अंतर तिमिर मिटाओ सद्गुरु ज्योत से ज्योत जगाओ …..

चंडीगढ़ एकांत सत्संग  ; 19 सप्टेंबर 2011

जब मोह होता है तब असलियत से व्यक्ति वंचित हो जाता है ….. सारे जीव , सारा संसार मोह मे उलझ रहा है ….

पीत्वा मोह मयी मदिरा

संसार भूतो उन्मत्त: ll

संसार ने क्या किया है – मोह मयी मदिरा पी है …. सब उन्मत्त हो गए … सुखी होने के लिए क्या क्या करते …. कितना कितना  साज सजाते …. कितना कितना गिड़गिड़ाते …. क्या क्या करते उस का वर्णन करू तो विषयांतर हो जाएगा … फिर भी बेचारे सुखी नहीं होते , निश्चिंत नहीं होते , निर्भय नहीं होते …. जनम मरण के चक्कर से नहीं छूटते ….

हिरण्य कश्यपू यूँ नजर घुमाए चारो तरफ और हाथ का संकेत करे तो जहा तक उस की नजर पड़ती वहा तक सारी धरती बिना खेड़े, बिना जोते, बिना बोए फसल से लहेराने लगती ऐसी तपस्या थी ….  समुद्र तट पर निगाहे डाले हिरण्य कश्यपू तो  समुद्र उछले …. ऐसा उछले की वो रत्नाकर जो भी उस के अंदर रत्न है उछाल उछाल कर किनारे रख देता ….  जो अंदर की आत्म ज्योति है उस ज्योति का फायदा तो लेता था तपस्या कर के ; लेकिन   ‘वो ज्योति ही मैं हूँ!’  इस का ज्ञान नहीं था तो ‘मैं हिरण्य कश्यपू हूँ, सर्व श्रेष्ठ राजा भगवान हूँ’   ऐसा मानता था ….

वास्तव में भगवान है जिस की सत्ता से भरण पोषण होता है , जिस की सत्ता से गमन-आगमन होता है , जिस की सत्ता से वाणी उठती है और जिस की सत्ता यह सब न होने के बाद भी ज्यों की त्यों रहेती है ऐसा अच्युत परमात्मा ही भगवान है …

लेकिन ‘मैं भगवान हूँ’ – ये  मोह हो गया था हिरण्य कश्यपू को …

‘मैं लंका पति रावण हूँ’  – ये मोह हो गया था रावण को …. तो देवताओं ने कहा की इन को मोह हो गया … मोह रूपी रावण  अहंकार में आ गया है … और अहंकार से वासनाये , कामनाये , भोग , इच्छाये –बाहर से अंदर सुख भरने की बढ़ती है …और उस में फिर दंभ आ जाता है ….

देखो – अंदर की ज्योति को नहीं जानने से मोह हुआ , मोह से अहंकार हुआ , अहंकार से वासनाओं का ज़ोर बढ़ा – और वासनाओं से दंभ हुआ – फिर वासना पूर्ति में कोई विघ्न आता है तो व्यक्ति हिंसक बन जाता है …. कोई वाणी से हिंसा करता , कोई भाव से हिंसा करता , कोई कैसे …. और फिर हिंसा के बदले हमारी भी हिंसा होती रहेती …. हम खुद भी ठगे जाते है … आखरी में मृत्यु हमारी हिंसा कर देता है … जनमो और मरो….

बोले ज्ञानी संतों की नहीं होती है क्या हिंसा ?

वो अपने शरीर को  ‘मैं’  मानते ही नहीं तो मृत्यु भी उन के आगे दास हो जाती है … ज्ञानी का संकल्प होता है की विलय हो जाये तब मृत्यु उस समय आती …. ज्ञानी की जबरन मौत नहीं होती ….

ब्रम्ह्ग्यानी संग धरमराज करे सेवा l

ब्रम्ह्ग्यानी बैठते तो यमराज सेवा करते …. मैंने कई बार बताया की मेरी नानी मर के यमराज से मिल कर निर्भयता से पूछताछ कर के फिर जिंदा हो गयी थी ; उस के बाद 39 साल जीवित रही …. हालाकी ये कोई साक्षात्कार नहीं है , लेकिन ओंकार के साथ गुरु मंत्र  का जप करती तो निर्भय थी … दूसरे लोग मरते समय भयभीत हो जाते … किसी को किए हुये पाप सताते मरते समय …. रखी हुयी अमानत भी भटकाती है मरते समय ….. अधूरा काम भी मरते समय पश्चाताप कराता है …. लेकिन जो ज्योतिशामपी ज्योति के करीब जाता है उस को ऐसा सब नहीं होता ….

