Dhyan Satsang

11th March 2009, Surat Satsang

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Sant Shiromani Param Pujya Shri Asaramji Bapu ki Amrutwani

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 For Hinglish please scroll down

जय सिव शंकर कशी विश्वनाथ गंगे..कश्मीरी बापू का सत्संग चाहते  काश्मीर  में ..प्रभु कश्मीरियों पर कृपा करे..हरी ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ राम राम राम राम ..सिव सिव सिव सिव..(शिव नहीं बोलना , सिव बोलना  !) ..

जय सिव शंकरकासी विस्वनाथ..हा हा हा हा हा..

(सदगुरुदेव जी भगवान हास्य कराये..)

 

 

नारायण नारायण नारायण नारायण

 

दिव्य प्रेरणा पुस्तक नहीं पढ़ा तो तुमने कुछ भी नहीं पढ़ा..जरुर ले जाना बहोत फायदा होता है..

 

 

आरती हुयी..

 

प्रार्थना हुयी..

 

हरि हरि ओम्म्म्म्म्म्म्म्म

 

धुप के वातावरण में लंबा श्वास भरोकमर सीधी , गर्दन सीधी ..ललाट में ओमकार का दर्शन करो और मन में ओमकार स्वरुप ईश्वर का रटन करो..जो करूणावरूणालय है..जो हमारी बुध्दी को शुध्द करते है..ज्ञान मुद्रा में बैठना  चाहिए ..जीभ तालू में लगाके रखना चाहिएजीतनी देर श्वास रोकते उतनी देर मूल बंध,  उडियान बंध और जालंधर बंध ये  ३ बंध लगे..

 

ओमकार स्वरुप ईश्वर का जप करो..और ललाट में ओमकार को प्रकाशरूप में देखो और ईश्वर का प्रकाश प्रगट करो..

 

प्रार्थना करे :

तुम प्रकाशमय हो! तुम ज्ञानमय हो! तुम चैत्यन्यमय हो! तुम मेरे आत्मा होकर बैठे हो!!म्हारा वालुडाआनंद देवामाधुर्य देवाप्रभुजी देवाप्यारे जी देवा….शान्ति ..ॐ शान्ति…’

 

 

सुख और भगवत शक्ति संचित करना हो तो ध्यान बहोत जरुरी है..

 

श्वास रोका मन में ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ-स्वरुप प्रकाशमय प्रभु को देखाफिर श्वास बाहर छोड़ा..बाहर रोका 40 सेकंड और पेट अन्दर दबाके रखाऔर वो ही ॐ-स्वरुप ईश्वर का रटनऐसा ५ बार करो..

 

ॐ ॐ माधुर्य..ॐ ॐ प्रभुजीध्यान में कर्तापन रहेगा..प्रेम करो ईश्वर सेशान्तिभीतर ही भीतर मुस्कुराते जाओ..अन्दर ही अन्दर हसते जाओ..ध्यान मत करो..जोर मत मारो..कोई नई स्थिति बनाओ मतजो है , सो है..ॐ आनंद आनंद..

 

प्यारे जी ॐ ॐ ..मेरे जी ॐ ॐ आनंद ॐ ॐ माधुर्य ॐ ॐ ….ॐ ॐ शान्ति..ॐ शान्ति..

 

..दुःख देने वाले अनेक है..लेकिन दुःख हरनेवाला एक है..

धोका  करनेवाले  अनेक है, लेकिन सुरक्षा करनेवाला एक काफी है..

 

काम धोका करता है..पति-पत्नी के शरीर में सुख दिखाता है..थोडी देर में थका के बेहोश कर देता है… …

क्रोध धोका देता हैइस को डांटे बिना काम नहीं चलेगाजलाकर थका देता है..

लोभ धोका देता है..

मोह धोका करता है..

चिंता धोका करती है..

लेकिन चिंता आई हम दुखी हो गए, चिंता गई हम शांत..

