एक अनादि अनंत छू रे..

द्वारिका सत्संग अमृत ; 3 एप्रिल 2012

सुबह का सत्र  

रमन्ते योगी यश्मिंच राम l

जहाँ  योगियों का मन रमण करता है वो सतचिदानंद ब्रम्ह राम है.

ब्रम्ह क्या है ? ईश्वर क्या है ? जीव क्या है ?

एक ब्रम्ह परमात्मा को 4 स्थितियों  में निहार सकते है..

एक साधक गुरु के पास गया … गुरुजी बोले , ‘बेटा  राम नाम रटना ’

 … राम नाम के आगे बीज मंत्र जपोगे तो बहुत लाभ होगा ….  रिं रामाय नमः

कृष्ण जी के आगे  क्लिं कृष्णाय नमः

शिष्य  मंत्र जप और अनुष्ठान करने लगा … बुध्दी में चमत्कार हुआ..

शिष्य ने पुछा : राम भगवान तो दशरथ राजा के घर आए थे …

 ‘ हाँ ’ …. गुरुजी बोले  ‘दशरथ नंदन राम है… ’

‘तो गुरुजी जो दशरथ नंदन राम को नही मानते उन की मुक्ति नही होती है क्या?’ शिष्य की बुध्दी सुविकसित हुई.

गुरुजी बोले, ‘हाँ  बेटा..उन की भी मुक्ति होती है..’

‘तो कोई दूसरे भी राम है क्या राम के बराबरी के ? 2 राम है क्या? ’

गुरु जी ने कहा : 4 राम है!

एक राम दशरथ घर डोले

दूसरा राम घट घट में बोले

तीसरे राम का सकल पसारा

ब्रम्‍ह  राम है सब से न्यारा !

ज्ञानी गुरुजी शिष्य को कही से भी पार करा देते है!

नारायण हरि नारायण हरि…

शिष्य भजन किया…जप करते करते कुछ बुध्दी सूक्ष्म ..सूक्ष्मतम..सूक्ष्मतर हुई…तब वह आखरी तत्व का पता  चलता है…शिष्य फिर गुरुजी के पास आया…गुरुजी भगवान तो एक ही है..फिर ये 4 भगवान कैसे?

गुरुजी बोले : एक ही है , लेकिन 4 तुम्हारे लिए गिने है..बाकी तो आखिल विश्व ही भगवत मय है…

वासुदेव सर्वम इति…

5 भूतों में भी  वो ही तत्व है…ऐसी कोई चीज़ नही जो रत्ती भर भी परमात्मा से अलग है…

जड़ चेतन जीव जगत सकल राम मय जानो..

वायूदेव को जड़ मत मानो, वायूदेव से मेरी बात भी हुई है..ऐसे ही पृथ्वी देवी, जल देवता इन में भी देवत्व है…

( पूज्यश्री गुरुदेव ने नर्मदा जी और गंगा जी का इसी ही काल के उदाहरण देकर जल तत्व का देवत्व स्पष्ट किया. पूज्यश्री के मित्र संत लालजी महाराज जो तैरना नही जानते थे एक बार नर्मदा जी के बाढ़ में भंवर में फँस गये थे ..तब उन को नर्मदा जी के जल तत्व ने भंवर से निकाल के किनारे ला कर रख दिया था..ऋषिकेश के आगे  22 की. मी. पर वशिष्ठ जी की गुफा है, जिस में पूज्यश्री गुरुदेव भी कई बार रहे है , वाहा पर एक संत रहेते थे ..उन के जनम दिन के भंडारे में गंगा जी का जल घी बन गया था … )

आप के मन में क्या क्या शक्तियाँ है! जल देवता से घृत देवता बन जाती है..

महापुरुषों के जीवन में संकल्प शक्ति से कुछ  का कुछ बन जाता है..ये सारी सृष्टि संकल्प ही तो है…इधर आने का आप का हमारा संकल्प है तो इधर हो गया ना ये सत्संग कार्यक्रम…तो संकल्प जहा से उठता है वो ही राम है …वो ही राम घट घट में बोल रहा है..एक राम  घट घट में बोले…सब के हृदय में वो ही राम है…दूजा राम दशरथ घर डोले..दशरथ के घर जो डोल रहे है,जो विष्णु जी का अवतार है वो दूसरे राम है…तीसरा राम जो वेदांत की भाषा मे हिरण्यगर्भ उसी का यह सब  सकल पसारा है…और ब्रम्‍ह राम है सब से न्यारा !

शिष्य ने पुछा, ‘ गुरुजी राम एक है फिर 4 क्यो बोले?’

गुरूजी  बोले : अब तेरी बुध्दी खुली है..

वो ही राम घट घट में बोले

वो ही राम दशरथ घर डोले

उसी राम का सकल पसारा

वो ही राम है सब से न्यारा !

शिष्य : गुरु जी ये कैसे हुआ?

