mathuraa kaa makhkhan , poonam vratdhaari special …

11th Oct 2011 ; Mathuraa sharad poonam mahotsav

काली माँ  की उपासना करनेवाले  बहादुर गदाधर  ठाकूर  ने पत्नी शारदा को फिर जीवन भर भोग्या नही माना… ( शारदा जी के पैरों में उन को माँ  के चरणों के दर्शन हुए थे इसलिए गदाधर ठाकुर अर्थात रामकृष्ण परमहंस..) ब्रम्हचर्य  व्रत पालते पालते कई ब्रम्हचारी फिसल जाते…लेकिन स्री  साथ में पत्नी रूप में आई और ब्रम्हचर्य   पालन जीवन भर किया…कैसी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था है!..की आप के भाव को बादलो…

विदेश में फ्राइड नाम के मनो वैज्ञानिक  के सिद्धांत  से गुमराह हो गये है लोग…पुत्री पिता की तरफ और पुत्र माता की तरफ काम विकार से आकर्षित होते है ऐसा उस का सिद्धांत  था…लेकिन ये फ्राइड के खुद के जीवन में हुआ होगा, ऐसा सब के जीवन में नही होता..ये उस ने अपने उग्रवादी वमन से जो लिखा है उस से सारा पाश्चात्य  जगत तबाह हो गया… ‘सम्भोग  से समाधि’ का भाषण करने वाला अपना भारत का विद्वान भी फ्राइड का मनोविज्ञान  पढ़ता था… 
भारतीय संस्कृति में ऐसा नही है…दुल्हन के वस्त्र  पहेन  के पुत्री जब ससुराल जाती है सजी धजी तब पिता के गले लगती है…क्या बेटी में पिता के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा उस समय?….अथवा पिता का पुत्री के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा पुत्री के प्रति?…..नही नही..ये तो मेरी लाडली पुत्री है..ये मेरे पिता है जिन्हों ने मुझे जनम दिया,पाल पोस  कर बड़ा किया,सुंदर संस्कार दिए…कितने कितने सुंदर भाव होते है पिता और पुत्री के एकदुसरे के प्रति.. ‘भावग्राही  जनार्दन!’ …आप जैसा भाव करते वो  जनार्दन हरि  आप को उसी में मदद करते है…भाव का महत्व है…
अभी भी आप आसपड़ोस को माईयों को विकारी नज़र से देखो तो आप को स्वपनदोष हो सकता है..
गदाधर ठाकुर अपनी विवाहिता विधिवत की पत्नी में  माँ का दृढ़ भाव किए तो जीवन भर ब्रम्हचर्य पालन में सफल हुए..कितनी उँचाई है!..आप के अंतरात्मा में कितना सामर्थ्य है!…कोई बात दृढ़ता  से ठान  लेते है तो मनोयोग से हो जाता है…
जो पूनम व्रत करते तो आपदाओं से और दुर्गति से उन की रक्षा होती है..ये तो आप ने बाद में सुना है…
श्रध्दा  पूर्वा सर्व धर्मा फल प्रदा: l
श्रध्दा सभी धर्मों के पूर्व में होती है और मनोरथों को पूर्ण करने वाली फल दायिनी  वो माता श्रध्दा है…वेदों में ‘श्रध्दा सूक्त’ है , उस की अपनी महिमा है….श्रध्दा से सब कुछ  आसान हो जाता है …
श्रध्दावान  लभते ज्ञानम्  l
तो श्रध्दा से पूनम व्रत धारी होने का संकल्प धर लिया तो आने में-जाने में , रूपीए -पैसे खरचने में, सुविधाओं में , छुट्टी  लेने में आदि कई कठिनाइयाँ आती है ..फिर भी आप का भाव ये नही होता की  ‘ये मुसीबत कहाँ  से आ गयी पूनम’ ….यह भाव मन में आता है की पूनम कब आएगी…और पूनम का दर्शन कर के नये हो के जाते , आनंदित हो के जाते , फ्रेश हो के जाते …
व्रतं  दीक्षाम  माप्नोति  l
दीक्षाम  माप्नोति  श्रध्दया  l
श्रध्येयाम  हरी माप्नुयात  ll  
आप के जीवन में कोई ना कोई व्रत होना ही चाहिए…व्रत  से आप के जीवन में दीक्षा माना दिशा साफ होती है..भगवान में परमात्मा में दृढ़ श्रध्दा होती है और श्रध्दा दृढ़ होती है तो परमात्मा का साक्षात्कार कइयों ने किया और कई उस रास्ते पर है…तो नीगुरो की अपेक्षा साधक बहुत फ़ायदे में है..साधकों का  शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता अच्छी रहेती है..बौध्दिक  दृढ़ निश्चय  और त्वरित निर्णय लेने में नीगुरों की अपेक्षा साधकों में- जितना पक्का साधक उतना अधिक प्रभाव होता है..
शास्त्र कहेते की आप के बुध्दी  का विकास हुआ ये कैसे आप जानोगे?…ईश्वर के रास्ते ठीक चल रहे है ये कैसे पता चले? …और आप की साधना का विकास हुआ ये कैसे जानोगे?…आप अंतर में जागने के रास्ते ठीक चल रहे हो ये जानने की पारा-शीशी क्या है? इस का थर्मा मीटर है :- 
जाने जीव तब जागा
हरी पद रूचि ,
 विषय विलास विरागा ll
परमात्मा में रूचि हो और विषय विलास सुविधा भोगने की गुलामी ना हो तो समझो की आप जाग रहे है…
मोह  निशा सब सोवन हारा l
देख ही स्वप्ने अनेक प्रकारा ll
ये मोह  की निद्रा है .. हम असली रूप में जो है उस का पता नही …अपने को देह मानते..मिटनेवाले चीज़ों  को अपना मानते :- ये अज्ञान  है..ये माया है…लेकिन देह को, मान को असुविधा में रख के भी व्रती अपना व्रत पालन करता तो उस को आत्म संतोष होता है..श्रध्दा की पराकाष्ठा है विश्वास…विश्वास फल दायक है..