क्रोध आया हम अशांत हो गए, क्रोध गया तो हम शांत !

काम आया तो हम कामी, काम गया तो हम शांत..

तो शांत स्वरुप परमात्मा हमारे साथ सदा रहेता है..

 

काम आता है जाता है, क्रोध आता है जाता है, मोह आता है जाता है, लोभ आता है जाता है..रक्षक सदा रहेता है..

ये लुटेरे आकर लूट जाते , फिर भी  पोषक पोसता रहेता है..

इन लोफरो से हम ठगे जाते और वो पोषक हमे रोज रात को पोसता रहेता है नींद मेंपोषक में डंटे रहे  बास्! फिर खाए, पिए लेकिन आसक्ति नहीं..

 

..ॐ शान्ति..ॐ आनंद..माधुर्य..ॐ प्रभुजी..ॐ प्यारे जीॐ ॐ ॐ .. होठो में जपोफिर कंठ में जपो….फिर ह्रदय में जपो..

 

प्रिती पूर्वक जपो..

 

भजताम प्रितिपुर्वकम l

ददामि बुध्दियोगम तं l

ये माम उप्यान्तिते..ll

 

उसे मैं बुध्दियोग देता हूँ..

 

ॐ शान्ति..ॐ आनंद..ॐ माधुर्य..ॐ प्रभुजी….

ओम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म..

ॐ ॐ हरि ॐ ॐ .. ॐ हरि ॐ ॐ ॐ ..

 

ॐ ॐ

नारायण नारायण नारायण नारायण

 

(श्री योग वशिष्ठजी (महारामायण) का पठन हो रहा है..)

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब यदि अविद्या से उपजा है तो वह निवृत्त किस भाँति होती है ?

वशिष्ठजी बोले हे रामजी ! जैसे बरफ की पुतली सूर्य के तेज से क्षण में नष्ट हो जाती वैसे आत्मा के प्रकाश से अविद्या नष्ट हो जाती है । जब तक आत्मा का दर्शन नहीं होता तब तक अविद्या मनुष्य को भ्रम दिखाती है और नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त कराती है “

गुरुदेव :

जब तक आत्मा की महानता नहीं जानते तब तक संसार का आकर्षण जिव को भटकाता हैअपनी आत्मा की महानता जानो तो आत्मा सुखरूप है..आनंदरूप है..चैत्यन्यरूप है..शाश्वत है..उस की कभी मृत्यु नहीं होती..संसार टिकता नहीं  और आत्मा मिटता नहींफिर काहे को दुखी होना?

मैं दुखी हूँ ..मैं दुखी हूँतो जो दुखी होता है वो शरीर है..उस को मैंमानकर परेशान हो रहे..कुछ हुआ तो हुआ ..इसी का नाम तो संसार है..बन बन के बिगड़ता ही हैटेंशन क्यो लेना?…(होता है..चलता है..कर के आगे बढे..) आनंद ..शान्ति..

 

 

 पर जब आत्मा के दर्शन की इच्छा  होती है तब वही इच्छा मोह का नाश करती है ।”

 

गुरुदेव : 

जब आत्मा परमात्मा को पाने की इच्छा होती तो दुसरे दुर्गुणों को स्वाहा कराती है..भगवान को पाने की इच्छा दूसरी दुष्ट इच्छाओ को हर लेती है..भगवान को पाने की  इच्छा सदगुण ले आती है..और संसारको पाने की इच्छा दुर्गुण , दुराचार, कपट, बे-इमानी ले आती है..

 

भगवान को पाने की जीतनी इच्छा तीव्र होगी उतना वो सज्जन बनेगा..श्रेष्ठ बनेगा..दुखो से बचेगा..