गुरुजी बोले : देखो! घड़े में जो आकाश है उस को घटाकाश बोलते..मठ में जो आकाश है  उस को मठाकाश बोलते..मेघ में जो आकाश है उस को मेघाकाश बोलते..और सर्वत्र व्यापक जो आकाश है उस को महा आकाश बोलते …तो महा आकाश ही मेघाकाश हो के दिखता है..महा आकाश ही मठाकाश हो के दिखता है..और महा आकाश ही घटाकाश हो के दिखता है …भेद से 4 दिखते है लेकिन है तो एक ही ..तो एक भी है, 4 भी है, अनंत भी है…भगवान एक मानो  तो एक है..4 मानो तो 4 है…अनंत मानो तो अनंत है…अल्लाह मानो  तो अल्लाह है, गॉड मानो तो गॉड है..गणेश जी मानो तो गणेश जी है…

दूसरी वेदांत की प्रक्रिया है..योग वशिष्ठ में भगवान राम के गुरुदेव ने बताई है…

1)ब्रम्‍ह परमात्मा की घन सुषुप्ति है – जो ये पहाड़ पर्वत, रेती, पत्थर आदि दिखते है…जैसे कोई खूप थका हुआ व्यक्ती दही में शक्कर मिला के खाए और सोए अथवा नींद आने के लिए कुछ  खिला के सुला दिया हो तो जैसे सोए ऐसे घन सुषुप्ति है…इस अवस्था में शरीर पर छीपकली घूमे, साप आ कर बैठ जाए घन सुषुप्ति में कुछ  पता नही चलता..महत्व नही रखता..तो जो भी जड़ भाव को प्राप्त हुआ वो परब्रम्‍ह परमात्मा की घन सुषुप्ति  है..

2) वृक्ष, पेड़ पौधों में क्षीण सुषुप्ति है..जैसे किसी की सात्विक निद्रा है…और निद्रा का समय पूरा हो गया फिर भी लेटा है तो इधर उधर की हलकी फुलकी आवाज़ कानो में पड़ती है तो सुषुप्ति तो है लेकिन टूटी हुई नींद है..ऐसे ही पेड़ पौधे क्षीण सुषुप्त अवस्था में जी रहे है..

3) मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस,गंधर्व आदि सब स्वप्नावस्था में जी रहे है..है तो कुछ ,  लेकिन स्वपना देख रहे की हम गंधर्व है ..हम मनुष्य है …हम द्वारिकावाले है..हम फलानेवाले है…है तो ब्रम्‍ह वाले लेकिन देश, काल, संस्कार से  अपने को वो ही मानने लगते …ये स्वप्नावस्था है…सत्संग मिले , ईश्वर को पाने की तत्परता मिले तो आश्वापादक आवरण और आभानापादक आवरण मिट जाता है..नीर-आवरण नारायण तत्व का साक्षात्कार हो जाता है ..ब्रम्‍ह ज्ञान हो जाता है!

ब्राम्ही स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष  l

मोह  कभी ना ठग सके इच्छा नही लवलेश ll

मोह किस को बोलते? विपरीत ज्ञान को मोह बोलते.

है तो सत-चित-आनंद स्वरूप लेकिन मान रहे अपने को शरीर …मान रहे अपने को अमुक जातीवाला, अमुक कर्म वाला, अमुक बंधन वाला…मान मान के फसते इस को बोलते मोह ..

तुलसीदास जी ने कहा :

मोह  सकल व्याधीन कर मुला l

ताते उपजे पुनी भव शूला ll

सभी व्याधियों का मूल मोह है, जिस से फिर फिर से जनम मरण का भव शूल पैदा होता है..

ब्राम्ही स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष  l

मोह कभी ना ठग सके इच्छा नही लवलेश ll

शरीर को मैं मानते जगत को सच्चा मानते तो इच्छाओं का गुलाम होता है ..ब्रम्‍ह परमात्मा का साक्षात्कार हो गया तो विभु व्याप्त सर्वत्र , सदा चिदानंद रूपम शिवोहम शिवोहम…

गुजराथी में भजन है :

एक अनादि अनंत छू रे ..

म्हारा आवे नही अंत !

आजे  ते मैं मने ओळख्यों ll

सतचिदानंद स्वरूप छू रे

देह आए अने जाए जो

माया साथे ना कही लागतो ll

जे भजे मोटा संत जो

आजे ते मैं मने ओळख्यों..ll

देह आए अने जाए जो

माया साथे ना कही लागतो ll

यह माया है जो  ‘ना होने’ में ‘है’ दिखा दे.. ठूंठे में चोर दिखा दे..चोर में ठूंठा दिखा दे..दोनो हटा कर साहूकार दिखा दे और तीनो हटा कर ठूंठा दिखा दे – यह माया का खेल है…धोखा है..सब जगत में घूम रहा है..

