हमारी आवश्यकता और कर्त्यव्य

चंडीगढ़ एकांत सत्संग ; 20 सप्टेंबर 2011

हरि ॐ ………….

श्वास अंदर जाये तो भगवन नाम ,श्वास बाहर आए तो गिनती …. 50 – 60 तक गिनती करे … गिनती में गलती ना हो , सतर्कता से गिनती ….. जीभ तालु में लगी रहे ….अगर 45 साल से उम्र ज्यादा है तो जीभ दातों के मूल में लगाए …

पद्मासन में बैठ कर दातों के मूल में जीभ घुमाए ऊपर और नीचे …. रोज आधा घंटा….  तो कैसा भी रोगी हो , कुछ ही समय में निरोगी होता है …

श्वासों में भगवान नाम की गिनती के प्रयोग से मुक्ति का रास्ता तय होता है ….इस में केवल स्थूल शरीर का ही नहीं , मनः शरीर का भी आरोग्य सुदृढ़ होता है , बुध्दी शरीर , आनंद मय शरीर भी इस उपासना से संबन्धित है … औषधियों से पूरा स्वास्थ्य लाभ होना संभव नहीं …अगर होता तो सभी स्वस्थ होते , औषधियाँ तो एक से एक मिलती है … एलोपथी ने जांच करने की साधनों में शीघ्रता से गति की है , फिर भी लोग पहेले के जमाने से अभी अस्वस्थ ज्यादा है … रोग भी ज्यादा है …

पहेले के लोग संध्या के समय प्राणायाम जप ध्यान करते थे … इसलिए वे बीमार भी नहीं होते , हुये तो भी जल्दी स्वस्थ हो जाते थे …दूसरी बात संयम की प्रधानता थी … अभी थोड़ा चटोरापन बढ़ गया है … तीसरी बात जितेंद्रियता का अंश अधिक था , अभी इंद्रिया लोलुपता बढ़ गयी है … एक दूसरे के प्रति काम विकार से आकर्षित होंगे …. चटोरापन में लगे रहेते … सुखी होना तो चाहते लेकिन विषय विकार और धोखा धड़ी से … तो रावण के रास्ते सुखी होने वाले समाज को सुखाभास होता है ….. असली सुख से वंचित रहे जाता है …

देवताओं ने ब्रम्हदेव की स्तुति की , निवेदन किया की रावण ने उपद्रव मचाया है , सृष्टि का संतुलन बिगड़ रहा है … तो भगवान शिव जी के पास भेजा … शिव जी ने कहा : चलो यही नारायण की स्तुति करो … नारायण कौन है ? नर –नारी का जो अंतरात्मा चैत्यन्य है वो नारायण है … नारायण की स्तुति करो…

देवताओं ने ब्रम्हा जी की आगेवानी में शिव जी की आज्ञा से भगवान नारायण की स्तुति की … नारायण प्रगट हुये … अर्थात सामूहिक संकल्प साकार हुआ ….

व्यक्तिगत संकल्प स्वपने में होता है , अथवा धारणा ध्यान से सामने आकार बात चित भी करते है, फिर देवता अन्तर्धान हो जाते है ….

तो सामूहिक सत्ता की चेतना से ईश्वर प्रगट होता है … … सामूहिक संकल्प से नारायण प्रगट हुये … देवताओं ने प्रार्थना की कि मोह रूपी रावण … मोह बोलते उलटे ज्ञान को … वास्तव में जो है वो नहीं मानते और जो नहीं है उस को मैं  मानना इस को मोह बोलते …

तुलसीदास जी ने इसी बात को कहा कि ,

मोह सकाल व्याधिन का मुला l

ताते उपजे पुनि भव शूला ll

भव शुल माना संसार की तकलीफ़े ….. और मोह बोलते उलटे ज्ञान को …. तो मोह से अहंकार हुआ …. अहंकार से वासनायें , इच्छायें, ख़्वाहिशों की परंपरा चली और इच्छा वासनाओं को पूर्ण करने के लिए दंभ की जरूरत पड़ती …. दंभ से भी वासना पूर्ति नहीं होती तो फिर हिंसा हो जाती है ….

