विधान में ही परम हीत Vidhaan men hi Param Heet

मुज़फ़रपुर सत्संग अमृत; 13 दिसंबर 2011

नारायण हरि

हरि ओम हरि

क्या हालचाल है?

जमनापार पूनम पूरी कर के 11 तारीख को रात को गाड़ी भगाई..बरौट गये..12 तारीख बरौट में सत्संग कार्यक्रम पूरा हुआ..12 रात को गाड़ी भगाई बरौट से मुजफ्फरपुर के लिए बीच में एक गौशाला में थोड़ा झाँक लिया…फिर मुज़फ्फरनगर के आश्रम से गाड़ी आराम से चलाई और तुम्हारे बीच आए..:) तुम्हारा क्या हालचाल है? 🙂 तुमने गाड़ी कहा भगाई , कहा चलाई बताओ.. 🙂

नारायण हरि

हरि ओम हरि

ये भ्रू मध्य पर तिलक करना बड़ा हीतकारी है..ललाट पर चंदन केसर आदि का तिलक करना उस का अलग महत्व है..लेकिन आम आदमी अथवा माताएँ बहेने जो भ्रू मध्य में तिलक करती है वो तिलक अगर प्लास्टिक की बिंदी वाला नही हो तो बहोत  फ़ायदा करता है…प्लास्टिक की बिंदी से तो नुकसान होता है…प्लास्टिक की बिंदी चिपकाने वाली केमिकल बनाने  के लिए पशुओ के अंगो का उपयोग होता है..

भ्रू  मध्य  पर (कुमकुम, हल्दी, चंदन, तुलसी की मिट्टी आदि से) तिलक करने से बहोत  लाभ होते है..इस को शिव नेत्र बोलते है…आज्ञा चक्र भी बोलते है…विज्ञानियों ने कहा हम हैरान है ..की हिन्दुस्तानी लोग जहाँ तिलक करते है वो पीनियल ग्रंथि है…वो इसे पीनियल ग्रंथि बोलते है….वैज्ञानिक जगत में बोलते की पीनियल ग्रंथि  सक्रिय रहेने से व्यक्ति प्रभावशाली होते है ऐसा कहा जाता है..

वैसे तो आप कोई भी शुभ कर्म करते तो पहेले ब्राम्‍हण यहा ललाट पर ही तिलक करते बाद में पूजा पाठ कराएगा..कारण यही है की आप की सूझ बुझ उन्नत हो..सूझ बुझ उन्नत नही तो आदमी के पास कितना भी धन दौलत कुछ भी हो फिर भी वो  दुखी रहेता है.

दुख 2 प्रकार से होता है.

एक तो – बाहर से दुख आता है..जैसे ज़्यादा बारिश पड़ा, भूकंप हुआ, एक्सिडेंट हुआ….तो ये बाहर की प्रतिकूलता से दुख होता है…और बाहर की अनुकूलता से सुख होता है..

तो बाहर से सुख दुख आता है.

दूसरा – आदमी अपनी सोच विचार से दुख सुख बनाता है.

‘मैं तो बड़ा परेशान हूँ ..ऐसा हो गया..वैसा हो गया…’ -तो जो अच्छा हुआ उस की कदर नही करेगा…जो गड़बड़ हुआ उस को याद कर कर के बोलेगा, ‘मैं परेशान हूँ..’

बोले ‘क्या करे खाना हजम नही होता’..अरे जिन को खाना नही मिलता उन की अपेक्षा भगवान ने तुम को ज़्यादा खाना दिया…तो संयम से खाए..बेवकूफी से खाया तो बीमार हुआ…रात को देर से खाएगा तो बीमार होगा..

बोले ‘क्या करे बेटे मानते नही..ऐसे नही वैसे नही..तबीयत ठीक नही रहेती… शादी किया लेकिन बड़ा दुखी हूँ..’

तो शादी से दुखी है की शादी के दुरुपयोग से दुखी है?

अगर अमावस्या को, पूनम को, शिवरात्रि को, होली को, दीवाली को, जन्माष्टमी को पति पत्नी का व्यवहार किया तो विकलांग संतान होगी और संतान पैदा नही भी हुई तो फिर जीवन भर की बीमारियाँ पकड़ेगी..जीवनभर रोते रहेंगे.. 

तो एक तो होता है की बाहर के अनुकूलता से सुख और प्रतिकूलता से दुख…दूसरा होता है नासमझी से दुख  बनाना..सुख को भी दुख बनाना ..दुख को गहेरा उतारना…ये होता है बेवकूफी से..

ऐसे दुख 2 प्रकार से हुआ की बाहर की प्रतिकूलता से दुख हुआ और भीतर की बेवकूफी से दुख हुआ…

ऐसे ही एक बाहर से अनुकूलता से सुख हुआ और दूसरा भीतर की बेवकूफी से सुख हुआ..

की ‘वाह वाह कितना अच्छा लगता है!तू भी अंडा खा के देख’ ..तो वो बेवकूफी से सुख ले रहा है…

‘दारू पी के देख..झूम शराबी झूम ..पेप्सी कोकोकोला पी के नाचे नाचे और फिर पानी पिए…बोले,  ‘हाय बड़ा मज़ा आया!’

 …अरे मूर्ख! खड़े खड़े पानी पीने से बीमारियाँ होती है..और नाच नाच के ये पेप्सी कोका कोला मुँह में लगाना तो पैरों की पिंडलियाँ 42 साल में तोबा करा देगी…नींद नही आने देगी.. मुर्दे के नाई पड़े रहोगे….थकान नही मिटेगी..ये सुख ले रहे हो की दुख ले रहे हो?

‘मेरा लवर ऐसा मेरी लवरी ऐसी’ इस में सुख खोज रहे तो कमर कमजोर कर रहे है..नेत्र ज्योति कमजोर कर रहे..ये बेवकूफी का सुख है..

ये टेस्टी खाया..वो खाया..बोले मैंगोशेक पीते..आम के फल में दूध डालते तो एन्टी(विरुध्द) खुराक है..ये बेवकूफी है, आगे चल के बाइ-पास सर्जरी करानी पड़ेगी….. भोजन और आइस क्रीम एन्टी (विरुध्द) खुराक है.. लेकिन सुखी होने के लिए दुख की खाई खोद रहे..

तो बाहर का सुख दुख भी बेवकूफी से आदमी मानता है..और भीतर का सुख दुख बेवकूफी से बनाता है..

वास्तव में सुख दुख को हम जानते है; हम सुखी दुखी नही होते..

सुखी दुखी होता है मन.

बीमार तंदुरुस्त होता है शरीर.

हम उन दोनो को जानने वाले है.और इन दोनो को जानने वाले का ज्ञान आ जाए तो सुख तुम्हारे लिए साधना बन जाएगा..सुख को बहुतों के हीत में लगाओगे तो महान आत्मा बन जाओगे..

दुख तुम्हारे लिए साधना बन जाएगा की दुख हारी हरि  के प्रसादी को पाओगे…

अगर सुख के पिछे दुख नही आता तो मानवजात की बड़ी दुर्दशा होती..

अनुकूलता के पिछे अगर प्रतिकूलता नही आती तो आप का विकास नही होता..अनुकूलता में खोकले हो जाते..तबाही हो जाती..

तो एक होता है करना और दूसरा होता है कुदरत से होना.

आप नही चाहते की हम दुखी हो, दुखद परिस्थिति आए..लेकिन कुदरती होती है ..जो कुदरती होता है उस में बड़ा हीत  छूपा होता है..जैसे बच्चा अपने तरफ से कुछ  करता और दूसरा माँ की तरफ से होता है…तो अपनी तरफ से जो करेगा उस में अपनी हानि भी करेगा..लेकिन माँ की तरफ से जो होगा की भले ही माँ  नाक दबोचे, गरम पानी से मुँह धोए,नहेलाए, कड़वी दवाई पिलाए तो उस में बच्चे का हीत होता है..लेकिन बच्चा अपनी मनमानी से नाक चाटेगा…अपनी डबल में उंगलिया घुमा रहा है…तो ये मनमानी में बच्चा अपना हीत  नही करता, जितना माँ उस का हीत करती है..लेकिन माँ का किया हुआ हीत  मूर्ख बच्चे को अच्छा नही लगता.. 

..ऐसे ही मूर्ख मनुष्यो को कुदरत की तरफ से दुख मिला तो अच्छा नही लगता…ईश्वर की जो व्यवस्था है बाहर से दुख भेजने  की उस में हमारा बड़ा भला छूपा है..

जैसे हम ठंडी नही चाहते , ठंडी भेजी..अपमान नही चाहते, अपमान भेजा..हम विरोधी नही चाहते …हम को टोकनेवाले ना हो तो भी ये दिया..तो जो हम नही चाहते वो हम को मिला तो उस में ईश्वर का हाथ होता है..ईश्वर  की कृपा होती है…ईश्वर की व्यवस्था होती है. .

पापा ने बबलू से पुछा की, ‘बबलू बेटा तू प्रधान मंत्री होगा तो क्या करेगा?’

‘पापा सारी स्कूले बंद करूँगा!’  ..क्यो की अच्छा नही लगता सुबह सुबह स्कूल  जाना पड़ता है ठंडी में..अब बताओ को बच्चे को तो लगता है की स्कूल कॉलेज बंद होने हम सुखी हो जाएँगे ; लेकिन मानव जात का भला होगा क्या?

तो बच्चे को जो अच्छा लगे वो वास्तव में अच्छा है क्या?

