DadujiDindayaal maharaj aur raja Mansingh ki kathaa

Oct 21st  2008; IST : 5.30 pm, Rewaadar( Rajsthan)

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Sadgurudev SantShiromani ParamPujya ShriAsaramBapuji ki Amrutwani

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Satsang & Bhandara at Pavilion (Khel Maidan), REVADAR, Dist. Sirohi (Raj.)


संत दादू दीनदयालजी महाराज और राजा मानसिंह

सत्संग से 18 लाभ , और मन्त्र दीक्षा से 33 लाभ होते …और सत्संग में एक एक  डगला(कदम) चल एक आते तो एक एक यज्ञ करने का फल होता…सत्संग सुनते तो ज्ञानयोग होता…सत्संग में ताली बजाते तो भक्ति योग होता….ऐसे  सब फल है!

..जो दीक्षा लेते उन को हार्ट एटेक  नहीं होगा,  हाई बी. पी.  नहीं होगी… ऑपरेशन नहीं करना पड़ेगा ….

राजे महाराजे राजपाट छोड़कर भी सत्संग जाते थे…

राजस्थान में दादू दीनदयाल बहोत उच्च कोटि के संत थे… राजा  मानसिंह का भी इतिहास में  नाम है… सुमति से मानसिंग अमेर के गद्दी पे बैठे …तो अधिकारी से लेकर सभी  अभिवादन करने आये…..सब ने तोहफा दिया….राजा मानसिंह का जयजयकार किया….मस्का मारने वालो ने खूब मस्का मारा…

उस समय का  ज़माना और  अभी का ज़माना वोही का वोही है…!! उस समय भी  संतो के दैवी कार्य का फायदा लेनेवाले लोग थे…और संतो के दैवी कार्य के  विरोध में  भड़काने वाले लोग भी थे ..!!

..तो दादू दीनदयाल के दैवी कार्य के जो विरोधी थे ऐसे लोगो ने राजा मानसिंह को भड़काया ….की आप आये तो बापू दीनदयाल ने अभिवादन भी नहीं किया ..इतने लोग आये…लेकिन दादू दिनदयाल ने आप को अभिवादन नहीं किया तो इस से  दुसरे नागरिको को असर पड़ जायेगी…दादू दीनदयाल  ऐसे है..वैसे है….आदि..

.. संत के लिए  दुष्ट प्रवृत्ति के लोग निंदा करते और सत-प्रवृत्ति के लोग उन के दैवी गुणों का फायदा लेते..जैसे बछडा  गाय का दूध पिता और पुष्ट होता है…. दुष्ट लोग तो गाय को काटते है .. ऐसे जहां  दूध पिने वाले बछड़े है तो खून पिने वाले भी होते…!

ऐसे लोग दूसरो की श्रध्दा तोड़ते …..तो ऐसे लोगों ने  राजा  मानसिंग  को कुछ न कुछ भड़काया..की, “ दादू दीनदयाल के आश्रम में किसी की मौत हो गयी तो उस को  ना जलाया,  ना समाधि दी….और ना उन का कुछ वैदिक विधि से संस्कार  किया….ऐसे ही जंगल में फिकवा दिया… की गीध जानवर खा जाए…. किसी साधू के लिए क्या ये अच्छी  बात है ?…ये तो बहोत  अनर्थ हो गया ….आप इतने अच्छे  राजा  है…आप पर अकबर प्रसन्न है…..लेकिन  उस दादू दीनदयाल  को नाराजी है…इसलिए  आप का राजतिलक हुआ तो अभिवादन स्वागत करने नहीं आये..और  शिष्यों को भी नहीं  भेज के 2 वचन नहीं बोले….!”

..राजा  मानसिंग ने देखा की कोई कुछ भी कहे…लेकिन संतो के लिए ऐसी बातो में विश्वास नहीं करना चाहिए…. अपनी बुध्दी लगना चाहिए…..राजा   मानसिंग बुध्दिमान था …..सोचा की खुद ही जांच करूंगा……

..एक दिन मोका  पा के एका एक राजा  मानसिंह साधू जी महाराज के आश्रम में गए…प्रणाम किया …..साधू महाराज ने कुशल पूछा ……राजा मानसिंह बोले, “आप की दया है… संतो की दया है ! आप के दर्शन करने आये है….”

….दादू दीनदयाल महाराज बोले, “तुम्हारी आँखों में कुछ प्रश्न दिख रहा है…आप केवल  दर्शन करने नहीं आये…. कुछ सच्चाई जानने को आये है….”

….तो राजा मानसिंह बोले, “ महाराज सच्ची बात है…

..दरबार में लोग बोलते की आप आये नहीं… राज्याभिषेक  के समय भी बापूजी नहीं आये…तो  आप हमारे  राजा बनने से नाराज है क्या?… आप पधारे नहीं!…”

..दादूजी दीनदयाल महाराज बोले, “…प्रेरणा नहीं हुयी तो नहीं आये… आप  ने हमारा क्या बिगाड़ा है की हम आप से नाराज होंगे?…हम  तो दुसरे में भी अपने आत्मा को देखते ….हम आप से नाराज नहीं …..लेकिन आने की जरुरत भी नहीं लगी, इसलिए नहीं आये….”