तो आज सारा विश्व हिंसा की चपेट से जकड़ा हुआ है , और साथ साथ प्राकृतिक उपद्रवों से भी भयभीत है जैसे आतंक , बाढ़ …. अभी उड़ीसा में बाढ़ आई है …. वहा हम ने जो टीम भेजी है , नागपूर से आश्रमवासी गए है … कुछ आमदाबाद से गए , कुछ दिल्ली से गए , कुछ उड़ीसा से है … तो वहा चावल दाल बना के खिला रहे … अभी उन को कपड़े , बर्तन आदि का किट बना कर देंगे…. जरूरत मंदो को घर बना के देंगे …. तो प्राकृतिक बाढ़ भी एक तरह से प्रकृति की तरफ से दंड है …. अथवा तो पुण्यों की कमी से प्राकृतिक उपद्रव होते है … तो ये सारे दुख और उपद्रव का मूल कारण है की मोह …. मोह से अहंकार …. अहंकार से इच्छायें वासनायें ….

तो एक होती है इच्छा वासना और दूसरी होती है आवश्यकता …. तीसरी होती है जिज्ञासा …. आवश्यकता होती है शरीर के पालन पोषण की …. जैसे श्वास आवश्यक है , पानी आवश्यक है , 2 टाईम भोजन आवश्यक है …. शरीर को ढकने के लिए वस्त्र आवश्यक है … आँधी तूफान बरसात से बचाने के लिए मकान आवश्यक है … ये है आवश्यकता …. आवश्यकता आसानी से पूरी हो जाएगी …. आवश्यकता पूर्ति की व्यवस्था सृष्टि कर्ता ने अपने ही जिम्मे लिया है …. जैसे माँ के जेर के साथ बच्चे की नाभि जुड़ जाना ये आवश्यकता है …. उस में ना माँ को प्रयत्न करना पड़ता है , ना बाप को , ना बच्चे को …आवश्यकता को सृष्टि कर्ता ने अपनी व्यवस्था में लिया है … तो जब बच्चे का जन्म होता है तो उस की आवश्यकता है तैयार दूध … तो माँ के शरीर में बन जाता है …. कितना समर्थ है वो नियंता ! …कितना प्यारा है !! कितना खयाल रखता है !!! ….

हमारी आवश्यकता पूर्ति सृष्टि कर्ता के संविधान में है … हम को नाक में गड़बड़ होती है तो आक्छी आक्छी (छींके ) होता है की दिमाग के नस नाड़ियों में दोष होता है , भारी पन होता है , प्राण संचार में , रक्त संचार में  बाधा का कोई द्रव्य आ जाते है – वात-पित्त-कफ आदि तो  आक्छी आक्छी आक्छी 3 बार छींके आते ही कुछ ना कुछ दोष निकल जाता है …. नाक से निकले , मुंह से निकले , आक्छी से निकले ….

ऐसे ही मस्तक में प्राण संचार अथवा रक्त संचार में कमी पड़ती है तो जम्हाई अपने आप आ आती है, आप को देनी नहीं पड़ती … अन्न अपने आप पचता है …. पानी की प्यास अपने आप लगती है …. अंदर का शुध्दिकरण अपने आप होता है … मूत्र की नाड़ियों में मूत्र और बाकी का मल पसीने के द्वारा बाहर निकलता ही है ….  ये आवश्यक कार्य आप नहीं करते… नियन्ता की व्यवस्था करती है …. पसीना निकलना अत्यन्त्य आवश्यक है …  पिया हुआ पानी अंदर की सफाई कर के बाहर पेशाब से निकलना अत्यन्त्य आवश्यक है …. खाया हुआ माल बाहर निकालना अत्यन्त्य आवश्यक है … खून बनना अत्यन्त्य आवश्यक है…. श्वासोश्वास चलना अत्यन्त्य आवश्यक है…. ये आप नहीं करते ! नियंता ने अपने हाथ में ही ले रखा है …. आप के जिम्मे सौपता तो गड़बड़ हो जाता …. कितनी सुंदर व्यवस्था है !

रचेता की रचना देख कर , रचेता की दयालुता देख कर , रचेता की सुहुर्दता देख कर उस के प्रति सहज में ही अहो भाव , धन्यवाद ,  अपनत्व उभर जाना चाहिए ….

