संत नामदेव

एक बार संत-परिषद मिली थी। संत लोग तीर्थयात्रा करने जाते तो गोरा कुम्हार के वहाँ दो चार दिन निवास कर लेते थे। ऐसे मौके के स्थान पर भक्त गोरा कुम्हार का घर था।

एक बार ज्ञानेश्वर महाराज, मुक्ताबाई, नामदेव तथा और कई संत गोरा कुम्हार के अतिथि बने थे। सब बैठे तब मुक्ताबाई ने लकड़े की एक छोटी-सी हथौड़ी उठाई। गोरा कुम्हार से पूछाः “यह क्या है ?”

“यह मिट्टी के घड़े परखने का साधन है।” भक्त जी ने बताया।

मुक्ताबाई ने विनोद करते हुए कहाः “आप मिट्टी के घड़े बनाते हो ऐसे ही ब्रह्माजी ये मनुष्यरूपी घड़े बनाते हैं। मिट्टी के घड़े में पानी भरा जाता है और ब्रह्माजी के घड़े में ज्ञान और राम रस भरा जाता है। मिट्टी के घड़े में पानी भरने से पहले कसौटी के लिए कई लोग टकोरा मारते हैं।”

निभाड़े में घड़ा पक जाता है तब कुम्हार उसे टकोरा मारकर खात्री कर लेता है। फिर कुम्हारिन टकोरा बजाकर रखती है। घड़े बेचने वाला भी टकोरा बजाता है। खरीदने वाला ग्राहक भी टकोरा मारकर जाँच कर लेता है कि घड़ा बराबर पका तो है ! फूटा हुआ तो नहीं ! घड़ा घर में पहुँचता है तो सेठानी भी यही कसौटी करती है। आखिर में पानी भरने से पहले भी नौकर भी टकोरा मारना चूकता नहीं।

दो बाल्टी पानी रखने वाले चार पैसे के घड़े की इतनी कसौटियाँ होती हैं, इतने टकोरे खाने पड़ते हैं तो जिसमें परब्रह्म परमात्मा को प्रकटाना है उसकी भी तो पूरी कसौटी होनी चाहिए!

“देखो भक्तजी ! हम लोग भी तो ब्रह्माजी के घड़े हैं। उसमें ब्रह्मज्ञान का मधुर जल भरना है। आप जरा सबके सिर पर टकोरा मारकर जाँच करो न, कि कौन सा घड़ा कच्चा है कौन सा घड़ा पक्का है, पता चले।”

वार्ता विनोद हो रहा था। सब संत सहमत हुए। गोरा कुम्हार अपनी हथौड़ी लेकर सब संतों के सिर पर बारी-बारी से हल्के हल्के मधुर टकोरे मारने लगे। और सब संत तो सत्ता-समान में थे पर जब नामदेव की बारी आयी तो वे चिढ़कर बोल उठेः

“हम कोई मिट्टी के घड़े थोड़े ही हैं कि इस प्रकार टकोरे मारकर देखा जा रहा है ?”

गोरा कुम्हार ने न्याय दियाः “और तो सब पक्के घड़े हैं, एक यह घड़ा कच्चा है। इसे ब्रह्मज्ञान का फल पकाना नहीं आया।”

नामदेव और गुस्से में हो गये। बुद्धू को कहो कि तू बुद्धू है उसे गुस्सा आयेगा। जब क्रोध आ गया तो तू बुद्धू है ही। किसी के भड़काने से भड़क गया तो मूर्ख है ही।

शुकदेव जी जा रहे थे। लोगों ने उन्हें पागल कहा, ‘हुर्रियो….’ कहा, लड़कों ने कंकड़ पत्थर मारे फिर भी वे परम शांत…..। जड़भरतजी को राजा रहुगण डाँट रहा है फिर भी जड़भरत जी के मुख पर वही शांति….।

मुस्कराके गम का जहर जिसको पीना आ गया।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।

सब संतों ने कह दिया कि ‘हाँ, नामदेव अभी कच्चा घड़ा है।’ नामदेव भीतर ही भीतर झुंझला रहे हैं कि, ‘मुझे ये कच्चा घड़ा कह रहे हैं ! मैं जब चाहूँ तब भगवान विट्ठल दर्शन देते हैं और मैं कच्चा घड़ा ? मैं इन लोगों को बता दूँगा।’

नामदेव गये मंदिर में। विट्ठल.. विट्ठल…’ करते हुए थोड़े शांत हुए, अहंरहित हुए तो वही चैतन्य विट्ठल होकर प्रकट हो गया। नामदेव बोलेः

“प्रभु ! उन लोगों ने मुझे कच्चा घड़ा सिद्ध किया है। अब उनको दिखा दो कि मैं आपका परम भक्त हूँ।”

भगवान मुस्करायेः “नामदेव ! संतों ने जो कहा है वह सत्य कहा है। अभी तू कच्चा घड़ा है।”

“भगवान ! आप भी मुझे कच्चा घड़ा कहते हैं ?”