….उन की बातो से राजा मानसिंह का चित्त शांत हुआ…तो उन्हों ने आगे पूछा की,  “महाराज , आप ने आश्रम के व्यक्ति का शव जंगल में फेकवा दिया….उस को  जलाया नहीं..कोई संस्कार नही किया….”

तो महाराज बोले, “जिस की मौत हुयी थी , उस की उस शरीर में कामना नहीं थी….वो त्यागी पुरुष था.. (जीते जी ही देहाध्यास छोड़ चुका था…)..इसलिए  हमने उस का शव जंगल में फेकवा दिया…

कोई मर जाता है तो  उस का 6 प्रकार से संस्कार किया जा सकता है….एक अग्नि संस्कार होता, दूसरा   समाधि संस्कार होता है. ..तीसरा  वायु संस्कार होता है….जो त्यागी होते उन का वायु संस्कार किया जाता है….जिन की मृत्यु हुयी वो संत  त्यागी था…तो ऐसे त्यागी का वायु संस्कार कर दिया ….

चौथा होता है  जल संस्कार …जल संस्कार  होता तो उस को  नदी में बहा देते ..जल को अर्पण कर दिए तो जल संस्कार ..वायु को अर्पण किये तो वायु संस्कार ….. अग्नि में जलाते तो अग्नि संस्कार….. (पूज्य बापूजी जोधपुर सत्संग में बोले की , भूमि संस्कार  और विरह-अग्नि संस्कार भी होता..मीराबाई और संत तुकाराम महाराज का देह  विरह-अग्नि में भगवान में समा गए…)

..जो संन्यासी  होते उन की  समाधि संस्कार  होता… और वेदों के अनुसार करते उस को  वैदिक संस्कार  बोलते…

तो ऐसे शव के 6 प्रकार से  संस्कार होते… वो त्यागी थे,  उन का हम ने त्यागी थे  इसलिए वायु संस्कार  किया…उन की  देह में अहंता नहीं थी.. संसार में महानता नहीं थी…. तो वायु का संस्कार कर देते……”

..राजा मानसिंह  को शान्ति हुयी… उस को लगा की , चलो भाई, अच्छा हुआ मैं  महाराज जी से मिला… निंदक कुछ न कुछ बकते…लेकिन  धरती पे संत आये, इसलिए सुख शांति है….

..ऐसे बड़े बड़े संत जब भी इस धरती पर आये है…निंदक लोग उन के लिए  कुछ न कुछ बकते है…. राम जी के गुरू के लिए  क्या क्या बोलते….लेकिन  संत दयालू स्वभाव के होते है की , अपने कार्य से लोगो का फायदा हो इसलिए समाज में रहेते  ….अज्ञानी लोगों का सुन कर  ऐसे संतो की निंदा कर के अपने 7 पीढ़ियों  को नरक में क्यों डाले?

… ऐसे मानसिंह राजा को संतोष हुआ …कुछ दिन बीते तो फिर दुसरे धर्म वालो ने फिर भड़काया….. “महाराज हद  हो गयी!बापू दीनदयाल महाराज ने तो 2  कुंवारी  ब्राम्हण  कन्याओं को आश्रम में रखा है… उन के साथ में ना शादी करते,  ना घर बसाते…. साधू बाबा हो के लड़कियों कों  साथ में रखना!….आप के राज्य  में कैसा अधर्म हो रहा….हम को  दुःख होता है ..!” ऐसी और भी गन्दी गन्दी  बाते करते…

फिर गए राजा मानसिंह महाराज के आश्रम में !..

महाराज को प्रणाम किया ….बोले, “महाराज  आप के दर्शन करने  आये…”

..महाराज बोले,  “दर्शन को भी आये और कुछ पूछने के लिए भी आये..पूछ लो…”

राजा मानसिंह बोले, “सच्ची बात है महाराज..आप के आश्रम में 2 कुमारियाँ  …2 लड़कियाँ  रहेती ….ब्राम्हण  की कन्याएं …लोग कुछ न कुछ बोलते…”

महाराज बोले,  “लोग तो बोले जो बोलना है..लेकिन वो कन्याएं  क्या बोलती वो भी सुन लो…”

…महाराज ने शिष्यों को भेजा की, कन्याओं को बुलाओ… राजा मानसिंह उन से मिलना चाहते है…

..राजा मानसिंह ने कन्याओं को पूछा की “तुम्हारी  इतनी उम्र हो गयी, शादी क्यों नहीं करती….बोलो तो  बढ़िया वर खोज दूँ…”

..तो उन ब्राम्हण  कन्याएं  बोली, “महाराज हमारी शादी तो हो गयी 8 साल पहेले …!