तो जो मुख्य आवश्यकता है वो रचेयेता ने अपने जिम्मे ले रखी है … और दूसरी आवश्यकता है थोड़ीसी निम्न दर्जे की वो रचेयेता ने पूर्ण करने की योग्यता तुम में दे दी है …. जैसे श्वास लेना आप की आवश्यकता है … तो घर से निकलते तो भोजन बना के टिफिन लेकर निकलते अथवा स्टेशन से खरीदते … पानी घर से लेते अथवा स्टेशन से भरते …. उस से ज्यादा आवश्यकता है श्वास की तो चलते फिरते कही भी ले सके ऐसी व्यवस्था है …. तो भोजन की , वस्त्र की , आवास की जो आवश्यकता है उस की पूर्ति हर एक व्यक्ति आराम से कर सकता है … रोटी सब्जी , रोटी दाल, दूध सामान्य रूप से पेट भरने की व्यवस्था थोड़े ही आयास से हो सकती है …. लेकिन 2 सब्जी चाहिए … थाली ऐसी होनी चाहिए , कटोरा ऐसा होना चाहिए …. घर ऐसा होना चाहिए – ये है वासना !

वासना पूर्ति में जीव को अहंकार – वासना – दंभ – हिंसा और फिर पतन में ले जाता है …. आवश्यकता पूर्ति करेगा तो सर प्लस होता है …. बच जाता है … जैसे मेरी आवश्यकता है भोजन , कपड़े – वो तो पूर्ति हो जाती है …. और इतना सर प्लस होता है की जहा तहा सत्कर्म कर के आई हुयी चीज का सतुपयोग कराते है … जैसे अभी उड़ीसा में भेजा या और जगह जप यज्ञ चल रहे वहा भेजा … अगर मैं वासना करूँ की मेरे को ऐसा चाहिए , ऐसी गाड़िया हो … ऐसा मेरा नाम हो तो ? … हम जहाज में भी जाते तो कम से कम किराये वाली टीकेट खोजवाते  …. 3500 , 7 हजार , 9 हजार वाली नहीं …. अभी हम दिल्ली से चंडीगढ़ आये  तो 2100 रूपिये वाली टीकेट से …. अहमदाबाद से दिल्ली आए तो 2100 में आए … तो बुध्दी दी है नियंता ने … अपनी वस्तुओं की , सामान की आवश्यकता आराम से पूरी कर सकते है …. लेकिन बीजिनेस क्लास में बैठना है , हम बड़े आदमी है – हमारे चेले हमारे आगे मत्था टेकनेवाले बीजिनेस क्लास में होते है , और हम इकोनोमी में बैठते ये अच्छा नहीं सोचे तो ये हो गया अहंकार !…

हम ने कभी बीजिनेस क्लास की टीकेट खरीदी तो एक बार …. वो भी मद्रास से अहमदाबाद की फ्लाईट में दूसरी टीकेट नहीं मिल रही थी तो बोले 50 रुपैया ज्यादा दो तो बीजिनेस क्लास की टीकेट दे देंगे … तो दे दिये थे … वैसे तो दुगुने पैसे होते है , लेकिन खाली 50 रूपिये मे मिला तो लिए … बाकी हम बीजिनेस क्लास की टीकेट नहीं खरीदते , इकोनोमी में आते है…. तो सादगी से अपनी आवश्यकता पूर्ति आप कर सकते है …. ठीक ठाक कपड़े हो … लेकिन इतने महेंगे हो , दिखावदार हो ये वासना है , अहंकार है …

बोले क्या करे? पोस्ट ऐसी है …तो गांधीजी की कैसी पोस्ट थी? फिर भी कैसे सादगी से रहेते …. लाल बहादुर शास्री जी की आवश्यकता पूर्ति में कितनी ऊंचाई थी … राम सुख दासजी महाराज , मेरे लीलाशाह प्रभुजी कितने सादे कपड़े पहेनते थे तो क्या …. कपड़े के कारण किसी पर प्रभाव डालना ये अहंकार है …. आवश्यकता पूर्ति अलग बात है … अहंकार सजाना अथवा दूसरों पर प्रभाव डालना या उल्लू बनाना ये आवश्यकता में नहीं आती…. तो आवश्यक है वस्त्र , आवास, भोजन ये आप आसानी से पूरी कर सकते है …

