महा कठिन ब्रम्हज्ञान ! बापूजी बनाते कितना आसान !!

 

देल्ही पूनम सत्संग अमृत; 11 दिसंबर 2011

 

 

ईश्वर का एक नाम है  सत्चिदानन्द ।

 

सत्चिदानन्द रूपाय

विश्व उत्पत्ति आदि हेतवे

ताप त्रय विनाशाय

श्रीकृष्णाय वयंनूम

 

जो सत स्वरूप है..’सत’ माना जो पहेल था , अभी है, बाद में भी रहेगा..जो सत रूप है, चेतन रूप है, आनंद रूप है..जो विश्व की उत्पत्ति करता है ..कृष्ण के रूप में प्रगट होता है ..और सभी के हृदय में छूपा रहेता है..उस सत्चिदानन्द को हम नमस्कार करते है…

जिस की सत्ता से सृष्टि बनती है और शरीर बनता है… जिस की सत्ता से उस का पालन पोषण होता है..और जिस में वो विलय हो जाता है उस परमेश्वर को हम नमस्कार करते है…

क्यो नमस्कार  करते है?

ताप त्रय विनाशाय…3 तापों के शमन करने के लिए हम उन को नमस्कार करते है..शारीरिक ताप(आधिभौतिक ताप), मानसिक ताप(आधिदैविक ताप) और अध्यात्मिक ताप ये 3 ताप होते है..

आधिभौतिक ताप उस को कहा जाता है जो शरीर का, धंधे  का, नोकरी का आदि स्थूल शरीर से संबंधित जो भी गड़बड़ हो उस को बोलते आधिभौतिक ताप…

अतिवृष्टि  हो गयी, अनावृष्टि हो गयी, भूकंप हुआ, एक्सिडेंट हो गया ये सब आधिदैविक ताप है…

और मन में जलन आई, अशांति रही ये अध्यात्म ताप है..

तो ये 3- आधिभौतिक ताप, आधिदैविक ताप, आध्यात्मिक ताप जीवों को जलाते रहेते…दुखी करते रहेते है..

 

संसार तापे तप्तानाम योग ही परम औषध ll

 

संसार के तापों में तपने वाले व्यक्ति के लिए योग परम औषध है ..

तो योग कैसा?

भगवान के साथ आप का असली संबंध है..शाश्वत संबंध है ..उस में आप की प्रीति हो जाए..उस में आप का मेल हो जाए ..इस को बोलते है योग…

उस की प्रीति हो जाए तो बोलते भक्ति योग..उस के तत्व का ज्ञान  हो जाए तो बोलते ज्ञान  योग..उसी की प्रसन्नता के लिए कर्म करते तो बोलते कर्म योग..

 

भगवान की प्रसन्नता के लिए सेवा करते तो कर्म योग हो गया..भगवान का ध्यान भजन करते, सुमिरन करते तो भक्ति योग हो गया…और भगवान क्या है ? हम क्या है? – इस का विचार करते तो ज्ञान योग हो गया..

 

 भगवान उस को कहेते जिस की सत्ता से भरण पोषण होता है (भ);जिस की सत्ता से गमन-आगमन होता है (ग) ; जिस की सत्ता से वाणी स्फुरित होती है (वा) ; ये सब ना होने के बाद भी जिस के साथ का संबंध हमारा साथ नही छोड़ता (वा).. वो है भगवान ! हमारा अंतरात्मा परमेश्वर…

तो परमेश्वर को बनाना नही है..कही से बुलाना नही है..उस परमेश्वर के पास जाना नही है…वास्तव में जो मौजूद है हाजीरा हजूर केवल उस की स्वीकृति , केवल उस की प्रीति अथवा केवल उस के निमित्त कर्म इतना ही…केवल उस के निमित्त कर्म करो…वो हमारे आत्मा है ये स्वीकृत करो…वो भगवान का ज्ञान पा लो…

श्रध्दा भक्ति से भगवान का भाव पैदा होगा लेकिन भाव के बाद भी भगवत तत्व का ज्ञान पाए बिना  आदमी पूर्ण रूप से तृप्त नही होता..

 

एक होता है दुख को मिटाना और सुख को पाना… संसारी सुख को पाने के लिए प्रयत्न करते…संसार दुखालय है तो संसारी सुख टिकता नही और दुख मिटता नही..वास्तव में भगवान सुख रूप है …उस को जानने से दुख टिकता नही..तो भगवान को  कैसे जाने? भगवान को सत्संग के द्वारा जाना जाता है..

 

बीनू सत्संग विवेक ना होई

राम कृपा बीनू सुलभ ना सोई ll

 

सत्संग के बिना विवेक नही होता…विवेक क्या है?

अविनाशी आतम , जगत ते प्रतिकूल ll

ऐसा ज्ञान  विवेक है..आत्मा अविनाशी है और जगत प्रतिकूल – विनाशी है और ये ज्ञान ही विवेक है…आत्मा अजन्मा है..और शरीर का जन्म होता , मृत्यु होती है.. आत्मा एक रस है और शरीर बदलता है..जैसे बालक हुआ , शिशु हुआ, कुमार हुआ, जवान हुआ, अधेड़ हुआ , बुड्ढा हुआ और मर गया..फिर भी ज्यो ज़्यु का त्यू रहेता है वो हमारा आत्मा है..हमारा आत्मा भगवान स्वरूप है..इस भगवान स्वरूप का ज्ञान सुन कर और जगत धोखे से, नश्वरता से, विकारों से भरा है ये जान कर जगत की आसक्ति मिटा कर भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करे..

जो झूठ बोलने में परहेज नही करते उन को भगवान को  पाने में रूचि नही होती..भगवान सत्य स्वरूप है..जो झूठ बोलते उन के मन में भगवान की प्रीति या भक्ति विशेष चमकता नही है..

सत्य बोले झूठ त्यागे मेल आपस में करे..

लड़ाई झगड़े द्वेष से होते अथवा तो राग से दिल मलिन होता है..किसी से राग भी ना करे; किसी से द्वेष भी ना करे..भगवान की प्रसन्नता के लिए अपना कर्त्यव्य पाले.. सुखी होने के लिए नही; दूसरे को सुख बाटे ..स्वयं भगवान में शांत रहेना और ज्ञान  में प्रवेश करना ये स्वाभाविक होता है…

जब तक भगवान में प्रीति नही होती तब तक भगवत रस का आस्वादन नही आता..तो विकार पिच्छा नही छोड़ते..

अकबर की बहोत सारी औरते थी..उस में हिंदू बेगम भी थी..एक बेगम का नाम था जोधा बाई..(पूज्यश्री बापूजी ने मन से किए पाप भी कैसे ताप देते है इस की कहानी सुनाई..   please visit :  http://wp.me/P6Ntr-Oa  )

 कहेना का तात्पर्य है की सुख के लिए आदमी ना करने जैसा काम भी करता है…..फिर भी सुख टिकता नही है..क्यो? क्यो की वो  सुख  दुखालय संसार से लेता है…सुख को थामने के लिए और दुख को भगाने के लिए दिन-रात लगे रहेते..फिर भी सुख थमता नही, दुख भागता नही…क्यो की दुख संसार की चीज़ है..दुखी आदमी का दुख तब तक रहेगा जब तक उस की भूल जीवित है..और दुखी आदमी की भूल ये है की दुखालय संसार से दुख मिटाना चाहता..

 

इस बात को भगवान राम के गुरुदेव बोलते की , ‘हे राम जी !जैसे कहीं आग लगे और  सूखे तिनको से आग बुझाना चाहे तो वो मूर्ख है’ आज के जमाने में कहेंगे की पेट्रोल के फुवारे से आग बुझाना चाहे तो कैसे बुझे?..

ऐसे ही जो संसार के साधनों से दुख मिटाना चाहते उन का दुख दब जाता है..दुख भूल जाते है लेकिन दुख मिटता नही है…दूसरे रूप में उभर आता है …

इसलिए दुख मिटाना है तो दुख हारी हरी के स्वभाव को जानो… हरि सत रूप है ,  दुख अ-सत है… हरि चेतन स्वरूप है , दुख  जड़ है.. हरि ज्ञान स्वरूप आनंद स्वरूप है..और दुख अज्ञान  और अ-सत रूप है…मेरा आत्मा हरी है, जो हर समय रहेता है.. दुख हर समय नही रहेता..सुख हर समय  नही रहेता.. बचपन , जवानी हर समय नही रहेती… लेकिन जो हर समय  रहेता वो मेरा अंतरात्मा हरि है…अंतरात्मा से मैं दूर नही हूँ..

ऐसा कर के अपने अंतरात्मा के सत स्वभाव को , चेतन स्वभाव को , आनंद स्वभाव को जाने तो आप का दुख कभी टीकेगा ही नही…

अन्यथा भगवान कृष्ण अर्जुन का रथ चलाते फिर भी अर्जुन निर्दुख नही होते..भगवान को कहेना पड़ता है :

आगमों  अपाइनो अनित्यश्च

शीत उष्ण सम दुखेसूखेशु

तथा मानापमान

त्वं  तितिक्षस्व भारता ll

 

ठंडी-गरमी, मान-अपमान, सुख-दुख ये आता है और जाता है..अपाइनो अनित्य है..उस का कोई पक्का पाया नही है..बेस नही है…वे अनित्य है..इसलिए उन को सहन करो अथवा पसार होने दो..तुम अपने आत्मा मे रहो… ये आया है, ये चला जाएगा…मैं आनंद स्वरूप हूँ…मैं चैत्यन्य स्वरूप हूँ…मैं शाश्वत हूँ.. मौत भी मुझ को  नहीं  मार सकती इतना मैं ‘सत’ हूँ… दुनिया का कोई अज्ञान  मुझे ढक नही सकता ऐसा मैं ज्ञान  स्वरूप हूँ..

 

जिस वस्तु का ज्ञान नही है, अज्ञान  है तो अज्ञान का भी तो ज्ञान है!..’मैं नही जानता हूँ’ ये नही जानने का ज्ञान  भी मेरे पास है तो मैं ज्ञान स्वरूप हूँ..ज़्यु का त्यू सदा – शाश्वत हूँ…

अपने  सत स्वभाव को, चेतन स्वभाव को, आनंद स्वभाव को, ज्ञान  स्वभाव को जान लेगा तो उस व्यक्ति के दुख सदा के लिए मिट जाते है….नही तो भगवान कृष्ण की भक्ति कर के , भगवान कृष्ण को अपना को सारथि बना के भी युध्द करने के मैदान में अर्जुन दुखी होता है..जब भगवान ने कृपा कर के अर्जुन को ब्रम्‍ह ज्ञान  दिया तब अर्जुन का दुख मिटा..