laakhon ki sankhyaa men saadhak

अथर्व  वेद के उपनिषद् में आया की :-
जहाँ श्रध्दा भक्ति वाले लोग रहेते और आत्म विचार करने वाले ज्ञान -वान  रहेते है ..  भक्ति रूपी मथनी से ज्ञान  रूपी रस्सी से भक्त ज्ञान के सिध्दांत  रूपी  रस को मथते तो  मथते मथते  नित्य नवनीत को जो समाज पाता है उस समाज का निवास स्थान मथुरा कहा जाता है…
7 तीर्थस्थान मोक्ष दायक है :
अयोध्या , मथुरा, माया , काशी , काँची अवन्तिका,पूरी .
3 दिवसीय शरद पूनम का महोत्सव का आज सुबह का सत्र पूनम व्रत धारियों के पुण्य प्रताप से बढ़ाया गया है…अभी दोपहेर को 12:40 के जहाज़ से उड़ेंगे…3:05 को अहमदाबाद पहुँचेंगे….पूनम  व्रतधारी  अन्न जल ले इसलिए मंच पर जल्दी जाएँगे…
आप की उत्पत्ति किस से हुई है?आप रहेते किस में है? और आप लीन  किस में होंगे?
ब्रम्‍ह परमात्मा से आप की उत्पत्ति हुई है..जो सत रूप है..जो चेतन रूप है, आनंद रूप है..प्राणी मात्र का सुहुर्द है..उस परबरम्‍ह परमात्मा से सारे जगत की और सारे वस्तु व्यक्तियों की उत्पत्ति हुई है…
वस्तुएँ उस को कहा जाता है जिस में अंतकरण अवछिन्न  चैत्यन्य  नही हो..और व्यक्ति , जीव उन्हे कहा जाता है की जिन में अंतकरण अवछिन्न  चैत्यन्य  हो…
इस विशेष सृष्टि व्यवस्था में जैसे आप एक हो और स्वप्ने में अनेक गाड़ी, मोटर, वस्तु , व्यक्ति बन जाते है..तो वस्तुएँ जड़ दिखती है, व्यक्ति चेतन दिखाते है …लेकिन है तो आप की अपनी अभिव्यक्ति…ऐसे ही परबरम्‍ह परमात्मा से जड़ और चेतन जगत की अभिव्यक्ति हुई है…तो सभी जड़ चेतन में परमात्मा की सत्ता मौजूद है..लेकिन हमारी नज़रिया जड़ पर जाती है और चैत्यन्य  – जो सब जड़ चेतन का आधार है उस पर नही जाती इसलिए हम दुखी है…दुखी आदमी तब तक दुखी रहेता है जब तक अपनी भूल संभाले हुए रखता है..पूनम व्रत और साधन सत्संग भूल निकालने का काम करते और भूल मिटी तो ब्राम्ही  स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष…
उस शहेंशहा का ज्ञान , शहेंशहा की स्मृति , शहेंशहा की समझ आई तो  शरीर संबंधी जो भी चिंतन अथवा भय होता है वो सब हट जाता है..
भगवान श्रीकृष्ण जिस की घोड़ागाड़ी चलाते ऐसा अर्जुन…उस  के कहे नुसार भगवान घोड़ा गाड़ी चलाते फिर भी अर्जुन का दुख नही मिटता ..भगवान ने अर्जुन को तत्वज्ञान  की भूख जगाने की कृपा की, कि  अर्जुन तू क्या जानता है?…अधी दैविक किस को कहेते है? अधी भौतिक किस को कहेते है?..अध्यात्म क्या है?
ये सारी सृष्टि जो दिखती वो 3 गुणों  के अंतर्गत है…अपने आत्म स्वभाव को जानो..वैदिक  ज्ञान  में और लौकिक  ज्ञान  में 3 गुण ही बरतते है..ये 3 गुण बदलते फिर भी जो नही बदलता तू उस अबदल सत-चित -आनंद स्वभाव में जाग….
एक ही परमात्मा देव है , उस के संकल्प से आधी देव उत्पन्न हुए..वरुण देव,अग्नि देव, वायु देव..आदि इन ५ आधीदेवों  का आधा आधा हिसा स्थूल मिश्रण कर के भौतिक सृष्टि बनी…और बाकी का शुध्द  हिस्सा में सूक्ष्म सृष्टि बनी… सूक्ष्म अंतकरण बना…तो सूक्ष्म अंतकरण में चैत्यन्य  का प्रतिबिंब दिखता है…जैसे आईने में सूर्य का प्रतिबिंब आता है, लेकिन शीला में प्रतिबिंब नही होता है…ऐसे ही जो 5 भूतों का मिश्रण है उस में तो सृष्टि बनी है…लेकिन बाकी का जो मिश्रण रहीत अंश है उन में से अंतकरण बना है..तो अंतकरण  सात्विक अंश रहा , बाकी राजस, तमस और सत्व  रहा…बड़ी उँची बात है..लेकिन मथुरा में नही मथोगे  तो कब नवनीत आएगा?…
भावना से भक्ति पैदा होती है..लेकिन भावना सदा नही टिकती…भावना जहा से उत्पन्न हो हो के विलय हो जाती उस परमेश्वर का चिंतन भी चाहिए…
भगवान अर्जुन को कहेते : उठो! जागो….महा पुरुषों से ज्ञान  प्रकाश ले लो…
महापुरुषो के पास कैसे जाए?
 बोले :  विनम्र हो कर…परीक्षा के लिए ना पूछे ..ढोंग से प्रणाम ना करो…विधि वत करो…
जिन को परमात्म तत्व का साक्षात्कार  हो गया ऐसे महा पुरुषों के पास जाओ..उन की कृपा पाओ..
तुम्हे पता ही नही की आधी भौतिक क्या है, आधी दैविक क्या है ..अध्यात्म क्या है..
अती सान्निध्य से अवज्ञा  होती है..सुना अन-सुना करता है ..तो अर्जुन को वहा ले जाता हूँ जिस में मैं सदा परितृप्त  हूँ….लेकिन ये तो अभी विराट रूप दिखाया तो भय भीत हो गया…
और पहेले पहेले विषाद योग में गिरा है..बिना ज्ञान  के दुखों का अंत नही होता है…और ज्ञान  की पवित्रता के बराबर दुनिया में कोई चीज़ पवित्र  करनेवाली नही है…
गंगाजी पवित्र  करती है लेकिन गंगा जी लोग नहाकर जो पाप डाल जाते है उन पापों का नाश होता है आत्मज्ञान  में जागे हुए महापुरुषों के चरण स्पर्श से…
नही ज्ञानेन  सदृश्यम पवित्रं  यदि विद्यते ll
ज्ञान  के समान पवित्र करनेवाला और कोई साधन नही है…जभी  जाना तभी मोक्ष…आत्मतत्व का ज्ञान  होगा उसी समय आप बंधन मुक्त होंगे…
श्रीकृष्ण  अद्भुत क्रांतिकारी अवतार है…
ईश्वर प्राप्ति की भूख नही तो भूख जगाते है..भूख जगाते जगाते बीच में सुना भी देते है की जाओ ! विधि से जाकर महापुरुषो को परिप्रश्न करो…
ततविधि प्राणिपातेन  परिप्रश्नेन   सेवया l
उपदेषिंतते ज्ञानम्  ज्ञानिनाम  तत्वदर्शी ll  
अर्जुन को और गुरु कहाँ मिलेंगे….अर्जुन थोडासा  सत्संग सुन कर चर्चा करते श्रीकृष्ण से ..अर्जुन बोला, ‘अब मैं आप का शिष्य हूँ …’
शिष्यत्व आ गया अर्थात अब मैं आप की सिख मानूँगा…आप का संकेत सुन कर अन-सुना नही करूँगा….अर्जुन सुनते सुनते युध्द  के मैदान में सत्य को उपलब्ध हुए…साक्षात्कार हो गया अर्जुन को…जो अर्जुन बोलता की मैं युध्द  नही करूँगा..ये मर जाएँगे तो मुझे पाप लगेगा.. आदि..भिक्षा माँग कर खाउंगा  .. ऐसा हो जाएगा-वैसा हो जाएगा..ना जाने क्या क्या कल्पना कर के दुखी हो रहा था  वो ही अर्जुन तत्व का ज्ञान  मिला तो भगवान को बोलता है :
नष्टो  मोह  स्मृति लब्धा ll   
मोह  माना उलटा ज्ञान  मेरा नष्ट हो गया है..मुझे स्मरण हुआ की मैं सत-चित -आनंद  सत्चिदानन्द  का अ -विभाज्य अंग हूँ…

सच्चाई तो ये है की भगवान आप को नही मार सकते… ‘नही मारेंगे’ ऐसा नही कहूँगा; नही मार सकते ! शरीर को तो भगवान ने भी नही रखा..आप भी नही रख सकते हो…भगवान सत्चिदानन्द  व्यापक विभु है…घड़े को तो कोई भी तोड़ सकेगा लेकिन घड़े के आकाश को महा आकाश भी नही मिटा सकता…वो ज्यों का त्यों रहेता है….क्यो की महा आकाश का अंग ही घटाकाश है…ऐसे ही परमात्मा का ही जीवात्मा अ-विभाज्य अंग है…समुद्र तरंग को मार सकता है , लेकिन पानी को समुद्र नही मारेगा..पानी स्वयं ही है..ऐसे ही परमात्मा की क्रिया व्यवस्था शरीरों को बदलती है…लेकिन उन के अंदर जो चिदानंद परब्रम्‍ह सत्ता है वो ज्यों की त्यों है…
तो अर्जुन को उपदेश देते देते अर्जुन ने उस उपदेश को मनन किया और अनुभूति हो गयी…