और संसार को पाने की जीतनी इच्छा तीव्र होगी उतना वो हेराफेरिवाला बनेगा..और दुःख बनानेवाला बनेगादुःख_मेकर बनेगा

 

 

 जैसे धूप से छाया क्षीण हो जाती है वैसे ही आत्मपद की इच्छा से अविद्या क्षीण हो जाती है

धुप से छाया चली जाती है ..ऐसे ही ईश्वर पाने की इच्छा से अविद्या और दुष्ट वासनाये धीरे धीरे ख़तम हो जाती है..और सर्वगत देव आत्मा के साक्षात्कार होने से नष्ट हो जाती है ।

 हे रामजी ! दृश्य पदार्थों में इच्छा उपजने का नाम अविद्या है और उस इच्छा के नाश का नाम विद्या है ।”

गुरुदेव :

संसारी इच्छा पुरी कराने का नाम ही अविद्या है और वो इच्छा पुरी हो गई तो विद्या है..

नहीं चाहते तो भी रोग होता है..नहीं चाहते तो भी दुःख आता है..नहीं चाहते तो भी यश होता है..नहीं चाहते हुए भी अपयश होता है..कोई चाहता है क्या अपयश आवे?तो भी आता हैअपयश मिला तो दुखी हो जाओ..क्या करे , होता है ..जान लिया की होता है बास्!मौज हो गई..टेंशन टेंशनक्यों? परेशान होने का धंधा

 

उस विद्या ही का नाम मोक्ष है । अविद्या का नाश भी संकल्पमात्र है । जितने दृश्य पदार्थ हैं उनकी इच्छा न उपजे और केवल चिन्मात्र में चित्त की वृत्ति स्थित हो-यही अविद्या के नाश का उपाय है ।”

गुरुदेव :

 संसार के आकर्षण टूट जाए..आत्म पद में विश्रांति मिले ये ही परमात्म प्राप्ति का राजमार्ग है..

ऐसा बनू..ऐसा पाऊइसी से परेशान होते..

रात को क्या करते?..क्या बनते?…क्या पाते?..फिर भी कितनी शान्ति रहेती….

ऐसा करू..ऐसा पाऊ ..इसी से दुःख पैदा होते..पाने की,  करने की सब इच्छा छोड़ दे..अगर पाना है तो ईश्वर को पाना है.. बास्!

तो सारे दुःख मिट जायेंगे चटाक से..

मैं  डॉक्टर बनू..फलाना बनू..मैं धिंगणा बनू..बन बन के भी टेंशन तो गया नहींदुःख तो मिटा नहींमेंढक काटे..मुर्दे काटे फिर भी दुःख नहीं मिटाअपने अज्ञान को काट ले बास्!

 

जोगी रे हम तो लुट गए   ..ये भजन जिस ने नहीं सुना हाथ ऊपर करो..नहीं सुना तो कैसेट ले लेना स्टाल से..

 

 

 

जब सब वासना निवृत्ति हों तब आत्मतत्त्व का प्रकाश होवे ।”

गुरुदेव :

सभी वासना की निवृत्ति होती तो निर्वासनिक नारायण प्रगट होते है ..तो बोले रात्रि को तो वासना नहीं है, फिर नारायण क्यो प्रगट नहीं होते?..वासना दबी हुयी है, निवृत्त नहीं हुयी..

रात को वासना दब गई तो तुम भी दब गए तमोगुण में..सुनसान हो गए..

 

जैसे रात्रि के क्षय होने से सूर्य प्रकाशता है वैसे ही वासना के क्षय होने से आत्मा प्रकाशता है । जैसे सूर्य के उदय होने से नहीं विदित होता कि रात्रि कहाँ गई वैसे ही विवेक के उपजे नहीं विदित होता कि अविद्या कहाँ गई ।”

गुरुदेव :

जैसे सूर्योदय होने से पता ही नहीं चलता की रात कहा गई,  ऐसे आत्मा परमात्मा का ज्ञान का, विवेक का  उदय होने से पता ही नहीं चलता की अविद्या और दुःख कहा चले गएबास् !  ईश्वर को पाने की इच्छा करो और संसार को पाने की वासना हटाते जाओ..इतना महान बनेगा की करोड़-पति अरबो-पति कुछ भी नहीं..