..हमारी शादी तो 8 साल पहेले ही भगवान से हो गयी है …महाराज,  शादी वो है जो  शाद आबाद करे….गुरू के  मार्गदर्शन से हम ने ये जान लिया की शरीर के हाडमांस में सुख खोजना व्यर्थ्य  है … अमर आत्मा- परमात्मा से, भगवान से शादी हो… ऐसे वर को क्या वरू   जो मर जाए!…..हमारी तो 8 साल पहेले भगवान से शादी हो गयी…ये तो  आत्मा परमात्मा की शादी है…. गार्गाचार्य  ऋषि  की बेटी थी गार्गी…  वो भी जीवन भर अ-विवाहित थी….क्यों की समझ आ गयी थी की  असली विवाह आत्मा परमात्मा का है, लोग उन को प्रणाम करते…… हमारे गुरू के चरणों में रहेकर भगवान की स्मृति में रहेना..इस से अच्छी  जगह कही ओर हो सकती है क्या?….गुरूजी के आश्रम में  ध्यान भजन करना…उन के दैवी कार्य में भागिदार होना इस से बड़ा काम हो सकता हैं  क्या?….”

..राजा मानसिंह बोला, “ ईश्वर भक्ति का इतना महत्त्व  समझती हो,  साधा जीवन का इतना महत्त्व समझती हो… भोगी और निंदक से  फक्कड़ साधू जीवन, त्यागी साधू जीवन जी कर अपना मनुष्य जीवन धन्य कर रही है…. ऐसे त्याग से रहेने वाली कन्या साधू ही है!”    मानसिंह राजा ने  माफी मांगी….

“… साधू  के देखकर लाचार , मोहताज नहीं कहेना चाहिए ..उन का आदर करना चाहिए ….साधू संतो की निंदा करने से , सुनने से विपदा आये,  पुण्य   नाश हो जाए, मति मरी जाए ऐसा नहीं हो….. संत का निंदा नहीं करे …साधू संतो को तो मान की इच्छा नहीं होती… लेकिन उन को प्रणाम करने से , उन का मान करने से करने वाले का अपार मंगल  होता…मैंने आप को ऐसा प्रश्न कर के अपमान किया,  मेरे को पाप लग गया” ऐसा राजा मानसिंह बोले…

ब्राम्हण  कन्याएं  बोली, “अमेर नरेश .. हमारा अपमान नहीं  हुआ … लेकिन गुरूजी के कार्य पर शंका हुयी इसलिए इस गलती की गुरूजी से माफी मांग लो …!”

..राजा मानसिंह बुध्दिमान थे..अकबर उन की बुध्दिमत्ता पे नाज करता था …ये ऐतिहासिक घटना है…राजा मानसिंह ने बापू दीनदयाल महाराज से माफी मांगी की, “मैं आप के बारे में गलत सोच रहा  था..मैं  आप का  अपराधी हूँ”

महाराज जी बोले,  “..लोग संतो में दोष देखते , उन की  निंदा करते तो  बुध्दी खराब करते ..राजन तुम्हारा कसूर नहीं…. संतो का संग है तो भगवान के भजन का रंग आता और  गन्दी चीज का संग होगा तो गन्दी चीज का ही  गंध आयेगा…ये संग का रंग है ! ..रामायण में लिखा है की मरुभूमि में मृग  बनना अच्छा है लेकिन भगवान दुष्टो का संग ना दे..!”

कबीरा दर्शन संत के साहिब आये याद l

लेखे में वो ही घडी,  बाकि के दिन बाद ll

संत का दर्शन होते वोही दिन जिंदगी के ऊँची  कमाई  के होते…बाकि के दिन खा-पि के गए…

…देव ऋषि  नारद कलियुग के प्रभाव से बहोत दुखी हुए और ब्रम्हाजी को बोले की ,  “कलियुग का कु- प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है की अच्छे  लोग भगवान की भक्ति साधन भूलकर निंदा चुगली में फसते….तीर्थो में जाते तो भी किसी साधू महाराज का दर्शन नहीं  करते….कोई मिलते तो वे संतों के नाम पर कालिमा लगानेवाले होते…. “हमारे गुरूजी  ये मांगे” ऐसा कर के धोखा- धडी करने वाले साधू मिलते…. इसलिए लोगो की श्रध्दा टूट गयी.. लोग बहोत दुखी है….. अच्छे  साधू को कोई पूछता नहीं  है…उन के दैवी कार्य का  फ़ायदा नहीं लेते…. बुध्दिमान भी आटा , दाल,  रोटी कमाए- खाए इसी में समय बरबाद  करते …..!कुछ उपाय कीजिये भगवान!”

