संत एकनाथ

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

पैठण में एकनाथ जी महाराज हो गये। वे जब दस-बारह साल के थे तब देवगढ़ गये और दीवान साहेब जनार्दन स्वामी के शिष्य बने।

जिस आदमी का कोई सदगुरु नहीं उस आदमी जैसा अभागा दुनियाँ में मिलना मुश्किल होगा। जो निगुरा है, चाहे दुनियाँ की सारी विद्याएँ जानता हो, बाल की खाल उतारता हो, बड़ा वैज्ञानिक हो, ‘सब कुछ जानता हो फिर भी जिसके जीवन में कोई सदगुरु नहीं है वह शिक्षित हो सकता है, दीक्षित नहीं।

जिसके जीवन में दीक्षा नहीं है वह चाहे लोगों की नज़रों में कितने भी ऊँचे पहाड़ों पर रहता हो पर भीतर में असन्तुष्ट होगा, दुःखी होगा। जो दीक्षित है वह चाहे रमण महर्षि जैसा हो, रामकृष्ण जैसा हो, कौपीन का टुकड़ा धारण करने वाला जड़भरत या तो शुकदेव जैसा हो, वह ईश्वर के साथ खेलनेवाला होता है, भीतर से पूर्ण तृप्त रहता है।

नन्हा सा बालक एकनाथ रात्रि को उठा, चुपके दरवाजा खोला, दादा-दादी को सोते हुए छोड़कर घर से निकल गया। पैदल चलकर देवगढ़ पहुँचा। वहाँ के दीवान साहब जनार्दन स्वामी के चरणों में जा पहुँचा। दीवान साहब ने कहाः

“मैं तो किसी को शिष्य नहीं बनाता।”

“महाराज ! आप भले शिष्य नहीं बनाते मगर मैं आपको गुरुदेव के रूप में स्वीकार करके दीक्षित होना चाहता हूँ।”

दीक्षा का अर्थ क्या है ? दी = जो दिया जाता है। क्षा = जो पचाया जाता है।

सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म का सामर्थ्य जो दे सकते हैं वे ‘दी’ की जगह पर हैं और उस सामर्थ्य को जो पचा सकता है वह ‘क्षा’ की जगह पर है। इन दोनों का जो मेल है उसे दीक्षा कहते हैं।

‘गुरु’ का मतलब क्या ? गु = अन्धकार। कई जन्मों में हमारे स्वरूप पर अविद्या का अन्धकार पड़ा है। ‘रू’ = प्रकाश। अविद्या के अन्धकार को आत्मज्ञान के प्रकाश से जो हटा दें उनका नाम गुरु है। कान फूँककर, कंठी बाँधकर दक्षिणा छीन ले उसका नाम गुरु नहीं है। वह कुलगुरु हो सकता है, सांप्रदायिक गुरु हो सकता है। सच्चे गुरु तो वे हैं जो तुम्हारी अविद्या को मिटाकर तुम्हें अपनी महिमा में जगा दें।

कबीर जी ने कहाः

कबीरा जोगी जगत गुरु तजे जगत की आस।

जो जग का आशा करे तो जग गुरु वह दास।।

जो जगत की आशा से रहित है, संसार के पदार्थों की आसक्ति से मुक्त है, अनपेक्षः है वह सच्चा गुरु है। जो जगत की आशा करता है वह तो जगत का दास है और जगत उसका गुरु है।

जिसके जीवन में ऐसे गुरु आ जाते हैं उसका उद्धार तो हो ही जाता है, उसकी निगाहों में आनेवाला भी निष्पाप हो जाता है। जो सच्चे महापुरुष हैं उनके दर्शन से, उनको छूकर आनेवाली हवा के स्पर्श से भी हमें हृदय में तसल्ली मिलने लगती है। ऐसा अनुभव करनेवाले बोलते भी हैं-

तुम तसल्ली न दो, सिर्फ बैठे ही रहो….।

मेहफिल का रंग बदल जाएगा।

गिरता हुआ दिल भी सँभल जायगा।।

हे गुरुदेव ! आप आश्वासन न दो, प्रवचन न करो, केवल हमारे समक्ष विराजमान रहो…. आपका दीदार होता रहे…. बस। दर्शन मात्र से हमें बहुत-बहुत लाभ होता है।

अपेक्षाओं में, कामनाओं में, चिन्ताओं में, भय में, ग्लानि में, घृणा में, राग-द्वेष में, लोभ-मोह में हमारा दिल गिर रहा है। पूर्ण बोधवान आत्मवेत्ता सदगुरुदेव को देखते ही हमारा गिरता हुआ दिल सँभलने लगता है।

बालक  एकनाथ ने दीवान साहब को रिझाया। दीवान साहब ने कहाः “मैं तो राजा का नौकर हूँ। देवगढ़ के राजा साहब का मैं दीवान हूँ। तू किसी साधु-सन्यासी का चेला हो जा।”