ब्रम्‍ह परमात्मा का ज्ञान पाना चाहिए.

 ब्रम्‍ह परमात्मा किस को बोलते है ?

जिस से ब्रम्‍हा विष्णु महेश और जीव जन्तु सभी सत-ता, चेतन-ता और आनंद-ता पा रहे  वो ब्रम्‍ह परमात्मा है..

वो ब्रम्‍ह परमात्मा अभी यहा है..

सर्व व्यापक  है तो यहा है…

सब में है तो हम मे भी है …

सदा रहेता है तो अभी भी है..

केवल हम उस को समझे तो  दुख मिट जाता है.

दुख हारी हरि के ज्ञान से,  हरि की प्रीति से, हरि के आनंद से, दुख हारी हरि की शरण जाने से दुख टिकता नही..(संसारी वस्तु से दुख दबेगा, हटेगा लेकिन मिटेगा नही, फिर उभरेगा..)

 

दुख आया तो मन से उद्विग्न  मत होइए..दुख क्यूँ  आया है ये जानिए..

1) कुछ  दुख बद परहेज़ी से आते जैसे बीमारी आती.

2) कुछ दुख बेवकूफी से आते जैसे मैं परेशान हूँ ये बेवकूफी है..

3)कुछ  दुख प्रारब्ध वेग से आते है..लेकिन ग़लती ये होती है की ‘मैं दुखी हूँ’…हक़ीकत में मन दुखी होता है, मन परेशान होता है, बीमारी शरीर को आती है…मैं इन को जानने वाला आत्मा- साक्षी हूँ…इस ज्ञान के अभाव में दुख का महत्व बढ़ जाता है और आप दब्बू हो जाते है..ज्ञान  को सजाग रखे की दुख और सुख आता है..दिखता है…जो  दृश्य है वो साक्षी की सत्ता से रहेता है..तो प्रारब्ध वेग से, प्रकृति की व्यवस्था  से दुखद अवस्था  आए अथवा बद परहेज़ी से दुख आए तो उस का उपाय खोज के भूल को मिटाओ..लेकिन  ‘मैं दुखी हूँ’ ऐसा चिंतन ना करो…मैं दुखी हूँ ऐसा मत मानो.. मैं इस को जाननेवाला हूँ, मैं चेतन हूँ ऐसी समझ पक्की करोगे तो आधा  दुख तो इस के प्रभाव से ही मिट जाएगा.. बाकी का उस के अनुरूप उपाय करो…जैसे बीमारी आई तो औषधि,  अनुरूप ख़ान-पान और संयम का सहारा ले.. दुश्मनी  है तो कम्प्रोमाइज़ का सहारा ले..अथवा प्रकृति से दुख आया है तो  पुरुषार्थ का सहारा ले..

 

तो दुख को मिटाने का  सही तरीका है की दुखी आदमी संसार का सहारा ना लेकर ज्ञान  का सहारा, भगवत सत्ता का सहारा और भगवत प्रीति का सहारा  ले तो उस के सारे दुख मिटते है…भगवत प्रीति का सहारा ले … दुख आए तो मन को उद्विग्न  ना होने दे… सुख आए तो आसक्ती ना करे… जो आता है, वो  जाता है; जो बनता है, वो बिगड़ता है…जो आ गया, आ गया..जो चला गया, चला गया..आगे  बढ़ते जाओ…जो मिलता है लेते जाओ और छूटता है तो छोड़ते जाओ.. मेरा बेटा चला गया..मेरा फलाना ऐसा है..ऐसा सोच के अपने को वर्तमान के आनंद स्वभाव से दूर मत करो..और भविष्य की शेख चिल्ली के किल्ले बाँध कर समय व्यर्थ ना गवाओ..अभी तुम सुख रूप हो ऐसा जान लो…ये मिलेगा तो सुखी होंगे, ऐसा होगा तो सुखी होंगे – इस चक्कर में मत पडो..

 

 

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श्रीमद भागवत में ये घटना आती है की श्रीकृष्ण ने औधव को बताया :

 

उज्जैन मे एक ब्राम्‍हण रहेता था..उस ने पैसा कमा कर सुखी होना चाहा.. उस को पता ही नही था की जो पैसों में लोभ करता है तो धन में 64 प्रकार के  दुर्गूण होते है..

धन में 16 प्रकार के सदगुण भी  होते है.. जैसे धन का सत उपयोग करे, साधन भजन मिल जाए , आराम से रहे सके, ठीक से खा-पी सके, माँ-बाप की सेवा कर सके.. शास्त्र खरीद सके, परलोक के लिए पुण्य  दान कर्म  कर सके… ऐसे 16 तो सदगुण धन में होते है …

लेकिन धन आता है तो व्यक्ति लोभी बनता, अहंकारी बनता, झूठा बनता है, विकारी बनता है, वासना बढ़ती है.. आदि आदि सब दुर्गूण  है..

 

तो ये ब्राम्‍हण धन के लोभ में  ऐसा लगे की ना पर्व करे ना त्योहार करे…ना ही परिजनो का ख़याल करे… ना ही साधु संतो के पास जाए..धन का  ऐसा लोभी हो गया की उस के परिवार वाले भी उस से तंग आ गये…

भगवान ने कृपा कर के उस के लोभ को मिटाने के लिए ऐसा निमित्त रचा…

भगवान प्राणी मात्र के सुहुर्द है.. ना जाने किस को कौन से निमित्त दल दल से उठाना चाहते वो ही जानते ….

 

श्रीकृष्ण कहेते की औधव ब्राम्‍हण का भाग्य बदला..

 ब्राम्‍हण की  2 दुकाने थी उज्जैन नगरी में.. कुछ  सरकारी अमलदारो से उस की खट-पट हुई..उन्हो ने राजा को भड़काया…राजा और  अधिकारियो ने उस का धन, ज़मीन, दुकान हड़प ली..कुटुम्बी तो पहेले ही उस से रूठे रहेते थे…

चारों तरफ से घिर गया तो उस को वैराग हुआ की संसार में सार कुछ  नही…इतना सारा धन कमा के , इतनी सारी मेहनत करने के बाद भी कब ये धन छोड़ना पड़े  कोई ठिकाना नही…ऐसा वैराग्य  हुआ तो वो ब्राम्‍हण सन्यासी संन्यासी  हो गया…

 ब्राम्‍हण संन्यासी हो गया तो उस के पहेले के जो दुशमन थे उन्हो ने  उस की खिल्ली उड़ाई की देखो अब कमाई का कोई साधन नही तो अब ये साधु बन के मोफत की रोटियां  ऐठेगा और दक्षिणा लेगा….हालाकी ब्राम्‍हण को ना ही किसी से कुछ  ऐठना था , ना ही दक्षिणा लेनी थी…वो तो दुख हारी के ज्ञान  में , दुख हारी के प्रीति मे रहेना चाहता था..

लेकिन जब भी वो भिक्षा मांगने  जाए तो उस के विरोधी और कुछ  लफंगे उस की मज़ाक उड़ाते…कोई उस पर थूक जाए..वो अपने मन को समझाता की थूक जाते तो इस मरने वाले शरीर पर थूकते..अगले जनम का लेन-देन  है उस को पूरा करते होंगे ..लेकिन मेरा आत्म तत्व तो ज्यो का त्यो है..गाली देते तो शरीर को देते है…शरीर नही रहेगा तो भी मैं रहेता हूँ..मैं भगवान का हूँ , भगवान मेरे है…जीव ब्रम्‍ह का है, ब्रम्‍ह जीव का है…ऐसे सोच के वो आनंद में रहेने लगा…

ज्यों  उस को दुख रहित स्थिति में देखते त्यो वो लोग चिड़ते…. कभी कभी वो भिक्षा माँग कर नदी किनारे भोजन करने बैठता तो उदंड लोग, विघ्न संतोषी लोग  वहा आते..उस को सताते …चने की दाल जान बुझ कर खाते और उस के भोजन के समय उस के नज़दीक जाकर दुर्गंध छोड़ते ….फिर भी वो ब्राम्‍हण अपने मन को समझाता की मन तेरे को  उद्विग्न करने के लिए ये सब करते..अब तू शांत रहे तो तेरी मर्ज़ी..तू अशांत होना चाहे तो तेरी मर्ज़ी..मैं तो तेरे को जानता हूँ…तू चाहता है वो सब होता नही है..जो होता है वो तुझे भाता नही है …जितना भाता है वो टिकता नही…टिकने वाला तो मेरा सतचिदानंद आत्मा है…

 ओम ओम ओम ओम …इस प्रकार ब्राम्‍हण अपने को प्रसन्नता से सराबोर रखता..

विघ्न विरोध करनेवाले कितना भी कुछ  करते लेकिन वो प्रारब्ध काट रहा है, इन का स्वभाव ऐसा है, ईश्वर की लीला मान कर अपने मन का वो समाधान करता…

 

समाज और हितेशियों से ठुकराया हुआ ब्राम्‍हण था …लेकिन सत्संग सुनने को बाद उस को हुआ की आत्म ज्ञान  से बड़ा कोई ज्ञान  नही है…इतने बड़े भारी दुख में भी मैं निर्दुख  हो रहा हूँ..आनंद से सोता हूँ..शांति से जागता हूँ..नदी किनारे रात बिताता हूँ अथवा मंदिर के प्रांगण में बिताता हूँ..लेकिन जब सुविधाएँ थी उस समय  भी इतनी निर्भयता नही थी….इतनी शांति नही थी..सत्संग से जो ज्ञान  मिलता है वो आदमी को अनुकूलता में उदार बना देता है और प्रतिकूलता में तितिक्षावान और सूझ बुझ का धनी बना देता है..

इसलिए जो सत्संग सुनते है अथवा सत्संग सुनने-सुनाने में भागीदार होते है उन पर भगवान बड़े प्रसन्न होते है….

भगवान कहेते है:

गीता मे हृदयम पार्थ ll

जो ज्ञान  गीता में है वो तो मेरा हृदय है..

 

तो आप को क्या करना है?

