Bhakti ka nata

7th March 2009, Nagpur satsang

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Shri Sureshanandji Maharaj ki Gurubhaktimay wani

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हरि ओम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म..
 
…..जिस को अपने भीतर जहां आत्मा परमात्मा विराजमान है वहा पहुँचना है तो उस को कौन सी पगडंडियो पर चलना होगा ..कौन सी सीढिया पार करनी होगी..
पहेली बात की ये भाव बना रहे की ये सब स्वप्न-वत है..जो बीत गया वो स्वप्न है..जो बीत रहा है वो भी स्वप्ना..
 
   ..एक संत थे .. ४५ साल की आयु होगी..एक नगर के बाहर  एकांत में रहेते थे..नगर से जो भी भिक्षा मिलती वो खा लेते..दिन बीते, सप्ताह बीते, महीने बीते, वर्ष बीते….
  ..एक दिन नगर के लोग इकठ्ठे होकर आए, पथ्थर मारे उन के झोपडे की तरफ़.. जो लोग मान देते थे..आदर करते थे , आशीर्वाद मांगने आते थे वोही लोग पथ्थर उछाल रहे थे…इतना ही नही कुछ उपद्रवी युवको ने उन के झोपडे को आग भी लगा दी..संत तो बाहर आ गए..पूछा की ये सब क्यो?…
तो आख़िर ..कुछ लोगो ने एक बच्चा उन के गोद में रख दिया… बोले, ‘ये बच्चा तुम्हारा है..अमुक लड़की ने कहा की ये तुम्हारा दिया हुआ है उस को..’
 
संत ने बच्चे को गोद में उठाया..बच्चे के सर पे हाथ रखा.. ‘ये बच्चा मेरा है? ठीक है..’
फिर लोगो ने पथ्थर मारे…तो संत ने पथ्थर बच्चे को ना लगे इसलिए उन की  तरफ़ पीठ कर दी की भले ही पथ्थर मुझे लगे लेकिन बच्चे को ना लगे..
लोग चले गए की अब झोपडा जला दिया..पथ्थर लगे है.. पीठ पर, सर पर, कंधो पर..लहुलुहान तो कर दिया ..अब और क्या करे…चलो..
 
  संत बैठे है शांत…की ये भी बीत गया..लोगो ने मान दिया , वो भी बीत गया..अपमान दिया , वो भी बीत गया..पथ्थर मारे, मेरा खून निकला , वो भी बीत गया..
हर दृश्य अ-दृश्य में जा रहा है..सुखद परिस्थिति आई तो क्या..दुखद परिस्थिति आई तो क्या..अनुकूलता मिली तो क्या..तंदुरुस्ती मिली तो क्या…और बीमारी आई तो क्या?..आख़िर बीत ही जाएगा सब…आख़िर सब तो पसार होने ही वाला है..
थोडी देर बीती…बच्चा रोने लगा..
संत ने सोचा मैं तो भूख सहेन कर लूँगा , लेकिन इस बच्चे को दूध चाहिए..संत तो भिक्षा के लिए उसी नगर में निकले है..पर लोगो ने दरवाजे बंद कर दिए है..कोई गालिया दे रहे है..कोई अप -शब्द कहे रहे है..
कोई पथ्थर मार देते है..
संत ने आख़िर एक जगह आवाज दी.. ‘मेरा कसूर है चलो आप की नजरो में ….मुझे नही दो..लेकिन ये बच्चा तो दोषी नही ..इस ने किसी का क्या बिगाडा..इस को थोड़ा दूध मिल जाए..बास..’
 
तो उस बच्चे को जनम देनेवाली जो थी, उस से रहा न गया..अपने पिता को बोली, ‘ पिताजी , ये बच्चा इन संत का दिया हुआ नही है..मैंने तो अपनी भूल छुपाने के लिए , उस युवक को बचाने के लिए दोष इस संत के ऊपर डाल दिया…मुझे तो लगा था की, आप लोग इन को थोड़ा कुछ कहे दोगे..मुझे नही पता था की बात इतनी बढ़ जायेगी..मैंने तो ऐसे ही सोचा की इन के ऊपर ढोल देते है … संत है तो बच जायेंगे..लेकिन बात तो बहोत बढ़ गई है पिताजी..ये संत तो पूजनीय है..ये बच्चा इन का नही है..’
पिताजी बोले, ‘बेटी तुम ने तो बड़ा अनर्थ कर दिया..इन संत को इतने पथ्थर मारे, इन की कुटीर को आग लगा दी..और अब तू कहे रही है?..’
  नगर में ये बात भी बिजली की  तरह फैल गई..
 