बच्चे को जो बुरा लगे वो वास्तव में बुरा है क्या?

नही!

भगवान जो करता है वो हम को अच्छा लगे चाहे बुरा लगे ईश्वर की सृष्टि में हमारा विकास, विकास और विकास ही छूपा है..

पिता के शरीर की पानी की एक बूँद! और  साब दुकानदार बन गये..मंत्री बन गये..महंत..संत बन गये! ..तो ये विधान की कृपा है  तभी बने है ना?

अपनी कृपा से साधु बाबा बने है क्या? उस विधान ने कृपा किया..सुख दुख देके वैराग्य जगाया…

तो एक होता है करना और दूसरा होता है होना.

विधाता के विधान से जो होता है, सृष्टि कर्ता की कृपा से जो होता है वो चाहे आप को अच्छा ना लगे  फिर भी उस में आप का भला छूपा है..

सुख दुख बाहर से जो आता है वो भी विधान से आता है..अनुकूलता-प्रतिकूलता विधान से आती है..और भीतर से जो सुखी दुखी होते है वो कल्पना से होते है…

बाहर का सुख दुख और भीतर का कल्पना का सुख दुख  दोनो बेवकूफी से ही दिखता है.. बाहर की सुविधाओं में अगर सुखी मानेगा तो आदमी ऐशी आरामी, विलासी हो कर खोकला हो जाएगा….और दुख से अगर डरता है

तो कायर हो जाएगा..दुख आया तो दाता का भेजा हुआ है..दुख हारी के शरण जाने के लिए, विवेक वैराग्य बढ़ाने के लिए आया है..संसार दुखालय है ये समझाने के लिए दुख आया है..

तो आदमी को बाहर से जो दुख भेजता है विधाता वो ईश्वर तक पहुँचा देगा…अगर बाहर से सुख भेजा है तो दूसरे के दुख दूर करने के लिए…. सुख मिला है तो बाटने के लिए और दुख मिला है तो विवेक वैराग्य जगाने के लिए..

विवेक वैराग्य जगा तो आप दुख से बच जाएँगे..दुखी आदमी का दुख तब तक रहेता है जब तक वो अपने को दुख का घर बनाता है…

दुख का घर कौन बनाता है अपने को ? मूढ़ आदमी!

दुखी की भूल बनी रहेगी तब तक दुखों से जान नही छूटेगी…एक दुख गया ना गया दूसरा दुख आएगा..दूसरा दुख गया ना गया तीसरा आएगा….चौथा आयेगा …

दुखी आदमी का दुख तब तक  बना रहेता है जब तक उस की भूल बनी रहेगी…अगर दुखी आदमी अपनी भूल निकाल दे तो दुबारा दुख आएगा नही…दुखद परिस्थितियाँ  आएगी  फिर भी वो आदमी दुखी नही बनेगा !

ये एकदम आप के अनुभव की बात है…शास्त्र की बात मत मानो ..चलो…भगवान की बात मत मानो…गुरु की बात मत मानो..लेकिन अपना अनुभव तो मानना चाहिए ना?

अपना अनुभव क्या है?  की सुबह से शाम तक, जीवन से मौत तक आप सुख को संभालते है..सुख बना रहे…इज़्ज़त बनी रहे..तंदुरुस्ती बनी रहे…ये मानते है ना आप? की सुख , इज़्जत , तनदूरूस्ती बनी रहे यही आप चाहते..  ये मानते ना?

तो सुख को थामने और दुख को भगाने के लिए ही सब करते है सुबह से शाम तक..ठीक बात है? ये आप का अनुभव है..जीवन भर सुबह से शाम तक , जन्म से मौत तक सुख को थामना और दुख को भगाना यही करते…

शादी करते तो सुखी होने के लिए, तलाक़ देते तो सुखी होने के लिए..नोकरी करते तो सुखी होने के लिए , वोलेंटरशिप लेते तो सुखी होने के लिए…किसी से दोस्ती करते तो सुखी होने के लिए और किसी से दुश्मनी करते तो कोई दुख दे रहा उस दुख को मिटाने के लिए..

सुख को थामना, दुख को मिटाना ये 2 कामों के सिवाय तीसरा कौन सा काम करते आप?

मंदिर में भी जाते तो सुख को थामने के लिए, साधु संतों के पास भी आते तो दुख को भगाने के लिए..

केवल मनुष्य ही नही;   कीड़ी से लेकर कुंजर तक ..और जीव से लेकर देवता तक सब सुख को थामते है दुख को भगाते है..लेकिन अंत में देखो तो सरप्लस क्या रहे जाता है ? दुख ही रहे जाता है..बचत में दुख ही दिखता है.

जीवन मे देखो तो दुख ज़्यादा है ..अकेला दुख कोई नही देख सकता , अकेला सुख भी कोई नही देखता..सुख-दुख-सुख-दुख..इसलिए सुख भी बहोत  हो जाते..दुख भी बहोत  हो जाते…लेकिन उस का अनुभव करनेवाले तुम ज्यो के त्यो रहे है..ये आप का अनुभव है..

सुख को संभालना और दुख को भगाना यही काम है फिर भी बचत में दुख ही रहे जाता.. क्यो की संसार से आप सुखी रहेना चाहते और दुखालय संसार से दुख मिटाने की ग़लती बरकरार रखते..

संसार दुखालय है..किसी को आग लगे और पेट्रोल  का फवारे से आग बुझाने जाए तो आग बढ़ेगी..आग लगी है और उस पर सूखा तिनका डालो अथवा तो मिट्टी का तेल डालो तो आग बुझेगी क्या? ऐसे ही जिस को संसार की तरफ से दुख हुआ है और फिर संसार की तरफ से ही सुखी होना चाहता है…तो दुख दब जाता है..और गहेरा होता है..बढ़ता जाता है.. दुख आए तो आप दुखालय संसार के साधनो से दुख मिटाने की ग़लती ना करे..सुख से दुख मिटाने की ग़लती ना करे..दुख आया है तो भोगने की ग़लती ना करे..

दुख आया है तो विवेक जगाओ की दुख किस निमित्त आया? क्यो आया ? दुख किस को होता है?

दुख होता है मन को. आया है विधान से.

‘ऐसा ना हो’ ये हमारा आग्रह है इसलिए दुख होता है. अगर दुख आया तो विकास के लिए उस का फ़ायदा उठाओ..तो दुख आप को दुखी नही करेगा….सुख आया है उस का फ़ायदा उठाओ तो सुख आप को खोकला नहीकरेगा..सुख में आप गरकाव हो जाते.

जैसे जलेबी की चासनी की कढ़ाई होती है ना , उस में मख्खी और मकोडे जो सयाने है वो कढ़ाई के किनारे से संयम से अपना काम बना के भाग जाते है… और जो बेवकूफ़ मख्खीयाँ और बेवकूफ़ मकोडे है वो चासनी में डूब मरते है…चासनी है तो उन के लिए सुख ! लेकिन ज़्यादा भोगते तो वो ही चासनी उन के लिए मौत बन जाती है…

 ऐसे ही संसार की अनुकूलता है तो आप के विकास के लिए..लेकिन उस का ज़्यादा उपयोग करते तो वो ही आप के लिए बीमारी बन जाती है..

पति पत्नी का संबंध है तो पति पत्नी का संयम बढ़ाए..पत्नी पति का संयम बढ़ाए..और अच्छी तेजस्वी संतान को जन्म दे..जो बुढ़ापे में हमारी सेवा भी करे और संस्कृति की सेवा भी करे…

लेकिन जो पत्नी आई तो ना दिन देखा, ना पूनम देखी ना अमावस्या देखी, ना होली देखी,ना शिवरात्रि देखी ..  सुखी होने में लगे रहे तो पत्नी भी बीमार होगी, पति भी बीमार होगा..बच्चे भी हरामजादे पैदा होंगे..तो सुख का दुरुपयोग हुआ ना?

सुख का भोग हुआ, उपयोग नही हुआ..

जैसे भोजन है तो आप चबा  चबा के भोजन करो.. बीच में गुनगुना पानी पिए तो कंधे नही पकड़ेंगे..शरीर स्वस्थ रहेगा..खाना ठीक से हजम होगा..लेकिन ज़्यु ही भोजन सामने आया चबर चबर जल्दी खाते गये..पानी पिया ना पिया और खाते गये..थोड़ा और , थोड़ा और करते करते ज़्यादा भोजन (ओवर ईटिंग)करता है सुख के लिए..तो वो जी भोजन उस के लिए बीमारी लेकर आती है..

भोजन तो है, भोजन से आप बीमार नही होते..खाते खाते एक बार ऐसा होता है की ‘बस!’ ..फिर और थोड़ा .. थोड़ा .. थोड़ा ..सुख की लालच से आप दुख भर लेते…तो बीमारियाँ  बन जाती है..

मिठाइयाँ हंसती है की ‘करेला तुम कितना बेकार है! कड़वा कड़वा!!..

करेला ने कहा, ‘बेटी मेरे बिना तो तुम्हारी कोई कदर नही होती..’

बोली, ‘क्यू? मिठाई तो मिठाई होती है!’

करेला बोला, ‘मिठाइयाँ डायबीटीस करती..कड़वा करेला है तब मिठाई हजम होती..’