अकबर जैसा राज वैभव मिल जाए फिर भी ये विकारी सुख भोगने की गंदी आदत जीव की जाती नही ..इसलिए अपनी पत्नी हो तभी भी संयमी जीवन जी कर भगवत सुख का अभ्यास करना चाहिए..

भगवत सुख कई वर्षों के बाद नही अभी है … सतचिदानंद भगवान दूर नही है…भगवान को कई लोगों ने कठिन कर दिया..वैकुंठ में है ..इतना तपस्या करो तो भगवान मिलेंगे ऐसा बोल के कठिन कर दिया है..

भगवान तो अब भी है, अभी मौजूद है, अभी सत रूप है, अभी चेतन रूप है…अभी आनंद रूप है और अभी मेरे आत्मा है..

ये सब तो आप ने सुना है…लेकिन इस का अनुभव करने की आप को भूख हो गयी तो भगवान अंतरयामी सत स्वभाव, ज्ञान  स्वभाव आप को महेसूस करा देते है..

देखो आप करो तो भगवान का सत स्वाभाव, आनंद स्वभाव, चेतन स्वभाव अभी अभी छलकेगा…

ये बिल्कुल दिमाग़ से निकाल दो की हम इतनी तपस्या करेंगे फिर भगवान आएँगे..भगवान आप से बिछड़ ही नही सकते…भगवान का आकार आता है, आकृति आती है , चली जाती है…लेकिन जो भगवान का चिदघान स्वभाव है वो सर्वत्र व्याप रहा है…पानी में तरंग आए, झाग आए, बुलबुले आए तो वो हवा के कारण..बाकी पानी तो इन सब में व्याप रहा है..ऐसे ही सत-चिद-आनंद स्वरूप परमात्मा अभी भी है..वो हम को छोड़  नही सकता, हम उन को छोड़  नही सकते…जैसे घड़े का आकाश महा आकाश को नही छोड़  सकता, महा आकाश घड़े के आकाश को अपने से अलग नही कर सकता…ऐसे परमात्मा चैत्यन्य  अपने से अलग नही कर सकते..

(पूज्यश्री बापूजी ने दिव्य ओंकार साधना कराई..सभी परमानंद में डुबकी लगा रहे…)

 

जैसे काले बादलों से सूर्य चंदा ढक जाता है ऐसे ही हमारी सत-चिद-आनंद स्वरूप ज्ञान  नज़रिया पर राग द्वेष ये बादल आ जाते है…

आज दत्तात्रेय जयंती भी है..अवधुत गीता में लिखा है

राग द्वेष विनिर्मुक्ता

सर्वो ते हीतेरता:

 

जो राग द्वेष से विनिर्मुक्त(रहीत) है, सब का मंगल और भला चाहते है, सब प्राणियों के प्रति हीत  की भावना से  जिस का हृदय भरा है, जिस को सब के प्रति प्रेम भाव है, जिस को दृढ़ बोध हुआ है की मैं साक्षी हूँ, मैं अमर आत्मा हूँ..मरनेवाला शरीर मैं नही हूँ… बदलने वाला मन और बदलने वाली बुध्दी मैं नही हूँ..मैं इन में भी हूँ और इन से परे भी हूँ…मैं बुध्दी को अपनी चेतना दे के बुध्दी  के निर्णय बनाता हूँ…निर्णय बदल जाते फिर भी मैं उन का साक्षी हो कर रहेता हूँ…ऐसा दृढ़ ज्ञान  वाला विद्वान पुरुष है , ब्रम्‍ह ज्ञान  की विद्या जिस को भा गयी है वो मुक्ति को प्राप्त होता है…परम पद को प्राप्त होता है…परम पद दूर नही..परम पद के पास जाना नही..वो ही परम चैत्यन्य  में अपने को एकाकार समझना है..

 

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भक्त माल में ये कथा आती है :

 

आगरा में एक भक्त रहेता था..प्रेम निधि उस का नाम था..सब में भगवान है ऐसा समझ कर प्रीति पूर्वक भगवान को भोग लगाए..और वो प्रसाद सभी को बाटें..

यमुनाजी से जल लाए..भगवान को स्नान कराए….उस समय यमुना जी में देल्ही की गट्टर का पानी नही आता था..तो यमुना जी के जल से भगवान को जल पान  कराता था..

सुबह सुबह जल्दी उठा प्रेम निधि…सुबह सुबह जल पर किसी पापी की, नीगुरे आदमी की नज़र पड़ने से पहेले मैं भगवान के लिए जल लेकर आऊँ ऐसा सोचा…अंधेरे अंधेरे में ही गया..लेकिन रास्ता दिखता नही था..इतने में एक लड़का मशाल लेकर आ गया..और आगे  चलने लगा..प्रेम निधि ने सोचा की ये क्या है?चलो ये लड़का जाता है उधर ही यमुना जी है..तो इस के पिछे पिछे  मशाल का फ़ायदा उठाओ..नही तो कही चला जाएगा…फिर लौटते समय देखा जाएगा..

लेकिन ऐसा नही हुआ..मशाल लेकर लड़का यमुना तक ले आया..प्रेम निधि ने यमुना जी से जल भरा..ज़्यु ही चलने लगे तो एकाएक लड़का आ गया.. आगे  आगे  चलने लगा..अपनी कुटिया तक पहुँचा..तो सोचा की उस को पुछे  की बेटा तू कहाँ  से आया..तो इतने में देखा की लड़का तो अंतर्धान हो गया!

प्रेम निधि भगवान के प्रति प्रेम करते तो भगवान भी उन के लिए कभी किसी रूप में कभी किसी रूप में उन का मार्ग दर्शन करने आ जाते…

लेकिन उस समय यौवनो का राज्य था..हिंदू साधुओं को नीचे दिखाना और अपने मज़हब का प्रचार करना ऐसी मानसिकता वाले लोग बादशाह के पास जा  कर उन्हों ने राजा  को भड़काया…की प्रेम निधि के पास औरते भी बहोत  आती है…बच्चे, लड़कियां , माइयां  सब आते है..इस का चाल चलन ठीक नही है..प्रेम निधि का प्रभाव बढ़ता हुआ देख कर मुल्ला मौलवियों ने , राजा के पिठ्ठुओ ने राजा को भड़काया..

राजा उन की बातों में आ कर आदेश दिया की प्रेम निधि को हाजिर करो..उस समय प्रेम निधि भगवान को जल पिलाने के भाव से कुछ  पात्र भर रहे थे…

सिपाहियों ने कहा , ‘चलो बादशाह सलामत बुला रहे ..चलो ..जल्दी करो…’

तो भगवान को जल पिलाए बिना ही वो निकल गये..अब उन के मन में खटका था की भगवान को भोग तो लगाया लेकिन जल तो  नही पिलाया..ऐसा उन के मन में खटका था…राजा के पास तो ले आए..राजा ने पुछा, ‘तुम क्यो सभी को आने देते हो?’

प्रेम निधि बोले, ‘सभी के रूप में मेरा परमात्मा है..किसी भी रूप में माई हो, भाई हो, बच्चे हो..जो भी सत्संग में आता है तो उन का पाप नाश हो जाता है..बुध्दी  शुध्द  होती है, मन पवित्र होता है..सब का भला होता है इसलिए मैं सब को आने देता हूँ सत्संग में..मैं कोई संन्यासी  नही हूँ की स्रीयों को नही आने दूं…मेरा तो  गृहस्थी जीवन है..भले ही मैं गृहस्थ हो कर विकारों में नही हूँ, फिर भी गृहस्थ परंपरा में ही तो मैं जी रहा हूँ..’

 बादशाह ने कहा की, ‘तुम्हारी बात तो सच्ची लगती है..लेकिन तुम काफर हो..जब तक तुम्हारा परिचय नही मिलेगा तब तक तुम को जेल की कोठरी में बंद करने की इजाज़त देते है..’बंद कर दो इस को’

भक्त माल में कथा आगे  कहेती है की प्रेम निधि तो जेल में बंद हो गये..लेकिन अंदर से जो आदमी गिरा है वो ही जेल में दुखी होता है..अंदर से जिस की समझ मरी है वो ज़रा ज़रा बात में दुखी होता है..जिस की समझ सही है वो दुख को तुरंत उखाड़ के फेंकने वाली बुध्दी  जगा देता है..क्या हुआ? जो हुआ ठीक है..बीत  जाएगा..देखा जाएगा..ऐसा सोच कर वो दुख में दुखी नही होता…

प्रेम निधि को भगवान को जल पान कराना था..अब जेल में तो आ गया शरीर..लेकिन ठाकुर जी को जल पान कैसे कराए?..रात हुई…राजा को मोहमद पैगंबर साब स्वप्ने में दिखाई दिए..

बोले, ‘हे बादशाह! अल्लाह को प्यास लगी है..’

‘मालिक हुकुम करो..अल्लाह किस के हाथ से पानी पियेंगे ?’ राजा ने पुछा.

बोले, ‘जिस के हाथ से पानी पिए उस को तो तुम ने जेल में डाल रखा है..’

बादशाह सलामत की धड़कने बढ़ गयी…देखता है की अल्लाह  ताला और मोहमाद साब बड़े नाराज़ दिखाई दे रहे…मैने जिस को जेल में बंद किया वो तो प्रेम निधि है..जल्दी जल्दी प्रेम निधि को रिहा करवाया…

प्रेम निधि नहाए धोए..अब भगवान को जल पान  कराते है..

राजा प्रेम निधि को देखता है…देखा की अल्लाह, मोहमद  साब और प्रेम निधि के गुरु एक ही जगह पर विराज मान है!

फिर राजा को तो सत्संग का चसका लगा..ईश्वर, गुरु और मंत्र दिखते 3 है लेकिन 1 ही सत्ता है..बादशाह सलामत हिंदुओं के प्रति जो नफ़रत की नज़रियाँ रखता था उस की नज़रिया बदल गयी…प्रेम निधि महाराज का वो भक्त हो गया..सब की सूरत में परब्रम्‍ह परमात्मा है ..राजा साब  प्रेम निधि महाराज को कुछ  देते..ये ले लो..वो ले लो …तो बोले, हमें तो भगवान की रस मयी, आनंद मयी, ज्ञान मयी भक्ति चाहिए..और कुछ नही…

 

जो लोग संतों  की निंदा करते वो उस भक्ति के रस को नही जानते..