“हाँ नामदेव ! जैसा है वैसा कहता हूँ। तू मेरा इतना निकटवर्ती बन गया है कि मैं तुझे पक्का घड़ा बनाऊँ यह मेरे बस की बात नहीं है। तू मेरे उपदेश का निदिध्यासन नहीं करेगा। तेरा प्रेम तो बढ़ गया है पर प्रेम के साथ जिज्ञासा भी होनी चाहिए। वह अगर नहीं है तो प्रेम की धारा बहेगी अन्तःकरण से। अन्तःकरण सदा बदलता रहेगा। कभी प्रेम की ऊँचाई पाएगा कभी नीचे आयेगा। इसलिए प्रेमी भक्त होने के बाद भी तत्त्वज्ञान में छलांग मारनी पड़ेगी। मेरा उपदेश तुम्हें लगेगा नहीं।”

नामदेव भगवान से प्रार्थना करने लगेः “प्रभु ! कुछ भी हो, मुझे संतों के आगे पक्का घड़ा सिद्ध कर दो। सब के सामने मेरी इज्जत खराब हो गई है। आप कुछ भी उपाय करो।”

किसी के सामने पक्का घड़ा होने की आकांक्षा है इसी बात से पता चलता है कि घड़ा कच्चा है। कोई तुम्हें बड़ा कहे यह लालच होना ही छोटेपन की निशानी है। सचमुच सत्कर्म करने के लिए सत्कर्म करो, बड़ा कहलाने के लिए नहीं। दानी कहलाने के लिए दान मत करो लेकिन दान करना तुम्हारा कर्त्तव्य है, तुम्हारा स्वभाव है इसलिए दान करो। दिखावा करने से काम नहीं चलेगा। बम्बई और अमेरिका के लोग प्रायः परस्पर मिलते हैं तो मुख पर हास्य लहराते हैं, बिल्कुल कृत्रिम। केवल ओंठ खुलते हैं, दिल तो बन्द ही रहता है। विमान में एयरहोस्टेस भी पेसेन्जरों के साथ स्मित करके बात करती है।

भीतर तुम्हारा दिल छलके और फिर ओंठ खुल जाय तो वह मजा कुछ और ही है। हृदय की प्रसन्नता मुख पर छलके तो असली मजा है।

भगवान विट्ठल नामदेव से कहने लगेः “नामदेव ! अगर पक्का घड़ा बनना है तो एक काम कर। जंगल में अमुक जगह पर एक संत रहते हैं, विसोबा खेचर। वे ब्रह्मवेत्ता है। उनकी शरण में जा। उनका उपदेश पचाएगा तब तू पक्का घड़ा बनेगा।”

 

“प्रभु ! मैं जब चाहूँ तब आप दर्शन देने की कृपा करते हैं फिर भी मुझे विसोबा खेचर के पास जाना होगा ?”

“हाँ नामदेव ! मैं भी जब रामावतार में आया था तब गुरु वशिष्ठजी महाराज की शरण में गया था। जीव को आत्यांतिक कल्याण के लिए सदगुरु के चरणों में जाना ही पड़ता है।”

नामदेव गये। देखा तो शिवालय में शिवजी के लिंग पर पैर पसारकर वे बूढ़े साधू पड़े हैं। नामदेव के हृदय को धक्का लगा। सुना था कि संत तो ब्रह्ममुहूर्त में उठते हैं। अब सूर्योदय हो गया है फिर भी ये लेटे हुए हैं। और पैर शिवलिंग पर ?

उनको पता नहीं था कि ब्रह्मज्ञानी जब जागते हैं तब ब्रह्ममुहूर्त होता है।

ब्रह्मज्ञानी का भोजन ज्ञान ब्रह्मज्ञानी का ब्रह्मध्यान।

ब्रह्मज्ञानी की मत कौन बखाने ब्रह्मज्ञानी की गत ब्रह्मज्ञानी जाने।

ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर।।

विसोबा खेचर को देखकर नामदेव चार कदम पीछे हट गये। श्रद्धा ‘डाउन’ हो गई।

हार्ट फेल होना इतना हानिकारक नहीं, श्रद्धा फेल होना बहुत हानिकारक है। हार्ट फेल होगा तो एक बार मरेगा, श्रद्धा फेल हुई तो अनंत-अनंत बार मरना पड़ेगा।

नामदेव वापस लौटने के लिए मुड़ ही रहे थे कि वे संत बोलेः

“अरे नामदेव ! विट्ठल ने भेजा है फिर भी वापस जा रहा है ?”