लोग अब इकठ्ठे होकर संत को प्रणाम कर के माफी मांगने लगे..
संत ने कहा कोई बात नही..चलो..ये भी स्वप्ना हो गया..मान दिया वो भी बीत गया..अपमान दिया वो भी बीत गया..
लोगो ने कहा हम ने आप को इतना कष्ट दिया महाराज आप को अपने सन्मान की नही पड़ी है?..
महाराज ने कहा, ‘रात को हम सो जाते है , नींद में स्वप्ना देखते है.स्वप्ने में मान मिला तो क्या और अपमान मिला तो क्या?.. स्वप्ने में किसी ने पथ्थर मारा तो क्या और किसी ने फूलो की बरसात की तो क्या?…आख़िर तो सब स्वप्ना ही है..वो बंद आँखों से देखा हुआ स्वप्ना और ये खुली आँख से देखा हुआ स्वप्ना ..दोनों स्वप्ना ही है..मैं इस को महत्त्व ही क्यो दूँ?मैं मेरे ईश्वर को महत्त्व देता हूँ..मैं मेरे भगवान को महत्त्व देता हूँ..बास् ..स्वप्ना ये संसार..जप ले हरि का नाम..’
 
तुलसी दास  जी कहेते है ..
‘उस को भक्ति सुलभ हो जाती जो सत्संग में बैठते है ..अभागी आदमी को भक्ति नही मिल सकती है..’
 
सत्संग में बैठेंगे..ईश्वर को पाए हुए संत के चरणों में बैठेंगे तो ईश्वर से प्रिती बढेगी..ईश्वर में प्रेम गुरु के ज्ञान से बढेगा…ईश्वर में प्रेम ईश्वर के नाम स्मरण से ही तो बढेगा..गुरु की कृपा से बढेगा..ईश्वर का नाम जपेंगे तो ईश्वर में प्रेम बढेगा..ईश्वर के बारे में सुनेंगे तो ईश्वर में प्रिती बढेगी..
 
  हनुमान जी को मोती की माला दी तो हनुमान जी एक एक मोती तोड़कर देखते और फेंकते गए..तो बिभीषण जी ने पूछा की क्यो मोती तोड़कर फ़ेंक रहे …हनुमान जी बोले , इन मोतियों में बाहर से बहोत चमक है , अन्दर भी मेरे राम जी की चमक है क्या देख रहा हूँ..नही है तो फ़ेंक रहा हूँ..’
 
तो बिभीषण जी बोले , ‘आप के ये पहाड़ जैसे शरीर में अन्दर से है चमक राम जी की?’
 
तब हनुमानजी ने वो मोतियों की माला निचे रख दी..खड़े हो गए और अपने वज्र समान नाखुनो से सीना चिर दिया..आँखों से आंसू बहे रहे थे और सिने से रक्त की धारा..और सब ने देखा की हनुमान जी के सिने में माँ सीता और श्री राम जी के दर्शन हो रहे थे..!
 
  ..राम जी से रहा न गया..अपने आसन से उतर के आये और हनुमान जी को गले लगा लिया..और अपना प्यार भरा हाथ हनुमानजी के ह्रदय पे रख दिया और हनुमान जी को स्वस्थ कर दिया..
 
ये भक्ति अभागे आदमी को नसीब नही होती..
जिस के बड़े भाग्य होते , उस को भक्ति मिलती..
 
इसलिए कभी रात को नींद खुल गई और घर के सब लोग सोये हो तो अकेले में शांत बैठना..अपने को कोसना नही की सब लोग सोये और मेरी नींद खुल गई..नही नही!.. ‘हे प्रभु मुझे जगाना चाहते है मोह के नींद से..इसलिए तुम ने ये बाहर की नींद थोडी देर के लिए नही दी..वाह प्रभु..वाह गुरुदेव..मुझे अपनी भक्ति देना ..मैं आप की राह पर चल सकू ऐसी मुझे शक्ति देना..मैं आप से कभी विमुख ना हो जाऊ..मैं आप की बतायी राह कभी छोड़ ना दू..’
 