 

संत की निंदा ते बुरी सुनो जन कोई l

की इस में सब जन्म के सुकृत ही खोई ll

 

जो भी सत्कर्म किया है अथवा सत्संग सुना है वो सारे पुण्य संत की निंदा करने से नष्ट होने लगते है..

जो गुरु के प्रति , भगवान के प्रति अहोभाव करते उन्हे वो प्रेमा भक्ति, परमात्म रस मिलता है…

 

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GURU Darshan Express

अभी कुछ  समय पहेले मेरा अमृतसर में सत्संग था..अमृतसर में अपना आश्रम है..आश्रम से 20 किमी की दूरी पर पाकिस्तान की बॉर्डर आती है…पाकिस्तान की बॉर्डर से 20किमी दूर लाहोर है…लाहोर बड़ा शहेर है पाकिस्तान का..

मैं इस बार गया तो हिन्दुस्तान से सामान ले जाने वाली 80-90 ट्रकें थी..वहाँ  से भी हिन्दुस्तान आने वाली ट्रके खड़ी थी..अभी गेट  खुला नही था…हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाने वाली बस भी पहुँच गयी थी..ये सब देखा तो मुझे वो कथा याद आ गयी..

लाहोर में बुल्ला शाह नाम के संत रहेते…वो ईश्वर की- अल्लाह की बंदगी करते..रोजे  रखते..कुछ  शक्तियाँ भी आ गयी..पाप से बचने से शक्तियाँ आती है..लेकिन हृदय में शांति और भगवत रस नही था …अपन लोग प्रेमा भक्ति बोलते ऐसे इश्क इलाही, इश्क मिजाजी, इश्क नूरानी के बिना उन को संतोष नही था..

आख़िर लाहोर से सटे हुए देहात में पहुँचे हुए ब्रम्ह ज्ञानी  संत रहेते गृहस्थ वेश में…उन की अपनी खेत खली में देखते..अल्लाह के रास्ते चलने सब को बड़ी मदद करते…उस फकीर का नाम था इनायत शाह.

 

इनायत शाह अपने खेत में प्याज लगा रहे थे..प्याज के बीज से छोटे छोटे पौधे उगते उन को खेत में लगाया जाता है…इनायत शाह ऐसे प्याज लगा रहे थे..बुल्ला ने उन को प्रणाम किया…स्तुति की…

तो संत इनायत शाह ने पुछा , ‘अरे भाई कौन हो? क्यो आए?’

बुल्ला शाह बोले, ‘मालिक रब दा रास्ता दिखाओ’

इनायत शाह जी बोले, ‘अरे रब कोई दूर है क्या की उस का रास्ता दिखाऊँ ?..रब के पास जाना है क्या? रब को कही से लाना है क्या?रब को कही से बुलाना है क्या? वो तो हाजीरा हजूर है..रब ही रब है! शरीर में से ‘मैं’निकालो और आत्मा में मैं लगाओ!’मैं’ को यहा से उठाओ और यहा लगाओ बस!मैं आत्मा हूँ ..चैत्यन्य  हूँ …. तो रब ही रब है!’

ऐसा कहेते हुए इनायत शाहा के संकल्प के रहेमत  की नज़र भी बुल्ला शाह पर बरसी…और बुल्ला शाह के चेहरे पर अंतरात्मा का संतोष , प्रसन्नता आई…

बुल्ला बार बार इनायत शाह के दर्शन करने आता..बैटरी चार्ज करवाता जैसे तुम लोग करते…जब तक बापू से प्रसन्नता की झलक नही पाते पूनम व्रत धारियों को तब तक संतोष नही होता…ऐसे बुल्ला शाह भी चक्कर काटता महीने पंधरा  दिन पर इनायत शाहा के यहा..

 

बुल्ला के परिवार में शादी का प्रसंग आया और गुरु महाराज को अर्ज़ किया की विवाह है, आप पधारे तो कृपा होगी…

इनायत शाह बोले, ‘अच्छी बात है..मैं नही तो मेरा चेला ही आ जाएगा’

शादी में इनायत शाह ने अपने घर के पास रहेने वाले किसी छोटी जात के आदमी को बोला की तुम जाओ और बुल्ला के रिश्तेदारों की  शादी है..

 ..वो आदमी छोटे जाती का था, छोटे स्वभाव का था.. छोटे मन का था…कपड़े भी ऐसे वैसे पहेन  के गया था..तो बुल्ला के रिश्तेदारों ने भी उस को महत्व नही दिया…अलग से बिठा के थोड़ा  टुकड़ा डाल दिया..भगा दिया… तो उस ने आ कर मिर्च मसाला डाल कर इनायत शाह को बता दिया…की आप नूरानी निगाहो से उन को खुशी देते थे…वो ही खुशी से वो अल्लाही नूर तक पहुँचे…आप ने इतना दे डाला मालिक लेकिन आप के बंदे के यहा आप के भेजे हुए आदमी को नीच जाती का मान कर तुच्छ के जैसा व्यवहार किया…

इनायत शाह को ऐसा सब बता कर बुल्ला के प्रति नाराज़ कर दिया..

इनायत शाह ने कहा, ‘हमें उस से क्या लेना है? इधर को बहाया था पानी..अब उधर को बहेता पानी इधर को वापिस मोड़ लेंगे! क्या है उस में?…’

इनायत शाह ने दिल में इतना सोचा ही था की इधर बुल्ला शाह के हृदय से खुशी चली गयी…आनंद चला गया..बुल्ला समझ गया की नूरानी नूर शाही फकीर के दिल में मेरे लिए नाराज़गी है…भागा भागा आया…तो उस आदमी ने बुल्ला को दूर से देख के बोल दिया की बुल्ला फिर आ रहा है आप को रिझाने के लिए…आप भोले है..आप को मस्का मारता है..

इनायत शाह बोले, ‘नही नही.. उस को मेरे पास आने ही मत दो!’

खेत खली का जीवन था…बुल्ला जब भी आए उस को धक्का मार के भगाया जाता था…इनायत शाह तक जाने ही नही देते..

आख़िर बुल्ला ने सोचा की इस महा पुरुष को मैं कैसे रिझाऊँ ?..तो पता चला की इनायत शाह गाना बजाना कव्वाली सुनने जाते है कभी कभी…तो उस समय जो नर्तक होते वो किन्नर होते..उन को नाचू भी बोलते…ऐसे मंडली में भरती हो गया…आज नही तो कल..नही तो परसो ..ऐसे करते करते 12 साल गुजर गये ..हिजड़ो की मंडली में नाचना गाना , स्री  के वस्त्र पहेनेना वो सब सीखा…12 साल के बाद उस हिजड़ो के मंडली का नंबर लगा जिस में बुल्ला शाह भरती हुए थे…

बुल्ला शाह सोचे की 12 साल के बाद आज मालिक तक पहुँचे..ऐसी काफिया गाइ…ऐसी ग़ज़ल और कव्वालियाँ गाइ…जिस में दर्द और विरह भरा था…

तकदीर तू किसी से धोका ना कर ..

मुश्किल है जुदाई सहेना

जिस ने एक बार महापुरुषों की रहेमत  का स्वाद चखा है ..जिन को राज वैभव मिलता वो कंगाल होते तो जो पीड़ा होती है वो ही जाने..कंगाल को कंगाल होने की कैसी पीड़ा?…भीक मंगों को , झोपड़पट्टी में रहेने वालों को दरिद्रता का इतना दुख नही होता जितना आमिर को दरिद्र होने का दुख होता है…ऐसे गुरु कृपा की धारा वापस खींच के चली गयी..अब मुझ पे क्या बीती है ये एक मैं जानू और के मेरे इनायत प्रभु जाने….

इनायत शाह बोले, ‘अरे हिजड़े के वेश में बुल्ला है तू?’

बुल्ला शाह ने वो वेश फेंक के इनायत शाह के चरणों  में पड़ते हुए कहा, ‘बाबा बुल्ला नही ..मैं तो भुला हूँ! 12 साल जैसे 12 युग बीते मेरे मालिक..मैने आप के रिझाने के लिए ये वेश बनाया..’

बोले, ‘अरे फिर भी सौदा सस्ता है..कितने करोड़ो जनमो तक पटकते..’

 

तो गुरु को रिझाने के लिए बुल्ला ने 12 साल हिजड़ो की मंडली में रहेना स्वीकार किया..रगड़े गये वहा…उन के जैसा ख़ान पान, रहेन सहेन…12 साल इतना कष्ट सहें  कर गुरु को रिझाया तब बुल्ला शाह ने गुरु की रहेमत फिर से पाई..

 

गोरखनाथ  भी मच्छीन्द्र  नाथ को रिझाने के लिए नर्तक मंडली में  12 साल भारती हुए थे..नाचना गाना सीखे थे.. मच्छीन्द्र नाथ रुठ गये थे तो उन को मनाने के लिए गोरखनाथ नर्तको के मंडली में आए थे..तब गुरु को रिझाने में सफल हुए..

 

गुरुओं को रिझाने में 12 – 12 साल लगे थे…लेकिन तुम लोगों का क्या जादू है की गुरु को रिझाने के लिए तुम्हे 1 मिनट भी नही लगता..गुरु तो सदा रिझे मिलते है और गुरु तुम्हे रिझाते रहेते है की आ जाओ! ले जाओ!!..जब देखो गुरु आते जाते गुरु तुम्ही ही को रिझाते है..रेल गाड़ी चला कर भी रिझाते है..नाच कर भी रिझाते है..गा  कर भी रिझाते है..सुना कर भी रिझाते है..

12-12 साल गुरु को रिझाने के लगा देने वाले  शिष्य हो गये..हम भी गुरु को रिझाने में ऐसे लगे थे की वो बात बताऊंगा तो अभी आप के आँखों में आसूं बहेंगे…

आप भी करते लेकिन क्या पता क्या जादू है की मुझे रिझाने के लिए आप को कुछ  नही करना पड़ता…मेरी ही आदत ऐसी है की मैं ही रिझाता रहेता हूँ आप को…और मेरी ये आदत इसलिए बनी की मैं  ने भगवान के साथ एक बार पंगा ले लिया था! 🙂

मैं बहोत  तरसा..लेकिन वो ईश्वर का आनंद नही मिल रहा था…खूब गिरी गुफ़ाओं में घूमे..केदार नाथ गये..साधना किए..अनुष्ठान करते करते रात्रि के 12-1 बज जाए..जवान शरीर ..सोए तो एकदम पता ही नही चले..तो रात्रि को नींद में चूछूंदरी पैरों के तलूवे फूँक मार मार कर खा जावे..फिर सुबह नदी मे स्नान करने जाए तो बालू घुस जाए तब पता चले..ऐसे दिन भी बिताए ईश्वर को रिझाने के लिए…

ईश्वर रीझ गये तो आनंद ही आनंद है!