आवश्यकता में भी 2 विभाग है … शादी किया तो पत्नी का भरण पोषण करना ये आप का कर्त्यव्य हो गया … पत्नी और बच्चे के लिए आवास की व्यवस्था करना ये आवश्यकता हो गयी … ये कर्त्यव्य कहेलाता है … तो कर्त्यव्य की भी 3 धारा है  …

एक कर्त्यव्य है की जीव को नियंता की इतनी इतनी कृपा मिली है तो जीव नियंता से प्रीति करे … और नियंता के पद चिन्हो पे , आज्ञा पर चले …

ये उस का पहेला कर्त्यव्य है …और दूसरा कर्त्यव्य है की माँ बाप ने जन्म दिया है तो वो जब वृध्द हो गए तो उन का पालन पोषण करना हमारा कर्त्यव्य है …. पत्नी हमारे आवास की व्यवस्था देखती तो उन का स्वास्थ्य से लेकर विकास करना हमारा कर्त्यव्य है … पति के अनुकूल भोजन बिछोना आदि की व्यवस्था करना पत्नी का कर्त्यव्य है …. तो ये होता है सामाजिक कर्त्यव्य …माता पिता के प्रति , गुरु के प्रति , शिष्य के प्रति  ये कर्त्यव्य है … तीसरा कर्त्यव्य है समाज के प्रति … हम जिस राष्ट्र मे जन्म लेते उस की सुरक्षा , उस की खुशहाली और उस का मंगल चिंतन और केवल परिवार का नहीं , मोहले का , मोहले से बढ़ कर पूरे राष्ट्र का और राष्ट्र से बढ़ कर विश्व मानव का … विश्व मानव से लेकर जीव मात्र का ऐसे सब के प्रति सदभाव ये हमारा कर्त्यव्य है …. और ये वैदिक वाणी है … सर्वं शांति , अन्तरिक्ष शांति , आपाः शांति , औषधय शांति , वनस्पतये शांति , वायुमंडल में भी जो जीव जन्तु है उन के प्रति सदभाव रखना ये हमारा कर्त्यव्य है … सब सुख शांति से आगे बढ़े …. क्यों की हमारा सभी का उद्गम स्थान सतचिदानंद है …. सत माना पहेले था , अभी है और बाद में भी रहेगा , तो हम मरने से डरे नहीं और दूसरों को डरावे नहीं … हम अज्ञान में पड़े नहीं और दूसरों को अज्ञान में धकेले नहीं … हम दुखी होवे नहीं और दूसरों के लिए दुख बनावे नहीं …. ये हमारा कर्त्यव्य है … सत स्वभाव , चेतन स्वभाव , आनंद स्वभाव में स्वयं छलकना और औरों को भी अनुकूल होना ये हमारा सामाजिक कर्त्यव्य है , मानवीय कर्त्यव्य है …

तो कर्त्यव्य की  ये 3 धाराएँ है….   

आप के पास जो योग्यता है  की आप मास्टर है तो विद्यार्थियो के लिए , जज है तो वकीलों के लिए , वकील है तो लोगो के लिए , डॉक्टर है तो मरीजों के लिए उपयोगी हो … आप की जो योग्यता है वो आप ने अकेले ने नहीं निखारी है …. कयियों का सहयोग लेकर आप की योग्यता बनी है …  उसी योग्यता को दूसरों की सेवा में लगाना है …

अखंडानंदजी के पास एक आदमी आया ;

बोले की, भाई क्या करते?

तो बोले : हेडमास्टर हूँ ….

तुम्हारे स्कूल में बच्चे कितने है ?

बोले :अभी तो 30-35 है ….

मास्टर कितने है?

बोले : अभी तो मैं अकेला ही संभालता हूँ ….

तो जब और मास्टर नहीं है तो आप हेडमास्टर कैसे हो ? और मास्टर हुये तो आप हेड होंगे ….

और जज है तो आप चीफ जज होंगे ….