लेकिन माइयाँ  क्या करती? ..करेला को चिर के नमक भरते..करेले में गुण है उस को निचोड़ के सब्जी बनाते तो करेला नही घास खा रहे! करेले की कड़वाहट पचाओगे तो मिठाई की मिठास हजम होगी..शरीर में

षड-रस लेने की ज़रूरत है..मीठा खाते, खारा खाते, तीखा

खाते,खट्टा खाते, तुरा भी खाते…लेकिन कड़वा नही खाते तो शरीर का संतुलन ठीक नही होता..आरोग्य नही रहेता..

नीम के पत्ते खा लेने चाहिए ..अभी होली के दिनों में नीम  के पत्ते खाने की सीजन है..और इस समय करेला खाने की सीजन है….

पिताजी फॅक्टरी से आए..पत्नी से पुछा, ‘बबलू कहाँ  गया?’

देखा तो बबलू चद्दर ओढ़ के सोया है … क्या हुआ ?

बोली , ‘सोया है..ठंड लगती चादर ओढ़ा दी..’

पिताजी ने भोजन किया..बबलू की तरफ देखा तो दूसरी चादर ओढ़ी है..

पुछे, ‘दूसरी चादर क्यो ओढ़ी ?’

बोली, ‘बेचारे को ठंड लगती है’

पिताजी घूम के आए..देखा तो तीसरा भी कपड़ा ओढ़ा दिया है माँ ने..

बाप ने क्या किया की बच्चे पर के तीनो कपड़े उतार के फेंक दिए…

बोले, ‘मेरे बेटे को इतना कायर बनाती है?..ठंडी नही पचाएगा तो गरमी कैसे सहेगा? ठिठूरने दे उसे…ठंड आएगी तो गरमी को शोषित करेगी…

इसलिए कार्तिक के महीने में सुबह सुबह जल्दी नहाने का विधान है..ठंड आने वाली है..ठंड पचाने के लिए आप को पहेले से ही अपना धर्म तैयार करता है ..सुबह  सुबह उठेंगे जल्दी और नहाएँगे तो रोम कुपो द्वारा रात भर जो गर्मी आ गयी है उस गरमी का परिमार्जन होता है..

जो सुबह देर से उठते वो इतने स्वस्थ नही रहेते जीतने सुबह जल्दी नहानेवाले स्वस्थ रहेते है.. ठंडे पानी से नहाने वाले जीतने स्वस्थ रहेते , गरम पानी के गुलाम इतना स्वस्थ नही रहेगा..तो ठंडी अच्छी नही लगती फिर भी हीतकारी है..ऐसी गरमी अच्छी नही लगती फिर भी गरमी के सीजन में गरमी हीतकारी है..जो ठंडी नही पचाएगा वो गरमी क्या पचाएगा ? जो अपमान नही पचाएगा ..गुरु ने गालिया दे दी..लोगो के सामने अपमान कर दिया..लेकिन गुरु दयालु है ये शिष्य जानता था..थोड़ी देर के बाद गुरु ने बुलाया..बेटा ये ऐसा करो ना.. गुरुजी अभी तो प्यार से बोलते, थोड़ी देर पहेले तो गालिया दिए…

गुरुजी बोले, ‘हमारा प्यार पचाता है …लोगो के सामने अहम बढ़ जाता है…लोगो के सामने ज़रा इधर उधर कहेता हूँ तो अहम नियंत्रित रहेता है…अगर करेला हजम नही होगा तो मिठाई भी हजम नही होगी…और गुरु की गाली नही पचाई तो संसार में ना जाने कितना अपमान सहेना पड़ेगा…

गुरु धोबी शिष्य कपड़ा साबुन सर्जनहार l

गुरु है धोबी..शिष्य है कपड़ा..और भगवान का नाम है साबुन सर्जनहार.

सूरत शीला पे बैठ के निकले मैल अपार ll

तो श्वास अंदर गया तो ‘ओम’ बाहर आया तो -1 .

श्वास अंदर आया तो ‘शांति’ बाहर आया तो -2

ऐसी श्वासोशवास की सूरत शीला की साधना करो तो अनेक प्रकार के मैल निकल जाते…

मथुरा के राजकुमार दशाहर का राज तिलक हुआ..राज गद्दी पर बैठा तो शादी भी करने गया…..काशी नरेश की बेटी कलावती से विवाह हुआ..अब वो राजा बन गया..राजा दशाहर कलावती को कहेता है, ‘रात्रि को आ जाना’

कलावती गयी नही…. दशाहार ने इंतजार किया…फिर उस के महेल में गया..देखा तो कलावती अपने आराम कक्ष में बैठी है..

बोला, ‘कलावती तेरी मेरी शादी हो गयी..तू कितनी खूबसूरत है’ आदि बोला जैसे कामी लोग बोलते….आप लोग समझ लेना , वो मेरा विषय नही..

तो बोला तू ऐसी है वैसी है..आई क्यू नही?….चलो मैं बुलाने आया हूँ…कलावती गयी … बैठी..जो ही दशाहर कलावती को प्यार से हाथ लगाने लगा…प्यार तो  क्या, काम होता है..प्यार तो भगवान करते, माता पिता करते और गुरु करते… पति-पत्नी का प्यार तो शारीरिक संबंध से होता है तो काम होता है..

प्रेम को शरीर में देखा तो काम हो जाएगा.

प्रेम को धन में लगाया तो लोभ हो जाएगा.

प्रेम को वाहवाही में लगाया तो अहंकार हो जाएगा.

और प्रेम को वास्तविक ज्ञान में लगाया तो परमात्मा प्रगट हो जाएगा!

दशाहर कलावती को बोले, ‘तेरा बाल कितना सुंदर.. तेरा चेहरा कितना सुहावना..’ बोलते बोलते जैसे ही दशाहर ने उस को स्पर्श किया , उस को बिजली के करंट जैसा शॉक लगा..

कलावती ये क्या है?

कलावती चुप बैठी.श्वास अंदर जाए तो भगवान का नाम.. अपनी अध्यात्मिक आभा में बैठी रही…

दशाहर धीरे से कलावती का कंधा पकड़ता है…फिर से शॉक लगता है..दूसरे हाथ से स्पर्श करने गया..फिर से शॉक लगा…

‘कलावती ये मैं क्या देख रहा हूँ? तू विद्युत की पुतली है क्या? खुली तारे है क्या शरीर में ? तू बिजली घर है क्या?’

 कलावती बोली, ‘नाथ ऐसा कुछ नही..मैने दुर्वासा ऋषि से गुरु मंत्र लिया था, वो जपने से मेरी अध्यात्मिक ओरा जागृत है..आप ऐसे तो बुध्दीमान  है..’

अब देखना माइयाँ …आप कलावती को गुरु बान लो..कैसा भी हरामी पति हो, कैसा भी लुच्चा लफंगा पति ही उस को तुम देवता बना सकते हो..!

बोली, ‘नाथ आप सब कुछ जानते हो..’

कुछ भी नही जानता!..अहंकारी को पहेले अहंकार का रंग चढ़ाया जाता है….तभी तुम्हारी बात लगेगी…सीधे भौवे चढ़ा के ‘तुम ऐसे नही करते ऐसे नही करते’ बोलने से तो तुम्हारी ही चोटी पकड़ के घर के बाहर कर देगा…

पति को समझाना ,  सही रास्ते लगाना कस्तूरबा से सीखो और कलावती से सीखो..पति से दुश्मनी अथवा पंगा मत लो.. कैसा भी पति हो, विवाह हो गया ना? फेरे फिर लिए अब उस से दुश्मनी मत लो और पंगा मतलो ..फिर देखो क्या होता है..जो तुम्हारी आवश्यकता पूरी करता है उस के प्रति तुम अच्छा व्यवहार करते हो की नही करते हो? तो आवश्यकता पूर्ति करने वाला स्वामी हो गया की नही हो गया?

आप को प्यास लगी है या भूक लगी है और पत्नी ने प्यार से भोजन दे दिया या पानी दे दिया तो आप उस से प्रभावित  हो जाओगे की नही?

मान की सब को इच्छा है और आप मान देते हो तो आप को वो चाहेंगे की नही चाहेंगे?

तो मैं कलावती और कस्तूरबा की कथा सुनाऊँगा..

(पूज्यश्री बापुजी ने कलावती की कथा सुनाई . इस कथा के लिए कृपया यहाँ पधारे : http://wp.me/P6Ntr-Oz  )

 एक बार कस्तूरबा और गाँधीजी  में  ‘ऐसा’ हो गया था..ऐसा समझती हो माइयाँ ? कुछ तो बोलो..नही समझती हो तो  भगवान को बोलो की तुम्हारे घर में अनुभव हो जाए! 🙂

'aisaa' samajhate ?

‘ऐसा’ अनुभव तो होता रहेता है ना? 🙂

‘ऐसा’ होता की नही होता? भाई लोग समझते हो? ‘ऐसा’ होता है की नही?होता है ना?

“हा! ”  🙂

तो तुम नही चाहते ‘ऐसा’ हो..पति भी नही चाहते , पत्नी भी नही चाहती की हमारा झगड़ा हो..फिर भी होता है तो ये भगवान का भेजा हुआ प्रसाद है..नही तो ज़्यादा शरीर खोकले हो जाएँगे और आयुष्य पूरी हो जाएगी..‘ऐसा’होता है तो थोड़ा संयम भी रहेता है  और आगे  का रास्ता भी सुझता है..आप के घर में कभी ‘ऐसा’ना हो ऐसा आशीर्वाद मैं नही देता!..भगवान करे होता रहे…

पति-पत्नी कुछ बोल देते तो उस को सच्चा नही मानना चाहिए…. घर-परिवार मे कोई कुछ बोल दे तो उस को सच्चा नही मानना चाहिए…. घर मे झगड़ा हो तो जीभ तालू मे लगा के भगवान का सुमिरन करे; झगड़ा समझोते में  बदल जाएगा…. एक बार कस्तूरबा और गाँधीजी मे झगड़ा हो गया..