गोरखनाथ जी ने कहा :

एक भुला, दूजा भुला..भुला सब संसार l

बीनू भुला एक गोरखा जिस को गुरु का आधार ll

जिसको गुरु का आधार है ..”गु” माना अंधकार ,  “रु” माना प्रकाश …अविद्या अंधकार मिटा दे, आत्म प्रकाश करा दे ऐसा गुरु का प्रकाश जिस को मिल गया तो कोई कोई जाग जाता है…

द्वारिका में आए है … जब श्रीकृष्ण ने जब अपनी लीला  समेटना शुरू किया तो औधव समझ गये…औधव ने श्रीकृष्ण को प्रार्थना किया : हे अच्युत ..आप के व्यवहार से धरती को छोड़ने की योजना दिख रही…मुझे साथ लेकर चलिए…

श्रीकृष्ण कहेते : औधव साथ में आए नही , जाएँगे नही…लेकिन मैं तुम्हे तत्व ज्ञान देता हूँ  तो तुम मुझे ऐसे मिलोगे की जैसे जल से जल, दूध से दूध और घटाकाश महाकाश का जैसे मिलन है ऐसे तुम मेरे से मिल जाओ !

श्रीकृष्ण ने औधव को तात्विक उपदेश दीया और कहा की बदरिका आश्रम जाओ..

यहा श्रीकृष्ण की मूर्ति के तो दर्शन कर लिए…लेकिन श्रीकृष्ण साक्षात है तो भी औधव को सत्संग की ज़रूरत पड़ी…और केवल सत्संग से काम नही चलता;  सुना हुआ सत्संग का मनन और नित्य-अध्यासन करने के लिए बदरिका आश्रम भेज दिया था औधव को श्रीकृष्ण ने… तो औधव को ‘जो कृष्ण का आत्मा है वो ही मैं हूँ जो मेरा आत्मा है वो ही कृष्ण है’  ऐसा अनंत ब्रम्‍हांडो में व्याप रहे अपने ब्रम्‍ह स्वभाव का साक्षात्कार हुआ….

तो घट घट में राम है ये भी बात सच्ची है, दशरथ नंदन राम है ये भी बात सच्ची है , सृष्टि कर्ता भगवान  है ये बात भी सच्ची है और ब्रम्‍ह परमात्मा है सब से न्यारे है ये बात भी सच्ची है ..उपाधि भेद से 4 है …उपाधि भेद से लाखो दिख जाए…चंद्रमा एक है, लेकिन हर घड़े, लोटे, ग्लास  में अलग अलग दिख रहा है..चाँद तो वो ही का वो ही है…उपाधि अलग अलग है ..ऐसे ही अंतर्यामी परमेश्वर तो वो ही का वो ही है..अंतकरण की उपाधि से , शरीर की उपाधि, मान्यताओ से विचित्रता दिखती है..

श्रीकृष्ण भगवान ने कृपा कर के बता दिया की पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन , बुध्दी, अहंकार ये अष्टदा प्रकृति से मैं भिन्न हूँ..मैं भिन्न हूँ इसलिए समझाया की तुम भी मेरे स्वरूप हो, तुम भी अष्टदा प्रकृति से भिन्न हो…

आप बोलना:

भूमि रापो अनलो वायु खं मन्नो बुध्दीरेवच

अहंकार इत्तेव मे भिन्न प्रकृति अष्टदा ll

श्रीकृष्ण ने कितनी कृपा की….  एकदम ज्ञान  का दरवाजा खोल दिया है की मैं इस अष्टदा प्रकृति से भिन्न हूँ और तुम?

ममई वांछे जीवलोके

जीव भूत सनातन

मन शष्टानी इंद्रियानी

प्रकृति स्थानाईकर्षति ll

ये इंद्रिया और मन तुम को खींच खींच के इस में ले आता है वरना ये शरीर में 5 भूत है और मन , बुध्दी , अहंकार है- ये बदलता है..लेकिन तुम? तुम अबदल हो!

जैसे सृष्टि बदलती है और भगवान ब्रम्‍ह अबदल है, ऐसे ही शरीर बदलता है और तुम आत्मा ब्रम्‍ह अबदल हो…मन बदलता है, तुम अबदल हो…बुध्दी  बदलती है , तुम अबदल हो…

बचपन की बुध्दी  बदल गयी..आसुमल बबलू बदल गये..मन बदल गया…बचपन के उस बुश शर्ट का  कही ठिकाना ही नही…लेकिन ये सब जानने वाला अब भी है..वो ही घट घट में बोल रहा है… वो ही राम है…चिदानंद है…

‘मेरा’ टिक नही सकता और ‘मैं’ मीट नही सकता…. ‘यह’ टिक नही सकता और ‘मैं’ मीट नही सकता…यह हाथ है- नही टीकेगा..यह मेरा मन है- एक जैसा नही टीकेगा…ये मेरा दुख है- नही टीकेगा…यह मेरा सुख है- नही टीकेगा…लेकिन मैं? …

एक अनादि अनंत छू  रे..

म्हारा आवे नही अंत !

आजे  ते मैं मने ओळख्यों….