अर्जुन को अनुभूति हो गयी श्रीकृष्ण के उपदेश से…लेकिन पाटलिपुत्र  नरेश का बेटा महेंद्र कुछ  गंदी सोबत  के कारण प्रजा का शोषक और लोफरों का , गुनहगारों का पालक बनाने के कारण मंत्री ने गंभीर स्वर में राजा को फरियाद की… की जो नही बोलना चाहिए वो बोलना पड़ता है…आप के महेंद्र के नाम से सिपाही और बड़े अधिकारी भी डरते है…महेंद्र बहू बेटियों को बुरी नज़र से देखता है और उन के साथ दुष्कृत्य करने वालों में ये भी लिप्त है…ऐसे ऐसे उस के चेष्टाओं  के विषय में मंत्री ने सुना दिया…
सम्राट अशोक बोले : महेंद्र जहाँ भी हो कटहरे में खड़ा कर दो..
‘महेंद्र तुम्हारी ये प्रजा द्रोही चेष्टा ठीक से समझ में आ गयी है ..तुम में ऐसे ऐसे ऐब  है..जो देश द्रोही होता है उस को क्या  दंड दे?’
महेंद्र बोले उस के पहेले महेंद्र के पिता पाटलीपुत्र सम्राट अशोक बोले : मृत्यु दंड !
महेंद्र भी ऐसे पिता का बेटा था जो न्यायप्रिय है..जो पक्षपात रहीत है..
सम्राट अशोक बोले : मृत्यु दंड !
तब उन का बेटा महेंद्र कहेता है : ‘राजाधिराज महाराज सम्राट अशोक के चरणों में नतमस्तक है..!ऐसे न्याय प्रिय राजा का नागरिक होने के सौभाग्य से बोलने की हिम्मत होती है की हम मृत्यु दंड के लायक है..स्वीकार है…लेकिन अगर कृपा कर सको तो 7 दिन के बाद मृत्यु दंड दे..तब तक अंधेरी कोठरी में धकेल सकते है…’
‘ऐसा ही होगा’ … राज आज्ञा  हुई.
अंधेरी कोठरी में पड़ा महेंद्र 1 दिन..2 दिन..3 दिन..ऐसे 6 दिन बिताया..राजा का पुत्र फाँसी पर चढ़ेगा तो अधिकारी मंत्री सब पल पल की ख़बरे रखते थे…छटे  दिन महेंद्र ने कहे दिया जेलर को की सत्य प्रिय,  न्याय प्रिय  सम्राट से 7 दिन की भीख माँगी थी…लेकिन वो काम 6 दिन में हो गया है… अब मेरे शरीर को फाँसी दे सकते हो..लेकिन मुझे कोई नही मार सकता , मैने मृत्यु पर विजय पाया है ! मृत्यु होती –पाँच भौतिक शरीर का परिवर्तन होता है…. उसे जानने वाला मैं मृत्यु का साक्षी हूँ ….बीमारी शरीर को होती है और दुख मन में आता है….बुढ़ापा तन  का होता है..इन सब को जानने वाला मैं साक्षी ज्योति स्वरूप आत्मा हूँ….मैने अंजाने में जो सत्संग सुना था, मृत्यु के इस कारावास को मैने साधन स्थली बना ली..चिंतन किया की  मैं कौन हूँ? दुख किस को हुआ?बदलता है वो कौन है?बदलने को जानने वाला कौन है? इस में मैने गोता मारा….मैं मृत्यु पर विजय पा चुका हूँ…. 7 दिन की मोहलत माँगी थी..आज छटा  दिन है..सम्राट को निवेदन करो की अब एक दिन कम भी कर सकते है…अब मेरी मृत्यु नही होगी..मुझे फाँसी नही लगेगी!…फाँसी लगेगी शरीर को ..मैं उस का साक्षी हूँ…शरीर छुट  जाता है, चैत्यन्य  ज्यों का त्यों है…लेकिन ये पता नही होता तो हम लोक लोकांतर में भटकते..दूसरे शरीरों में जाते…. ये पता चल जाए की मैं सत-चित –आनंद ब्रम्‍ह हूँ तो ब्रम्हपरमात्मा में एकाकार हो जाता है….
अच्छे निपुण विद्वानों ने , मंत्रियों ने महेंद्र का संपर्क साधा…इंटरव्ह्यु  लिया..उन के इंटरव्ह्यु में महेंद्र खरे उतरे और उन को विश्वास हुआ की ये कोई ऐरे गैरे महेंद्रा नही है…महेंद्रा जब मरा है और तब जो जगा है ये उसी आत्म वेत्ता पुरुष के वचन है…राजा प्रसन्न हुए और महेंद्र को जाकर कहेते है की : महेंद्रा! जिस समय तुम्हें फाँसी देनी थी वो ही समय अब तुम्हारा राज्याभिषेक का है…तुम ने जो अनुसंधान किया, मंथन किया भक्ति ज्ञान  का और अपने नवनीत अपने सोहम स्वाभाव को जाना है उस में मैं तुम्हें ये पूरा राज्य तोहफे में भेट करता हूँ…!’
न्याय प्रिय , सत्य प्रिय  सम्राट को महेंद्र ने कहा की : ‘मैं ये नम्रता पूर्वक अस्वीकार करता हूँ…अब मेरे लिए इतनी ही सीमा वाला राज्य किसी काम का नही..मैं असीम हूँ..सत्चिदानन्द  हूँ ! इस शरीर का निवास गिरी होगा, गुफा होगा, एकांत आश्रम होगा..और जो अपने असलियत से च्युत हुए है उन को मार्गदर्शन देने का काम अब ये महेंद्र का शरीर करेगा…लोगों ने समझाया लेकिन महेंद्र अपने इरादे से हटा नही…संयमी व्यक्ति और दृढ़ इरादे का धनी , त्वरित निर्णय करने वाला हो तो समझो उस के बुध्दी  के विकास की उँचाई को उस ने छुआ  है…ऐसी उँचाई  को छुआ  महेंद्र… कभी नदी किनारे तो कभी पर्वत शिखरों पर, कभी गिरी गुफ़ाओं में तो कभी  उन के उपदेश से पावन होने वाले भक्तो के बीच रहेते..चीन तक भी उन के मानने वाले लोग थे..मनुष्य अपने आप में कितना पवित्र  है! ये अंतकरण अवछिन्न चैत्यन्य है..सूक्ष्म शरीर से, स्थूल शरीर से तादात्म्य   करने के कारण बेचारा संसार की गगरी बना है..तो इस गगरी से बचाने के लिए ही सत्संग, शास्त्र, भजन , कीर्तन आदि है…
वास्तव में जीव ब्रम्‍ह का सनातन अंश है…तो ब्रम्‍ह चिंतन कर के ब्रम्‍ह वेत्ता ब्रम्‍ह ध्यान में, ब्रम्‍ह चिंतन में, ब्रम्‍ह रस में , परमात्म रस में तृप्त होते है…उन्हे कोई पर्वाह   नही अब संसार के विषय विकार की..वे अपने आप में रमण करते है…
स्व  तृप्तो भवती 
स्व  अमृतो भवती
स्व  तरती,  लोकान तारिती .. ll   
उन को छूकर  जो हवाएँ जाती है ना वो भी लोगों को सात्विकता का , नीरद्वन्दता  का थोडा  बहोत  सहयोग कर देती है…जैसे हिमालय में बरफ गिरे तो टेम्परेचर कम हो जाता है देल्ही मथुरा में आदि…ऐसे ही जिस के चित्त में परमात्म शीतलता , जो अंतकरण अवछिन्न चैत्यन्य  है उस में व्यापक चैत्यन्य  को जाना तो ब्रम्‍ह स्वभाव में शीतलता  देता है…आनंद में नित्य नवीन रस में रहेता है…ऐसे ब्रम्‍ह स्वभाव में रहे हुए महापुरुषों के पास जिज्ञासु  जाए , पात्रता बढ़ती जाए और साक्षात्कार करे..एक तरीका ये है..
लेकिन इस मथुरा के देवता का कुछ  अनूठा स्वभाव है..जो इन के पास आए उस को तो निहाल करे..लेकिन इन को माने नही, इन के पास आए नही , इन से पुछे  नही फिर भी उन के अंदर जिज्ञासा  जगा के उन्हे भी जगा देते…
ये कैसा अवतार है श्रीकृष्ण का! गिरी गुफा में शांत ब्रम्‍ह होना, दूसरों को शांत ब्रम्‍ह में ले जाना ये महापुरुषों की उँचाई  तो है.. लेकिन उस में कोई कोई विरले  महा पुरुषो के महापुरुष कन्हैय्या तो ऐसे है की देखा की हम गाय चराने जा  रहे और ये माई अपने बच्चे को नहेला धुला रही है..हमारी तरफ आँख उँची कर के नही देखती…माँ  आगे  –पिछे हुई और उस का बच्चा उठा के किवाड़ के पिछे  छुपा  दिया… 
‘अरे मेरा बेटा कहाँ  गया…मेरा लाला कहाँ गया’ ..
लालो कहेता की , ‘मैं तेरो  लालो नही हूँ क्या?मेरे को ही लाला मान ले ना..मैं ही तो तेरा लाला हूँ..’
माई देखती रहे गयी की ये अजनबी कितना सुंदर है!कितना प्यारा है… बोली , ‘तुम को तो मान लूँ , लेकिन मेरो लालो कहा गयो?’
कन्हैया बोलते: ‘मेरे तेरे का फंदा छोड़  दे मैय्या!’
‘मैय्या’ कहेते ही मैय्या का दिल पसिजा..अब तो लाले को टिक टिकी  लगा के देख रही…और लाले ने उस का छिपाया हुआ लाला प्रगट कर दिया..अब तो महाराज वो बाई  और बाई  का लाला कृष्ण के भक्त हो गये….जो नही देखते उन को देखने को मजबूर कर देते ! जो नही चाहते उन को चाह पैदा कर के प्रसाद दे देते…उस अवतार का नाम है कृष्ण अवतार…जिस का बोलना,  चलना, चिन्तवन , निगाह , हरकते जीव को जगाने की होती है..आकर्षित करने की होती है..कर्षति –आकर्षति वो ही है कृष्ण !… उस तत्व में जो भी जाग जाए उन महापुरुषों में कर्षण –आकर्षण आ जाता है…और उन महापुरुषों में कोई विरले  विरले  ऐसे होते है जो कृष्ण तत्व का स्वभाव उन में छलकता  है…वे नित्य नवीन रस में तृप्त होते है..
गो – माने इंद्रिया..खुली इंद्रियों से जो ब्रम्‍ह रस पी सके उन का नाम है गोप और गोपी… तो इस मथुरा में आर्यसमाज़ी के पंडित राम शर्मा जी ने यज्ञ  करवाया..जिस में लाखो आदमी आमंत्रित थे…प्रचार प्रसार था…उन में एक बड़े धुरंधर  विद्वान थे..उन्हो ने भगवान कैसे है इस की व्याख्या किया…फिर शरणानंद के लिए 20 मिनट थे..शरणानंद  को कहा की बाबा आप बोलो…बाबा ने कहा भगवान ऐसे है ऐसे है..ये जो व्याख्या हुई ..जो दूर होता है , परे होता है, पराया होता है उन की व्याख्या की जाती है..लेकिन जो हाजरा हुजूर है, अपना आपा है उस की व्याख्या होती है की उस का प्रेम होता है की उस में विश्रान्ति होती है इस प्रश्न का उत्तर  आप सोचिए…
व्याख्या जब भी होगी दूर वाले की होगी…परे की होगी…पराए की होगी..जो हाजरा हुजूर है उस की व्याख्या क्या करोगे? उस को स्वीकार करोगे और प्रीति करो : ओम ओम ओम …ओम माना मैं मेरे प्रभु का..ओम आनंद…ओम माधुर्य …
भगवान ऐसे ऐसे है , ऐसे भले ही अपने आकर्षणों  को मिटाने के लिए थोड़ी शास्त्रीय व्याख्या कर लो, सुन लो…लेकिन वास्तव में भगवान कैसे है वहा तो चुप हो जाओगे…
सुमिरन ऐसा कीजिए खरे निशाने चोट l
मन ईश्वर में लीन  हो हाले  ना जिव्हा होठ  ll
एक ऐसी भी स्थिति आती है…
लेकिन ये कन्हैय्या तो बोलते  जिव्हा भी हिलाते जाओ, होठ  भी हिलाते जाओ..नाचते जाओ, थेपड़िया थपाते जाओ…दही दूध बेचते जाओ..लेकिन चिन्तवन  करो…
इस अवतार ने 4 रास्ते स्पष्ट किए है गीता में …
1 ) जो संयमी है , शुध्द   हो कर भगवान पाना चाहता है ऐसे औधव को कहेते है की औधव मेरा उपदेश सुना ; अब तुम सब कुछ  छोड़  कर बदरिका  आश्रम जाओ…और मुझे अंतरात्म रूप से मिलो..औधव को ये उपदेश दिया..लेकिन अर्जुन को ये उपदेश नही देते..
2 )तुम सब कुछ  लेकर आओ और सब कुछ  ले चलो…और मेरे लिए कर्म करो , मेरे से मिलो…अर्जुन की पात्रता के अनुसार उपदेश दिया …
3 ) और जो व्रतधारी है उन को कहेते की तुम ये व्रत करो..ताप करो ..शुध्द  होते हुए अपने व्यवहार को परमार्थ में,  भक्ति में,  ज्ञान  में बदलो..फिर मुझ से मिलो…साक्षी भाव से चिन्तवन  करो…
4 )  लेकिन गोप गोपियों को तो कहा तुम जैसे हो, जो करते हो, जैसा भी करते हो तुम मेरे हो- मैं तुम्हारा हूँ…बस!
ये 4 मार्ग बताए है गीता में…इन चारों में से आप को जो रूचि कर है वो कल्याणकारी है …