गाँधीजी बोले, ‘तू मेरे घर में  नही रहेगी, तेरा मेरा संबंध कट!’

..गाँधीजी ने कस्तूरबा का हाथ पकड़ कर बाहर कर दिया..

तो कस्तूरबा सीडियो में  बैठी रही..गाँधीजी खिड़की से देखे की कहा जाती..कस्तूरबा वहा ही सीडियो पे बैठी रही, तो गाँधीजी दरवाजा खोल के फिर डांटे, ‘शरम नही आती ? यहा बैठी है,चली जा , इस घर में तेरा पैर नही…घर से निकल जाओ..जाओ..’

आख़िर में  कस्तूरबा बोली, ‘बहोत  हो गया  वकील साहब! आप को शरम आना चाहिए..’

बोले, ‘एँ!मेरे को क्यो शरम आएगी?’

कस्तूरबा बोली, ‘घर तो घर वाली का होता है…तुम्हारा तो ऑफीस है.. अभी रात्रि के 10 बजे मैं  कही जाऊँ तो अख़बारो में आएगा की गाँधीजी की पत्नी पराए  घर में  रही… आप की इज़्ज़त मेरी इज्जत नही है क्या?’

गाँधीजी और कस्तूरबा का झगड़ा वहा ही मिट गया!

जब कस्तूरबा बीमार थी तो गाँधीजी ऐसी सेवा करते,की शायद ही कोई पति करे! अभिमान नही, जीवनभर साथ रहे..प्यार से..ब्रम्हचर्य  में..

मैं नही चाहता हूँ की तुम बीमार पडो और तुम्हारा पति तुम्हारी चाकरी करे..मैं तो चाहता हूँ की तुम्हारे जीवन में ऐसी चमक आए की दुख के समय धैर्य और सुख के समय उदारता , दुख के सीर पर पैर- सुख के सीर पर पैर हो , परमानंद परमात्मा  का सच्चा प्यार हो!

🙂 मैं शुरू शुरू में गुरुजी के पास गया था  मुंबई के पास वज्रेशवरी में..साई एकांत में थे…कोई भगत था.. बेटे की शादी करा के दुल्हन दूल्हे को आशीर्वाद कराने ले आया था…

साई बोले, आशीर्वाद तो क्या है?.. भगवान करे पत्नी झगडाखोर हो या तो कुरूप हो! तो वर का कल्याण है ….बाकी तो जुग जुग जियो, दक्षिणा धरो, तुम चाहे तरो चाहे मरो वाले आशीर्वाद से कोई जुग जुग जीता नही….असली आशीर्वाद तो ये है की, ‘पत्नी कुरूप हो या झगडाखोर हो तो वर तेरा कल्याण हो जाएगा’.. 🙂 दूल्हा का बाप सुकूडा.. फिर गुरुजी ने एक कहानी उस को बताई…लेकिन बताने से अब विषयांतर हो जाएगा…

तो दुख नही चाहते तो ओ विधान …प्राकृतिक ढंग से ये बाते समझ में आए जो चाहते नही होता है तो समझ लेना भाला चाहता है…तो दुख आप नही चाहते तो भी दुख आता है तो विधान से आया है…विधान सभी के भले के लिए होता है…

आप नही चाहते की सुख चला जाए , लेकिन प्राकृतिक ढंग से सुख खिसक जाता है…आप नही चाहते फिर भी जो होता है उस में ईश्वर की कृपा है…

ये बाते अगर आप के समझ में आ जाए तो मैं तो आप को हाथ जोड़ू!आप का बहोत भला हो जाएगा..आप चाहते वो नही होता है तो समझ लेना की तू हमारा भला चाहता है हम जानते नही है..लेकिन तू भला चाहता है इसलिए दुख भेजा है…अभी सुख भी भेजा है तो भला चाहता है..माँ बाप बच्चे के लिए जो भी करेंगे तो उस की भलाई के लिए ऐसे भगवान जो भी करते है आप के भलाई के लिए…भगवान के तरफ से जो होता है , जो आप नही  चाहते फिर भी होता है तो आप का उस में भला है..

विधि के विधान से हमारा जितना भला होता है उतना हम अपनी अकल हुषारी से अपना भला नही कर सकते… मासूम दूध पीने वाला बच्चा अपना इतना भला नही कर सकता जितना माँ  बच्चे का भला कर सकती ..और बच्चे का  भला किस में है ये माँ  जितना जानती है उतना वो भोंदु  स्वयं नही जानता!  हम  मासूम थे , जब दूध पीने वाले बच्चे थे तब हमारे माँ  बाप हमारा जितना भला  जानते थे उस समय हम अपना उतना भला नही जानते थे..

ऐसे ही ईश्वर और  प्रकृति हमारा जितना भला जानते और करते है उतना हम नही कर पाते है…

तो झगड़े देकर भी आप की आसक्ति मिटाता है..

जब झगड़ा होता है ना तो एक दूसरे के दोष दिखते.. जब झगड़ा नही हुआ तब पहेले पहेले दिनों  में तो वो बुद्दु समझता की आहाहा…ब्रम्‍हा जी ने इस को तो अमृत के घड़े से बनाया है ! 🙂  एक दूसरे को देख कर हेंहें हेंहें  करते …सत्यानाश कर देते है हेंहें हेंहें हेंहें  में…फिर तो कभी कभी हेंहें हेंहें में  दिन को भी संभोग करते..आयुष्य नाश होती है दिन को संभोग करने से..आँखो की ज्योति  घटती है और बुध्दी का

प्रभाव नाश होता है..और  मासिक धर्म में तीसरे,चौथे, पाचवे दिन में करे तो तबाही होती है..लेकिन हेंहें हेंहें  में पता ही नही चलता….उस समय तो बस अंध के चश्मे लग जाते है…एक तो यौवन हो, दूसरा पैसा हो और तीसरा तंदुरुस्ती हो और चौथा हेंहें हेंहें वाले मिले फिर तो तबाही की ओर तो बिल्कुल नॅशनल  हाइवे की जैसे गाड़ी दौडेगी..

तो विधाता ने कृपा किया है..यौवन भी दिया, तनदुरूस्ती भी दी, पैसा भी दिया, पति पत्नी भी दिया ..लेकिन कुछ  ना कुछ अट-पट डाल दी ता की हेंहें हेंहें  में हूहू ना हो जाओ!..कितनी करुणा कृपा है !प्रभु तेरे दुख मे कितनी करुणा है! क्या व्यवस्था है!!

आप अगर उस विधान को समझे तो आप दुखी नही हो सकते.. आप उस विधान को समझेंगे तो सुख के लोलुप नही होंगे..सुख के दाता हो जाओगे..आप के पास सुख आएगा तो आप बाटोगे…और दुख आएगा तो उस प्रभु की प्रीति में अमृतमय हो जाओगे..

दुख का सतुपयोग करो, विकास का साधन समझो.

दुख को विकास का साधन समझोगे तो की दुख आने पर भी आप दुखी नही होंगे..दुख कैसे आते?एक तो प्राकृतिक विधान  से आते, दूसरा प्रारब्ध वेग से आते और तीसरा अपनी बदपरहेज़ी से आते…  इन सब का मूल है अपनी बेवकूफी से सब जगह दुख बन जाते..

जीभ घूम रही है …परसो दाँत टूटा है…31 दाँत मुँह में है..मेरा नही टूटा है 🙂 दृष्टांत देता हूँ…31 दाँत हैं मुँह में उस की कदर नही है, लेकिन एक दाँत नही है..’नही है’ तो वहा ही जीभ बार बार घूमती..जो है उस की कदर नही, और जो नही उस की सोच में दुखी होना…

घर मे 2 कमरे है, एक रसोई घर है..लेकिन सहेली के  पास 3 कमरे है उस की खटक माई के मन में है…

किसी के घर फर्नीचर देख के आए तो मन में खटक की अपने घर में तो ऐसा है..

जो लोग पिक्चर देखते वो झगड़ा करेंगे ज़रूर…क्यो की पिक्चर में जो नाज़ नखरे करते ऐसी तुम्हारी गृहिणी बेचारी नहीं  कर पाएगी तो अच्छी नही लगेगी.. पिक्चर का पति जैसा नटखटिया होता है ऐसा पत्नी को पति नही दिखेगा..जो पिक्चर बाज है वो पति अपने पत्नी से संतुष्ट नही, वो पत्नी अपने पति से संतुष्ट नही.. फिर इधर उधर मुँह काला करेंगे..

दुखी किस लिए होते? की सही समझ नही है..अगर सही समझ आ जाए तो आप को पिक्चर  की गुलामी कर के सुख नही होना पड़ेगा..क्लबों  की गुलामी से सुख नही ढूँढना पड़ेगा..

आप स्वयं ही ऐसे सुख रूप हो की दिले तस्वीरे है यार जब भी गर्दन झुका ली मुलाकात कर ली…वो थे ना मुझ से दूर , ना मैं उन से दूर था , आता ना था नज़र तो नज़र का कसूर था..सूझ बुझ का कसूर था….