सतचिदानंद  स्वरूप छू  रे ….

ध्यान देना –

सत वो है जो शाश्वत है.

चिद वो है जो बुध्दी में ज्ञान  देता है.भगवान का चिद  स्वभाव ज्ञान  देता है.

और आनंद स्वभाव से खुशी आती है.

कोई भी जीव का शरीर मर गया तो भी सद्चिदानंद स्वभाव ज्यों का त्यों  रहेगा..शरीर मर जाएगा, मरने के बाद भी हम रहेते है…मरने के बाद जीव स्वर्ग जाए अथवा कही जाए लेकिन वो ‘सत’ सदा रहेता है…जो ‘सत’ है उस में चिद स्वभाव भी है की बुध्दी  में ज्ञान  प्रकाश है..

इतने से मच्छर के आगे सभी बड़े से बड़े व्यक्ती भी हार जाते..मच्छर का शरीर कितना, उस का खोपड़ी कितना लेकिन उस में भी सतचिदानंद है.. जो उस की बुध्दी का प्रेरक है की हाथ आया है उस के पहेले वो छटक जाए!

कीड़ी में तू नान्हो लागे

हाथी मा तू मोटो ज़्यु !

(पूज्यश्री बापूजी ने श्रीधर स्वामी की कथा से स्पष्ट किया की अध्यात्मीकता में वो शक्ति है की मूर्ख से मूर्ख भी विद्वान हो सकता है…श्रीधर नाम का लड़का जो तेल लेने गया और बर्तन भूल गया तो जुते में तेल ले कर जा  रहा था..ऐसे महा मूर्ख को विजयनगर के राजा के कहेने से गुरुजी ने मंत्र दिया … गुरु मंत्र जप और अनुष्ठान से बुध्दी में ऐसा प्रकाश हुआ की गीता पर टीका लिखे जो श्रीधरी टीका नाम से सुप्रसिध्द  है.)

भगवान कैसा अंतरयामी है, कैसा सब की खोपड़ी चलाता है…इर्षालुओं की खोपड़ी चलाया कू-प्रचार कर दिया..फिर चीफ जस्टीस के बुध्दी  में बैठ कर दूध का दूध और पानी का पानी भी कर दिया ! अगर वो ऐसा नही करता तो यहा मुलाकात भी नही होती !!सृष्टि कर्ता  क्या तेरी लीला है!..क्या तेरा आयोजन है!!.. 🙂

श्रीधर स्वामी ने  गीता पर टीका लिखी ..

एक श्लोक पर रुक गये :

अनन्यो  चींतायश्योमां

ये जनापरी उपास्यते

तेशाम नित्याविनिमयाम

योगक्षेम वहाम्यहम

जो मेरा अनन्य भाव से चिंतन करते है, अन्य अन्य में भी मैं अनन्य हूँ- जैसे अन्य अन्य घड़ो में भी आकाश अनन्य है;चंद्रमा अनन्य है… वो अन्य नही है..ऐसे “अन्य अन्य शरीरों में भी जो अन्य नही है वो ही मेरा परमात्मा है” – ऐसा जो चिंतन करता है उस को किस चीज़ का योग चाहिए और किस वस्तु की सुरक्षा चाहिए वो मैं पूरी कर देता हूँ…

हमारे जीवन में भी ऐसा हुआ और जो भी भजन करते है उन के जीवन में भी योगक्षेम वहन करने की भगवान की लीला तो दिखती ही है…भगवान सब के सुहुर्द है तो सब की उन्नति के लिए लीला करते है…भगवान ज्ञान  स्वरूप है..हमारा बुरा नही कर सकते…

कभी कभी भगवान से दिल्लगी करो की प्रभु आप तो सर्व समर्थ है लेकिन 2 बातों में आप असमर्थ है :

1) एक तो आप किसी का बुरा नही कर सकते.

2) दूसरा आप अपनी सृष्टि से किसी को बाहर नही कर सकते.

भगवान किसी जीव का अमंगल नही कर सकते चाहे कितना शैतान हो, कितना लुच्चा हो!…राम जी की पत्नी को उठा के ले गये फिर भी रावण का अमंगल नही किया..

रिझे दिनी लंक

खिजे दीये परम पद.

बिभीषण को राज़ी हो कर लंका दे दी और रावण पर खिज गये तो क्या दिया? परम पद दिया!रावण का बुरा नही कर सकते..द्वारिकाधीश आप कंस का बुरा कर के दिखाओ…नही कर सकते!..

चंड लोग तो अपने घर से, अपने गाँव से,अपने दुकान से किसी को निकाल देंगे..और किसी का बुरा भी कर लेंगे इस में हम चंड लोग पावरफुल है..लेकिन भगवान आप हमारे चंडाई  के आगे  असमर्थ है..

भगवान बोलेंगे, ‘हा ..मैं हार खाता हूँ!’ ..भगवान चंड  नही बन सकते..और वैसे देखो तो चंडो का प्रेरक भी वो ही है!..