लेकिन मैं उन दिनों  ईश्वर से बोलता की आप मिलते नही हो…एक बार मिलोगे ना तो तुम्हारी हालत ऐसी करूँगा….  की जैसे कोई बहोत  दुखी हो कर माँ  से, बाप से , मित्र से चिढ़ जाते ऐसे हम ईश्वर से चिढ़ गये…की मिलते नही हो एक बार मिल जाओ तो तुम्हे ऐसा सस्ता कर दूँगा की जैसे फुटपाथ की सब्जी! सुबह 5 रुपये की 500 , दोपहेर को 3 की 500, और शाम आए तो 2 रूपीए में ले जाओ..तो ऐसा भगवान ने वचन सच्चा कर दिखाया…और वो मज़ा ले रहे है..और हम को भी दौड़ा दौड़ करा के मज़ा ही दिला रहे है

ओम शांति.

 

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो!!!!!

ग़लतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे….

 

 

 

Delhi Poonam Satsang Amrut ; 11 Dec. 2011

 

  iishwar kaa ek naam hai satchidaanand

 

satchidaanand rupaay

vishw utapatti aadi hetave

taap tray vinaashaay

shrikrushnaay vayamnum

 

jo sat swarup hai..’sat’maanaa jo pahel ethaa, abhi hai, baad men bhi rahegaa..jo sat rup hai, chetan rup hai, aanand rup hai..jo vishw ki utpatti karataa hai ..krushn ke rup men pragat hotaa hai ..aur sabhi ke hruday men chhupaa rahetaa hai..us satchidaanand ko ham namaskaar karate hai…

jis ki sattaa se srushti banati hai aur sharir banataa hai… jis ki sattaa se us kaa paalan poshan hotaa hai..aur jis men vo vilay ho jaataa hai us parameshwar ko ham namaskaar karate hai…

kyo namsakaar karate hai?

taap tray vinaashaay…3 taapon ke shaman karane ke liye ham un ko namaskaar karate hai..shaaririk taap(aadhibhautik taap), maanasik taap(aadhidaivik taap) aur adhyaatmik taap ye 3 taap hote hai..

aadhibhautik taap us ko kahaa jaataa hai sharir kaa, dhande kaa, nokari kaa aadi sthul sharir se sambandhit jo bhi gadabad ho us ko bolate aadhi bhautik taap…

ativrushti ho gayi, anaa vrushti ho gayi, bhukamp huaa, accident ho gayaa ye sab aadhidaivik taap hai…

aur man men jalan aayi, ashaanti rahi ye adhyaatm taap hai..

to ye 3- aadhibhautik taap, aadhidaivik taap, adhyyaatmik taap jivon ko jalaate rahete…dukhi karate rahete hai..

 

sansaar taape taptaanaam yog hi param aushadh l

 

sansaar ke taapon men tapane waale vyakti ke liye yog param aushadh hai ..

to yog kaisaa?

bhagavaan ke saath aap ka asali sambandh hai..shaashwat sambandh hai ..us men aap ki priti ho jaaye..us men aap kaa mel ho jaaye ..is ko bolate hai YOG…priti ho jaaye to bolate bhakti yog..us ke tatv kaa gyaan ho jaaye to bolate gyaan yog..usi ki prasannataa ke liye karm karate to bolate karm yog..

 

bhagavaan ki prasannataa ke liye sewaa karate to karm yog ho gayaa..bhagavaan kaa dhyaan bhajan karate, sumiran karate to bhakti yog ho gayaa…aur bhagavaan kyaa hai ? ham kyaa hai? – is kaa vichaar karate to gyaan yog ho gayaa..

 

 bhagavaan us ko kahete jis ki sattaa se bharan poshan hotaa hai (BHA);jis ki satta se gaman-aagaman hotaa hai (GA) ; jis ki sattaa se waani sphurit hoti hai (VA) ; ye sab na hone ke baad bhi jis ke saath kaa sambandh hamaaraa saath nahi chhodataa (VA).. vo hai BHAGAVAAN ! hamaaraa antaraatmaa parameshwar…

to parameshwar ko banaanaa nahi hai..kahi se bulaanaa nahi hai..us parameshwar ke paas jaanaa nahi hai…vaastav men jo maujud hai haajiraa hajur kewal us ki swikruti , kewal us ki priti athavaa kewal us ke nimitt karm itanaa hi…kewal us ke nimitt karm karo…vo hamaare aatmaa hai ye swikrut karo…vo bhagavaan kaa gyaan paa lo…

shradhdaa bhakti se bhagavaan kaa bhaav paidaa hogaa lekin bhaav ke baad bhi bhagavat tatv kaa gyaan paaye binaa  aadami purn rup se trupt nahi hotaa..

 

ek hotaa hai dukh ko mitaanaa aur sukh ko paanaa… sansaari sukh ko paane ke liye prayatn karate…sansaar dukhaalay hai to sansaari sukh tikataa nahi aur dukh mitataa nahi..vaastav men bhagavaan sukh rup hai …us ko jaanane se dukh tikataa nahi..to bhagavaan ke kaise jaane? bhagavaan ko satsang ke dwaaraa jaanaa jaataa hai..

 

 

binu satsang vivek na hoyi

raam krupaa binu sulabh naa soyi ll

 

 

satsang ke binaa vivek nahi hotaa…vivek kya hai?

avinaashi aatam jagataa te pratikul l

aisaa gyaan vivek hai..aatmaa avinashi hai aur jagat pratikul – vinashi hai aur ye gyaan hi vivek hai…aatmaa ajanmaa hai..aur sharir kaa janm hotaa , mrutyu hoti hai.. aatmaa ek ras hai aur sharir badalataa hai..jaise baalak huaa , shishu huaa, kumaar huaa, jawaan huaa, adhed huaa , budhdaa huaa aur mar gayaa..phir bhi jyo jyu kaa tyu rahetaa hai vo hamaaraa aatmaa hai..hamaaraa aatmaa bhagavaan swarup hai..is bhagavaan swarup kaa gyaan sun kar aur jagat dhokhe se, nashwarataa se, vikaaron se bharaa hai ye jaan kar jagat ki aasakti mitaa kar bhagavaan ki prasannataa ke liye karm kare..jo juth bolane men parahej nahi karate un ko bhagavaan ke paane men ruchi nahi hoti..bhagavaan sat swarup hai..jo jhuth bolate un ke man men bhagavaan ki priti yaa bhakti vishesh chamakataa nahi hai..

satya bole jhuth tyaage mel aapas men kare..

ladaayi jhagade dwesh se hote athavaa to raag se dil malin hotaa hai..kisi se raag bhi naa kare; kisi se dwesh bhi naa kare..bhagavaan ki prasannataa ke liye apanaa kartyavy paale.. sukhi hone ke liye nahi; dusare ko sukh baate..swayam bhagavaan men shaant rahenaa aur gyaan men pravesh karanaa ye swaabhaavik hotaa hai…

jab tak bhagavaan men priti nahi hoti tab tak bhagavat ras kaa aaswaadan nahi aataa..to vikaar pichhaa nahi chhodate..

 

 

akabar ki bahot saari aurate thi..us men hindu begam bhi thi..ek begam kaa naam thaa jodhaa baai..(Pujyashri Bapuji ne man se kiye paap bhi kaise taap dete hai is ki kahaani sunaayi..  please visit :  http://wp.me/P6Ntr-Oa )

 

 

kahenaa kaa taatpary hai ki sukh ke liye aadami na karane jaisaa kaam bhi karataa hai…..phir bhi sukh tikataa nahi hai..kyo? kyo ki vo  sukh  dukhaalay sansaar se letaa hai…sukh ko thaamane ke liye aur dukh ko bhagaane ke liye din-raat lage rahete..phir bhi sukh thamataa nahi, dukh bhagataa nahi…kyo ki dukh sansaar ki chij hai..dukhi aadami ka dukh tab tak rahegaa jab tak us ki bhul jivit hai..aur dukhi aadami ki bhul ye hai ki dukhaalay sansaar se dukh mitaanaa chaahataa..

 

is baat ko bhagavaan raam ke gurudev bolate ki , ‘hey raam ji !jaise kahin aag lage aur  sukhe tinako se aag bujhaanaa chaahe to vo murkh hai’ aaj ke jamaane men kahenge ki petrol ke phuwaare se aag bujhaanaa chaahe to kaise bujhe?..

aise hi jo sansaar ke saadhanon se dukh mitaanaa chaahate un kaa dukh dab jaataa hai..dukh bhul jaate hai lekin dukh mitataa nahi hai…

 

isliye dukh mitaanaa hai to dukh haari hari ke swabhaav ko jaano… hari sat rup hai, dukh a-sat hai…atanaa jad hai..hari gyaan swarup aanand swarup hai..aur dukh agyaan aur a-sat rup hai…meraa aatma hari hai, jo har samay raheta hai.. dukh har samy nahi rahetaa..sukh har samy nahi rahetaa.. bachapan , jawaani har samay nahi raheti… lekin jo har samy rahetaa vo meraa antaraatmaa hari hai…antaraatmaa se main dur nahi hun..

aisa kar ke apane antaraatmaa ke sat swabhaav ko , chetan swabhav ko , aanand swabhaav ko jaane to aap kaa dukh kabhi tikegaa hi nahi…

 

 

anyathaa bhagavaan krushn arjun kaa rath chalaate phir bhi arjun nirdukh nahi hote..bhagavaan ko kahena apadataa hai :

aagamo apaayino anityaasch

shit ushn sam dukhesukheshu

tathaa maanaapamaan

taam titikshasw bhaarataa l

 

thandi-garami, maan-apamaan, sukh-dukh ye aataa hai aur jaataa hai..apaayino

anitya hai..us kaa koyi pakkaa paayaa nahi hai..base nahi hai…ve anitya hai..isliye un ko sahan karo athavaa pasaar hone do..tum apane aatmaa me raho… ye aayaa hai, ye chalaa jaayegaa…main aanand swarup hun…main chaityany swarup hun…main shaashwat hun.. maut bhi mujh ko  nahi maar sakati itanaa main ‘sat’ hun… duniyaa kaa koyi agyaan mujhe dhak nahi sakataa aisaa main gyaan swarup hun..