अगर सूझ बुझ सत्संग के द्वारा नही बनाई तो भगवान स्वयं तुम्हारा घोड़ा गाड़ी चलाए तभी भी दुख नही मिटेगा…अर्जुन का रथ श्रीकृष्ण चलाए फिर भी  अर्जुन का दुख नही मिटा …श्रीकृष्ण ने कृपा कर के अर्जुन को ब्रम्‍हज्ञान  की तरफ जगाया…आधिभौतिक क्या होता है..आधिदैविक क्या होता है..अध्यात्म क्या होता है ? ऐसा पुछ के अध्यात्म की भूक जगाई …तब अर्जुन को लाइट हुआ..शरीर सहित स्वर्ग जाने वाले अर्जुन , एक वर्ष किन्नर बनने का श्राप स्वीकारा लेकिन उर्वंशी अप्सरा को ठुकरा के संयम का परिचय देने वाले अर्जुन ..ऐसा मानवता को यश देनेवाली  उँचाइयों को  छू ने वाला अर्जुन था… रोज भगवान के दर्शन करता फिर भी अर्जुन का दुख नही मिटा…जब भगवान कृपा कर के अर्जुन को सत्संग देते तो फिर बोलता है

“नष्टों मोहा स्मृतिम लब्ध्वा”

इसलिए भगवान के दर्शन से भी भगवान का सत्संग ज़्यादा हीतकारी है…

ब्रम्‍हज्ञानी  गुरुओं के दर्शन और सत्संग से असुविधा में भी  सुखी आनंदित होते..आप को घरों में बैठने की जगह नही ऐसा नही..यहा अभी आप लेटना चाहे तो नही कर सकते..पानी पीना है तो नहीं जा सकते … किसी से बात करनी है तो नहीं कर सकते … नेताओं के भाड़ोत्री  लोग भी आप नही… तो भी आप असुविधा में इतने आनंदित हो रहे है तो ये आप को चिन्मय  सुख मिल रहा है…. अंतरात्मा का सुख मिल रहा है इसलिए आप बैठे है..

इसलिए कहेते की :

साधुजन मिल हरि यश गाइए l

ब्रम्ह ज्ञानी की दृष्टि अमृत वर्षी l

नज़रों से वो निहाल हो जाते ,

जो संतों की नज़रों में आ जाते ll

तो संतों के वाणी से, संतों की नज़रों से, संत को छू कर जो हवा आती है उस से हम को जो फ़ायदा होता है वो फ़ायदा किसी देने की किसी औषधि में ताकद नही होती..

संत के द्वार एक एक कदम चल कर आते तो एक एक यज्ञ  करने का फल होता है … बैठते तो भक्ति का मीटर चालू होता हैं …. संत के साथ संकीर्तन करते तो आप के शरीर के 7 केंद्र , 72 करोड़ 72 लाख नाड़ियाँ , 23 उपत्काये शुद्ध हो जाते है … ये विज्ञान से भी सिध्द हुआ है की रक्त परीक्षण किया जाये सत्संग से पहेले और बाद में तो सत्संग सुनने से आप के रक्त में 1 घन मिली रक्त में 1600 श्वेत कण बढ़ जाते है …

आप को शिव जी के धन्यवाद  में अपना धन्यवाद मिला कर देता हूँ :

धन्य माता पिता धन्य गोत्रम धन्योम कुलोदभव

धन्याच वसुधा देवी यत्र स्यात गुरु भक्तत: ll

Guru Darshan Express

मोबाइल से जितना सत्यानाश हुआ है उस का हीसाब तो आगे की पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा …आप को भी चुकाना पड़ेगा..वीर्य के कण कमजोर हो जाते है..ज़्यादा मोबाइल का उपयोग करते तो नपुंसकता आती है..नपुंसकता नही भी आती तो धातु कमजोर से बच्चे तो कमजोर आएँगे…आँखों की रोशनी कमजोर हो जाती, कनपटी की पिछे की नसें कमजोर हो जाती है..सिर के दर्द कई प्रकार के आते है.. कॅन्सर जैसी बीमारियाँ  मोबाइल फोन की देन हो जाती है..मोबाइल फोन से जो हानियाँ होती है उन को तोड़ने के लिए  राग सहानी, राग पहाड़ी सुना करो..मोबाइल से जो हानियाँ होती उस का काट है राग पहाड़ी..

ओम शांति.

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो!!!!!

ग़लतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे….

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

Mujaffarpur satsang amrut; 13 Dec 2011

Naaraayan Hari

Hari om Hari.

kyaa haalchaal hai?

Jamanaapaar poonam puri kar ke 11 taarikh ko raat ko gaadi bhagaayi..Baraut  gaye..12 taarikh baraut men satsang kaaryakram puraa huaa..12 raat ko gaadi  bhagaayi Baraut se mujaffarpur ke liye bich men ek gaushaalaa men thodaa  jhaank liyaa…phir mujaffarnagar ke aashram se gaadi aaraam se chalaayi aur  tumhaare bich aaye..:) tumhaaraa kyaa haalchaal hai? 🙂 tumane gaadi kahaa  bhagaayi , kahaa chalaayi bataao.. 🙂

Naaraayan Hari

Hari om Hari.

ye bhru madhy par tilak karanaa badaa heet kaari hai..lalaat par chandan  kesar aadi ka tilak karanaa us kaa alag mahatv hai..lekin aam aadami athavaa  maataayen bahene  jo bhru madhy men tilak karati hai vo tilak agar plaastik  ki bindi waalaa nahi ho to bahot phaayadaa karataa hai…plastik ki bindi se  to nuksaan hotaa hai…plaastik ki bindi chipakaane waali chemical banaane  ke liye pashuo ke ango kaa upayog hotaa hai..

bhru madhya par (kumkum, haldi, chandan, tulasi ki mitti aadi se) tilak  karane se bahot laabh hote hai..is ko shiv netr bolate hai…aagyaa chakr  bhi bolate hai…vigyaaniyon ne kahaa ham hairaan hai ..ki hindusthaani log  jahaa tilak karate hai vo piniyal granthi hai…vo ise piniyal granthi  bolate hai….vaigyaanik jagat men piniyal granthi  sakriy rahene se vo  vyakti prabhaavshaali hote hai aisaa kahaa jaataa hai..

waise to aap koyi bhi shubh karm karate to pahele braamhan yahaa lalaat par   hi tilak karate baad men pujaa paath karaayegaa..kaaran yahi hai ki aap ki 

sujh bujh unnat ho..sujh bujh unnat nahi to aadami ke paas kitanaa bhi dhan  daulat kuchh  bhi ho phir bhi vo  dukhi rahetaa hai.

dukh 2 parakaar se hotaa hai.

ek to – baahar se dukh aataa hai..jaise jyaadaa baarish padaa, bhukamp huaa,  accident huaa….to ye baahar ki pratikulataa se dukh hotaa hai…aur baahar ki anukulataa se sukh hotaa hai..to baahar se sukh dukh aataa hai.

dusaraa – aadami apani soch vichaar se dukh sukh banaataa hai.

‘mai to badaa pareshaan hun ..aisa ho gayaa..waisaa ho gayaa…’ -to jo  achchaa huaa us ki kadar nahi karegaa…jo gadabad huaa us ko yaad kar kar  ke bolegaa, ‘main pareshaan hun..’

‘kya kare khaanaa hajam nahi hotaa’..are jin ko khaanaa nahi milataa un ki  apekshaa bhagavaan ne tum ko jyaadaa khaanaa diyaa…to sanyam se 

khaaye..bewkufi se khaayaa to bimaar huaa…raat ko der se khaayegaa to  bimaar hogaa..

‘kya kare bete maanate nahi..aise nahi waise nahi..tabiyat thik nahi  raheti… shadi kiyaa lekin badaa dukhi hun..’

to shaadi se dukhi hai ki shaadi ke durupayog se dukhi hai?

agar amaavasyaa ko, poonam ko, shivaraatri ko, holi ko, diwaali ko,  janmaasthami ko pati patni kaa vyavahaar kiyaa to vikalaang santaan hogi aur 

santaan paidaa nahi bhi huyi to phir jeevan bhar ki bimaariyaa  pakadegi..jeevanbhar rote rahenge.. 

to ek to hotaa hai ki baahar ke anukulataa se sukh aur pratikulataa se  dukh…dusaraa hotaa hai naasamajhi se dukh  banaanaa..sukh ko bhi dukh  banaanaa ..dukh ko gaheraa utaaranaa…ye hotaa hai bewkufi se..

aise dukh 2 prakaar se huaa ki baahar ki pratikulataa se dukh huaa aur  bhitar ki bewkufi se dukh huaa…

aise hi ek baahar se anukulataa se sukh huaa aur dusaraa bhitar ki bewkufi  se sukh huaa..

ki ‘waah waah kitanaa achha lagataa hai!tu bhi andaa khaa ke dekh’ ..vo  bewkufi se sukh le rahaa hai…

‘daaru pee ke dekh..jhum sharaabi jhum ..pepsi kokakolaa pi ke naache naache  aur phir paani piye…bole,  ‘haay badaa majaa aayaa!’

 …are murkh! khade khade pani pine se bimaariyaan hoti hai..aur naach  naach ke ye pepsi kokaa kola munh men lagaanaa to pairon ki pindaliyaan 42  saal men tobaa karaa degi…nind nahi aane degi.. murde ke naayi pade  rahoge….thakaan nahi mitegi..ye sukh le rahe ho ki dukh le rahe ho?