ब्रम्हाजी तनिक शांत हुए … …..फिर ब्रम्हाजी के आँखों में चमक और  चेहरे  पे प्रसन्नता आई…..बोले…नारद बहोत अच्छा प्रश्न किया…  कलियुग में कलियुग का भाई अधर्म घुस गया है….एक मन्त्र है… इस मन्त्र से कलियुग के दोष दूर होंगे… अन्तर्यामी राम का कृपा प्रसाद पाके   लोग  दुखो से पार होंगे..!

मन्त्र है:-

हरे राम हरे राम

राम राम हर हरे

हरे कृष्ण हरे कृष्ण

कृष्ण कृष्ण हरे हरे..

तो कलियुग में भगवान का नाम का जो ये भजन करेगा उस के घर में कलियुग का प्रभाव कम हो जायेगा..

… भजन करते  हाथ की ताली  बजती तो हाथ  पवित्र होते , बोलते तो जीभ पवित्र होती….सुनते तो मन पवित्र होता..

राम राम राम” ऐसा  3 बार कहेने से किसी भी काम में पूर्णता हो जाती…. ऐसा राम नाम का प्रभाव है….

(पूज्य बापू जी श्लोक बोले…)

ये भगवान शिव जी ने पार्वतीजी  को कहा….

पार्वतीजी  विष्णु सहस्त्र नाम कर के,  बाद में भोजन करती ….तो शिव जी ने पूछा,   “अभी तक भोजन नहीं किया?” …. पार्वतीजी बोली, “नाथ, मेरा  नियम बाकी है…”

जो साधक भजन नियम नहीं करते उन को भगवान  की  कीमत नहीं होती…

नारायण नारायण नारायण नारायण

सत्संग में वो ही लोग आते जिन पर भगवान की विशेष कृपा होती है..जिन के पुण्य  जगे है…पूर्व के पाप से दुराचारी  को “हरिनाम ना सुहावे”..उस को भगवान का नाम अच्छा नहीं लगता…

भगवान कृष्ण गीता में बोलते की , “दुखद समय में मेरे को स्मरण करो… युध्द  जैसा घोर काम करते हुए भी मुझे स्मरण करो”

….जो भी काम करते तो  करते करते भगवान का नाम सुमिरन करो….लेकिन इस में काम का महत्त्व बना रहेगा…तो जो भी काम करते वो भगवान के लिए करे तो बेड़ा  पार!सब समय में जो भी काम करते – सब मन, बुध्दी, इन्द्रियों से जो भी करते ..सब भगवान को अर्पित करे….

3 प्रकार का सुमिरन होता है….

1)क्रिया जन्य  सुमिरन

2) स्मृति जन्य  सुमिरन

3)बोधजन्य  (ज्ञानमय) सुमिरन

क्रिया जन्य  सुमिरन…मुंह से राम राम बोल रहे हाथ से ताली  बजा के हील रहे…ये हो गया क्रियाजन्य सुमिरन..

स्मृति जन्य  सुमिरन… “मैं  भगवान का और भगवान मेरे” इस की पक्की स्मृति हो जाए….तो मेरे मेरे ऐसा बोलना नहीं पडेगा….मैं  मारवाड़ी मैं  इस की लुगाई ऐसा याद करना पड़ता है क्या तुम को?ऐसे ये स्मृतिजन्य सुमिरन है…

बोध जन्य  सुमिरन में सब वासुदेव है..जो अंतर्यामी देव है….बीमारी आती तो शरीर में आती, सुख दुःख आता तो वृत्तियों में आता…अच्छाई -बुराई आती तो मन बुध्दी में आती….मरते तो शरीर मरता …हमारा आत्मा अमर है …ऐसा ज्ञानमय सुमिरन है….

..एक बेटा चल बसा और दुसरे बेटे को बेटा हुआ….तो बेटा मर गया इस का दुःख हुआ और पोता हुआ इस का सुख भी हुआ…लेकिन दोनों को जाननेवाला कौन है?….वो ही आत्मा-परमात्मा है..अपने अन्दर चेतन स्वरुप बन के बैठा है…

मन तू ज्योति स्वरुप अपना मूल पहेचान l

गुरू के दिखाए मार्ग पर चलते तो गुरू की कृपा है…गुरू सब संभाल लेंगे…गुरू से निभाते तो ह्रदय में भगवान प्रगट हो जाते….:-) लेकिन गुरू से छलछिद्र  करते तो गुरू कृपा से वंचित हो जाते…..ऐसा व्यक्ति भगवान को नहीं भाता….

राजा मानसिंह के आस पास के नीच मति के लोगों ने फिर से संत दादू दिन दयाल के प्रति कान भर दिए …. तो मानसिंह ने सोचा अच्छा होगा की महाराज अजमेर छोड़ कर कही और चले जाए ….इस विचार से राजा फिर से महाराज दिन दयाल जी के दर्शन करने आया ….बोला , “महाराज , संत फकीर तो रमते ही भले लगते …आप यहाँ इतने सालों से रहे कर उब नहीं गए क्या ?”