 

jis vastu ka gyaan nahi hai, agyaan hai to agyaan kaa bhi gyaan hai!..’main nahi jaanataa hun’ye nahi jaanane kaa gyaan bhi mere paas hai to main gyaan swarup hun..jyu kaa tyu shaashwat hun…

apane  sat swabhaav ko, chetan swabhaav ko, aanand swabhaav ko, gyaan swabhaav ko jaan legaa to us vyakti ke dukh sadaa ke liye mit jaate hai….nahi to bhagavaan krushn ki bhakti kar ke , bhagavana krushn ko apanaa ko saarathi banaa ke bhi yudhd karane ke maidaan men arjun dukhi hotaa hai..jab bhagavaan ne krupa akar ke arjun ko bramh gyaan diyaa tab arjun kaa dukh mitaa..

bramh paramtma ka gyaan paanaa chaahiye.

 bramh paramaatmaa kis ko bolate hai ?

jis se bramha avishnu mahesh aur jeev jantu sabhi sat-taa,chetan-taa aur aanand-taa paa rahe  vo bramh paramaatmaa hai..

vo bramh paramaatmaa abhi yahaa hai..sarv vyapaak hai to yahaa hai… sab men hai to ham me bhi hai … sadaa rahetaa hai to abhi bhi hai..kewal ham us ko samajheto dukh mit jaataa hai.

dukh haari hari ke gyaan se, hari ki priti se, hari ke aanand se, dukh haari hari ki sharan jaane se dukh tikataa nahi..(sansaari vastu se dukh dabegaa, hategaa lekin mitegaa nahi, phir ubharegaa..)

 

dukh aayaa to man se udvign mat hoyiye..dukh kyu aayaa hai ye jaaniye..

1) kuchh dukh bad parheji se aate jaise bimaari aati.

2) kuch dukh bewkufi se aate jaise main pareshan hun ye bewkufi hai..

3)kuchh dukh praarabdh veg se aate hai..lekin galati ye hoti hai ki ‘main dukhi hun’…hakikat men man dukhi hotaa hai, man pareshaan hotaa hai, bimaari sharir ko aati hai…main in ko jaanane waalaa aatmaa- saakshi hun…is gyaan ke abhaav men dukh ka mahatv badh jaata hai aur aap dabbu ho jaate hai..gyaan ko sajaag rakhe ki dukh aur sukh aataa hai..dikhataa hai…jo  drushy hai vo saakshi ki sattaa se rahetaa hai..to praarabdh veg se, prakruti ki vyavstaha se dukhad awasthaa  aaye athavaa bad parheji se dukh aaye to us kaa upaay khoj ke bhul ko mitaao..lekin  ‘main dukhi hun’ aisaa chintan naa karo…main dukhi hun aisaa mat maano.. main is ko jaananewaalaa hun, main chetan hun aisi samajh pakki karoge to aadhaa  dukh to is ke prabhaav se hi mit jaayegaa.. baaki kaa us ke anurup upaay karo…jaise bimaari aayi to aushadhi, khaan-paan aur sanyam kaa sahaaraa le..dushamni  hai to compromise ka sahaaraa le..athavaa prakruti se dukh aayaa hai to  purushaarth kaa sahaaraa le..

 

to dukh ko mitaane ke sahi tarikaa hai ki dukhi aadami sansaar ka sahaaraa na lekar gyaan ka sahaaraa, bhagavat sattaa kaa sahaaraa aur bhagavat priti kaa sahaaraa  le to us ke saare dukh mitate hai…bhagavat priti ka sahaaraa le to dukh ,itata hai

 

dukh aaye to man ko udvign na hone de… sukh aaye to aaskati naa kare… jo aata hai, vo  jata hai; jo banata hai, vo bigadataa hai…jo aa gayaa, aa gayaa..jo chalaa gayaa, chalaa gayaa..aage badhate jaao…jo milataa hai lete jaao aur chhutataa hai to chhodate jaao.. mera beta chalaa gayaa..mera phalaanaa aisaa hai..aisaa soch ke apane ko vartamaan ke aanand swabhaav se dur mat karo..aur bhavishya ki shekh chilli ke kille baandh kar samay vyarthy naa gavaao..abhi tum sukh rup ho aisaa jaan lo…ye milegaa to sukhi honge, aisaa hogaa to sukhi honge – is chakkar men mat pado..

 

 

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bhaagavat men ye ghatanaa aati hai ki shrikrushn ne audhav ko bataayaa :

 

ujjain me ek bramhan rahetaa thaa..us ne paisaa kamaa kar sukhi honaa chaahaa.. us ko pataa hi nahi thaa ki jo paison men lobh karataa hai to dhan men 64 prakaar ke  durgun hote hai..

dhan men 16 prakaar ke sadgun bhi  hote hai.. jaise dhan kaa sat upyog kare, saadhan bhajan mil jaaye , aaraam se rahe sake, thik se khaa-pi sake, maa-baap ki sewaa kar sake.. shastr kharid sake, par lok ke liye punya  daan karm  kar sake… aise 16 to sadgun dhan men hote hai …

lekin dhan aataa hai to lobhi banataa, ahankaari banataa, jhuthaa banataa hai, vikaari banataa hai, waasanaa badhati hai.. aadi aadi sab durgun hai..

 

to ye braamhan dhan ke lobh me aisaa lage ki naa parv kare naa tyohaar kare…naa hi parijano kaa khayaal kare… naa hi saadhu santo ke paas jaaye..dhan kaa  aisa lobhi ho gayaa ki us ke pariwaar waale bhi us se tang aa gaye…

bhagavaan ne krupaa kar ke us ke lobh ko mitaane ke liye aisaa nimitt rachaa…

bhagavaan prani maatr ke suhurd hai.. na jane kis ko kaun se nimitt dal dal se uthaanaa chaahate vo hi jaanate ….

 

shrikrushn kahete ki audhav braamhan ka bhaagy badalaa..

 braamhan ki  2 dukaane thi ujjain nagari men.. kuchh sarakaari amaladaaro se us ki khat-pat huyi..unho ne raajaa ko bhadakaayaa…raajaa aur  adhikaariyo ne us kaa dhan, jamin, dukaan hadap li..kutumbi to pahele hi us se ruthe rahete the…

charo taraf se ghir gayaa to us ko vairaag huaa ki sansaar men saar kuchh nahi…itanaa saaraa dhan, itani sari mehanat karane ke baad bhi kab ye dhan chhodanaa pade  koyi thikaanaa nahi…aisa vairaagya huaa to sanyaasi ho gayaa…

 braamhan sanyaasi ho gayaa to us ke pahele ke jo dushamn the unho ne  us ki khilli udaayi ki dekho ab kamaayi kaa koyi saadhan nahi to ab ye saadhu ban ke mofat ki rotiyaa aithegaa aur dakshinaa legaa….haalaki braamhan ko naa hi kisi se kuchh aithanaa thaa , naa hi dakshinaa leni thi…vo to dukh haari ke gyaan men , dukh haair ke priti me rahenaa chaahataa thaa..

lekin jab bhi vo bhikshaa maanagane  jaaye to us ke viroshi aur kuchh lafange us ki majaak udaate…koyi us par thuk jaaye..vo apane man ko samajhaata aki thuk jaate to is marane waale sharir par thuke..agale janam kaa len-den hai us ko puraa karate hnge..lekin meraa aatm tatv to jyo kaa tyo hai..gaali dete to sharir ko dete hai…sharir nahi rahegaa to bhi main rahetaa hun..main bhagavaan kaa hun , bhagavaan mere hai…jeev bramh kaa hai, bramh jeev kaa hai…aise soch ke vo aanand men rahene lagaa…

jo us ko dukh rahit sthiti men dekhate tyo vo log chidate…. kabhi kabhi vo bhikshaa maang kar nadi kinaare bhojan karane baithataa to udand log, vighn santoshi log  wahaa aate..us ko sataate …chane ki daal jaan bujh kar khaate aur us ke bhojan ke samay us ke najadik jaakar durgandh chhodate ….phir bhi vo braamhan apane man ko samjhaataa ki man tere men udvign karane ke liye ye sab karate..ab tu shaant rahe to teri marji..tu ashaant honaa chaahe to teri marji..main to tere ko jaanataa hun…tu chaahataa hai vo sab hotaa nahi hai..jo hotaa hai vo tujhe bhaataa nahi hai …jitanaa bhaataa hai vo tikataa nahi…tikane waalaa to meraa satchidaanand aatmaa hai… om om om om …is prakaar braamhan apane ko prasannataa se saraabor rakhataa..

vighn virosh karanewaale kitanaa bhi kuchh karate lekin vo praarabdh kat rahaa hai, in ka swabhaav aisaa hai, ishwar ki lilaa maan kar apane man kaa vo samaadhaan karataa…

 

braamhan samaaj aur hiteshiyon se thukaraayaa huaa thaa …lekin satsang sunane ko baad us ko huaa ki aatm gyaan se badaa koyi gyaan nahi hai…itane bade bhaari dukh men bhi main nir-dukh ho rahaa hun..aanand se sotaa hun..shaanti se jagataa hun..nadi kinaare raat bitaataa hun athavaa mandir ke praangan men bitaataa hun..lekin jab suvidhaayen thi us samy bhi itani nirbhayataa nahi thi….itani shaanti nahi thi..satsang se jo gyaan milataa hai vo aadami ko anukulataa men udaar banaa detaa hai aur pratikulataa men titikshaawaan aur sujh bujh kaa dhani banaa detaa hai..

isliye jo satsang sunate hai athavaa satsang sunane-sunaane men bhaagidaar hote hai un par bhagavaan bade prasann hote hai….

bhagavaan kahete hai:

gitaa me hrudayam paarth

jo gyaan gitaa men hai vo to meraa hruday hai..