चैत्यन्य  महा प्रभु ने ग्रंथो का अर्थ लगाया की जो ग्रंथ को पढ़ते है, उस नियम में चलते है वे धर्मात्मा महात्मा है लेकिन जीवनमुक्त तो साक्षात परमात्म स्वरूप है…वो ग्रंथो से, वेदों से भी पार की उन की चेष्टा होती है..ऐसी पार की चेष्टा श्रीकृष्ण की थी…वे नीर-ग्रंथ थे..
भगवान अर्जुन को कहेते की  ‘वेद भी 3 गुणों  मे है, तुम तो अपने मैं को जान कर त्रिगुणातीत  हो जाओ!’
त्रिगुणातीत  कृष्ण चलते फिरते, उठते बैठते अपना आत्म रस छिटकते …और उस का प्रसाद को बाटते  रहेते ..


व्याख्या हुई की महा पुरुष अपने प्रेमी भक्त को कब नही सुनते?
बोले जब समाधि में होते तो वे नही सुनते है…अथवा उस महा पुरुष के बदले कोई कृतघ्न होता है तो अपने से प्रीति करने वाले को कुछ  नही देखता है..अथवा जो नीगुरा होता है वो अपने सेवक की सेवा का कदर नही करता ..गोप गोपियों ने उंगली उठाई कृष्ण के सामने की ‘तुम इन में से कौन हो?’ .. बोले.. नीगुरा नही, गुरु है..गुणचोर भी नही लगते फिर भी हम को छोड़  कर चले जाते हो तो आप में इन में से का कौन सा दोष है?…
श्री कृष्ण ने कहा : इस में से का कोई दोष नही..मैं समाधि में हूँ, आप का ध्यान नही रख पाता ऐसा भी नही है….नीगुरा हूँ ऐसा भी नही है….गुण चोर हूँ  ऐसा भी नही है..जो भी ये 4 बाते आई है उस में से एक भी नही हूँ..फिर भी मैं तुम से बिछड़  जाता हूँ ता की तुम  बाहर से मुझे देख कर बाहर में ही ना रहो..तुम्हारी तड़प मेरे अंतर स्वभाव में तुम्हे पहुँचा दे..इसलिए मैं वियोग भी देता हूँ…
अती सान्निध्य से अवज्ञा  हो जाती है…श्रीकृष्ण ने वृंदावन छोड़ा  तो मूड कर देखा नही है..वियोग वियोग में तड़पते तड़पते गोपिया परिपक्व हुई …औधव को गोपियों के पास भेज दिया ..औधव ने गोपियों की दशा देख कर अपने ज्ञान  की शुष्कता छोड़ी …और वो भक्ति रस सहित ज्ञान  के मार्ग  का अधिकारी  बने…