दादू दिन दयाल जी महाराज उस ही रात को चेलों के साथ आश्रम छोड़ कर चले गए ….

जिस  प्रांत में , राज्य में संतों के चरण पड़ते उस राज्य में संपत्ति समृध्दी लहेराती है , प्रकृति प्रसन्न रहेती है.. लेकिन जहां संतों को सताया जाता है , वहाँ प्रकृति का कोप हो जाता है ….

जिस स्थान में 5 वर्ष तक संत के चरण नहीं पड़ते वहा के लोग पिशाच  के जैसे बन जाते..

संत दीनदयाल के बारे में जो कु-प्रचार हो रहा था , मानसिंग राजा  उस का शिकार हुआ..राजा  मानसिंह ने दादू दीनदयाल को सताया..दादू दिन दयाल वहा का आश्रम छोड़ के चले गए..प्रभात को राजा  मानसिंह को सपना आया की तुम्हारे नगर का नाश होगा..प्रभात के स्वपने ने राजा  को झाँकझोर  दिया..सैनिको को दौड़ाया की देखो दादुजी आमेर में है की नहीं…पता चला की दादू जी स्थान छोड़ कर निकल गए…पद चिन्ह ढूंढ़ते   उन का पीछा किया.. संत के चरण पकडे.. बोले, “ऐसा सपना आया प्रभात का..संत रूठ गए ..महाराज गुस्ताखी माफ हो.. कुल नाश होगा..राज्य नाश होगा… सुबह का  सपना है महाराज..बचाईये ”
संत ह्रदय था..बोले,  “100 साल की गद्दी रहेगी ..बाद में उजड़ेगा …”
अभी भी जयपुर के चारो ओर जयजयकार है लेकिन आमेर के तरफ उजड़ा हुआ है …जयपुर में ही है आमेर फिर भी ऐसा है..

ॐ शांती


hari om hari om hari om

narayan narayan narayan narayan

he ram ram!  jay ho !jay ho…!!

kal..sumerpur phir jodhpur ….kal subah Mantrdikshaa…

aaj to sab aanand aanand huaa!! aanand me hai? achha lag raha hai sab ko?… J J J J J

narayan narayan narayan narayan

satsang se 18 labh , aur mantr diksha se 33 labh hore…aur satsang me ek ek  dagalaa(kadam) chal ek aate to ek ek yagy karane kaa phal hota…satsang sunate to gyanyog hota…satsang me taali bajaate to bhakti yog hota….aise  sab phal hai!

..jo dikshaa lete un ko heart attack nahi hoga,  high bp nahi hogi… operation nahi karanaa padega ….

raje maharaje raajpaat chhodkar bhi satsang jaate the…

rajsthan me dadu dindayaal bahot uchch koti ke sant the… raja mansingh ka bhi itihaas me  naam hai… sumati se mansing ajmer ke gaddi pe baithe …to adhikari se lekar sabhi  abhiwaadan karane aaye…..sab ne tohafaa diyaa….raja  mansingh ka jayjaykaar kiya….maskaa marane walo ne khub maskaa maraa… us samay ka  jamaanaa aur  abhi ka jamaanaa wohi ka wohi hai…!! us samay bhi  santo ke daivi kary ka phayada lenewale log the…aur santo ke daivi kary ke  virodh me  bhadkane wale log bhi the ..!!

..to dadu dindayaal ke daivi kary ke jo virodhi the aise logo ne raja mansingh ko bhadakaayaa ….ki aap aaye to bapu dindayaal ne abhiwaadan bhi nahi kiya ..itane log aaye…lekin dadu dindayal ne aap ko abhivaadan nahi kiya to is se  dusare naagriko ko asar pad jaayegi…dadu dindayaal  aise hai..waise hai….aadi..

.. sant ke liye  dusht pravrutti ke log nindaa karate aur sat-pravrutti ke log un ke daivi guno ka phayadaa lete..jaise bachha gaay ka dudh pita aur pusht hota hai…. dusht log to gaay ko kaatate hai .. aise jahaa dudh pine wale bachhade hai to khun pine wale bhi hote…!

Aise log dusaro ki shradhda todate …..to aise log raja mansing  ko kuchh na kuchh bhadakaayaa..ki, “ dadu dindayaal ke ashram me kisi ki maut ho gayi to us ko  naa jalaayaa,  naa samaadhi dee….aur naa un ka kuch vaidik vidhi se sankaar kiyaa….aise hi jungle me phikavaa diyaa… ki gidh jaanavar khaa jaaye…. kisi sadhu ke liye kya ye achhi baat hai?…ye to bahot  anarth ho gayaa ….aap itane achhe raja hai…aap par akbar prasann hai…..lekin  us dadu dindayaal  ko naaraaji hai…isliye  aap kaa rajtilak huaa to abhivaadan swaagat karane nahi aaye..aur  shishyo ko bhi nahi  bhej ke 2 vachan nahi bole….!”