तो मोह रूपी रावण अहंकार ग्रस्त हुआ …. अहंकार से वासना आई … वासना से दंभ हुआ और दंभ से हिंसा हुयी … और अंत में विनाश हुआ …. तो

मोह सकल व्याधिन कर मुला … इसलिए साधक प्रार्थना करता है की हिंसा , दंभ , वासना , अहंकार , मोह ये सब हटाने पर साधक प्रार्थना करता है की ज्योत से ज्योत जगाओ …

भगवान वशिष्ठ जी सुमेरु पर्वत पर काग भूषण्डी के पास गए … काग भूषण्डी जी चिरंजीवी है – कई प्रलय आए फिर भी ज्यों के ज्यों …  बोले : कई बार भूकंप आए , कई बार पृथ्वी कही की कही चली गयी लेकिन मेरा सुमेरु अविचल रहा …. मैं प्राण कला का चिंतवन करता हूँ … श्वास अंदर जाये – ‘सो’  ;  बाहर आता है तो ‘हम’ – सोहम – श्वास अर्थात प्राण अंदर जाता है तो शीतल होता है : पान  , बाहर आता है तो उष्ण होता है : अपान …. पान-अपान की गति से शरीर में गरमी पैदा होती है … इसी से शरीर की रक्त वाहिनिया संचालित होती है … मैंने प्राण कला का अनुसंधान कर के मैंने अपने मन बुध्दी को आत्मा मे स्थित किया … ज्योति कहो – आत्मा कहो वोही है …. इस से मैं  सुख पूर्वक जीता हूँ … जहां मैं  रहेता हूँ वहा इस सुमेरु पर्वत पर सव्वा योजन तक कलियुग यहा नहीं आता  …

तो आत्म ज्योति मे जो भी जोगी स्थित है वो कही भी रहेते हो वहा सव्वा योजन / कही सव्वा माईल तो कही सव्वा फर्लांग तो कही सव्वा हजार गज – जितना जितना वो महापुरुष उस आत्म ज्योति में स्थित होता है वो जगह तीरथत्व में बदल जाती है ….

जैसे गंगोत्री से गंगा जी चलती है , तो गंगा तो गंगा है  लेकिन गंगाजी का महत्व कुम्भ के दिनों में पर्व के दिनों में हरिद्वार में  जितना है उतना हरिद्वार के ऊपर अथवा हरिद्वार के नीचे नहीं माना जाता …. हरिद्वार में भी कई साधुओं के गंगाजी के किनारे आश्रम है , धर्मशाला है फिर भी वे लोग हर की पौड़ी पर आ कर नहाते है …. क्यो की वहा मान्धाता राजा परमात्मा के ज्ञान में ज्योतियों की ज्योति सोहम के जाप में स्थित हुआ था …. ब्रम्हा जी प्रगट हुये थे तो मांधाता जी ने वरदान मांगा था की यहा पर जो कोई नहाये तुरंत आनंदित हो जाये … और इस जगह का नाम ब्रम्हकुण्ड रखा जाये … तो हर की पौड़ी ब्रम्ह कुण्ड है , वहा गंगास्नान का विशेष महत्व है …