‘meri lover aisa meri lovery aisi’is men sukh khoj rahe to kamar kamajor kar  rahe hai..netr jyoti kamajor kar rahe..ye bewkufi kaa sukh hai..

ye testy khaayaa..vo khaayaa..bole mango shake pite..aam ke phal men dudh  daalate to anti(virudhda) khuraak hai..ye bewkufi hai, aage chal ke by-paas sarjary karaani padegi….. bhojan aur ice cream anti(virudhda) khuraak  hai.. lekin sukhi hone ke liye dukh ki khaayi khod rahe..

to baahar kaaa sukh dukh bhi bewkufi se aadami maanataa hai..aur bhitar kaa  sukh dukh bewkufi se banaataa hai..

vaastav men sukh dukh ko ham jaanate hai; ham sukh dukhi nahi hote..

sukhi-dukhi hotaa hai man.

Bimaar-tandurust hotaa hai sharir.

ham un dono ko jaanane waale hai.aur in dono ko jaanane waale kaa gyaan aa  jaaye to sukh tumhaare liye saadhanaa ban jaayegaa..sukh ko bahuton ke heet 

men lagaaoge to mahaan aatmaa ban jaaoge..

dukh tumhaare liye saadhanaa ban jaayegaa ki dukh haari hari ke prasaadi ko  paaoge…

agar sukh ke pichhe dukh nahi aataa to maanavajaat ki badi durdashaa hoti..anukulataa ke pichhe agar pratikulataa nahi aati to aap ka vikaas nahi  hotaa..anukulataa men khokale ho jaate..tabaahi ho jaati..

to ek hotaa hai karanaa aur dusaraa hotaa hai kudarat se hona.aap nahi  chaahte ki ham dukhi ho, dukhad paristhiti aaye..lekin kudarati hoti hai 

..jo kudarati hotaa hai us men badaa heet chhupaa hotaa hai..jaise bachchaa apane taraf se kuchh  karataa aur dusaraa maa ki taraf se  hotaa hai…to apani taraf se jo karegaa us men apani haani bhi  karegaa..lekin maa ki taraf se jo hogaa ki bhale hi maa naak daboche, garam  paani se munh dhoye,nahelaaye, kadavi davaayi pilaaye to us men bachche ka  heet hotaa hai..lekin apani manamaani se naak chaategaa…apani double men  ungaliyaa ghumaa rahaa hai…to ye manamaani men bachchaa apanaa heet nahi  karataa, jitanaa maa us kaa heet karati hai..lekin maa ka kiyaa huaa heet  murkh bachche ko achhaa nahi lagataa…  

..aise hi mrukh manushyo ko kudarat ki taraf se dukh milaa to achchaa nahi  lagataa…iishwar ki jo vyavasthaa hai baahar se dukh bjejane ki us men 

hamaaraa badaa bhalaa chhupaa hai..

jaise ham thandi nahi chhhate , thandi bheji..apamaan nahi chaahate, apamaan  bhejaa..ham virodhi nahi chaahate …ham ko tokanewaale naa ho to bhi ye 

diyaa..to jo ham nahi chaahate vo ham ko milaa to us men iishwar kaa haath  hotaa hai..iishwar  ki krupaa hoti hai…iishwar ki vyavasthaa hoti hai..

paapaa ne babalu se puchhaa ki, ‘babalu betaa tu pradhaan mantri hogaa to 

kyaa karegaa?’

‘paapaa saari schoole band karungaa!’  ..kyo ki achhaa nahi lagataa subah 

subah school  jaanaa padataa hai thandi men..ab bataao ko bachche ko to  lagataa hai ki school college band hone ham sukhi ho jaayenge ; lekin maanav 

jaat kaa bhalaa hogaa kya?

to bachche ko jo achhaa lage vo vaastav men achhaa hai kya?bachche ko jo buraa lage vo vaastav men buraa hai kya?

NAHI!

bhagavaan jo karataa hai vo ham ko achhaa lage chaahe buraa lage iishwar ki srushti men hamaaraa vikaas, vikaas aur vikaas hi chhupaa hai..

pitaa ke sharir ki pani ki ek bund! aur  saab dukaandaar ban gaye..mantri  ban gaye..mahant..sant ban gaye! ..to ye vidhaan ki krupa ahai tabhi bane  hai naa?

apani krupaa se saadhu baabaa bane hai kya? us vidhaan ne krupaa kiyaa..sukh  dukh deke vairaagy jagaayaa…

to ek hotaa hai karanaa aur dusaraa hotaa hai hona.

vidhaataa ke vidhaan se jo hotaa hai, srushti kartaa ki krupaa se jo hotaa  hai vo chaahe aap ko achchhaa naa lage  phir bhi us men aap kaa bhalaa  chhupaa hai..

sukh dukh baahar se jo aataa hai vo bhi vidhaan se aataa hai..anukulataa  pratikulataa vidhaan se aati hai..aur bhitar se jo sukhi dukhi hote hai vo 

kalpanaa se hote hai…

baahr ka sukh dukh aur bhitar kaa kalpanaa ka sukh dukh  dono bewkufi se hi  dikhataa hai.. baahar ki suvidhaaon men agar sukhi maangeaa to aadami aishi  

aaraami, vilaasi ho kar khokalaa ho jaayegaa….aur dukh se agar darataa hai  to kaayar ho jaayegaa..dukh aayaa to daataa ka bhejaa huaa hai..dukh haari  ke sharan jaane ke liye, vivek vairaagy badhaane ke liye aayaa hai..sansaar  dukhaalay hai ye samajhaane ke liye dukh aayaa hai..to aadami ko baahar se jo dukh bhejataa hai vidhaataa vo iishwar tak  pahunchaa degaa…agar baahar se sukh bhejaa hai to dusare ke dukh dur  karane ke liye…. sukh milaa hai to baatane ke liye aur dukh milaa hai to  vivek vairaagy jagaane ke liye..

vivek vairaagy jagaa to aap dukh se bach jaayenge..dukhi aadami kaa dukh tab  tak rahetaa hai jab tak vo apane ko dukh kaa ghar banaataa hai…

dukh kaa ghar kaun banaataa hai apane ko?MUDH AADAMI!

tab tak bhul bani rahegi tab tak dukhon se jaan nahi chhutegi…ek dukh  gayaa na gayaa dusaraa dukh aayegaa..dusaraa dukh gayaa na gayaa tisaraa 

aayegaa….

dukhi aadami kaa dukh tab tak  banaa rahetaa hai jab tak us ki bhul bani  rahegi…agar dukhi aadami apani bhul nikaal de to dubaaraa dukh aayegaa nahi…dukhad paristhitiyaan  aayegi  phir bhi vo aadami dukhi nahi banegaa  !

ye ekadam aap ke anubhav ki baat hai…shaastr ki baat mat maano  ..chalo…bhagavaan ki baat mat maano…guru ki baat mat maano..lekin apanaa 

anubhav to maananaa chaahiye naa?

apanaa anubhav kya hai?  ki subah se shaam tak, jeevan se maut tak aap sukh  ko sambhaalate hai..sukh banaa rahe…ijjat bani rahe..tandurusti bani  rahe…ye maanate hai naa aap? ki sukh , iijjat , tanadurusti bani rahe yahi  chaahate..  ye maante naa?

to sukh ko thaamane aur dukh ko bhagaane ke liye hi sab karate hai subah se  shaam tak..thik baat hai? ye aap kaa anubhav hai..

lekin jeevan bhar subah se shaam tak , janm se maut tak sukh ko thaamanaa  aur dukh ko bhagaanaa yahi karate…

shaadi karate to sukhi hone ke liye, talaak dete to sukhi hone ke  liye..nokari karate to sukhi hone ke liye , volentarship lete to sukhi hone  ke liye…kisi se dosti karate to sukhi hone ke liye aur kisi se dushmani 

karate to koyi dukh de rahaa us dukh ko mitaane ke liye..

sukh ko thaamanaa, dukh ko mitaanaa ye 2 kaamon ke siwaay tisaraa kaun saa  kaam karate aap?

mandir men bhi jaate to sukh ko thaamane ke liye, saadhu santon ke paas bhi  aate to dukh ko bhagaane ke liye..

kewal manushy hi nahi;   kidi se lekar kunjar tak ..aur jiv se lekar devataa  tak sab sukh ko thaamate hai dukh ko bhagaate hai..lekin ant men dekho to  sarplas kyaa rahe jaataa hai?dukh hi rahe jaataa hai..bachat men dukh hi  dikhataa hai.

jeevan me dekho to dukh jyaadaa hai ..akelaa dukh koyi nahi dekh sakataa  akelaa sukh bhi koyi nahi dekhataa..sukh-dukh-sukh-dukh..isliye sukh bhi 

bahot ho jaate..dukh bhi bahot ho jaate…lekin us kaa anubhav karanewaale  tum jyo ke tyo rahe hai..ye aap kaa anubhav hai..

sukh ko sambhalanaa aur dukh ko bhagaanaa yahi kaam hai phir bhi bachat men  dukh hi rahe jata.. kyo ki sansaar se aap sukhi rahenaa chaahate aur sansaar  se dukh mitaane ki galati barakaraar rakhate..

sansaar dukhaalay hai..kisi ko aag lage aur petro ka fawaare se aag bujhaane  jaaye to aag badhegi..aag lagi hai aur us par sukhaa tinakaa daalo athavaa  to mitti ka tel daalo to aag bujhegi kya? aise hi jis ko sansaar ki taraf se  dukh huaa hai aur phir sansaar ki taraf se hi sukhi honaa chaahataa hai…to  dukh dab jaataa hai..aur gaheraa hotaa hai..badhataa jaataa hai.. dukh aaye  to aap dukhaalay sansaar ke saadhano se dukh mitaane ki galati naa  kare..sukh se dukh mitaane ki galati naa kare..dukh aaya hai to bhogane ki  galati naa kare..

dukh aayaa hai to vivek jagaao ki dukh kis nimitt aayaa?

 kyo aayaa?

dukh kis ko hotaa hai?

dukh hotaa hai man ko. aaya hai vidhaan se.