..raja mansing ne dekha ki koyi kuchh bhi kahe…lekin santo ke liye aisi baato me vishwas nahi karanaa chahiye…. apani budhdi laganaa chaahiye…..raja  mansing budhdimaan tha …..socha ki khud hi jaanch karungaa……

..ek din moka  paa ke ekaa ek raja mansingh sadhu ji maharaj ke ashram me gaye…pranaam kiya …..sadhu maharaj ne kushal puchha ……raja mansingh bole, “aap ki dayaa hai… santo ki dayaa hai!aap ke darshan karane aaye hai….”

….dadu dindayaal maharaj bole, “tumhari aankho me kuchh prashn dikh rahaa hai…aap kewal  darshan karane nahi aaye…. kuchh sachchaayi janane ko aaye hai….”

….to raja mansingh bole, “ maharaj sachchi baat hai…

..darbaar me log bolate ki aap aaye nahi… rajyaabhishek  ke samay bhi bapuji nahi aaye…to  aap humhaare raja banane se naaraaj hai kya?… aap padhaare nahi!…”

..daduuji dindayaal maharaj bole, “…preranaa nahi huyi to nahi aaye… aap  ne humaara kya bigaadaa hai ki hum aap se naaraaj honge?…hum  to dusare me bhi apane aatmaa ko dekhate ….hum aap se naaraaj nahi …..lekin aane ki jarurat bhi nahi lagi, isliye nahi aaye….”

….un ki baato se raja mansingh ka chitt shant huaa…to unho ne aage puchhaa ki,  “maharaj , aap ne ashram ke vyakti kaa shav jungle me phekavaa diyaa….us ko  jalaayaa nahi..koyi sanskaar nahikiyaa….”

To maharaj bole, “jis ki maut huyi thi , us ki us sharir me kaamanaa nahi thi….vo tyaagi purush thaa.. (jite jee hi dehaadhyaas chhod chukaa tha…)..isliye  hamane us ka shav jungle me phekavaa diyaa…

Koyi mar jaataa hai to  us kaa 6 prakaar se sansaakr kiyaa jaa sakataa hai….ek agni sanskar hota, dusaraa   samaadhi sanskaar hotaa hai. ..tisaraa  vaayu sanskaar hota hai….jo tyaagi hote un ka vayu sanskaar kiya jata hai….jin ki mrutyu huyi vo sant  tyagi tha…to aise tyaagi ka vayu sanskaar kar diyaa ….

Chauthaa hotaa hai  jal sankar…jal sankaar  hota to us ko  nadi me bahaa dete ..jal ko arpan kar diye to jal sankaar..vayu ko arpan kiye to vayu sankaar….. agni me jalaate to agni sanskaar….. (pujya bapuji jodhapur satsang me bole ki , bhumi sankar aur virah-agni sanskar bhi hota..mirabai aur sant tukaram maharaj ka deh  virah-agni me bhagavan me samaa gaye…)

..jo sanyaasi hote un ki  samaadhi sanskaar hotaa… aur vedo ke anusaar karate us ko  vaidik sanskaar bolate…

To aise shav ke 6 prakaar se  sanskaar hote… wo tyagi the,  un ka hum ne tyagi the  isliye vayu sankaar kiyaa…un ki  deh me ahanta nahi thi.. sanskaar me mahantaa nahi thi…. to vayu ka sanskar kar dete……”

..raja mansingh  ko shaanti huyi… us ko lagaa ki , chalo bhai, achha huaa mai maharaj ji se milaa… nindak kuchh na kuchh bakate…lekin  dharati pe sant aaye, isliye sukh shanti hai….

..aise bade bade sant jab bhi is dharati par aaye hai…nindak log un ke liye  kuchh na kuchh bakate hai…. ram ji ke guru ke liye  kya kya bolate….lekin  sant dayaaloo swabhaav ke hote hai ki , apane kary se logo ka phayadaa ho isliye samaaj me rahete  ….log aise santo ki nindaa kar ke apane 7 pidhiyo ko narak me kyo daale?

… aise mansingh raja ko santosh huaa …kuchh din bite to phir dusare dharm walo ne phir bhadakaayaa….. “maharaj hud ho gayi!bapu dindayaal maharaj ne to 2  kuwaari braamhan kanyaao ko ashram me rakhaa hai… un ke sath me naa shadi karate,  naa ghar basaate…. sadhu baba ho ke ladakiyo me sath me rakhanaa!….aap ke raajya  me kaisaa adharm ho rahaa….hum ko  dukh hotaa hai ..!” aisi aur bhi gandi gandi  baate karate…

phir gaye raja mansingh maharaj ke ashram me !..

maharaj ko pranaam kiya ….bole, “maharaj  aap ke darshan karane  aaye…”

..maharaj bole,  “darshan ko bhi aaye aur kuchh puchhane ke liye bhi aaye..puchh lo…”

Raja mansingh bole, “sachchi baat hai maharaj..aap ke ashram me 2 kumaariyaa …2 ladakiyaa raheti ….bramhan ki kanyaaye…log kuchh na kuchh bolate…

Maharaj bole,  “log to bole jo bolanaa hai..lekin vo kanyaaye kya bolati vo bhi sun lo…”

…maharaj ne shishyo ko bheja ki ,kanyaao ko bulaao… raja mansingh un se milana chaahate hai…

..raja mansingh ne kanyaao ko puchha ki “tumhari  itani umar ho gayi, shadi kyo nahi karati….bolo to  badhiyaa var khoj dun…”

..to un bramhan kanyaaye boli, “maharaj hamaari shadi to ho gayi 8 saal pahele …!