तो ये ज्योतियों की ज्योति आत्मा सत रूप है … सत उसे कहेते जो सदा रहे … वो चैत्यन्य है- चित रूप है वहा आनंद होता है …इस ज्योतियों की ज्योति की सत्यता विवेक से समझ में आ जाये …. शरीर नहीं था तब भी हम थे , अब भी है और शरीर मरने के बाद भी हम रहेते  तो हम ‘सत’ हुये ; जो सत है वो चेतन है ये भी विवेक से समझ ले की हाथ को पता नहीं की मैं  हाथ हूँ –लेकिन हमारी चेतना से हाथ उठता है तो हम चेतन है …. ये मकान को , डेस्क को , माईक को पता नहीं की मैं माईक हूँ लेकिन चेतन को पता है की ये माईक है …. तो जो सत है , चित है , वो आनंद स्वरूप भी है … ज्ञान से आनंद का संबंध है … मुंह खुला है और नींद आ गयी , नींद में किसी ने मुंह मे रसगुल्ला डाल दिया तो  जब तक ज्ञान नहीं हुआ तो स्वाद नहीं आयेगा … कोई महान व्यक्ति है , आप के सामने बैठा है , आप उस को मिलना चाहते है , उस का नाम आप ने सुना है लेकिन फोटो नहीं देखी तो वो व्यक्ति सामने बैठा है फिर भी आनंद नहीं आयेगा … जब परिचय होगा – ज्ञान होगा तब आनंद आयेगा …

 सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रम्ह l

सत है , ज्ञान है , अनंत है , ब्रम्ह है ऐसा ज्योति स्वरूप अपना आत्मा है … वास्तव में अपन वो ही है …वास्तव में अपन सत-चित – आनंद ब्रम्ह है … लेकिन मानते है की मैं असत जड़ दुखरूप शरीर को…यही मोह है…  मोह से फिर अहंकार …अहंकार से वासना … वासनाओं से न जाने क्या क्या करते … पढ़ाई लिखाई … बी टेक , एमबीए , ये वो …. कुल मिला कर सुखी रहेने के लिए क्या क्या सर्ट्फिकेट, जॉब करते…. इस से सुविधा तो हासिल कर लेते लेकिन जब रिटायर होते तो कोई मानता नहीं … फिर वो ही रोना धोना चालू …रोते रोते ही मरते… मर गए तो समशान में ले जाते … वहा भी भटकते …शरीर में आना चाहते , लेकिन नहीं आने देते- शरीर को तो जला देते … फिर किसी के गर्भ में गए … तो दुख तो नहीं मिटा ना …. कौन से गर्भ में जाएँगे कुछ पता नहीं …. राजा नृग मरने के बाद गिरगिट हो गया … सम्राट भरत हिरण हो गया …. मुसोलिन मरने के बाद झील के किनारे प्रेत हो कर भटक रहा …. प्रेसिडेंट ऑफ अमेरिका अब्राहिम लिंकन मरने के बाद व्हाईट हाउस में बेचारा देखा जाता है भटकते  …. जब तक ज्योतियों की ज्योति आत्मा को मैं रूप में नहीं मानते तब तक ज्ञान नहीं होता , तिमिर नहीं मिटता …

अंतर तिमिर मिटाओ सद्गुरु ज्योत से ज्योत जगाओ …..

हम बालक तेरे द्वार पे आए ….. हम कुछ विशेष हो कर आए तो ज्ञान पचेगा नहीं …इसलिए बालवत-  बच्चे को जैसा समझाओ ऐसा समझ जाता, मोड़ो तो मूड जाता ऐसे हम को आप समझाओ … ज्योति स्वरूप परमात्मा का ज्ञान दो …. हे योगेश्वर , हे ज्ञानेश्वर , हे सर्वेश्वर …. निज कृपा बरसाओ ! …रूपिये पैसों की कृपा नहीं …. दुनिया के विज्ञान की कृपा नहीं …. अपने सोहम स्वभाव की कृपा बरसाओ …. मंगल दरश दिखाओ सद्गुरु ज्योत से ज्योत जगाओ ….. शीश झुकाये करे तेरी आरती …प्रेम सुधा बरसाओ …. वो ज्योति प्रेम स्वरूप है …. आनंद स्वरूप है …. शुध्द स्वरूप मे है तो … प्रेम जब पैसों में फसता तो लोभ हो जाता , प्रेम जब विकारो में फसता तो काम हो जाता है … प्रेम जब अपने आप में हो जाता है तो परम आत्मा ही प्रेम स्वरूप है … साची ज्योत जगे जो हृदय में सोहम नाद जगाओ …. मैं वो ही हूँ ऐसा अनुभव कराओ …अंतर में युग युग से  सोयी चित्शक्ति को जगाओ …. वो चैत्यन्य शक्ति जिस से ज्योतियों की ज्योति की मदद लेकर चिदशक्ति चिदावली मे स्फुरना होता है …. स्फुरने से मन , मन से इंद्रिया और इंद्रिया से संसार मे जाते  …. संसार का सार शरीर है … शरीर का सार इंद्रिया है , इंद्रियों का सार मन है … मन का सार बुध्दी है …बुध्दी का सार जीव है … जीव का सार चिदावली है … चिदावली का सार चित्शक्ति है …. चित्शक्ति का सार ज्योतियों की ज्योति सोहम स्वभाव है ….