‘aisa naa ho’ ye hamaaraa aagrah hai isliye dukh hotaa hai. agar dukh aayaa  to vikaas ke liye us kaa phaaydaa uthaao..to dukh aap ko dukhi nahi  karegaa….sukh aaya hai us ka phayadaa uthaao to sukh aap ko khokalaa nahi  karegaa..sukh men aap garakaav ho jaate.

jaise jalebi ki chaasani ki kadhaayi hoti hai naa , us men makhkhi aur  makode jo sayaane hai vo kadhaayi ke kinaare se sanyam se apanaa kaam banaa  ke bhaag jaate hai… aur jo bewkuf makhkhiyaa aur bewkuf makode hai vo  chaasani men dub marate hai…chaasani hai to un ke liye sukh!lekin jyaadaa 

bhogate to vo hi chaasani un ke liye maut ban jaati hai…

 aise hi sansaar ki anukulataa hai to aap ke vikaas ke liye..lekin us kaa  jyaadaa upayog karate to wo hi aap ke liye bimaari ban jaati hai..

pati patni ka sambandh hai to pati patni kaa sanyam badhaaye..patni pati kaa  sanyam badhaaye..aur achhi tejaswi santaan ko janm de..jo budhaape men  hamaari sewaa bhi kare aur sankruti sewaa bhi kare…

lekin jo patni aayi to na din dekhaa, na poonam dekhi na amaavasyaa dekhi,na  holi dekhi,na shivaraatri dekhi ..  sukhi hone men lage rahe to patni bhi  bimaar hogi, pati bhi bimaar hogaa..bachche bhi haraamjade paida honge..to  sukh kaa durupayog huaa naa?

sukh kaa bhog huaa, upyog nahi huaa..

jaise bhojan hai to aap chabaa  chabaa ke bhojan karo.. bich men gungunaa  paani piye to kandhe nahi pakadenge..sharir swasth rahegaa..khaanaa thik se 

hajam hogaa..lekin jyu hi bhojan saamane aayaa chabar chabar jaldi khaate  gaye..pani piyaa na piyaa aur khaate gaye..thod aur thoda aur karate karate 

jyada bhojan (over eating)karataa hai sukh ke liye..to vo ji bhojan us ke  liye bimaari lekar aati hai..

bhojan to hai, bhojan se aap bimaar nahi hote..khaate khaate ek baar aisaa  hotaa hai ki ‘bas!’ ..phir aur thodaa.. thodaa.. thodaa..sukh ki laalach se 

aap dukh bhar lete…to bimaariyaa ban jaati hai..

mithaayiyaan  hasati hai ki ‘karelaa tum kitanaa bekaar hai!kadavaa  kadavaa!!..

karelaa ne kahaa, ‘beti mere binaa to tumhaari koyi kadar nahi hoti..’

boli, ‘kyu? mithaayi to mithaayi hoti hai!’ karela bola, ‘mithaayiyaa  daibitis karati..kadawaa karelaa hai tab mithaayi hajam hoti..’

lekin maayiyaa kya karati? ..karelaa ko chir ke namak bharate..karele men  gun hai us ko nichod ke sabji banaate to karelaa nahi ghaas khaa rahe!  karele ki kadawaahat pachaaoge to mithaayi ki mithaas hajam hogi..sharir men  shad-ras lene ki jarurat hai..mithaa khaate, khaaraa khaate, tikhaa  khaate,khattaa khaate, turaa bhi khaate…lekin kadavaa nahi khaate to  sharir kaa santulan thik nahi hotaa..aarogya nahi rahetaa..

nim ke patte khaa lene chahaiye..abhi holi ke dinon men neem ke patte khaane  ki sijan hai..aur is samay karelaa khaane ki sijan hai….

pitaaji factory se aaye..patni se puchhaa, ‘babalu kahaa gayaa?’

boli , ‘soyaa hai..thand laagati chadar odhaa di..’

pitaaji ne bhojan kiyaa..babalu ki taraf dekhaa to dusari chaadar odhi hai..

puchhe, ‘dusari chaadar kyo odhi?’

boli, ‘bechare ko thand lagati hai’

pitaaji ghum ke aaye..dekhaa to tisaraa bhi kapadaa odhaa diyaa hai maa ne.. 

baap ne kyaa kiyaa ki tino kapade uaatr ke phenk diye…

bole, ‘mere bete ko itanaa kaayar banaati hai?..thandi nahi pachaayegaa to  garami kaise sahegaa? thuthurane de use…thand aayegi to garami ko shoshit 

karegi… isliye kaartik ke mahine men subah subah jaldi nahaane kaa vidhaan  hai..thand aane waali hai..thand pachaane ke liye aap ko pahele se hi apanaa  dharam taiyyar karataa hai ..suabh subah uthenge jaldi aur nahaayenge to rom  kupo dwara raat bhar jo garmi aa gayi hai us garami ka parimaarjan hotaa  hai..

jo subah der se uthate vo itane swasth nahi rahete jitane subah jaldi  nahaanewale swasth rahete hai.. thande paani se nahaane waale jitane swasth  rahete , garam paani ke gulaam itanaa swasth nahi rahegaa..to thandi achhi  nahi lagati phir bhi heet kaari hai..aisi garami achhi nahi lagati phir bhi  garami ke sijan men garami heet kaari hai..jo thandi nahi pachaayegaa vo 

garami kyaa pachaayegaa?

jo apamaan nahi pachaayegaa ..guru ne ne gaaliyaa de di..logo ke saamane  apamaan kar diyaa..lekin guru dayaalu hai ye shishy jaanataa thaa..thodi der  ke baad guru ne bulaayaa..beta ye aisa karo naa.. guruji abhi to pyaar se  bolate thodi der pahele to gaaliyaa diye…

guruji bole, ‘hamaaraa pyaar pachaata hai …logo ke saamane aham badh  jaataa hai…logo ke saamane jaraa idhar udhar kahetaa hun to aham niyantrit 

rahetaa hai…agar karelaa hajam nahi hogaa to mithaayi bhi hajam nahi  hogi…aur guru ki gaali nahi pachaayi to sansaar men na jaane kitanaa 

apamaan sahenaa padegaa…

guru dhobi shishy kapadaa saabun sarjanhaar l

guru hai dhobi..shishy hai kapadaa..aur bhagavaan kaa naam hai saabun  sarjanhaar.

surat shilaa pe baith ke nikale mail apaar ll

to shwaas andar gayaa to ‘om’ baahar aayaa to -1 .

shwaas andar aayaa to ‘shaanti’ baahar aayaa to -2

aisi shwaasoshwaas ki surat shila ki saadhanaa karo to anek prakaar ke mail  nikal jaate…

mathuraa ke raaj kumaar dashaahar kaa raaj tilak huaa..raaj gaddi par  baithaa to shaadi bhi karane gayaa…..kaashi naresh ki beti kalaavati se  vivaah huaa..ab vo raja ban gayaa..raja dashaahar kalaavati ko kahetaa hai, ‘raatri ko aa  jaanaa’

kalaavati gayi nahi.dashaahar ne intjaar kiyaa…phir us ke mahel men  gayaa..dekhaa to kalaavati apane aaram kaksh men baithi hai..

bola, ‘kalaavati teri meri shaadi ho gayi..tu kitani khubsurat hai’aadi bola  jaise kaami log bolate….aap log samajh lenaa , vo mera vishay nahi..

to bolaa tu aisi hai waisi hai..aayi kyu nahi?….chalo main bulaane aayaa hun…

kalaavati baithi..jo hi dashaahar kalaavati ko pyaar se haath lagaane  lagaa…pyaar to  kyaa, kaam hota hai..pyaar to bhagavaan karate, maataa  pitaa karate aur guru karate… pati-patni kaa pyaar to shaaririk sambandh  se hotaa hai to kaam hotaa hai..

prem ko sharir men dekhaa to kaam ho jaayegaa.

prem ko dhan men lagaayaa to lobh ho jaayegaa.

prem ko waahwahi men lagaayaa to ahankaar ho jaayegaa.

aur prem ko vaastavik gyaan men lagaaya to paramaatmaa pragat ho jaayegaa!

dashaahar kalaavati ko bole, ‘tera baal kitanaa sundar.. teraa cheharaa  kitanaa suhaavanaa..’ bolate bolate jaise hi dashaahar ne us ko sparsh kiyaa  us ko bijali ke current jaisaa shack lagaa..

kalaavati ye kyaa hai?

kalaavati chup baithi.shwaas andar jaaye to bhagavaan kaa naam.. apani  adhyaatmik aabhaa men baithi rahi…

dashaahar dhire se kalaavati kaa kandhaa pakadataa hai…phir se shock  lagataa hai..dusare haath se sparsh karane gayaa..phir se shock lagaa…