 

 

 हे रामजी मनुष्य संसार की दृढ़ वासना में बँधा है । और जैसे संध्याकाल में मूर्ख बालक परछाहीं में वैताल कल्पकर भयवान् होता है वैसे ही मनुष्य अपनी वासना से भय पाता है ।”

गुरुदेव :

संध्याकाल में बच्चा परछाई में भुत देखे अथवा आईने में अपने को देखे और आकर्षण करे..अथवा आकाश में देवताओं की बरात देखे..तो ख़ुद ही कल्पनाओ में उलझता है ..ऐसे ही वासनाओ से ख़ुद ही संसार में उलझता है..

आत्मा को पाने की इच्छा करे तो वासनाये शांत होगी..शांत आत्मा ..महान आत्मा…!

इतना पहेले नहीं पढ़ते थे..ऐसे ही बोल के इलाज कर लेते थे..संत लोग अभी भी कहा इतने डॉक्टरी पढ़ते है..फिर भी शांत हो के उपाय बताते तो सामनेवाले ठीक हो जाते

पोथे पढ़ पढ़ के टाल के बाल भी घिस गए बेचारो के….नौ-जवानों के..

 

 

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह सब दृश्य अविद्या से हुआ है और अविद्या आत्मभाव से नष्ट होती है तो वह आत्मा कैसा है ?

वशिष्ठजी बोले, चैत्योन्मुखत्व से रहित और सर्वगत समान और अनुभव रूप जो अशब्दरूप चेतन तत्त्व है वह आत्मा परमेश्वर है । हे रामजी !ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जगत् सब आत्मा है और अविद्या कुछ नहीं । हे रामजी ! सब देहों में नित्य चेतनघन अविनाशी पुरुष स्थित है, उसमें मनो नाम्नी कल्पना अन्य की नाईं होकर भासती है, पर आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं । हे रामजी ! कोई न जन्मता ,न मरता है और न कोई विकार है, केवल आत्मतत्त्व प्रकाश सत्तासमान, अविनाशी, चैत्य से रहित, शुद्ध, चिन्मात्रतत्त्व अपने आपमें स्थित है अनित्य, सर्वगत, शुद्ध, चिन्मात्र, निरुपद्रव, शान्तरूप, सत्तासमान निर्विकार अद्वैत आत्मा है | “

 

नारायण हरी..

 

अच्युताय गोविन्दाय अनंताय नाम भेषजाम l

 नश्यन्ति सर्व रोगाणी सत्यम सत्यम वदाम्यहम ll

 

हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ

नारायण नारायण ..

हरी ॐ शान्ति.

 

हरि ॐ!सदगुरुदेव जी भगवान की जय हो!!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे….

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Jay siv shankar kashi vishwanath gange..kashmiri bapu ka satsang chahate kashmir me ..prabhu kashmiriyo par krupa kare..hari om om om om om …ram ram ram ram ..siv siv siv siv..(shiv nahi bolana  🙂 siv boalana!) ..

jay siv shankar…kasi viswanath..ha ha ha ha ha.. 🙂

(sadgurudev ji bhagavan hasy karaaye..)

 

 

narayan narayan narayan narayan

 

divy prerana pustak nahi padha to tumane kuchh bhi nahi padha..jarur le jana bahot phayada hota hai..

 

 

aarati huyi..

 

prarthana huyi..

 

hari hari oooooooommmmmmmm

 

dhup ke vatavaran me lamba shwas bharo…kamar sidhi , gardan sidhi ..lalaat me omkaar ka darshan karo aur man me omkaar swarup ishwar ka raTan karo..jo karunavarunaalay hai..jo humaari budhdi ko shudhd karate hai..gyan mudra me baithana chahiye..jibh taalu me lagaake rakhana chahiye…jitani der shwas rokate utani der mul bandh, udiyaan bandh aur jalandhar bandh – ye  3 bandh lage..