आप ईश्वर के नाम का चिंतन करो तो चिंतन करते कराते एक दिन ऐसा आएगा की चिंतन अवछिन्न चैत्यन्य  में होता है, लेकिन चिंतन  को भी जानने वाला मेरा निश्चिन्त  नारायण  पहेले भी था , अभी भी है, बाद में भी रहेगा…
ब्राम्ही  स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष…
दुष्ट चिंतन को भगाने के लिए सात्विक चिंतन,  अच्छा चिंतन करे…लेकिन एक ऐसी अवस्था भी आती है की चिंतन चित्त का धर्म है … चित्त से भी संबंध विच्छेद कर दो तो आप अभी सत्चिदानन्द  स्वभाव में साक्षात्कार कर सकते हो !

ओम शांति.
श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!
ग़लतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे….
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11th Oct 2011 ; Mathuraa sharad poonam mahotsav

ahmdaabaad aashram se darshan

Kaali Maa ki upaasanaa karanewaale  bahaadur Gadaadhar thaakun ne patni shaaradaa ko phir jeevan bhar bhogyaa nahi maanaa… ( shaaradaa ji ke pairon men un ko maa ke charanon ke darshan huye the isliye Gadaadhar thaakur arthaat Ramkrushn Paramhans..) bramhachary vrat paalate paalate kayi bramhachaari phisal jaate…lekin sree saath men patni rup men aayi aur bramhachary paalan jeevan bhar kiyaa…kaisi bhaaratiy sanskruti ki vyavasthaa hai!..ki aap ke bhaav ko badalo…

Videsh men fraaiid naam ke manovigyaanik ke sidhdaant   se gumraah ho gaye hai log…putri pitaa ki taraf aur putr maataa ki taraf kaam vikaar se aakarshit hote hai aisaa us kaa sidhdaant thaa…lekin ye fraaiid ke khud ke jeevan men huaa hogaa, aisaa sab ke jeevan men nahi hotaa..ye us ne apane ugrawaadi vaman se jo likhaa hai us se saaraa paaschaatya jagat tabaah ho gayaa… ‘sabhog se samaadhi’ ka bhaashan karane waalaa apanaa bhaarat kaa vidwaan bhi fraaiid kaa manovigyaan padhataa thaa…

Bhaaratiy sanskruti men aisaa nahi hai…dulhan ke vasra pahen ke putri jab sasuraal jaati hai saji dhaji tab pitaa ke gale lagati hai…kyaa beti men pitaa ke prati vikaari aakarshan rahegaa us samay?….athavaa pitaa kaa putri ke prati vikaari aakarshan rahegaa putri ke prati?…..nahi nahi..ye to meri laadali putri hai..ye mere pitaa hai jinhon ne mujhe janam diyaa,paal pos kar badaa kiyaa,sundar sanskaar diye…kitane kitane sundar bhaav hote hai pitaa aur putri ke ekdusare ke prati..bhaavgrahi janaardan…aap jaisaa bhaav karate vo  janaardan hari aap ko usi men madad karate hai…bhaav kaa mahatv hai…

Abhi bhi aap aaspados ko maayiyon ko vikaari najar se dekho to aap ko swapndosh ho sakataa hai..

Gadaadhar thaakur apani vivaahitaa vidhi vat ki patni men  maa kaa drudh bhaav kiye to jeevan bhar bramhachary paalan men saphal huye..kitani unchaayi hai!..aap ke antaraatmaa men kitanaa saamarthy hai!…koyi baat drdhataa se thaan lete hai to manoyog se ho jaataa hai…

Jo poonam vrat karate to aapadaaon se aur durgati se un ki rakshaa hoti hai..ye to aap ne baad men sunaa hai…

Shradhdaa purvaa sarv dharmaa phal pradaa: l

Shradhdaa sabhi dhramon ke purv men hoti hai aur manorathon ko purn karane waali phal daayini vo maataa shradhdaa hai…vedon men ‘shradhdaa sukt’ hai , us ki apani mahimaa hai….shradhdaa se sab kuchh aasaan ho jaataa hai …

Shradhdaawaan labhate gyaanam l

To shradhdaa se poonam vrat dhaari hone kaa sankalp dhar liyaa to aane men-jaane men , rupiye -paise kharchane men, suvidhaaon men , chhutti lene men aadi kayi kathinaayiyaan aati hai ..phir bhi aap kaa bhaav ye nahi hotaa ki  ‘ye musibat kahaa se aa gayi poonam’ ….yah bhaav man men aataa hai ki poonam kab aayegi…aur poonam kaa darshan kar ke naye ho ke jaate , aanandit ho ke jaate , fresh ho ke jaate …

Vraten dikshaam maapnoti l

Dikshaaam maapnoti shradhdayaa l

Shradhdayaam hari maapnuyaat ll

Aap ke jeevan men koyi na akoyi vrat honaa hi chaahiye…vrat  se aap ke jeevan men dikshaa maanaa dishaa saaph hoti hai..bhagavaan men paramaatmaa men drudh shradhdaa hoti hai aur shradhdaa drudh hoti hai to paramaatmaa kaa saakshaatkaar kayiyon ne kiyaa aur kayi us raaste par hai…to niguro ki apekshaa saadhak bahut phaayade men hai..saadhakon ki shaaririk swaasthy, maanasik prasannataa achhi raheti hai..baudhdik drudh nischay aur tvarit nirnay lene men niguron ki apekshaa saadhakon men- jitanaa pakkaa saadhak utanaa adhik prabhaav hotaa hai..

Shaastr kahete ki aap ke budhdi kaa vikaas huaa ye kaise aap jaanoge?…iishwar ke raaste thik chal rahe hai ye kaise pataa chale? …aur aap ki saadhanaa kaa vikaas huaa ye kaise jaanoge?…aap antar men jaagane ke raaste thik chal rahe ho ye jaanane ki paaraa-shishi kyaa hai? Is kaa tharmaa mitar hai :-

Jaane jeev tab jaagaa

Hari pad ruchi ,

  vishay vilaasaa viraagaa ll

paramaatmaa men ruchi ho aur vishay vilaas suvidhaa bhogane ki gulaami naa ho to samajho ki aap jag rahe hai…

moh nishaa sab sohan haaraa l

dekh hi swapne anek prakaaraa ll

ye moh ki nidraa hai .. ham asali rup men jo hai us kaa pataa nahi …apane ko deh maanate..mitanewaale chijon  ko apanaa maanate :- ye agyaan hai..ye maayaa hai…lekin deh ko, man ko asuvidhaa men rakh ke bhi vrati apanaa vrat paalan karataa to us ko aatm santosh hotaa hai..shradhdaa ki paraakaashthaa hai vishwaas…vishwaas phal daayak hai..

 

atharv ved ke upnishad men aayaa ki :-

jahaan shradhdaa bhakti waale log rahete aur aatm vichaar karane waale gyaan-waan rahete hai ..  bhakti rupi mathani se gyaan rupi rassi se bhakt gyaan ke sidhdaanto rupi  ras ko mathate matahte nitya navneet ko jo samaaj paataa hai us samaaj kaa niwaas sthaan mathuraa kahaa jaataa hai…

7 tirthsthaan moksh daayak hai :

Ayodhyaa , mathuraa, maayaa , kaashi , kaanchi avantikaa,puri .