..hamaari shaadi to 8 saal pahele hi bhagavan se ho gayi hai …maharaj,  shadi vo hai jo  shaad aabaad kare….guru ke  margdarshan se hum ne ye jaan liya ki sharir ke haadmaans me sukh khojanaa vyarthy hai … amar aatmaa- parmaatmaa se, bhagavan se shadi ho… aise var ko kya varu jo mar jaaye!…..humaari to 8 saal pahele bhagavan se shaaadi ho gayi…ye to  aatma paramaatma ki shadi hai…. gargaachary rushi ki beti thi gargi…  vo bhi jeevan bhar a-vivaahit thi….kyo ki samajh agyi thi ki  asali vivaah aatmaa paramaatmaa ka hai, log un ko pranaam karate…… hamaare guru ke charano me rahekar bhagavan ki smruti me rahenaa..is se achhi jagah kahi aor ho sakati hai kya?….guruji ke ashram me  dhyaan bhajan karanaa…un ke daivi kary me bhagidaar honaa is se badaa kaam ho sakataa ahi kya?….”

..raja mansingh bola, “ ishwar bhakti ka itanaa mahatv  samajhati ho,  sadha jeevan ka itana mahatv samajhati ho… bhogi aur nidnak phakkad sadhu jeevan, tyaagi sadhu jeevan jee kar apana manushy jeevan dhany kar rahi hai…. aise tyag se rahene wali kanyaa sadhu hi hai!”    mansingh raja ne  maphi mangi….

“… sadhu  ke dekhakar laachaar , mohtaaj nahi kahenaa chahiye ..un ka aadar karanaa chaahiye ….sadhu santo ki nindaa karane se , sunane se vipadaa aaye,  puny nash ho jaaye, mati mari jaaye aisa nahi ho….. sant ka ninda nahi kare …sadhu santo ko to maan ki ichha nahi hoti… lekin un ko pranaam karane se , un ka maan karane se karane wale ka apaar mangal  hota…maine aap ko aisa prashn kar ke apmaan kiya,  mere ko paap lag gaya” aisa raja mansingh bole…

Bramhan kanyaaye boli, “aamer naresh .. hamaara apamaan nahi  huaa … lekin guruji ke kary par shankaa huyi isliye is galati ki guruji se maaphi mang lo …!”

..raja mansingh budhdimaan the..akbar un ki budhdimatta pe naaj karataa tha …ye aitihaasik ghatanaa hai…raja mansingh ne bapu dindayaal majaraj se maphi mangi ki, “mai aap ke baare me galat soch rahaa  tha..mai aap ka  aparaadhi hun”

Maharaj ji bole,  “..log santo me dosh dekhate , un ki  ninda karate to  budhdi kharaab akarate ..raajan tumharaa kasur nahi…. santo ka sang hai to bhagavan ke bhajan ka rang aataa aur  gandi chij ka sang hoga to gandi chij kaa hi  gandh aayegaa…ye sang ka rang hai ! ..ramaayan me likha hai ki marubhumi me mrug  bananaa achha hai lekin bhagavan dushto ka sang naa de..!”

kabira darshan sant ke saahib aaye yaad l

lekhe me wo hi ghadi,  baki ke din baad ll

sant ka darshan hote wohi din jindagi ke unchi  kamaayi  ke hote…baki ke din khaa-pi ke gaye…

…dev rushi naarad kaliyug ke prabhaav se bahot dukhi huye aur bramhaaji ko bole ki ,  “kaliyug ka ku- prabhaav itanaa adhik badh gayaa hai ki achhe log bhagavan ki bhakti sadhan bhulkar nindaa chugali me phasate….tirtho me jaate to bhi kisi sadhu maharaj ka darshan nah karate….koyi milate to ve sadhuoke naam par kaalimaa lagaanewale hote…. “hamaare guruji  ye maange” aisa kar ke dhokhaa- dhadi karane wale sadhu milate…. isliye logo ki shradhdaa tut gayi.. log bahot dukhi hai….. achhe sadhu ko koyi puchhataa nahi  hai…un ke daivi kary ka  phaayadaa nahi lete…. budhdimaan bhi aatta , daal,  roti kamaaye khaaye isi me samay bardbaad karate …..!kuchh upaay kijiye bhagavan!”