 

omkar swarup ishwar ka jap karo..aur lalaat me omkar ko prakashrup me dekho aur ishwar ka prakash pragat karo..

 

prarthana kare :

‘tum prakashmay ho! tum gyan may ho! tum chaityany may ho! tum mere aatma hokar baithe ho!!mhara waluda…aanand deva…madhury deva…prabhuji deva…pyare ji deva….shanti ..om shanti…’

 

 

sukh aur bhagavat shakti sanchit karana ho to dhyan bahot jaruri hai..

 

shwas roka …man me om om om om om-swarup prakashmay prabhu ko dekha…phir shwas baahar chhoda..baahar roka 40 second aur pet andar dabaake rakha…aur vo hi om swarup ishwar ka raTan…aisa 5 baar karo..

 

om om madhury..om om prabhuji…dhyan me karta pan rahega..prem karo ishwar se…shanti…bhitar hi bhitar muskuraate jaao..andar hi andar hasate jaao..dhyan mat karo..jor mat maaro..koyi nayi sthiti banaao mat…jo hai , so hai..om aanand aanand..

 

pyare ji om om ..mere ji om om …aanand om om madhury om om ….om om …shanti..om shanti..

..dukh dene wale anek hai..lekin dukh haranewala ek hai..

dhokaa  karanewale anek hai, lekin suraksha karanewala ek kafi hai..

kaam dhoka karata hai..pati-patni ke sharir me sukh dikhaataa hai..thodi der me thakaa ke behosh kar deta hai… …

krodh dhoka deta hai…is ko daante bina kaam nahi chalega…jalaakar thakaa deta hai..

 

lobh dhoka deta hai..

moh dhoka karata hai..

chinta dhoka karati hai..

lekin chinta aayi hum dukhi ho gaye, chinta gayi hum shant..

krodh aaya hum ashant ho gaye, krodh gaya to hum shant !

kaam aaya to hum kaami, kaam gaya to hum shant..

to shant swarup paramatma humhare sath sadaa raheta hai..

 

kaam aata hai jata hai, krodh aata hai jata hai, moh aata hai jata hai, lobh aata hai jata hai..RAKSHAK sadaa raheta hai..

ye lutere aakar loot jaate , phir POSHAK posataa raheta hai..

in lopharo se hum thage jate aur vo POSHAK humhe roj raat ko posataa raheta hai nind me…POSHAK me dante rahe  baas! phir khaye, piye lekin aasakti nahi..

 

..om shanti..om aanand..madhry..om prabhuji..om pyare ji…om om om hotho me japo…phir kanth me japo….phir hruday me japo..

 

priti purvak japo..

 

bhajatam pritipurvakam l

dadaami budhdiyogam tam l

yen maam upyaantite..ll

 

use mai budhdiyog deta hun..

 

om shanti..om aanand..om madhury..om prabhuji….

oooooooooooooommmmmmmmmmmmmmmm..

om om hari om om ..hari om om om om ..

 

om om

narayan narayan narayan narayan

 

(shri yog vashishth ji(maharamayan) ka pathan ho raha hai..)

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब यदि अविद्या से उपजा है तो वह निवृत्त किस भाँति होती है ?

वशिष्ठजी बोले हे रामजी ! जैसे बरफ की पुतली सूर्य के तेज से क्षण में नष्ट हो जाती वैसे आत्मा के प्रकाश से अविद्या नष्ट हो जाती है । जब तक आत्मा का दर्शन नहीं होता तब तक अविद्या मनुष्य को भ्रम दिखाती है और नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त कराती है

gurudev :

jab tak aatma ki mahaanata nahi janate tab tak sansaar ka aakarshan jiv ko bhatakata hai…apani aatma ki mahaanata jano to aatma sukhrup hai..aanandrup hai..chaityanyrup hai..shashwat hai..us ki kabhi mrutyu nahi hoti..sansar tikata nahi  aur aatma mitata nahi…phir kay ko dukhi hona?