3 divasiy sharad poonam ka mahotsav kaa aaj subah kaa satr poonam vrat dhaariyon ke punya prataap se badhaayaa gayaa hai…abhi dopaher ko 12:40 ke jahaaj se udenge…3:05 ko ahmdabaad pahunchenge….poonam vratdhaari ann jal le isliye manch par jaldi jaayenge…

Aap ki utpatti kis se huyi hai?aap rahete kis men hai? Aur aap leen kis men honge?

Bramh paramaatmaa se aap ki utpatti huyi hai..jo sat rup hai..jo chetan rup hai, aanand rup hai..praani maatr kaa suhurd hai..us parabramh paramaatmaa se saare jagat ki aur saare vastu vyaktiyon ki utpatti huyi hai…

Vastuyen us ko kahaa jaataa hai jis men antakaran avachhinn chaityany nahi ho..aur vyakti , jeev unhe kahaa jaataa hai ki jin men antakaran awachhinn chaityany ho…

Is vishesh srushti vyavasthaa men jaise aap ek ho aur swapne men anek gaadi, motor, vastu , vyakti ban jaate hai..to vastuyen jad dikhati hai, vyakti chetan dikhate hai …lekin hai to aap ki apani abhivyakti…aise hi parabramh paramaatmaa se jad aur chetan jagat ki abhivyakti huyi hai…to sabhi jad chetan men paramaatmaa ki sattaa maujud hai..lekin hamaari najariyaa jad par jaati hai aur chaityanya – jo sab jad chetan kaa aadhaar hai us par nahi jaati isliye ham dukhi hai…dukhi aadami tab tak dukhi rahetaa hai jab tak apani bhul sambhaale huye rakhataa hai..poonam vrat aur saadhan satsang bhul nikaalane kaa kaam karate aur bhul miti to braamhi sthiti praapt kar kaary rahe naa shesh…us shahenshahaa kaa gyaan, shahenshahaa ki smruti , shahenshahaa ki samajh aayi to  sharir sambandhi jo bhi chintan athavaa bhay hotaa hai vo sab hat jaataa hai..

Bhagavaan shrikrishn jis ki ghodaagaadi chalaate aisaa arjun…us  ke kahe nusaar bhagavaan ghodaa gaadi chalaate phir bhi arjun kaa dukh nahi mitataa..bhagavaan ne arjun ko tatvgyaan ki bhukh jagaane ki krupaa ki, ki arjun tu kyaa jaanataa hai?…adhi daivik kis ko kahete hai? Adhi bhautik kis ko kahete hai?..adhyaatm kyaa hai?

Ye saari srushti jo dikhati vo 3 guno ke antargat hai…apane aatm swabhaav ko jaano..vadik gyaan men aur loakik gyaan men 3 gun hi baratate hai..ye 3 gun badalate phir bhi jo nahi badalataa tu us abadal sat-chit-aanand swabhaav men jag….

Ek hi paramaatmaa dev hai , us ke sankalp se aadhi dev utpann huye..varun dev,agni dev, vaayu dev..aadi in 5 aadi devon kaa aadhaa aadhaa hisaa sthul mishran kar ke bhautik srushti bani…aur baaki kaa shudhd hissaa men sukshm srushti bani… sukshm antakaran banaa…to sukshm antakaran men chaityanya kaa pratibimb dikhataa hai…jaise aaiine men sury kaa pratibimb aataa hai, lekin shilaa men pratibimb nahi hotaa hai…aise hi jo 5 bhuton kaa mishran hai us men to srushti bani hai…lekin baaki kaa jo mishran raheet ansh hai un men se antakaran banaa hai..to antkaran saatvik ansh rahaa , baaki raajas, tamas aur satv  rahaa…badi unchi baat hai..lekin mathuraa men nahi mathoge to kab navneet aayegaa?…

Bhaavanaa se bhakti paidaa hoti hai..lekin bhaavanaa sadaa nahi tikati…bhaavanaa jahaa se utpann ho ho ke vilay ho jaati us parameshwar kaa chintan bhi chaahiye…

bhagavaan arjun ko kahete : utho! jaago….mahaa purushon se gyaan prakaash le lo…

mahaapurusho ke paas kaise jaaye?

 Bole vinamra ho kar…parikshaa ke liye naa puchho..dhong se pranaam naa karo…vidhi vat karo…

Jin ko paramaatm tatv kaa saakashaatkaar ho gayaa aise mahaa purushon ke paas jaao..un ki krupaa paao..

tumhe pataa hi nahi ki adhi bhautik kyaa hai, adhi daivik kyaa hai ..adhyaatm kya hai..

ati saannidhya se avagyaa hoti hai..sunaa an-sunaa karataa hai ..to arjun ko wahaa le jaataa hun jis men main sadaa paritrupt hun….lekin ye to abhi viraat rup dikhaayaa to bhay bhit ho gayaa…

aur pahele pahele vishaad yog men giraa hai..binaa gyaan ke dukhon kaa ant nahi hotaa hai…aur gyaan ki pavitrataa ke baraabar duniyaa men koyi chij pavitra karanewaali nahi hai…

gangaaji pavitra karati hai lekin gangaa ji log naha akar jo paap daal jaate hai un paapon kaa naash hotaa hai aatm gyaan men jage huye mahaapurushon ke charan sparsh se…

nahi gyaanen sadrushyam pavitram yadi vidyate l

gyaan ke samaan pavitr karanewaalaa aur koyi saadhan nahi hai…jabhi jaanaa tabhi moksh…aatm tatv kaa gyaan hogaa usi samay aap bandhan mukt honge…

shrirkishn adbhut kraantikaari awataar hai…

iishwar praapti ki bhukh nahi to bhukh jagaate hai..bhukh jagaate jagaate bich men sunaa bhi dete hai ki jaao !vidhi se jaakar mahaa purusho ko pari prashn karo…

tatvidhi pranipaaten pariprashen sewayaa l

updeshintate gyaanam gyaaninaam tatvdarshi ll

arjun ko aur guru kahaan milenge….arjun thodasa satsang sun kar charchaa karate shrikrushn se ..bolaa, ‘ab main aap kaa shishya hun …’

shishyatv aa gayaa arthaat ab main aap ki sikh maanungaa…aap kaa sanket sun kar an-sunaa nahi karungaa….arjun sunate sunate yudhd ke maidaan men satya ko upalabdh huye…saakshaatkaar ho gayaa arjun ko…jo arjun bolataa ki main yudhd nahi karungaa..ye mar jaayenge to mujhe paap lagegaa.. aadi..bhikshaa maang kar khaungaa .. aisaa ho jaayegaa-waisaa ho jaayegaa..naa jaane kyaa kyaa kalpanaa kar ke dukhi ho rahaa thaa  vo hi arjun tatv kaa gyaan milaa to bhagavaan ko bolataa hai :

nashto moh smruti labdhaa l

moh maanaa ulataa gyaan meraa nasht ho gayaa hai..mujhe smaran hua aki main sat-chit-aanand  satchidaanand kaa a-vibhaajya ang hun…

 

sachchaayi to ye hai ki bhagavaan aap ko nahi maar sakate… ‘nahi maarenge’ aisaa nahi kahungaa; nahi maar sakate ! sharir ko to bhagavaan ne bhi nahi rakhaa..aap bhi nahi rakh sakate ho…bhagavaan satchidaanand vyaapak vibhu hai…ghade ko to koyi bhi tod sakegaa lekin ghade ke aakaash ko mahaa aakaash bhi nahi mitaa sakataa…vo jyon kaa tyon rahetaa hai….kyo ki mahaa aakaash kaa ang hi ghataakaash hai…aise hi paramaatmaa kaa hi jivaatmaa a-vibhaajya ang hai…samudra tarang ko maar sakataa hai , lekin paani ko samudra nahi maaregaa..paani swayam hi hai..aise hi paramaatmaa ki kriyaa vyavasthaa shariron ko badalati hai…lekin un ke andar jo chidaanand parbramh sattaa hai vo jyon ki tyon hai…

to arjun ko updesh dete dete arjun ne us updesh ko manan kiyaa aur anubhuti ho gayi…

 

arjun ko anubhuti ho gayi shrikrushn ke upadesh se…lekin magadh naresh kaa betaa mahendra kuchh gandi sobat ke kaaran prajaa kaa shoshak aur lofaron kaa , gunahgaaron kaa paalak banane ke kaaran mantri ne gambhir swar men raajaa ko phariyaad ki ki jo nahi bolanaa chaahiye vo bolanaa padataa hai…aap ke mahendra ke naam se sipaahi aur bade adhikaari bhi darate hai…mahendra bahu betiyon ko buri najar se dekhataa hai aur un ke saath dushkruty karane waalon men ye bhi lipt hai…aise aise us ke cheshtaaon ke vishay men mantri ne sunaa diyaa…

samraat ashok bole : mahendr jahaan bhi ho katahare men khadaa kar do..