मण्डल में और साधु है तो आप मंडलेश्वर हुये … 1008 साधु के मण्डल के आप मंडलेश्वर हो …. आज कल तो वासना ऐसी है की 3 साधु भी है तो नाम ले लेते मंडलेश्वर बोलते …मंडलेश्वर से भी संतोष नहीं होता तो महा मंडलेश्वर …. गुरु से भी संतोष नहीं होता तो जगत गुरु बोलते …. उस से भी संतोष नहीं होता तो विश्वगुरु बोलते … ये सब वासनाओं की लीला है … अहंकार की लीला है …. अपने को बड़ा साबित करने का जो धुन चल पड़ी है वो हमारी आवश्यकता नहीं है , वो हमारा कर्त्यव्य नहीं है … और उस से हमारा भला होने वाला नहीं है …

तो भला किस से होगा ? की जो हमारी आवश्यकता है उस की पूर्ति और कर्त्यव्य पूर्ति से – इस में भी 3 धारा है – नियंता के प्रति , समाज के प्रति और परिवार के प्रति ….

तो अब देखना की खूब सूक्ष्म बात चल पड़ी है ….

अहंकार ही परेशान होता है … अहंकार ही गलत निर्णय कराता है … जिस से आदमी भगवान की नजरों से , गुरु की नजरों से , अपनी नजरों से भी गिर जाता है …. फिर मरते समय खूब पछताता है जैसे औरंगजेब पछताया मरते समय ….तो अपनी नजरों से नहीं गिरना चाहिए … भगवान के , शास्त्र के , गुरु के नजरों से नहीं गिरना चाहिए …

नामदेव जी की शादी हुयी ….  दर्जी का काम करते – कपड़े सिलते … उसी से शिधा सामान ला कर आवश्यकता पूर्ति करते….

आवश्यकता की पूर्ति कराते और ध्यान भजन कीर्तन के लिए चल पड़ते …. तो दूसरे लोगों को तरस आता था की देखो कितना कट्कसर से जीते …

(पुज्यश्री बापुजी ने नामदेव महाराज की और परिसा भागवत की कथा से यह स्पष्ट किया की नामदेव महाराज में इतनी शक्ति की गंगा जी में एक डुबकी लगाते तो ढेर सारे परिस लाकर दिखाते ; लेकिन इस से अधिक महत्व है जो परिसों का भी परिस है आत्म देव है उस का …. आवश्यकता पूर्ति से अधिक जो भी मिलता  वो सब तुकाराम महाराज और नामदेव महाराज गरीबों में बाट देते ; सादगी से जीते … जब की साक्षात भगवान उन के लिए सब कुछ करने को तैयार खड़े थे … ये कथा पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक कीजिएगा : http://wp.me/P6Ntr-Le 

सामाजिक कर्त्यव्य के नाम पर तो कई आकर चल जाते सुविधा भोग कर …. लेकिन असली कर्त्यव्य ईश्वर को प्रीति कर दिया नामदेव जी ने …तो ईश्वर का खजाना उन का हो गया …. 

ऐसे ही तुकाराम महाराज की शादी हो गयी जीजाई का भरण पोषण करना तुकारामजी का कर्त्यव्य था … 

तुकाराम महाराज  ने किसी का खेत रखा खेडने के लिए , उन की अपनी जमीन तो थी नहीं … आधा खेत वाले का आधा अपना …. तो थोड़ा गन्ना बोया … थोड़ा अनाज बोया …

राम जी की चिड़िया , राम जी का खेत

 खाले मेरी चिड़िया तू भर भर पेट… 

ऐसा कीर्तन करते… तो गाँववाले ने जमींदार को कहा की सारा अनाज तो चिड़िया चुगेगी तो तुम को मिलेगा क्या ? वो आया … बोला हर साल मेरे को इतना मण अनाज मिलता है , तुम तो सारा चिड़ियों को खिलाओगे तो मेरे को क्या दोगे ?