जीवन में श्रीराम अविनाशी ….. जो रोम रोम में रम रहा है वो चिद्घन चैत्यन्य अविनाशी है … चरणन शरण लगाओ …. तो चरण शरण कैसे ?

एकनाथ जी कहेते : भगवान आप ने कहा मेरी शरण आओ … तो आप बताओ आप की शरण कहाँ है ? मंदिर में आप का जो विग्रह है उस के पैर पकड़ना आप की शरण है तो मैं अभी पकड़ता हूँ … साधु बनना आप की शरण है तो मैं  साधु बन जाता हूँ … जटा रखना आप की शरण है तो मैं जटाधारी  बन जाता हूँ … गृहस्थी का बोज़ा उठाना आप की शरण है तो मैं अभी संसारी पिट्ठू हूँ ऐसा ही रहूँ महाराज …. आप बताओ आप की शरण कहाँ है …. खोजते खोजते शांत हो गए …

दृष्टि ज्ञानमय कृत्वा पश्चेत हरीमेव जगत

जगी सर्व सुखी असा कोण आहे ?

मना तुम्ही शोधूनी पाहे ll

जगत में पूर्ण रूप से सुखी कौन है ?  ऐसा खोजे तो खोजते खोजते जिस को खोजते थे वो ही हो गए …. बाद में लेखनी में आया :  दृष्टि ज्ञानमय कृत्वा पश्चेत हरीमेव जगत l

नानक जी भी यही कहेते :

मन तू ज्योति समान अपना मूल पहेचान l घर विच आनंद भरपूर , मन मुख स्वाद न पाया ll

कूर कपट ये सब दंभ वासना करवाती है … आत्म साक्षात्कार के बिना कोई दंभ छोड़ के बैठा हो ये मैं स्वीकार नही करता …. मोह होता तो दंभ हो ही जाता … कितने भी आदर्श पति पत्नी हो एक दूसरे से कुछ न कुछ छुपाते , वफादार नोकर सेठ से छुपाएगा ….ये दंभ है …. मोह से अहंकार , अहंकार से वासना और वासना से दंभ …. वासना मिटी  तो दंभ मिटा ….  इसलिए मोह मिटा दो …अहंकार मिटा दो … अहंकार मनुष्य से क्या क्या कराता है …..

भुला जभी आपनु तभी हुआ खराब l

अपने सोहम स्वभाव को भुला तो खराब हुआ …. शरीर को कितना भी संभालो , सजाओ, सवारों …. ऐसा नहीं की सब सुविधा हुयी तो आप ब्रम्ह हो गए …. जरा असुविधा हुयी तो कराहने लगे तो ये कोई ब्रम्ह ज्ञान नहीं ….कैसी भी अवस्था आए …. खिन्न होते हुये भी खिन्न नहीं होते …. रुष्ट होते हुये दिखते हुये भी अंदर से रुष्ट नहीं होते ….सदैव अपने सोहम स्वभाव में स्थित होते है ….

ब्रम्ह ज्ञानी की गत कौन बखाने

नानक ब्रम्ह ज्ञानी की गत ब्रम्ह ज्ञानी जाने ….

ब्रम्ह ज्ञान में जगना बहुत ऊंची बात है …. ऊंचे से ऊंचे भगवंत से एकाकार होना है ….

ओ ————— म्म……

ॐ शांती

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे …..  

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2 Comments on “अंतर तिमिर मिटाओ सद्गुरु ज्योत से ज्योत जगाओ …..”

  1. Subrat Singh Says:

    hari om….!!!!!!!!!!!!!!11

  2. subhash chander Says:

    jai siya ram jai jai siya ram hari hari hari om

    sadhu vad hai hindi main type karne ke liye

    jai jai siya ram narayan hari narayan hari

    jai bapu ji


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