कालीकमलीवाले बाबा का पक्षपात रहीत अनुभव प्रकाश आप देख लो …बस! जीवन मुक्त!!..

नारायण हरी! हरी ओम हरी!!

मेरे गुरुजी पूरे अद्वैत में रहेते फिर भी द्वैत की भावना कर के भजन गाते और मज़ा लेते … विशिष्ठ अद्वैत में …जानते थे की मैं ही अच्युत हो कर यहा खड़ा हूँ और मैं ही प्रार्थना कर रहा हूँ..ज्ञानी  तो ऐसा आनंद भी लेते…जानते की कृष्ण में भी मैं हूँ..राम में भी मैं हूँ..फिर भी जैसा व्यवहार आया कर लेते..ऐसे ब्रम्हवेत्ता को कैसे तोलोगे?

कैसी  उँची  अनुभूति के धनी हो गये भारत में  महापुरुष ..विश्व के किसी भी धर्म ग्रंथ में ऐसी उँचाई नही जो गीता में है ..

हरि ॐ … हरि ॐ

श्री सद्गुरुदेवजी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करें …..  

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Dwarikaa Satsang Amrut ; 3 April 2012

ramante yogi yashminch raam

jahaan yogiyon ka man raman karataa hai vo satchidaanand bramh raam hai.

bramh kyaa hai?iishwar kyaa hai?jeev kyaa hai?

ek bramh paramaatmaa ko 4 sthitiyon men nihaar sakate hai..

ek saadhak guru ke paas gayaa…guru ji bole, ‘betaa raam naam japanaa..’

raam naam ke aage bij mantr japoge to bahut laabh hogaa…jaise

rim raamaay namah

krishn ji ke aage

klim krishnaay namah

vo shishya  mantr jap aur anushthaan karataa… budhdi men chamatkaar huaa..

shishya ne puchha :

‘haa’guruji bole ‘dasharath nandan raam hai…’

‘to guruji jo dasharath nanadan raam ko nahi maanate un ki mukti nahi hoti hai kya?’shishy ki budhdi suvikasit huyi.

guruji bole, ‘haan betaa..un ki bhi mukti hoti hai..’

‘to koyi dusare bhi raam hai kya raam ke baraabari ke ? 2 raam hai kya?’

guru ji ne kahaa : 4 raam hai!

ek raam dasharath ghar dole

dusara raam ghat ghat men bole

tisare ram ka sakal pasaaraa

bramh  ram hai sab se nyaaraa !

gyaani guruji shishy ko kahi se bhi paar karaa dete hai!

naarayan hari naarayan hari…

shishy bhajan kiyaa…jap karate karate kuchh budhdi sukshm ..sukshm tam..sukshm tar huyi…tab vah aakahri tatv kaa pataa  chalataa hai…shishya phir guruji ke paas aayaa…guruji bhagavaan to ek hi hai..phir ye 4 bhagavaan kaise?

guruji bole : ek hi hai , lekin 4 tumhaare liye gine hai..baaki to aakhil vishw hi bhagavat may hai…vaashudev sarvam iti…5 bhuton men hi vo hi tatv hai…aisi koyi chij nahi jo ratti bhar bhi paramaatmaa se alag hai…

jad chetan jeev jagat sakal raam mayi jaano..

vaayudev ko jad mat maano, vayudev se meri baat bhi huyi hai..aise hi pruthvi devi, jal devataa in men bhi devatv hai…

( Pujyashri Gurudev ne narmadaa ji aur gangaa ji ka is hi kaal ke udaaharan dekar jal tatv ka devatv spasht kiyaa. Pujyashri ke mitra sant Laal ji mahaaraaj jo tairanaa nahi jaanate the ek baar narmadaa ji ke baadh men bhanvar men phans gaye the ..tab un ko narmadaa ji ke jal tatv ne bhanvar se nikala ke kinaare laa kar rakh diyaa tha..rishikesh ke aage 22 ki mi par vashishth ji ki guphaa hai, jis men pujyashri gurudev bhi kayi baar rahe hai , wahaa par ek sant rahete the ..)

aap ke man men kyaa kyaa shaktiyaa hai! jal devataa se ghrut devataa ban jaati hai..

mahaapurushon ke jeevan men sankalp shakti se kuchh kaa kuchh ban jaataa hai..ye saari srishti sankalp hi to hai…idhar aane kaa aap ka hamaaraa sankalp hai to idhar ho gayaa na ye satsang kaaryakram…to sankalp jahaa se uthataa hai vo hi ram hai …vo hi ram ghat ghat men bol rahaa hai..ek raam  ghat ghat men bole…sab ke hruday men vo hi raam hai…dujaa ram dasharath ghar dole..dasharath ke ghar jo dol rahe hai,jo vishnu ji ka awataar hai vo dusare ram hai…tisaraa raam jo vedaant ki bhaashaa me hiranyagarbh usi ka yah sab  sakal pasaaraa hai…aur bramh raam hai sab se nyaaraa !

