi..seth bole , ‘haa!Narasi Mehataa to hamaare khub aadaraniy hai..vo jo bhi chiththi likhate ham bharapaayi karate..un ki hamaare par badi krupaa hai!..un ko hamaare se badaa sneh hai..lo munim ye chiththi..aur in ko 700 rupiye de do..’

munim ne 700 rupiye diye aur braamhan khush khush ho gaye..idhar ke pande bolate the ki Narasi Mehataa bade kangaal hai lekin ye to bade amir hai!..

 

ye kaisi bhagavaan ki leela hai!jo vastu hai us ko to upaasanaa pragat kar deti hai lekin upaasanaa men vo taakad hai  jo vastu asthitv men nahi hai vo upaasanaa ke bal se ban bhi jaati hai!pedhi nahi thi to ban gaye..munim nahi the to ban gaye…vo hi tumhaaraa antaraatmaa saawariyaa seth kuchh bhi nahi hotaa to bhi swapne men sab kuchh ban jaataa hai..aise drudh premaa bhakti ho to is jagat men bhi tumhaare sankalp se, tumhaare bhaav se , tumhaari praarthanaa se, tumhaari vishraanti se ban jaataa hai…tumhaaraa chaityany aatmaa tumhaare sankalp saakaar karane ke liye roop bhi dhaaran kar sakataa hai..isliye aap bhagavaan par nirbhar rahe,apanaa purushaarth kare aur vishraanti yog paaye…jahaa apanaa purushaarth ho sake , kare..baaki bhagavaan kaa sahayog..bade kaa aashray lene se chhotaa aadami bhi bade bade kaam kar letaa hai to sab se bade men bade antaraatmaa bhagavaan hai..un kaa aashray lete huye apane jeevan ko abhyaas, ruchi aur rati men badal do..jeevan saar swarup ho jaayegaa.. ye yogiyon ki  samaadhi hai..bhakto ki premaa bhakti hai..aur tatv vettaon ki tisari bhumikaa hai…phir chauthi bhumikaa men “braamhi sthiti praapt kar..”

chamatkaar to hote hai, lekin is awasthaa ke baad to  chamatkaar ki bhi ruchi nahi raheti…aise hi sahej swabhaav men ho jaataa hai…

prathamaa bhakti santan kar sangaa..gangaa kaa snaan karate to paap naash hote..poonam kaa chaand dekhate to tapan mit jaati hai..kalpa vruksh milataa hai daridrataa hat jaati hai ..lekin sant milate to hruday ki daridrataa, paap, taap, santaap aur deenataa meet kar bhagavaan kaa sukh, shaanti aur maadhury milane lagataa hai…

 

om om naaraayan…

 

 

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYAJAYAKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare…

 

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