‘mai dukhi hun ..mai dukhi hun’ to jo dukhi hota hai vo sharir hai..us ko ‘mai’ manakar pareshan ho rahe..kuchh huaa to huaa ..isi ka naam to sansaar hai..ban ban ke bigadata hi hai…tention kyo lena?…(hota hai..chalata hai..kar ke aage badhe..) aanand ..shanti..

 

 

पर जब आत्मा के दर्शन की इच्छा  होती है तब वही इच्छा मोह का नाश करती है ।

 gurudev :

jab aatma paramatma ko pane ki ichha hoti to dusare durguno ko swaha karati hai..bhagavan ko pane ki ichha dusari dusht ichhao ko har leti hai..bhagavan ko pan eki ichha sadgun le aati hai..aur sansaarko pane ki ichha durgun , durachar, kapat, be-imaani le aati hai..

 

bhagavan ko pane ki jitani ichha tivr hogi utana vo sajjan banegaa..shresth banega..dukho se bachega..

aur sansar ko pane ki jitani ichha tivr hogi utana vo heraapheriwala banega..aur dukh banaanewala banegaa…”DUKH_MAKER” banega…

 

 

 

जैसे धूप से छाया क्षीण हो जाती है वैसे ही आत्मपद की इच्छा से अविद्या क्षीण हो जाती है

 gurudev :

dhup se chhaya chali jati hai ..aise hi ishwar pane ki ichha se avidya aur dusht waasanaye dhire dhire khatam ho jati hai..

 

 

 

 

और सर्वगत देव आत्मा के साक्षात्कार होने से नष्ट हो जाती है ।

 हे रामजी ! दृश्य पदार्थों में इच्छा उपजने का नाम अविद्या है और उस इच्छा के नाश का नाम विद्या है ।

gurudev :

sansaari ichha puri karane ka naam hi avidya hai aur vo ichha puri ho gayi to vidya hai..

nahi chahate to bhi rog hota hai..nahi chahate to bhi dukh aata hai..nahi chahate to bhi yash hota hai..nahi chahate huye bhi apyash hota hai..koyi chahata hai kya apyash aawe?to bhi aata hai…apyash mila to dukhi ho jaao..kya kare , hota hai ..jaan liya ki hota hai baas!mauj ho gayi..tention tention…pareshan hone ka dhandha…

 

उस विद्या ही का नाम मोक्ष है । अविद्या का नाश भी संकल्पमात्र है । जितने दृश्य पदार्थ हैं उनकी इच्छा न उपजे और केवल चिन्मात्र में चित्त की वृत्ति स्थित हो-यही अविद्या के नाश का उपाय है ।

gurudev:

jitane drushy padaarth hai sansar ke udhar ke aakarshan tut jaaye..aatm pad me vishranti mile ye hi paramatm prapti ka rajmarg hai..

aisa banu..aisa paau…isi se pareshan hote..

raat ko kya karate?..kya banate?…kya paate?..phir bhi kitani shanti raheti….

aisa karu..aisa paau ..isi se dukh paida hote..pane ki,  karane ki sab ichha chhod de..agar pana hai to ishwar ko pana hai.. baas!

to sare dukh mit jayenge chataak se..

mai  doctor banu..phalana banu..mai dhingana banu..ban ban ke bhi tention to gaya nahi…dukh to mita nahi…mendhak kaate..murde kaate phir bhi dukh nahi mita…apane agyan ko kaat le baas!