ऐसी ह्रदय पूर्वक प्रार्थना की जाती है तो भगवान वो ह्रदय का प्रेम देखते है.. शबरी के पास संपत्ति थी इसलिए राम जी नही गए..राम जी कहेते  है मैं केवल एक भक्ति का नाता ही स्वीकार करता हूँ….
 
 
जो भरा नही है भावो से
बहेती जिस में रसधार नही l
वो दिल नही है पथ्थर है
जिस दिल में भगवान के लिए प्यार नही ll
 
 
ओम शान्ति.
 
हरि ओम!सदगुरुदेव जी भगवान की जय हो!!!!!
गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करे….
 
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Hari Ooooommmmmmm..

 

…..jis ko apane bhitar jaha aatma paramatma virajman hai waha pahunchana hai to us ko kaun si pagdandiyo par chalana hoga ..kaun si sidhiya paar karani hogi..

paheli baat ki ye bhav banaa rahe ki ye sab swapn-vat hai..jo beet gaya wo swapana hai..jo beet raha hai vo bhi swapna..

 

   ..ek sant the .. 45 saal ki aayu hogi..ek nagar ke baahar  ekant me rahete the..nagar se jo bhi bhiksha milati vo kha lete..din beete, saptah bite, mahine bite, varsh bite….

  ..ek din nagar ke log ikaththe hokar aaye, paththar mare un ke jhopade ki taraf.. jo log maan dete the..aadar karate the , ashirvad mangane aate the wohi log paththar uchhal rahe the…itana hi nahi kuchh upadravi yuvako ne un ke jhopade ko aag bhi lagaa di..sant to baahar aa gaye..puchha ki ye sab kyo?…

to aakhir ..kuchh logo ne ek bachcha un ke god me rakh diya… bole, ‘ye bachcha tumhara hai..amuk ladaki ne kaha ki ye tumhara diya huaa hai us ko..’

 

sant ne bachche ko god me uthaya..bachche ke sir pe hath rakha.. ‘ye bachcha mera hai? thik hai..’

phir logo ne paththar maare…to sant ne paththar bachche ko naa lage isliye un ko taraf pith kar di ki bhale hi paththar mujhe lage lekin bachche ko naa lage..

log chale gaye ki ab jhopada jala diya..paththar lage hai.. pith par, sir par, kandho par..lahuluhaan to kar diya ..ab aur kya kare…chalo..

 

  sant baithe hai shant…ki ye bhi beet gaya..logo ne maan diya , vo bhi beet gaya..apaman diya , vo bhi beet gayaa..paththar maare, mera khun nikala , vo bhi beet gayaa..

har drushy a-drushy me jaa raha hai..sukhad paristhiti aayi to kya..dukhad paristhiti aayi to kya..anukulata mili to kya..tandurusti mili to kya…aur bimari aayi to kya?..aakhir beet hi jayega sab…aakhir sab to pasaar hone hi wala hai..

thodi der biti…bachcha rone laga..

sant ne socha mai to bhukh sahen kar lunga , lekin is bachche ko dudh chahiye..sant to bhiksha ke liye usi nagar me nikale hai..par logo ne darwaje band kar diye hai..koyi gaaliya de rahe hai..koyi ap-shabd kahe rahe hai..

koyi paththar maar dete hai..

sant ne aakhir ek jagah aawaj di.. ‘mera kasur hai chalo aap ki najaro me ….mujhe nahi do..lekin ye bachcha to doshi nahi ..is ne kisi ka kya bigada..is ko thoda dudh mil jaaye..baas..’

 

to us bachche ko janam denewali jo thi, us se raha na gayaa..apane pita ko boli, ‘ pitaji , ye bachcha in sant ka diya huaa nahi hai..maine to apani bhul chhupane ke liye , us yuvak ko bachaane ke liye dosh is sant ke upar daal diya…mujhe to laga tha ki, aap log in ko thoda kuchh kahe doge..mujhe nahi pata tha ki baat itani badh jayegi..maine to aise hi socha ki in ke upar dhol dete hai … sant hai to bach jayenge..lekin baat to bahot badh gayi hai pitaji..ye sant to pujniy hai..ye bachcha in ka nahi hai..’

pitaji bole, ‘beti tum ne to bada anarth kar diya..in sant ko itane paththar mare, in ki kutir ko aag laga di..aur ab tu kahe rahi hai?..’

  nagar me ye baat bhi bijali ki  tarah phail gayi..