‘mahendra tumhaari ye prajaa drohi cheshtaa thik se samajh men aa gayi hai ..tum men aise aise aib hai..jo desh drohi hotaa hai us ko kyaa  dand de?’

Mahendra bole us ke pahele mahendra ke pitaa paatali putra samraat ashok bole : mrutyu dand !

Mahendra bhi aise pitaa kaa betaa thaa jo nyaaya priy hai..jo pakshapaat raheet hai..

samraat ashok bole : mrutyu dand !

tab un kaa betaa mahendra kahetaa hai : ‘raajaadhiraaj mahaaraaj samraat ashok ke charanon men natmastak hai..!aise nyaay priy raajaa kaa naagarik hone ke saubhaagy se bolane ki himmat hoti hai ki ham mrutyu dand ke laayak hai..sweekaar hai…lekin agar krupaa kar sako to 7 din ke baad mrutyu dand de..tab tak andheri kothari men dhakel sakate hai…’

aisaa hi hogaa… raaj aagyaa huyi.

Andheri kothari men padaa mahendra 1 din..2 din..3 din..aise 6 din bitaayaa..raajaa kaa putra phaansi par chadhegaa to adhikaari mantri sab pal pal ki khabare rakhate the…chhate din mahendr ne kahe diyaa jelar ko ki satya priy,  nyaay priy  samraat se 7 din ki bhikh maangi thi…lekin vo kaam 6 din men ho gayaa hai… ab mere sharir ko phaansi de sakate ho..lekin mujhe koyi nahi maar sakataa , maine mrutyu par vijay paayaa hai ! mrutyu hoti –panch bhautik sharir kaa parivartan hotaa hai…. use jaanane waalaa main mrutyu kaa saakshi hun ….bimaari sharir ko hoti hai aur dukh man men aataa hai….budhaapaa tan kaa hotaa hai..in sab ko jaanane waalaa main saakshi jyoti swarup aatmaa hun….maine anjaane men jo satsang sunaa thaa, mrutyu ke is kaaraawaas ko maine saadhan sthali banaa li..chintan kiyaa ki  main kaun hun? Dukh kis ko huaa?badalataa hai vo kaun hai?badalane ko jaanane waalaa kaun hai? Is men maine gotaa maaraa….main mrutyu par vijay paa chukaa hun…. 7 din ki mohalat maangi thi..aaj chhathaa din hai..samraat ko nivedan karo ki ab ek din cam bhi kar sakate hai…ab meri mrutyu nahi hogi..mujhe phaansi nahi lagegi!…phaansi lagegi sharir ko ..main us kaa saakshi hun…sharir chhut jaataa hai, chaityanya jyon kaa tyon hai…lekin ye pataa nahi hotaa to ham lok lokaantar men bhatakate..dusare shariron men jaate…. ye pataa chal jaaye ki main sat-chit –aanand bramh hun to bramhaparamaatmaa men ekaakaar ho jaataa hai….

Achhe nipun vidwaanon ne , mantriyon ne mahendra kaa sampark saadhaa…interveiw liyaa..un ke interveiw men mahendr khare utare aur un ko vishwaas huaa ki ye koyi aire gaire mahendra nahi hai…mahendra jab maraa hai aur tab jo jagaa hai ye usi aatm vettaa purush ke vachan hai…raajaa prasann huye aur mahendr ko jaakar kahete hai ki : mahendra! Jis samay tumhen phaansi deni thi vo hi samay ab tumhaaraa raajyaabhishek kaa hai…tum ne jo anusandhaan kiyaa, manthan kiyaa bhakti gyaan kaa aur apane navaneet apane soham swabhaav ko jaanaa hai us men main tumhen ye puraa raajya tohafe men bhet karataa hun…!’

Nyaay priy , satyapriy samraat ko mahendra ne kahaa ki : ‘main ye namrataa purvak asweekaar karataa hun…ab mere liye itani hi simaa waalaa raajya kisi kaam kaa nahi..main aseem hun..satchidaanand hun!is sharir kaa niwaas giri hogaa, guphaa hogaa, ekaant aashram hogaa..aur jo apane asaliyat se chyut huye hai un ko maargdarshan dene kaa kaam ab ye mahendra kaa sharir karegaa…logon ne samajhaayaa lekin mahendra apane iraade se hataa nahi…sanyami vyakti aur drudh iraade kaa dhani , tvarit nirnay karane waalaa ho to samajho us ke budhdi ke vikaas ki unchaayi ko us ne chhuaa hai…aisi unchaaii ko chhuaa mahendra kabhi nadi kinaare to kabhi parvat shikharon par, kabhi giri guphaaon men to kabhi logon men un ke upadesh se paawan hone waale bhakto ke bich rahete..chin tak bhi un ke maanane waale log the..manushya apane aap men kitanaa pavitra hai! Ye antakaran avachhinn chaityany hai..sukshm sharir se, sthul sharir se taadaatmya karane ke kaaran bechaaraa sansaar ki gagari banaa hai..to is gagari se bachane ke liye hi satsang, shaastr, bhajan , kirtan aadi hai…

Vaastav men jeev bramh kaa sanaatan ansh hai…to bramh chintan kar ke bramh vetta bramh dhyaan men, bramh chintan men, bramh ras men , paramaatm ras men trupt hote hai…unhe koyi parvaa nahi..ab sansaar ke vishay vikaar ki..ve apane aap men raman karate hai…

Swa trupto bhavati

swa amruto bhavati

Swa tarati,  lokaan taariti.. ll

Un ko chhukar jo havaayen jaati hai naa vo bhi logon ko saatvikataa kaa , nirdwandwataa kaa thodaa bahot sahayog kar deti hai…jaise himaalay men baraf gire to temprechar cum ho jaataa hai delhi mathuraa men aadi…aise hi jis ke chitt men paramaatm shitalataa , jo antakaran avachhinn chaityany hai us men vyaapak chaityanya ko jaanaa to bramh swabhaav men chitalataa detaa hai…aanand men nitya navin ras men rahetaa hai…aise bramha swabhaav men rahe huye mahaa purushon ke paas jigyaasu jaaye , paatrataa badhati jaaye aur saakshaatkaar kare..ek tarikaa ye hai..

Lekin is mathuraa ke devataa kaa kuchh anuthaa swabhaav hai..jo in ke paas aaye us ko to nihaal kare..lekin in ko maane nahi, in ke paas aaye nahi , in se puchhe nahi phir bhi un ke andar jigyaasaa jagaa ke unhe bhi jagaa dete…

Ye kaisaa awataar hai shrikrushn kaa! Giri guphaa men shaant bramh honaa, dusaron ko shaant bramh men le jaanaa ye mahaapurushon ki unchaaii to hai lekin us men koyi koyi virale mahaa purusho kemahaa purush kanhaiyyaa to aise hai ki dekhaa ki ham gaay charaane jaa rahe aur ye maayi apane bachche ko mahelaa dhulaa rahi hai..hamaari taraf aankh unchi kar ke nahi dekhati…maa aage –pichhe huyi aur us kaa bachchaa uthaa ke kiwaad ke pichhe chhipaa diyaa…

‘are meraa betaa kahaa gayaa…meraa laalaa kahaan gayaa’ ..

laalo kahetaa ki , ‘main tero laalo nahi hun kyaa?mere ko hi laalaa maan le naa..main hi to teraa laalaa hun..’

maayi dekhati rahe gayi ki ye ajanabi kitanaa sundar hai!kitanaa pyaaraa hai… boli , ‘tum ko to maan lun , lekin mero laalo kahaa gayo?’

kanhaiyaa bolate: ‘mere tere kaa phandaa chhod de maiyyaa!’