‘kalaavati ye main kyaa dekh rahaa hun? tu vidyut ki putali hai kya? khuli  taare hai kya sharir men ? tu bijali ghar hai kyaa?’

 kalaavati boli, ‘naath aisa kuchh nahi..maine durwasa rishi se guru mantr  liya tha, vo japane se meri adhyaatmik oraa jaagrut hai..aap aise to 

budhdimaan hai..’

ab dekhanaa maayiyaa…aap kalaavati ko guru baan lo..kaisaa bhi haraami  pati ho, kaisaa bhi luchchaa lafangaa pati hi us ko tum devataa banaa sakate 

ho..!

boli, ‘naath aap sab kuchh jaanate ho..’

kuchh bhi nahi jaanataa!..ahankaari ko pahele ahankaar kaa rang chadhaayaa  jaataa hai….tabhi tumhaari baat lagegi…sidhe bhauwe chadhaa ke ‘tum aise  nahi karate aise nahi karate’ bolane se to tumhaari hi choti pakad ke ghar  ke baahar kar degaa…

pati ko samajhaanaa ,  sahi raaste lagaana kasturbaa se sikho aur kalaavati  se sikho..pati se dushmani athavaa pangaa mat lo.. kaisaa bhi pati ho,  vivaah ho gayaa naa? phere phir liye ab us se dushmani mat lo aur pangaa mat  lo ..phir dekho kyaa hotaa hai..jo tumhaari aawashyakataa puri karataa hai  us ke prati tum achchaa vyavahaar karate ho ki nahi karate ho? to 

aawashyakataa purti karane waalaa swaami ho gayaa ki nahi ho gayaa?

aap ko pyaas lagi hai yaa bhuk lagi hai aur patni ne pyaar se bhojan de  diyaa yaa paani de diyaa to aap us se prabhaavit  ho jaaoge ki nahi?

maan ki sab ko ichchaa hai aur aap maan dete ho to aap ko vo chaahenge ki  nahi chaahenge?

to main kalaavati aur kasturbaa ki kathaa sunaaungaa..

( pujyashri Bapuji ne Kalavati ki kathaa sunaayi.is kathaa ke liye please is link par click kijiyegaa :   http://wp.me/P6Ntr-Oz  )

 ek baar kasturabaa aur gandhi men aisaa ho gayaa thaa..aisaa samajhati ho  maayiyaa?kuchh to bolo..nahi samajhati ho t bhagavaan ko bolo ki tumhaare  ghar men anubhav ho jaaye! 🙂

aisaa anubhav to hotaa rahetaa hai na? 🙂

aisaa hotaa ki nahi hotaa? bhaai log samajhate ho? aisaa hotaa hai ki nahi?hotaa hai naa?

 HAA! 🙂

 to tum nahi chaahate aisaa ho..pati bhi nahi chaahate 

patni bhi nahi chaahati ki hamaaraa jhagadaa ho..phir bhi hotaa hai to ye  bhagavaan bhejaa huaa prasaad hai..nahi to jyaadaa sharir khokale ho jaayenge aur aayushy puri ho jaayegi.. 

‘aisaa’hotaa hai to thodaa sanyam bhi rahetaa hai  aur aage ka rastaa bhi  sujhataa hai..

aap ke ghar men kabhi ‘aisaa’naa ho aisaa aashirwaad main nahi  detaa!..bhagavaan kare hotaa rahe… 🙂

to ek  baar kasturbaa aur mahaatmaa gandhi me áisaa’’  (jhagadaa) ho gayaa…

( Pujyashri Baapuji ne  ye ghatanaa sunaayi. Is ghatanaa ko padhane ke liye krupayaa yahaan padhaare :

http://wp.me/P6Ntr-OC  )

main shuru shuru men guruji ke paas gayaa tha  mumbai ke paas vajreshwari  men..saai ekaant men the…koyi bhagat thaa.. bete ki shaadi karaa ke dulhan 

dulhe ko aashirwaad karaane le aayaa thaa…

saai bole, aashirwaad to kya hai?.. bhagavaan kare patni jhagadaakhor ho yaa  to kurup ho! to var ka kalyaan hai ….baaki to jug jug jiyo, dakshina  dharo, tum chaahe taro chaahe maro waale aashirwaad se koyi jug jug jitaa  nahi….asali aashirwaad to ye hai ki, ‘patni kurup ho yaa jhagadaakhor ho  to var teraa kalyaan ho jaayegaa’.. 🙂 dulhaa ka baap sukudaa..

phir guruji ne ek kahaani us ko bataayi…lekin bataane se ab vishayaantar  ho jaayegaa…

to dukh aap nahi chaahate to bhi dukh aataa hai to vidhaan se aayaa  hai…vidhaan sabhi ke bhale ke liye hotaa hai…aap nahi chaahate ki sukh chalaa jaaye , lekin prakrutik dhang se sukh  khisak jaataa hai…aap nahi chaahate phir bhi jo hotaa hai us men iishwar 

ki krupaa hai…

ye baate agar aap ke samajh men a jaaye to main to aap ko haath jodu!aap ka  bahot bhalaa ho jaayegaa..

aap chaahate vo nahi hotaa hai to samajh lenaa ki tu hamaaraa bhalaa  chaahataa hai ham jaanate nahi hai..lekin tu bhalaa chaahataa hai isliye  dukh bhejaa hai…abhi sukh bhi bhejaa hai to bhalaa chaahataa hai..

maa baap bachche ke liye jo bhi karenge to us ki bhalaayi ke liye aise  bhagavaan jo bhi karate hai aap ke bhalaayi ke liye…bhagavaan ke taraf se  jo hotaa hai , jo aap nahi  chaahate phir bhi hotaa hai to aap ka us men  bhalaa hai..

vidhi ke vidhaan se hamaaraa jitanaa bhalaa hotaa hai utanaa ham apani akal  hushaari se apanaa bhalaa nahi kar sakate… maasoom dudh pine waalaa  bachchaa apanaa itana abhala anahi kar sakataa jitanaa maa bachche ka bhalaa  kar sakati ..aur bachch ekaa bhalaa kis men hai ye maa jitanaa jaanati hai  utanaa vo bhondu swayam nahi jaanataa!ham  maasum the , jab dudh pine waale bachche the tab  hamaare maa baap hamaaraa jitanaa bhalaa  jaanate the us samay ham apanaa  utanaa bhalaa nahi jaanate the..

aise hi iishwar aur  prakruti hamaaraa jitanaa bhalaa jaanate aur karate hai  utanaa ham nahi kar paate hai…

to jhagade dekar bhi aap ki aasakti mitaataa hai..

jab jhagadaa hotaa hai naa to ek dusare ke dosh dikhate.. jab jhagadaa nahi  huaa tab pahele pahele dinon  men to vo buddu samajhataa ki ahaahaa ki 

bramhaa ji ne is ko to amrut ke ghade se banaayaa hai ! 🙂  ek dusare ko  dekh kar hey hey karate …satyaanash kar dete hai hey hey  men…phir to  kabhi kabhi hey hey men  din ko bhi sambhog karate..aayushy naash hoti hai  din ko sambhog karane se..aankho ki roshani ghatati hai aur   budhdi kaa  prabhaav naash hotaa hai..aur  maasik dharm men tisare,chauthe, paachave din  men kare to tabaahi hoti hai..lekin hey hey hey men pataa hi nahi  chalataa….us samay to bas andh ke chashme lag jaate hai…ek to yauwan ho,  dusaraa paisaa ho aur tisaraa tandurusti ho aur chauthaa hey hey waale mile   phir to tabaahi ki aor to bilkul national  highway ki jaise gaadi daudegi..

to vidhaataa ne krupaa kiyaa hai..yauwan bhi diyaa, tan durusti bhi di,  paisaa bhi diyaa, pati patni bhi diyaa ..lekin kuchh naa kuchh at-pat daal  di taa ki hey  hey men hu hu naa ho jaao!..kitani karunaa krupaa hai !prabhu  tere dukh me kitani karunaa hai! kyaa vyavasthaa hai!!

aap agar us vidhaan ko samajhe to aap dukhi nahi ho sakate.. aap us vidhaan  ko samjhenge to sukh ke lolup nahi honge..sukh ke daataa ho jaaoge..aap ke  paas sukh aayegaa to aap baatoge…aur dukh aayegaa to us prabhu ki priti  men amrut may ho jaaoge..

mobile se jitanaa satyanash huaa hai us kaa heesaab to aage ki pidhiyon ko chukaanaa padegaa …aap ko bhi chukaanaa padegaa..viry ke kan kamajor ho jaate hai..jyada mobile ka upyog karate to napunsakataa aati hai..napunsakataa nahi bhi aati to dhaatu kamajor se bachche to kamajor aayenge…aankhon ki roshani kamajor ho jaati, kanapati ki pichhe ki nasen kamajor ho jaati hai..sir ke dard kayi prakaar ke aate hai.. cancer jaisi bimaariyaa mobile phone ki den ho jaati hai..mobile phone se jo haaniyaan hoti hai un ko todane ke liye  raag sahaani, raag pahaadi sunaa karo..mobile se jo haaniyaan hoti us kaa kaat hai raag pahaadi..

OM SHANTI.

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYAJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare….

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One Comment on “विधान में ही परम हीत Vidhaan men hi Param Heet”

  1. gurucharandas Says:

    bapug ki kirpa hui h to hi hum kabil h ki unki gyan ki batein hume samajh ati h …..bapu apke betey h ache h bure h kaise bhi h parantu tumhare h


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