“बाबा ! आपको कैसे पता चला ?” ….और आप तो भगवान शिव के पिण्ड पर पैर पसारकर सो रहे हैं ! आप ही बताओ, मैं क्या करूँ ?” बाबा का अन्तर्यामीपना देखकर नामदेव के हृदय में श्रद्धा का दीपक फिर से जगमगा उठा था।

“देख नामदेव ! मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ। पैरों में हिलने की ताकत नहीं रही। तुम ऐसा करो, मेरे पैर उठाकर वहाँ रखो जहाँ शिव न हो, अशिव हो।”

नामदेव ने बड़े आदर से, सेवाभाव से विसोबा खेचर के पैर उठाये। शिवलिंग बिना की खाली जगह पर पैर रखे। योगी के संकल्प से वहाँ भी नामदेव को शिवलिंग दिखाई दिया। नामदेव ने तुरन्त पैर वहाँ से हटाकर दूसरी जगह रखा तो वहाँ भी शिवलिंग, तीसरी जगह रखा तो वहाँ भी शिवलिंग। जहाँ जहाँ पैर रखते गये वहाँ वहाँ शिवलिंग दिखाई दिये। नामदेव सोच में पड़ गये…. अब पैर कहाँ रखूँ ? नामदेव की श्रद्धा उमड़ पड़ी। भावविभोर होकर उनके पैर अपने सिर पर रख दिये।

ब्रह्मनिष्ठ संत पुरुष की चरणरज सिर पर लगी तो नामदेव के ज्ञानतंतुओं की प्यास जग गई। संत श्री के चरणों में बैठ गये। आर्त भाव से प्रार्थना करने लगेः

“भगवन ! मैं आपकी शरण में आया हूँ, श्रीचरणों का आश्रय लेने आया हूँ…. अब आप मेरी प्यास बुझाइये। मुझे तत्त्वज्ञान दीजिये।”

विसोबा खेचर प्रसन्न थे। नामदेव भी अधिकारी तो थे ही। प्रेमा-भक्ति से ओतप्रोत थे। तभी तो भगवान विट्ठल प्रत्यक्ष प्रकट हुआ करते थे। ब्रह्मवेत्ता के थोड़े से उपदेश मात्र से नामदेव तत्त्वज्ञान को उपलब्ध हो गये। विट्ठल तत्त्व का ज्ञान हो गया।

देखा अपने आप को मेरा दिल दीवाना हो गया।

ना छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

नामदेव अपने आप पर सन्तुष्ट हो गये। यही बात गीता में इस प्रकार कही हैः

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धियो मद् भक्तः स मे प्रियः।।

‘जो योगी निरन्तर संतुष्ट हैं, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए हैं और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय हैं।’

(भगवद् गीताः 12.14)

भगवान हमें प्रिय लगें यह तो ठीक है लेकिन जब भगवान को हम प्रिय लगने लगें तब पूरा काम बन जाता है। नारायण….. नारायण….नारायण….।

नामदेव अपने निवास स्थान में पहुँचे। एक दिन बीता… दूसरा दिन बीता… वही ब्रह्मानन्द की गहरी मस्ती में मग्न। तीसरे दिन भगवान विट्ठल वहाँ प्रकट हो गयेः

“हे नामदेव ! क्या हो गया तेरे को ? अब मेरे पास मंदिर में आता नहीं ?”

“भगवान क्षमा करो। पहले मैं मानता था कि आप वहीं एक ही जगह पर हो परन्तु अब पता चला है कि ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ आप न हो। फिर आपको रोज-रोज परेशान करने वहाँ क्यों आऊँ ?”

भगवान मुस्कुराते हुए बोलेः “देख नामदेव ! आज तक तू मेरे पास आता था पर अब मैं तेरे पास आ गया हूँ। ऐसी महिमा है ब्रह्मज्ञानी सदगुरु के उपदेश की !”

यह है मनरूपी कल्पवृक्ष का चमत्कार। आपके पास भी यह कल्पवृक्ष है। आप जैसा चाहते हैं, जहाँ चाहते हैं वहाँ पहुँच सकते हैं।

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