 

to aap ko kyaa karanaa hai?

akabar jaisaa raaj vaibhav mil jaaye phir bhi ye vikaari sukh bhogane ki gandi aadat jeev ki jaati nahi ..isliye apani patni ho tabhi bhi sanyami jeevan jee kar bhagavat sukh kaa abhyaas karanaa chaahiye..

bhagavat sukh kayi varshon ke baad nahi abhi satchidaanand bhagavaan dur nahi hai…bhagavaan ko kayi logon ne kathin kar diyaa..vaikunth men hai ..itanaa tapasyaa karo to bhagavaan milenge aisaa bol ke kathin kar diyaa hai..

bhagavaan to ab bhi hai, abhi maujud hai, abhi sat rup hai, abhi chetan rup hai…abhi aanand rup hai aur abhi mere aatmaa hai..

ye sab to aap ne sunaa hai…lekin is kaa anubhav karane ki aap ko bhukh ho gayi to bhagavaan antarayaami sat swabhaav, gyaan swabhaav aap ko mahesoos karaa dete hai..

dekho aap karo to bhagavaan kaa sat swabhaav, aanand swabhaav, chetan swabhaav abhi abhi chhalakegaa…

ye bilkul dimaag se nikaal do ki ham itani tapasyaa karenge phir bhagavaan aayenge..bhagavaan aap se bichhad hi nahi sakate…bhagavaan kaa aakaar aataa hai, aakruti aati hai , chali jaati hai…lekin jo bhagavaan kaa chidghan swabhaav hai vo sarvatr vyaap rahaa hai…paani men tarang aaye, jhaag aaye, bulbule aaye to vo havaa ke kaaran..baaki paani to in sab men vyaap rahaa hai..aise hi sat-chit-aanand swarup paramaatmaa abhi bhi hai..vo ham ko chhod nahi sakataa, ham un ko chhod nahi sakate…jaise ghade kaa aakaash mahaa aakaash ko nahi chhod sakataa, mahaa aakaash ghade ke aakaash ko apane se alag nahi kar sakataa…aise paramaatmaa chaityany apane se alag nahi kar sakate..

 

 

(Pujyashri Baapuji ne divya omkaar saadhanaa karaayi..sabhi paramaanand men dubaki lagaa rahe…)

 

jaise kaale baadalon se sury chandaa dhak jaataa hai aise hi hamaari sat-chit-aanand swarup gyaan najariyaa par raag dwesh ye baadal aa jaate hai…

aaj dattaatrey jayanti bhi hai..awadhut gitaa men likhaa hai

raag dwesh vinirmuktaa

sarvo te heeterataa:

 

jo raag dwesh se vinirmukt(raheet) hai, sab kaa mangal aur bhalaa chaahate hai, sab praaniyon ke prati heet ki bhaavanaa se  jis kaa hruday bharaa hai, jis ko sab ke prati prem bhaav hai, jis ko drudh bodh huaa hai ki main saakshi hun, main sakshi hun, main amar aatmaa hun..maranewaalaa sharir main nahi hun… badalane waalaa man aur badalane waali budhdi main nahi hun..main in men bhi hun aur in se pare bhi hun…main budhdi ko apani chetanaa de ke budhdi ke nirnay banaataa hun…nirnay badal jaate phir bhi main un kaa saakshi ho kar rahetaa hun…aisaa drudh gyaan waalaa vidwaan purush hai , bramh gyaan ki vidyaa jis ko bhaa gayi hai vo mukti ko praapt hotaa hai…param pad ko praapt hotaa hai…param pad dur nahi..param pad ke paas jaanaa nahi..wo hi param chaityany men apane ko ekaakaar samajhanaa hai..

 

50 se adhik divya jyotiyon kaa praagatya

 

 

 

 

****************

bhakt maal men ye kathaa aati hai :

 

aagraa men ek bhakt rahetaa thaa..prem nidhi us kaa naam thaa..sab men bhagavaan hai aisaa samajh kar priti purvak bhagavaan ko bhog lagaaye..aur vo prasaad sabhi ko baaten..

yamunaaji se jal laaye..bhagavaan ko snaan karaaye….us samay yamuna ji men delhi ki guttar kaa paani nahi aataa thaa..to yamunaa ji ke jal se bhagavaan ko jal paan karaataa thaa..

subah subah jaldi uthaa prem nidhi…subah subah jal par kisi paapi ki, nigure aadami ki najar padane se pahele main bhagavaan ke liye jal lekar aaun aisaa sochaa…andhere andhere men hi gayaa..lekin raastaa dikhataa nahi thaa..itane men ek ladakaa mashaal lekar aa gayaa..aur aage chalane lagaa..prem nidhi ne sochaa ki ye kyaa hai?chalo ye ladakaa jaataa hai udhar hi yamunaa ji hai..to is ke pichche pichhe mashaal kaa phaayadaa uthaao..nahi to kahi chalaa jaayegaa…phir lautate samay dekhaa jaayegaa..

lekin aisaa nahi huaa..mashaal lekar ladakaa yamunaa tak le aayaa..prem nidhi ne yamunaa ji se jal bharaa..jyu hi chalane lage to ekaaek ladakaa aa gayaa.. aage aage chalane lagaa..apani kutiyaa tak pahunchaa..to sochaa ki us ko puchhe ki betaa tu kahaa se aayaa..to itane men dekhaa ki ladakaa to antardhaan ho gayaa!

prem nidhi bhagavaan ke prati prem karate to bhagavaan bhi un ke liye kabhi kisi rup men kabhi kisi rup men un kaa maarg darshan karane aa jaate…

lekin us samay yauwano kaa raajya thaa..hindu saadhuon ko niche dikhaanaa aur apane majahab kaa prachaar karanaa aisi maanasikataa waale log baadashaah ke paas jaa kar un ko bhadakaayaa…ki prem nidhi ke paas aurate bhi bahot aati hai…bachche, ladakiyaa, maayiyaa sab aate hai..is kaa chaal chalan thik nahi hai..prem nidhi kaa prabhaav badhataa huaa dekh kar mullaa maulaviyon ne , raajaa ke piththuo ne raajaa ko bhadakaayaa..

raajaa un ki baaton men aa kar aadesh diyaa ki prem nidhi ko haajir karo..us samay prem nidhi bhagavaan ko jal pilaane ke bhaav se kuchh paatr bhar rahe the…

sipaahiyon ne kahaa , ‘chalo baadashaah salaamat bulaa rahe ..chalo ..jaldi karo…’

to bhagavaan ko jal pilaaye binaa hi vo nikal gaye..ab un ke man men khatakaa thaa ki bhagavaan ko bhog to lagaayaa lekin jal ti nahi pilaayaa..aisaa un ke man men khatakaa thaa…raajaa ke paas to le aaye..raajaa ne puchhaa, ‘tum kyo sabhi ko aane dete ho?’

prem nidhi bole, ‘sabhi ke rup men meraa paramaatmaa hai..kisi bhi rup men maayi ho, bhai ho, bachche ho..jo bhi satsang men aataa hai to un kaa paap naash ho jaataa hai..budhdi shudhd hoti hai, man pavitr hotaa hai..sab kaa bhalaa hotaa hai isliye main sab ko aane detaa hun satsang men..main koyi sanyaasi nahi hun ki sreeyon ko nahi aane dun…meraa to  gruhasthi jeevan hai..bhale hi main gruhasth ho kar vikaaron men nahi hun, phir bhi gruhasth paramparaa men hi to main jee rahaa hun..’

 baadashaah ne kahaa ki, ‘tumhaari baat to sachchi lagati hai..lekin tum kaafar ho..jab tak tumhaaraa parichay nahi milegaa tab tak tum ko jel ki kothari men band karane ki ijaajat dete hai..’band kar do is ko’

bhakt maal men kathaa aage kaheti hai ki prem nidhi to jel men band ho gaye..lekin andar se jo aadami giraa hai vo hi jel men dukhi hotaa hai..andar se jis ki samajh mari hai vo jaraa jaraa baat men dukhi hotaa hai..jis ki samajh sahi hai vo dukh ko turant ukhaad ke phenkane waali budhdi jagaa detaa hai..kyaa huaa? jo huaa thik hai..beet jaayegaa..dekhaa jaayegaa..aisaa soch kar vo dukh men dukhi nahi hotaa…

prem nidhi ko bhagavaan ko jal paan  karaanaa thaa..ab jel men to aa gayaa sharir..lekin thaakur ji ko jal paan kaise karaaye?..raat huyi…raajaa ko mohmad paigambar saab swapne men dikhaayi diye..

bole, ‘hey baadashaah allaah ko pyaas lagi hai..’

‘maalik hukum karo..allaah kis ke haath se paani piye?’ raajaa ne puchhaa.

bole, ‘jis ke haath se paani piye us ko to tum ne jel men daal rakhaa hai..’

baadashaah salaamat ki dhadakane badh gayi…dekhataa hai ki alaah taalaa aur mohmad saab bade naaraaj dikhaayi de rahe…maine jis ko jel men band kiyaa vo to prem nidhi hai..jaldi jaldi prem nidhi ko rihaa karavaayaa…prem nidhi nahaaye dhoye..ab bhagavaan ko jal paan karaate hai..

raajaa prem nidhi ko dekhataa hai…dekhaa ki allaah, mohamad saab aur prem nidhi ke guru ek hi jagah par viraaj maan hai!

phir satsang kaa chasakaa lagaa..iishwar, guru aur mantr dikhate 3 hai lekin 1 hi sattaa hai..baadshaah salaamat hinduon ke prati jo nafarat ki najariyaan rakhataa thaa us ki najariyaa badal gayi…prem nidhi mahaaraaj ka vo bhakt ho gayaa..sab ki surat men parbramh paramaatmaa hai ..raajaa saab  prem nidhi mahaaraaj ko kuchh dete..ye le lo..vo le lo …to bole, hamen to bhagavaan ki ras mayi, aanand mayi, gyaan mayi bhakti chaahiye..aur kuchh nahi…

 

jo log santo ki nindaa karate vo us bhakti ke ras ko nahi jaanate..