तो तुकाराम जी महाराज बोले , आप को हर साल मिलता है उस से एक मण ज्यादा ले लीजिये , बाकी बचेगा वो मेरा है … जमींदार बोला , बचेगा ही नहीं तो ? … बोले नहीं बचेगा तो नहीं बचेगा …. ऐसे चमत्कार होते की जमींदार अपने हिस्से का ले जाता फिर भी खूब अनाज रहेता … कभी कभार ऐसा भी हुआ की खेतवाले ने कहा की इस साल अनाज कम हुआ तो गन्ना सब मेरा है … तुम केवल एक भार ही गन्ना ले जाओ …. तुकाराम महाराज बोले : ठीक है !…. वो जानते थे की संसार की चीजे पकड़ना ये हमारा कर्त्यव्य नहीं है … ईश्वर को पाना हमारा कर्त्यव्य है … असली कर्त्यव्य पर नजर रहेती तो नकली कर्त्यव्य में भोले भगत बन जाते … तो तुकाराम जी एक बोज़ा गन्ना लेकर शाम के समय घर आ रहे थे तो कही मंदिर में आरती हो रही थी … तो तुकाराम महाराज ने बोज़ा उतार के मंदिर में रखा और आरती में खड़े हो गए …. पुजारी ने देखा की किसी भगत राज ने भेजा है तो सेवाधारियों से गन्ने के टुकड़े कर के आरती के बाद प्रशाद रूप में बाट दिया … आरती के बाद तुकाराम महाराज ने अपना गन्ने का बोज़ा कहा गया ढूंडा तो पुजारी ने बोला की हम तो समझे की किसी ने भेजा है …ये आप के हाथ में प्रशाद है व उसी का है ! …. लेकिन एक अलग से रखा है आप वो ले जाओ भगत राज …. पूरे खेत में से एक बोज़ा गन्ना मिला था , उस में से भी मंदिर गए तो केवल एक गन्ना मिला …. घर पर पत्नी ने पूछा की खेत में से क्या मिला तो बोले ऐसा ऐसा हुआ … सारी बाट बताई … जीजाई को गुस्सा आया … की ये तुम्हारी कमाई है ? क्या पालन पोषण करते तुम हमारा ? … वो ही गन्ना उठा के दे मारा उन की पीठ पे ! …. तो गन्ने के 2 टुकड़े हो गए … बोले : अरे पांडुरंगा ! कशी तुमची माया आहे …कैसे भगवान ने तुम को बुध्दी दिया की गन्ने के भी 2 टुकड़े कर दिया …आधा तेरा ! आधा मेरा !! J …. तुकाराम महाराज दुखी नहीं होते …. भगवान के भक्त हो कर दुखी होना ये उन के स्वभाव में नहीं है ….

अब जीजाई ने तो हाथ जोड़े की ये कमाएंगे और हम खाएँगे ऐसा हो नहीं सकता … जीजाई यहा वहा का काम कर के खुद ही खर्चा चलाने लगी … ये महाराज ने भी हाथ जोड़े की अब नहीं संभालेंगे खेत … सुबह पर्वत पहाड़ी पर चले जाते …  ध्यान मे बैठ जाते …शाम को घर आते … तो एक दिन ऐसे ही तुकाराम महाराज सुबह पर्वत पर चले गए …. जीजाई को खाना बना के ये महाराज के लिए ले के जाना पड़ता… तो विठ्ठल को कोस रही है की : विठ्ठल तुम ने मेरे पति का कैसा मन कर दिया …. वो बेचारे अच्छे है …मैं  इतना  डाटती …मैंने इतना गन्ना मारा लेकिन वो बेचारे मेरे को कुछ नहीं बोले ….नहीं तो पति को मारना कोई स्री का धरम होता है क्या … मैं कैसा पाप करती , वो तो बेचारे कुछ भी नहीं बोलते …. और तुम ने ही उन को खराब किया … अपना भजन करा करा के उन को कहीं का नहीं रखा …. !

ऐसा जीजाई विठ्ठल भगवान को डाटती , पैर पछाड़ते पछाड़ते पर्वत पर गयी ….

विठ्ठल ने देखा की चलो पति के लिए गहेराई में तो सदभाव है … इतने में जीजाई को एक काटा चुभा पैर में …. आहह  निकली जीजाई के मुख से …. किसी का कुछ काम कर के आटा दाल लाओ , खाना बनाओ और इन महाराज  को पहाड़ पर टिफिन देने जाओ …. और उस में भी रास्ते में पैर में शुल काटा चुभ जाये ….

अब यहा विठ्ठल ने देखो अपना कर्त्यव्य कैसे निभाया ! विठ्ठल तो अपना अंतरात्मा ही है ! जीजाई का काटा निकाला …. बोले मैं पांडुरंग हूँ …जीजाई मुंह घूमा के बैठ गयी की नहीं चाहिए मुझे पांडुरंग … तुम ने मेरा घर खराब किया … मुंह घूमा के बैठ गयी…  तो जिधर मुंह घुमाती उधर पांडुरंग दिखे …इंकार में भी आमंत्रण होता है !…

ॐ शांती ll

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करें ….     

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