 

jogi re ..ye bhajan jis ne nahi suna hath upar karo..nahi suna to cassette le lena stall se.. 🙂

 

 

 

जब सब वासना निवृत्ति हों तब आत्मतत्त्व का प्रकाश होवे ।

gurudev :

sabhi wasana ki nivrutti hoti to nirwaasanik narayan pragat hote hai ..to bole ratri ko to wasana nahi hai, phir narayan kyo pragat nahi hote?..wasana dabi huyi hai, nivrutt nahi huyi..

raat ko wasana dab gayi to tum bhi dab gaye tamogun me..sunsaan ho gaye..

 

जैसे रात्रि के क्षय होने से सूर्य प्रकाशता है वैसे ही वासना के क्षय होने से आत्मा प्रकाशता है । जैसे सूर्य के उदय होने से नहीं विदित होता कि रात्रि कहाँ गई वैसे ही विवेक के उपजे नहीं विदित होता कि अविद्या कहाँ गई ।

gurudev :

jaise suryoday hone se pata hi nahi chalata ki raat kaha gayi,  aise aatma paramatma ka gyan ka ,vivek ka  uday hone se pata hi nahi chalata ki avidya aur dukh kaha chale gaye…baas !  ishwar ko pane ki ichha karo aur sansaar ko pane ki wasana hataate jaao..itana mahaan banega ki karod-pati arabo-pati kuchh bhi nahi..

 

 

 हे रामजी मनुष्य संसार की दृढ़ वासना में बँधा है । और जैसे संध्याकाल में मूर्ख बालक परछाहीं में वैताल कल्पकर भयवान् होता है वैसे ही मनुष्य अपनी वासना से भय पाता है ।

gurudev:

sandhyakaal me bachcha parchayi me bhut dekhe athava aayine me apane ko dekhe aur aakarshan kare..athava aakash me devataao ki baraat dekhe..to khud hi kalpanao me ulajhata hai ..aise hi wasanao se khud hi sansar me ulajhataa hai..

aatma ko pane ki ichha kare to wasanaye shant hogi..shant aatma mahaan aatma…

itana pahele nahi padhate the..aise hi bol ke ilaaj kar lete the..sant log abhi bhi kaha itane doctory padhate hai..phir bhi shant ho ke upaay bataate to saamanewale thik ho jaate…

pothe padh padh ke taal ke baal bhi ghis gaye becharo ke….nau-jawano ke..

 

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह सब दृश्य अविद्या से हुआ है और अविद्या आत्मभाव से नष्ट होती है तो वह आत्मा कैसा है ?

वशिष्ठजी बोले, चैत्योन्मुखत्व से रहित और सर्वगत समान और अनुभव रूप जो अशब्दरूप चेतन तत्त्व है वह आत्मा परमेश्वर है । हे रामजी !ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जगत् सब आत्मा है और अविद्या कुछ नहीं । हे रामजी ! सब देहों में नित्य चेतनघन अविनाशी पुरुष स्थित है, उसमें मनो नाम्नी कल्पना अन्य की नाईं होकर भासती है, पर आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं । हे रामजी ! कोई न जन्मता ,न मरता है और न कोई विकार है, केवल आत्मतत्त्व प्रकाश सत्तासमान, अविनाशी, चैत्य से रहित, शुद्ध, चिन्मात्रतत्त्व अपने आपमें स्थित है अनित्य, सर्वगत, शुद्ध, चिन्मात्र, निरुपद्रव, शान्तरूप, सत्तासमान निर्विकार अद्वैत आत्मा है |

 

narayan hari..

 

achyutaay govindaay anantaay naam bheshjaam l

 

nashyanti sarv rogani satyam satyam vadaahimihyam ll

 

hari om hari om hari om …

 

narayan narayan ..

hari om shanti.

 

Hari Om!Sadgurudev ji Bhagavan ki jay ho!!!!!

Galatiyo ke liye prabhuji kshama kare….

 

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One Comment on “Dhyan Satsang”

  1. Murali Says:

    Kithna sundar satsang hai mere Gurujika Satsang. Each time I read it I find it new.

    Jai ho mere Gurujika

    Hari Om


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