 

log ab ikaththe hokar sant ko pranam kar ke maphi mangane lage..

sant ne kaha koyi baat nahi..chalo..ye bhi swapna ho gaya..maan diya vo bhi beet gayaa..apaman diya wo bhi beet gayaa..

logo ne kaha hum ne aap ko itana kasht diya maharaj aap ko apane sanman ki nahi padi hai?..

maharaj ne kaha, ‘raat ko hum so jate hai , nind me swapna dekhate hai.swapne me maan mila to kya aur apaman mila to kya?.. swapne me kisi ne paththar mara to kya aur kisi ne phulo ki barsaat ki to kya?…aakhir to sab swapna hi hai..vo band aankho se dekha huaa swapna aur ye khuli aankh se dekha huaa swapna ..dono swapna hi hai..mai is ko mahatv hi kyo dun?mai mere ishwar ko mahatv deta hun..mai mere bhagavan ko mahatv deta hun..baas ..swapna ye sansaar..jap le hari ka naam..’

 

tilasi das ji kahete hai ..

‘us ko bhakti sulabh ho jati jo satsang me baithate hai ..abhagi aadami ko bhakti nahi mil sakati hai..’

 

satsang me baithenge..ishwar ko paye huye sant ke charano me baithenge to ishwar se priti badhegi..ishwar me prem guru ke gyan se badhega…ishwar me prem ishwar ke naam smaran se hi to badhega..guru ki krupa se badhega..ishwar ka naam japenge to ishwar me prem badhega..ishwar ke baare me sunenge to ishwar me priti badhegi..

 

  hanumaan ji ko moti ki mala di to hanumaan ji ek ek moti todkar dekhate aur phenkate gaye..to bibhishan ji ne puchha ki kyo moti todkar phenk rahe …hanuman ji bole , in motiyo me baahar se bahot chamak hai , andar bhi mere ram ji ki chamak hai kya dekh raha hun..nahi hai to phenk raha hun..’

 

to bibhishan ji bole , ‘aap ke ye pahaad jaise sharir me andar se hai chamak ram ji ki?’

 

tab hanumanji ne wo motiyo ki mala niche rakh di..khade ho gaye aur apane vajr samaan nakhuno se sina chir diya..aankho se aansu bahe rahe the aur sine se rakt ki dhara..aur sab ne dekha ki hanuman ji ke sine me maa sita aur shri ram ji ke darshan ho rahe the..!

 

  ..ram ji se raha na gaya..apane aasan se utar kar aye aur hanuman ji ko gale laga liya..aur apana pyar bharaa hath hanumanji ke hruday pe rakh diya aur hanuman ji ko swasth kar diya..

 

ye bhakti abhage aadami ko nasib nahi hoti..

jis ke bade bhagy hote , us ko bhakti milati..

 

isliye kabhi raat ko nind khul gayi aur ghar ke sab log soye ho to akele me shant baithana..apane ko kosana nahi ki sab log soye aur meri nind khul gayi..nahi nahi!.. ‘hey prabhu mujhe jagaana chahate hai moh ke nind se..isliye tum ne ye baahar ki nind thodi der ke liye nahi di..wah prabhu..wah gurudev..mujhe apani bhakt idena..mai aap ki raah par chal saku aisi mujhe shakti dena..mai aap se kabhi vimukh naa ho jaau..mai aap ki bataayi raah kabhi chhod naa du..’

 

aisi hruday purvak prarthana ki jati hai to bhagavan vo hruday ka prem dekhate hai.. shabari ke paas sampatti thi isliye ram ji nahi gaye..ram ji kaheta hai mai kewal ek bhakti ka nata hi sweekar karata hun….

 

 

jo bhara nahi hai bhaavo se

baheti jis me rasdhaar nahi l

wo dil nahi hai paththar hai

jis dil me bhagavan ke liye pyar nahi ll

 

Om Shanti.

Hari Om!Sadgurudev ji Bhagavan ki Jay ho!!!!!

Galatiyo ke liye prabhuji kshama kare..

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One Comment on “Bhakti ka nata”

  1. I.D.Chaturvedi Says:

    Saar baat yahi hai ki:-

    ये भक्ति अभागे आदमी को नसीब नही होती..
    जिस के बड़े भाग्य होते , उस को भक्ति मिलती..


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