shishy ne puchhaa guruji ram ek hai phir 4 kyo bole?

guruj bole : ab teri budhdi khuli hai..

vo hi Raam ghat ghat men bole

vo hi Raam dasharath ghar dole

usi Raam ka sakal pasaaraa

wo hi Raam hai sab se nyaaraa !

shishya : guru ji ye kaise huaa?

guruji bole : dekho! ghade me jo aakaash hai us ko ghataakaash bolate..math men jo aakaash hai  us ko mathaakaash bolate..megh men jo aakaash hai us ko meghaakaash bolate..aur sarvatr vyaapak jo aakaash hai us ko mahaa aakaash bolate …to mahaa aakaash hi meghaakaash ho ke dikhataa hai..mahaa aakaash hi mathaakaash ho ke dikhataa hai..aur mahaa aakaash hi ghataakaash ho ke dikhataa hai …bhed se 4 dikhate hai lekin hai to ek hi ..to ek bhi hai, 4 bhi hai, anant bhi hai…bhagavaan ek manao to ek hai..4 maano to 4 hai…anant maano to anant hai…allaah manao to allaah hai, GOD maano to GOD hai..Ganesh ji maano to Ganesh ji hai…

dusari vedaant ki prakriyaa hai..yog vashishth men bhagavaan Raam ke gurudev ne bataayi hai…

1)bramh paramaatmaa ki ghan sushupti hai – jo ye pahaad parvat, reti, paththar aadi dikhate hai…jaise koyi khup thakaa huaa dahi men shakkar milaa ke khaaye aur soye athavaa nind aane ke liye kuchh khilaa ke sulaa diyaa ho to jaise soye aise ghan sushupti hai…is awasthaa men sharir par chhipakali ghume, saap aa kar baith jaaye ghan sushupti men kuchh pataa nahi chalataa..mahatv nahi rakhataa..to jo bhi jad bhaav ko praapt huaa vo parabramh paramaatmaa ki ghan sushupti  hai..

2) vruksh, ped paudhon men kshin sushupti hai..jaise kisi ki saatvik nidraa hai…aur nidraa kaa samay puraa ho gayaa phir bhi letaa hai to idhar udhar ki halaki phulaki aawaaj kaano men padati hai to sushupti to hai lekin tuti huyi nind hai..aise hi ped paudhe kshin sushupt awasthaa men jee rahe hai..

3) manushya, devataa, yaksh, raakshas,gandharv aadi sab swapnaavasthaa men jee rahe hai..hai to kuchh lekin swapanaa dekh rahe ki ham gandharv hai ..ham manushy hai …ham dwaarikaawaale hai..ham phalaanewaale hai…hai to bramh waale lekin desh kaal sanskaar se  apane ko wo hi maanane lagate …ye swapnaawasthaa hai…satsang mile , ishwar ko paane ki tatparataa mile to ashwaapaasak aawaran aur abhaanaapaadak aawaran mit jaataa hai..nir-aawaran naaraayan tatv kaa saakshaatkaar ho jata hai ..bramh gyaan ho jaataa hai!

braamhi sthiti praapt kar kaary rahe naa shesh  l

moh kabhi naa thag sake ichchaa nahi lavlesh ll

moh kis ko bolate? viparit gyaan ko moh bolate.

hai to sat-chit-aanand swarup lekin maan rahe apane ko sharir …maan rahe apane ko amuk jaatiwaalaa, amuk karm waalaa, amuk bandhan waalaa…maan maan ke phasate is ko bolate moh..

tulasidaas j ine kahaa : moh sakal vyaadhin kar mulaa..taate upaje puni bhav shulaa ll

sabhi vyaadhiyon ka mul moh hai, jis se phir phir se janam maran kaa bhav shul paidaa hotaa hai..

braamhi sthiti praapt kar kaary rahe naa shesh  l

moh kabhi naa thag sake ichchaa nahi lavlesh ll

sharir ko main maanate jagat ko sachchaa maanate to ichchaaon ka gulaam hotaa hai ..braamh paramaatmaa ka saakshtaakaar ho gayaa to vibhu vyaapt sarvatr , sadaa chidaanand rupam shivoham shivoham…

ek anaadi anant chhu re ..

mane aawe nahi ant jo

aaje to main mane olaakhyo ll

satchidaanand swarup chhu re

deh aaye ane jaaye jo

maayaa saathe na kahi laagato ll

je bhaje motaa sant jo

aaje te main mane olakhyo..ll

deh aaye ane jaaye jo

maayaa saathe na kahi laagato ll

yah maayaa hai jo na hone men hai dikhaa de..thunthe men chor dikhaa de..chor men thunthaa dikhaa de..dono hataa kar saahukaar dikhaa de aur tino hataa kar thunthaa dikhaa de yah maayaa ka khel hai…dhokhaa hai..sab jagat men ghum rahaa hai..