Bramhaa ji tanik shant huye … …..phir bramhaji ke aankho me chamak aur  chehare pe prasannata aayi…..bole…narad bahot achha prashn kiya…  kaliyug me kaliyug ka bhai adharm ghus gaya hai….ek mantr hai… is mantr se kaliyug ke dosh door honge… antaryaami ram ka krupaa prasaad paake   log  dukho se paar honge..!

mantr hai:-

hare ram hare ram

ram ram har hare

hare krushn hare krushn

krushn krushn hare hare..

to kaliyug me bhagavan ka naam ka jo ye bhajan karega us ke ghar me kaliyug ka prabhav kam ho jayega..

… bhajan karate  hath ki tali bajati to hath  pavitr hote ,bolate to jibh pavitr hoti….man pavitr hotaa..

ram ram ram” aisa  3 baar kahene se kisi bhi kaam me purnataa ho jaati…. aisa ram naam ka prabhaav hai….

(Pujya Bapu ji shlok bole…)

ye bhagavan shiv ji ne paravti ko kahaa….

parvati ji  vishnu sahastr naam kar ke,  baad me bhojan karati ….to shiv ji ne puchhaa,   “abhi tak bhojan nahi kiyaa?” …. parvati ji boli, “nath, mera  niyam baaki hai…”

jo sadhak bhajan niyam nahi karate un ko bhagavan  ki  kimat nahi hoti…

narayan narayan narayan narayan

satsang me vo hi log aate jin par bhagavan ki vishesh krupa hoti hai..jin ke puny jage hai…purv ke paap se durachaari  ko “harinaam naa suhaave”..us ko bhagavan ka naam achha nahi lagataa…

bhagavan krushn gitaa me bolate ki , “dukhad samay me mere ko smaran karo…yudd jaisa ghor kaam karate huye bhi mujhe smaran karo”

….jo bhi kaam karate to  karate karate bhagavan ka naam sumiran karo….lekin is me kaam ka mahatv banaa rahegaa…to jo bhi kaam karate wo bhagavan ke liye kare to bedaa paar!sab samay me jo bhi kaam karate sab man budhdi indriyo se jo bhi karate ..sab bhagavan ko arpit kare….

3 prakaar ka sumiran hota hai….

1)kriya jany sumiran

2) smruti jany sumiran

3)bodhjany (gyanmay) sumiran

Kriya jany sumiran…munh se ram ram bol rahe hath se tali baja ke heel rahe…ye ho gayaa kriyajany sumiran..

Smruti jany sumiran… “mai bhagavan ka aur bhagavan mere” is ki pakki smruti ho jaaye….to mere mere aisa bolanaa nahi padegaa….mai marwadi mai is ki lugaayi aisa yaad karanaa padataa hai kya tum ko?aise ye smrutijany sumiran hai…

Bodh jany sumiran me sab vasudev hai..jo antaryami dev hai….bimari aati to sharir me aati, sukh dukh aata to vruttiyo me aataa…achhayi burayi aati to man budhdi me aati….marate to sharir marataa …hamaaraa aatma amar hai …aisa gyan may sumiran hai….

..ek beta chal basaa aur dusare bete ko beta huaa….to beta mar gayaa is ka dukh huaa aur pota huaa is ka sukh bhi huaa…lekin dono ko jaananewala kaun hai?….vo hi aatma-parmaatmaa hai..apane andar chetan swarup ban ke baithaa hai…

Man tu jyoti swarup apanaa mul pahechaan l

guru ke dikhaaye marg par chalate to guru ki krupaa hai…guru sab sambhaal lenge…lekin guru se chhalkapatchhal chhidr karate to guru krupa se vanchit ho jaate…..aisa vyakti bhagavan ko nahi bhaataa….aur guru se nibhaate to hruday me bhagavan pragat ho jaate….:-)

(sadgurudev ji bhagavan ne Preetam maharaj ki kathaa sunaayi…)

Aarati huyi : aanand mangal karu aarati …

(Sadgurudev ji ne sabhi satsang premiyo ko shiv ki vachano se dhanywaad diye…)

Dhanyo mata pitaa dhanyo, gotram dhanyam kulodbhav l

Dhanyach vasudhaa devi , yatr syaat guru bhaktataa ll

(shri suresh maharaj bhajan gaa rahe hai..)

Jaraa thahero guru devaa

abhi dil bharaa hi nahi……

Om shanti.

Hari Om!Sadgurudev ji Bhagavan ki Jay ho!!!!!

Galatiyo ke liye prabhuji kshamaa kare…

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3 Comments on “DadujiDindayaal maharaj aur raja Mansingh ki kathaa”


  1. […] …जयपुर में ही है आमेर फिर भी ऐसा है.. ( महाराज दीनदयाल और राजा मानसिंह की पूरी कथा पढ़ने के लिए […]


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