 

sant ki nindaa te buri suno jan koyi

ki is men sab janm ke sukurt hi khoyi

 

jo bhi satkarm kiyaa hai athavaa satsang sunaa hai vo saare punya sant ki nindaa karane se nasht hone lagate hai..

jo guru ke prati , bhagavaan ke prati ahobhaav karate unhe vo premaa bhakti, paramaatm ras milataa hai…

 

***********************

 

abhi kuchh samay pahele meraa amrutsar men satsang thaa..amrutsar men apanaa aashram hai..aashram se 20 kimi ki duri par paakisthaan ki bordar aati hai…paakisthaan ki border se 20kimi dur laahor hai…lahor badaa shaher hai paakisthaan kaa..

main is baar gayaa to hindusthaan se saaman le jaane waali 80-90 traken thi..wahaa se bhi hindusthaan aane waali trake khadi thi..abhi gate khulaa nahi thaa…hindusthaan se paakisthaan jaane waali bus bhi pahunch gayi thi..ye sab dekhaa to mujhe vo kathaa yaad aa gayi..

laahor men bullaa shaah naam ke sant rahete…vo iishwar ki allaah ki bandagi karate…roje rakhate..kuchh shaktiyaan bhi aa gayi..paap se bachane se shaktiyaan aati hai..lekin hruday men shanti aur bhagavat ras nahi…apan log premaa bhakti bolate aise ishk ilaahi, ishk mijaaji, ishk nuraani ke binaa un ko santosh nahi thaa..

aakhir laahor se sate huye dehaat men pahunche huye bramhagyaani sant rahete gruhasth vesh men…un ki apani khet khali men dekhate..allaah ke raste chalane sab ko badi madad karate…us phakir kaa naam thaa inaayat shaah.

 

inaayat shaah apane khet men pyaaj lagaa rahe the..pyaaj ke bij se chhote chhote paudhe ugate un ko khet men lagaayaa jaataa hai…inaayat shaah aise pyaaj lagaa rahe the..bullaa ne un ko pranaam kiyaa…stuti ki…

to sant inaayat shaah ne puchhaa, ‘are bhai kaun ho? kyo aaye?’

bullaa shaah bole, ‘maalik rab daa raastaa dikhaao’

inaayat shaah ji bole, ‘are rab koyi dur hai kyaa ki us kaa raastaa dikhaaun?..rab ke paas jaanaa hai kya? rab ko kahi laanaa hai kyaa?rab ko kahi se bulaanaa hai kya? vo to haajiraa hajur hai..rab hi rab hai! sharir men se ‘main’nikaalo aur aatmaa men main lagaao!’main’ ko yahaa se uthaao aur yahaa lagaao bas!main aatmaa hun ..chaityany hun to rab hi rab hai!’

aisaa kahete huye inaayat shahaa ke sankalp ke rahemat ki najar bhi bullaa shaah par barasi…aur bullaa shaah ke chehare par antaraatma aka santosh , prasannataa aayi…

bullaa baar baar inaayat shaah ke darshan karane aataa..baittery charge karavaataa jaise tum log karate…jab tak bapu se prasannataa ki jhalak nahi paate poonam vrat dhaariyon ko tab tak santosh nahi hotaa…aise bullaa shaah bhi chakkar kaatataa mahine pandharaa din par inaayat shahaa ke yahaa..

 

bullaa ke pariwaar men shaadi ka prasang aayaa aur guru mahaaraaj ko arj kiyaa ki vivaah hai, aap padhaare to krupaa hogi…

inaayat shaah bole, ‘achhi baat hai..main nahi to meraa chelaa hi aa jaayegaa’

shaadi men inaayat shaah ne apane ghar ke paas rahene waale kisi chhoti jaat ke aadami ko bolaa ki tum jaao aur bullaa ke rishtedaaron ki  shaadi hai..

 ..vo aadami chhote jaati kaa thaa, chhote swabhaav kaa thaa..chhote man kaa thaa…kapade bhi aise waise pahen ke gayaa thaa..to bullaa ke rishtedaaron ne bhi us ko mahatv nahi diyaa…alag se bithaa ke thodaa tukadaa daal diyaa..bhagaa diyaa… to us ne aa kar mirch masaalaa daal kar inaayat shaah ko bataa diyaa…ki aap nuraani nigaaho se un ko khushi dete the…wo hi khushi se vo allaahi nur tak pahunche…aap ne itanaa de daalaa maalik lekin aap ke bande ke yahaa aap ke bheje huye aadami ko nich jaati kaa maan kar tuchchh ke jaisaa vyavahaar kiyaa…

inaayat shaah ko aisaa sab bataa kar bullaa ke prati naaraaj kar diyaa..

inaayat shaah ne kahaa, ‘hamen us se kyaa lenaa hai? idhar ko bahaayaa tha apaani..ab udhar ko bahetaa paani idhar ko waapis mod lenge! kyaa hai us men?…’

inaayat shaah ne dil men itanaa sochaa hi thaa ki idhar bullaa shaah ke hruday se khushi chali gayi…aanand chalaa gayaa..bullaa samajh gayaa ki nuraani nur shaahi phakir ke dil men mere liye naaraajagi hai…bhaagaa bhaagaa aayaa…to us aadami ne bullaa ko dur se dekh ke bol diyaa ki bullaa phir aa rahaa hai aap ko rijhaane ke liye…aap bhole hai..aap ko maskaa maarataa hai..

inaayat shaah bole, ‘nahi nahi.. us ko mere paas aane hi mat do!’

khet khali kaa jeevan thaa…bullaa jab bhi aaye us ko dhakkaa maar ke bhagaayaa jaataa thaa…inaayat shaah tak jaane hi nahi dete..

aakhir bullaa ne sochaa ki is mahaa purush ko main kaise rijhaaun?..to pataa chalaa ki inaayat shaah gaanaa bajaanaa kawwaali sunane jaate hai kabhi kabhi…to us samay jo nartak hote vo kinnar hote..un ko naachu bhi bolate…aise mandali men bharati ho gayaa…aaj nahi to kal..nahi to paraso ..aise karate karate 12 saal gujar gaye ..hijado ki mandali men naachanaa gaanaa , sree ke vastr pahenenaa vo sab sikhaa…12 saal ke baad us hijado ke mandali kaa number lagaa jis men bullaa shaah bharati huye the…

bullaa shaah soche ki 12 saal ke baad aaj maalik tak pahunche..aisi kaafiyaa gaayi…aisi gajal aur kawwaaliyaan gaayi…jis men dard aur virah bharaa thaa…

takadir tu kisi se dhoka naa kar ..

mushkil hai judaayi sahenaa

jis ne ek baar mahaapurushon ki rahemat kaa swaad chakhaa hai ..jin ko raaj vaibhav milataa vo kangaal hote to jo pidaa hoti hai vo hi jaane..kangaal ko kangaal hone ki kaisi pidaa?…bhik mango ko , jhopad patti men rahene waalon ko daridrataa kaa itanaa dukh nahi hotaa jitanaa amir ko daridr hone kaa dukh hotaa hai…aise guru krupaa ki dhaaraa waapas khinch ke chali gayi..ab mujh pe kyaa biti hai ye ek main jaanu aur ke mere inaayat prabhu jaane….

inaayat shaah bole, ‘are hijade ke vesh men bullaa hai tu?’

bullaa shaah ne vo vesh phenk ke inaayat shaah ke charano men padate huye kahaa, ‘baabaa bullaa nahi ..main to bhulaa hun! 12 saal jaise 12 yug bite mere maalik..maine aap ke rijhaane ke liye ye vesh banaayaa..’

bole, ‘are phir bhi saudaa sastaa hai..kitane karodo janamo tak patakate..’

 

to guru ko rijhaane ke liye bullaa ne 12 saal hijado ki mandali men rahenaa sweekar kiyaa..ragade gaye wahaa…un ke jaisaa khaan paan, rahen sahen…12 saal itanaa kasht sahe kar guru ko rijhaayaa tab bullaa shaah ne guru ki rahemat phir se paayi..

 

gorakhanaath  bhi machhindar naath ko rijhaane ke liye nartak mandali men  12 saal bharati huye the..naachanaa gaanaa sikhe the..machchindar naath ruth gaye the to un ko manaane ke liye gorakhnaath nartako ke mandali men aaye the..tab guru ko rijhaane men saphal huye..

 

guruon ko rijhaane men 12 – 12 saal lage the…lekin tum logon kaa kyaa jaadu hai ki guru ko rijhaane ke liye tumhe 1 minat bhi nahi lagataa..guru to sadaa rijhe milate hai aur guru tumhe rijhaate rahete hai ki aa jaao! le jaao!!..jab dekho guru aate jaate guru tumhi hi rijhaate hai..rel gaadi chalaa kar bhi rijhaate hai..naach kar bhi rijhaate hai..gaa kar bhi rijhaate hai..sunaa kar bhi rijhaate hai..

12-12 saal guru ko rijhaane ke lagaa dene wale shishy ho gaye..ham bhi guru ko rijhaane men aise lage the ki vo baat bataaungaa to abhi aap ke aankhon men aasun bahenge…

aap bhi karate lekin kyaa pataa kyaa jaadu hai ki mujhe rijhaane ke liye aap ko kuchh nahi karanaa padataa…meri hi aadat aisi hai ki main hi rijhaataa rahetaa hun aap ko…aur meri ye aadat isliye bani ki maine bhagavaan ke saath ek baar pangaa le liyaa thaa! 🙂

main bahot tarasaa..lekin vo iishwar kaa aanand nahi mil rahaa thaa…khub giri gufaaon men ghume..kedaar nath gaye..saadhanaa kiye..anushtaan karate karate raatri ke 12-1 baj jaaye..jawaan sharir ..soye to ekadam pataa hi nahi chale..to raatri ko nind men chuchundari pairon ke taluwe phunk maar maar kar khaa jaawe..phir subah nadi me snaan karane jaaye to baalu ghus jaaye tab pataa chale..aise din bhi bitaaye iishwar ko rijhaane ke liye…

iishwar rijh gaye to aanand hi aanand hai!

lekin main un dino iishwar se bolataa ki aap milate nahi ho…ek baar miloge naa tumhaari haalat aisi karungaa ki jaise koyi bahot dukhi ho kar maa se baap se mitr se chidh jaate aise ham iishwar se chidh gaye…ki milate nahi ho ek baar mil jaao to tumhe aisaa sastaa kar dungaa ki jaise foot paath ki sabji! subah 5 rupaye ki 500 , dopaher ko 3 ki 500, aur shaam aaye to 2 rupiye men le jaao..to aisaa bhagavaan ne vachan sachchaa kar dikhaayaa…aur vo majaa le rahe hai..aur ham ko bhi daudaa daud karaa ke majaa hi dilaa rahe hai!..

..bhagavaan ko to sastaa kiyaa, ham bhi saste ho gaye!! 🙂

 

 

naaraayan hari ..hari om hari.

 

 

 

OM SHANTI.

 

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYAJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare….

 

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