gorakh naath ji ne kahaa :

ek bhulaa , dujaa bhulaa..bhulaa sab sansaar l

binu bhulaa ek gorakhaa jis ko guru kaa aadhaar ll

jis k oguru kaa aadhaar hai ..”gu” maanaa anadhaakaar ,  “ru” maanaa prakaash …avidyaa andhakaar mitaa de, aatm prakaash karaa de aisaa guru kaa prakaash jis ko mil gayaa to koyi koyi jag jaataa hai…

dwaarikaa men aaye hai jab shrikrishn ne jab apani leela  sametanaa shuru kiyaa to audhav samajh gaye…audhav ne shrikrushn ko praarthanaa kiyaa : hey achyut ..aap ke vyavahaar se dharati ko chhodane ki yojanaa dikh rahi…mujhe saath lekar chaliye…

shrikrushn   kahete : audhav saath men aaye nahi , jaayenge nahi…lekin main tumhe tatv gyaan detaa hun  to tum mujhe aise miloge ki jaise jal se jal, dudh se dudh aur ghataakaash mahaakaash ka jaise milan hai aise tum mere se mil jaao !

shrikrishn ne audhav ko taatvik updesh siyaa audhav ko aur kahaa ki badrikaa aashram jaao..

yahaa shrikrushn ki murti ke to darshan kar liye…lekin shrikrushn saakshaat hai to bhi audhav ko satsang ki jarurat padi…aur kewal satsang se kaam nahi chalataa;  sunaa huaa satsang kaa manan aur nitya-adhyaasan karane ke liye badrikaa aashram bhej diyaa tha audhav ko shrikrishn ne… to audhav ko jo krishn ka aatmaa hai vo hi main hun jo meraa aatmaa hai wo hi krishn hai  aisaa anant bramhaando men vyaap rahe apane bramh swabhaav kaa saakshaatkaar huaa….

to ghat ghat men Raam hai ye bhi baat sachchi hai, dasharath nandan Raam hai ye bhi baat sachchi hai , srishti kartaa bhagavaan  hai ye baat bhi sachchi hai aur Bramh Paramaatmaa hai sab se nyaare hai ye baat bhi sachchi hai ..upaadhi bhed se 4 hai …upaadhi bhed se laakho dikh jaaye…chandramaa ek hai, lekin har ghade, lote, glaas  men alag alag dikh rahaa hai..chaand to vo hi kaa vo hi hai…upaadhi alag alag hai ..aise hi antaryaami parameshwar to vo hi kaa vo hi hai..antakaran ki upaadhi se , sharir ki upaadhi, maanyataao se vichitrataa dikhati hai..

bhagavaan ne krupaa kar ke bataa diyaa ki prithvi, jal, tej, vaayu, aakaash, man , budhdi, ahankaar ye ashtadaa prakruti se main bhinn hun..main bhinn hun isliye samajhaayaa ki tum bhi mere swarup ho, tum bhi bhinn ho…

aap bolanaa:

bhumi raapo analo vaayu kham manno budhdi revach

ahankaar ittev me bhinn prakruti ashtadaa ll

shrikrishn ne kitani krupaa ki ekadam gyaan ka darawaajaa khol diyaa hai ki main is ashtadaa prakruti se bhinn hun aur tum?

mamayi vaanchhe jeev loke

jeev bhut sanaatan

man shashtaani indriyaani

prakruti sthnai karshati ll

ye indriyaa aur man tum ko khinch khinch ke is men le aataa hai varanaa ye sharir men 5 bhut hai aur man , budhdi ahanakaar hai- ye badalataa hai..lekin tum? tum abadal ho!

jaise srushti badalati hai aur bhagavaan bramh abadal hai, aise hi sharir badalataa hai aur tum aatmaa bramh abadal ho…man badalataa hai, tum abadal ho…budhdi badalati hai , tum abadal ho…

bachapan ki budhdi badal gayi..aasumal babalu badal gaye..man badal gayaa…bush shirt ka  kahi thikaanaa hi nahi…lekin ye sab jaanane waalaa ab bhi hai..vo hi ghat ghat men bol rahaa hai… wo hi Raam hai…chidaanand hai…

‘meraa’ teek nahi sakataa aur ‘main’meet nahi sakataa…. ‘yah’teek nahi sakataa aur ‘main’meet nahi sakataa…yah haath hai- nahi tikegaa..yah mera man hai- ek jaisaa nahi tikegaa…ye mera dukh hai- nahi tikegaa…yah mera sukh hai- nahi tikegaa…lekin “MAIN?’ …

ek anaadi anant chhu re..

mhaaraa aawe nahi ant !

aaje  te main mane olakhyo….

satchidaanand  swarup chhu re

sat vo hai jo shaashwat hai.

chid vo hai jo budhdi men gyaan detaa hai.bhagavaan ka chid  swabhaav gyaan detaa hai.

aur aanand swabhaav se khushi aati hai.

koyi bhi jeev ka sharir mar gayaa to bhi sadchidaanand swabhaav jyon kaa tyo rahegaa..sharir mar jaayegaa, marane ke baad bhi ham rahete hai…marane ke baad jeev swarg jaaye athavaa kahi jaaye lekin vo ‘sat’sadaa rahetaa hai…jo ‘sat’ hai us men chid swabhaav bhi hai ki budhdi men gyaan prakaash hai..

machchhar ke aage sabhi haar jaate..us ka sharir kitanaa, us ka khopadi kitanaa lekin us men bhi satchidaanand hai..us ki budhdi ka prerak hai ki haath aayaa hai us ke pahele vo chhatak jaaye!

kidi men tu naanho laage

haathi maa tu moto jyu !