‘maiyyaa’ kahete hi maiyyaa kaa dil pasijaa..ab to laale ko tiktiki lagaa ke dekh rahi…aur laale ne us kaa chhipaayaa huaa laalaa pragat kar diyaa..ab to mahaaraaj vo baaii aur baaii kaa laalaa krushn ke bhakt ho gaye….jo nahi dekhate un ko dekhane ko majabur kar dete ! jo nahi chaahate un ko chaah paidaa kar ke prasaad de dete…us awataar kaa naam hai krushn awataar…jis kaa bolanaa,  chalaanaa, chintavan, nigaah , harakate jeev ko jagaane ki hoti hai..aakarshit karane ki hoti hai..karshati –aakarshati vo hi hai krushn !… us tatv men jo bhi jag jaaye un mahaa purushon men karshan –aakarshan aa jaataa hai…aur un mahaa purushon men koyi virale virale aise hote hai jo krushn tatv kaa swabhaav un men chhalakataa hai…ve nitya navin ras men trupt hote hai..

Go – maane indriyaa..khuli indriyon se jo bramh ras pee sake un kaa naam hai gop aur gopi… to is mathuraa men aarysamaaji ke pandit raam sharmaa ji ne yagy karavaayaa..jis men laakho aadami aamantrit the…prachaar prasaar thaa…un men ek bade dhurndhar vidwaan the..unho ne bhagavaan kaise hai ki vyaakhyaa kiyaa…phir sharanaanand ke liye 20 minat the..sharanaanand ko kahaa ki baabaa aap bolo…baabaa ne kahaa bhagavaan aise hai aise hai..ye jo vyaakhyaa huyi ..jo dur hotaa hai , pare hotaa hai, paraayaa hotaa hai un ki vyaakhyaa ki jaati hai..lekin jo haajaraa hujur hai, apanaa aapaa hai us ki vyaakhyaa hoti hai ki us kaa prem hotaa hai ki us men vishraanti hoti hai is prashn kaa uttar  aap sochiye…

Vyaakhyaa jabhi bhi hogi dur waale ki hogi…pare ki hogi…paraaye ki hogi..jo haajaraa hujur hai us ki vyaakhyaa kyaa karoge? Us ko sweekaar karoge aur priti karo : om om om …om maanaa main mere prabhu kaa..om aanand…om maadhury…

Bhagavaan aise aise hai , aise bhale hi apane aakarshano ko mitaane ke liye thodi shaastriy vyaakhyaa kar lo, sun lo…lekin vaastav men bhagavaan kaise hai wahaa to chup ho jaaoge…

Sumiran aisaa kijiye khare nishaane chot l

Man iishwar men leen ho hale naa jivhaa hoth ll

Ek aisi bhi sthiti aati hai…

Lekin ye kanhaiyyaa to jivhaa bhi hilaate jaao, hoth bhi hilaate jaao..naachate jaao, thepadiyaa thepate jaao…dahi dudh bechate jaao..lekin chintavan karo…

Yudhd ki bhumi men saakshaatkaar karaane kaa saamarthya shrikrushn ki is madhumay lilaa men thaa…

is awataar ne 4 raaste spasht kiye hai gitaa men …

1) jo sanyami hai , shudhd ho kar bhagavaan paanaa chaahataa hai aise audhav ko kahete hai ki audhav meraa upadesh sunaa ; ab tum sab kuchh chhod kar badrikaa aashram jaao…aur mujhe antraatm rup se milo..audhav ko ye upadesh diyaa..lekin arjun ko upadesh nahi dete..

2) tum sab kuchh lekar aao aur sab kuchh le chalo…aur mere liye karm karo , mere se milo…arjun ki paatrataa ke anusaar upadesh diyaa …

3) aur jo vratdhaari hai un ko kahete ki tum ye vrat karo..tap karo ..shudhd hote huye apane vyavhaar ko paramaarth men,  bhakti men,  gyaan men badalo..phir mujh se milo…saakshi bhaav se chintavan karo…

4) lekin gop gopiyon ko to kahaa tum jaise ho, jo karate ho, jaisa bhi karate ho tum mere ho- main tumhaaraa hun…bas!

ye 4 maarg bataaye hai gitaa men…in chaaron men se aap ko jo ruchi kar hai vo kalyaan kaari hai …

chaityany mahaa prabhu ne grantho ka arth lagaayaa ki jo granth ko padhate hai, us niyam men chalate hai ve dharmaatmaa mahaatmaa hai lekin jivan mukt to saakshaat paramaatm swarup hai…vo grantho se, vedon se bhi paar ki un ki cheshtaa hoti hai..aisi paar ki cheshtaa shrikrushn ki thi…nir-granth the..

bhagavaan arjun ko kahete ki  ‘ved bhi 3 guno me hai, tum to apane main ko jaan kar trigunaatit ho jaao!’

trigumaatit krushn chalate phirate, uthate baithate apanaa aatm ras chhitakaate…aur us kaa prasaad baatate rahete ..

vyaakhyaa huyi ki mahaa purush apane premi bhakt ko kab nahi sunate?

Bole jab samaadhi men hote to ve nahi sunate hai…athavaa us mahaa purush ke badale koyi krutaghn hotaa hai to apane se priti karane waale ko kuchh nahi dekhataa hai..athvaa jo niguraa hotaa hai vo apane sewak ki sewaa kaa kadar nahi karataa ..gop gopiyon ne ungali uthaayi krushn ke saamane ki ‘tum in men se kaun ho?’ .. Bole.. niguraa nahi, guru hai..chor bhi nahi lagate phir bhi ham ko chhod kar chale jaate ho to aap men in men se kaa kaun saa dosh hai?…

Shri krushn ne kahaa : is men se kaa koyi dosh nahi..main samaadhi men hun, aap kaa dhyaan nahi rakh paataa aisaa bhi nahi hai….niguraa hun aisaa bhi nahi hai….tumhaaraa vishwaas todu aisaa bhi nahi hai..jo bhi ye 4 baate aayi hai us men se ek bhi nahi hun..phir bhi main tum se bichhad jaataa hun taa ki tum mujhe baahar se mujhe dekh kar baahar men hi naa raho..tumhaari tadap mere antar swabhaav men tumhe pahunchaa de..isliye main viyog bhi detaa hun…

Ati saannidhyaa se avagyaa ho jaati hai…shrikrushn ne vrundaavan chhodaa to mud kar dekhaa nahi hai..viyog viyog men tadapate tadapate gopiyaa paripakv huyi …audhav ko gopiyon ke paas bhej diyaa ..audhav ne gopiyon ki dashaa dekh kar apane gyaan ki shushkataa chhodi…aur vo bhakti ras sahit gyaan ke maagr kaa adhikaari  bane…

 

 Aap iishwar ke naam kaa chintan karo to chintan karate karaate ek din aisaa aayegaa ki chintan avachhinn chaityany men hotaa hai, lekin chintan  ko bhi jaanaewaalaa meraa nischit naaraayan  pahele bhi thaa , abhi bhi hai, baad men bhi rahegaa…

Braamhi sthiti praapt kar kaary rahe naa shesh…

Dusht chintan ko bhagaane ke liye saatvik chintan achhaa chintan kare…lekin ek aisi awasthaa bhi aati hai ki chintan chitt kaa dharm hai … chitt se bhi sambandh vichhed kar do to aap abhi satchidaanand swabhaav men saakshaatkaar kar sakate ho !

 

Om shaanti.

Shri Sadgurudev ji Bhagavaan ki mahaa jayjaykaar ho !!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa kare….

 



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