(Pujyashri Bapuji ne shridhar swaami ki kathaa se spasht kiyaa ki adhyaatmikataa men vo shakti hai ki murkh se murkh bhi vidwaan ho sakataa hai…shridhar naam ka ladakaa jo tel lene gayaa aur bartan bhul gayaa to jute men tel le kar jaa rahaa thaa..aise mahaa murkh ko guru mantr jap aur anushthan se budhdi men aisaa prakaash huaa ki gitaa par tika likhe jo shridhari tika naam se suprasidhd hai.)

kaisaa antarayaami hai, kaisaa sab ki khopadi chalaataa hai…irshaaluon ki khopadi chalaayaa ku-prachaar kar diyaa..phir chief justice ke budhdi men baith kar dudh ka dudh aur paani ka pani bhi kar diyaa ! agar vo aisaa nahi karataa to yahaa mulaakaat bhi nahi hoti !!srushti kartaa kyaa teri leelaa hai!..kya teraa aayojan hai!!.. 🙂

shridhar swaami ne  geeta par tikaa likhi ..

ek shlok par ruk gaye :

ananyo chintayaschomaam

ye janaapari upaasyate

teshaam nityavimyktaamaam

yogkshem vahaamyaham

jo meraa ananya bhaav se chintan karate hai, any any men bhi main ananya hun- jaise any any ghado men bhi aakaash anany hai;chandramaa ananya hai… vo anya nahi hai..aise “anya anya shariron men bhi jo anya nahi hai vo hi  meraa paramaatmaa hai” – aisaa jo chintan karataa hai us ko kis chij ka yog chaahiye aur kis vastu ki surakshaa chaahiye vo main puri kar detaa hun…

hamaare jeevan men bhi aisa huaa aur jo bhi bhajan karate hai un ke jeevan men bhi yog kshem vahan karane ki bhagavaan ki leelaa to dikhati hi hai…bhagavaan sab ke suhurd hai to sab ki unnati ke liye lilaa karate hai…bhagavaan gyaan swarup hai..hamaaraa buraa nahi kar sakate…

kabhi kabhi bhagavaan se dillagi karo ki prabhu aap to sarv samarth hai lekin 2 baaton men aap asamarth hai :

1) ek to aap kisi kaa buraa nahi kar sakate.

2) dusaraa aap apani srushti se kisi ko baahar nahi kar sakate.

bhagavaan kisi jeev kaa amangal nahi kar sakate chaahe kitanaa shaitaan ho, kitanaa luchchaa ho!…Raam ji ki patni ko uthaa ke le gaye phir bhi raawan ka amangal nahi kiyaa..

rijhe dini lank

khije dinaa param pad.

bibhishan ko raaji ho kar lankaa de di aur raawan par khij gaye to kyaa diyaa? param pad diyaa!raawan ka buraa nahi kar sakate..dwaarikaadhish aap kans ka buraa kar ke dikhaao…nahi kar sakate!..

chand log to apane ghar se, apane gaanv se,apane dukaan se kisi ko nikaal denge..aur kisi kaa buraa bhi kar lenge is men ham chand log powerful hai..lekin bhagavaan aap hamaare chandaayi ke aage asamarth hai..bhagavaan bolenge , ‘haa ..main haar khaataa hun!’ ..bhagavaan chand nahi ban sakate..aur waise dekho to chando ka prerak bhi vo hi hai!..

kaalikamaliwaale baabaa ka pakshpaat raheet anubhav prakaash aap dekh lo …bas! jeevan mukt!!..

Naaraayan hari! Hari om hari!!

mere guruji pure adwait men rahete phir bhi dwait ki bhaavanaa kar ke bhajan gaate aur majaa lete … vishishth adwait men …jaanate the ki main hi achyut ho kar yahaa khadaa hun aur main prarthanaa kar rahaa hun..gyaani to aisaa aanand bhi lete…jaanate ki Krushn men bhi main hun..Raam men bhi main hun..phir bhi jaisaa vyavhaar aayaa kar lete..aise bramhvettaa ko kaise tologe?

kaisi unchi anubhuti ke dhani ho gaye bhaarat men  mahaapurush ..vishw ke kisi bhi dharm granth men aisi unchaayi nahi jo gitaa men hai ..

HARI OM ..HARI OM ..

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYAKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye prabhuji kshamaa kare….

 

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