“महाराज ! साधयन्ते परं कार्यं इति साधु। जिसने परम कार्य साध लिया है वह साधु है। आपने परम कार्य साध लिया है देव ! मुझे अपनी शरण में रहने दो।”

सदगुरु ने बालक एकनाथ को शरण में रख लिया। एकनाथ जी वर्षों तक गुरु की सेवा में रहे। वे हर समय कुछ न कुछ सेवा ढूँढ लेते थे। बड़ी तत्परता से, बड़े चाव से, उत्साहपूर्वक सेवा करके अपना समय सार्थक कर लेते थे। हररोज प्रभात काल में दीवान साहब ध्यानमग्न जो जाते तब एकनाथ जी द्वार के बाहर चौकीदार बनकर खड़े हो जाते ताकि कोई गुरुदेव के ध्यान में विक्षेप न डाले। गुरु महाराज स्नान करते तब एकनाथ जी रामा बन जाते, मौसम के अनुसार गर्म या ठण्डा पानी रख देते। कपड़े ला देते गुरुदेव के उतरे हुए कपड़े धो लेते। गुरु महाराज  बेटा स्कूल जाता तो सेवक बनकर एकनाथ जी उसे छोड़ने और लेने जाते। दीवान साहब ऑफिस का काम करते तब एकनाथजी मेहता जी बनकर सेवा में जुट जाते। हर समय सेवा खोज लेते।

जिन सेव्या तिन पाया मान…..।

सेवक को सेवा में जो आनन्द आता है वह सेवा की प्रशंसा से नहीं आता। सेवा की प्रशंसा में जिसे आनन्द आता है वह सच्चा सेवक भी नहीं होता।

 

आप अपनी सेवा, अपना सत्कर्म, अपना जप-तप, अपनी साधना जितनी गुप्त रखोगे उतनी आपकी योग्यता बढ़ेगी। अपने सत्कर्मों का जितना प्रदर्शन करोगे, लोगों के हृदय में उतनी तुम्हारी योग्यता नष्ट होगी  लोग बाहर से तो सलामी कर देंगे किन्तु भीतर समझेंगे कि यह तो यूँ ही कर दिया। कोई नेता बोलेगा तो लोग तालियाँ बजाएँगे, फिर पीछे बोलेंगे, यह तो ऐसा है। संत महापुरुषों के लिए ऐसा नहीं होता। महात्मा की गैरहाजरी में उनके फोटो की, प्रतिमाओं की भी पूजा होती है।

हम अपने श्रोताओं को यह सब क्यों सुना रहे हैं ? क्योंकि उन्हें जगाना है। मैं तुम लोगों को दिखावे का यश नहीं देना चाहता। वास्तविक यश के भागी बनो ऐसा मैं चाहता हूँ। इसीलिए सेवाधर्म के संकेत बता रहा हूँ।

अब वापस देवगढ़ चलते हैं।

प्रातःकाल का समय है। दीवान साहब जनार्दन स्वामी अपने ध्यान-खण्ड में समाधिस्थ हैं। बाहर एकनाथ जी सतर्क होकर पहरा दे रहे हैं। इतने में देवगढ़ के राजा का संदेशवाहक आदेशपात्र लेकर भागता-भागता आ पहुँचा। शीघ्रता से दीवान साहब के पास जाने लगा तो एकनाथ जी गर्ज उठेः “रूको।”

“अरे क्या रुकना है ? अभी राजा साहब को दीवान जी की खास जरूरत है, शत्रुओं ने अपने नगर पर घेरा डाला है। तोपों की आवाज आ रही है, सुनते नहीं ? राजा साहब ने दीवानजी को तत्काल बुलाया है। फौजी लोग दीवान साहब को खूब मानते हैं। वे संकेत करेंगे तो फौज में प्राणबल आ जायेगा। अपने गुरुजी को जल्दी बुलाओ।”

“नहीं….अभी नहीं। गुरुदेव अभी राजाओं के राजा विश्वेश्वर से मिले हैं। अभी उनको राजाजी का आदेशपत्र नहीं पहुँचेगा।”

“अरे बच्चा ! तू क्या करता है ? कैसी विकट परिस्थिति….।”

“कुछ भी हो, मैं अपने कर्त्तव्य पर दृढ़ हूँ। चाहे कोई भाला भोंक दे, मैं अपने निश्चय से च्युत नहीं होऊँगा।”

“ऐ बालक ! मैं बहुत जल्दी में हूँ। अपने नगर पर खतरा है। समय गँवाया तो संभव है शत्रुओं का दल नगर को खेदान-मैदान कर देगा। तू जल्दी मुझे दीवानजी से मिलने दे।”

“मेरे गुरुदेव से अभी कोई नहीं मिल सकता।” एकनाथजी अपने कर्त्तव्य में दृढ़ रहे।”

“अरे छोकरा ! “गुरु…. गुरु…” करके कब तक समय बिगाड़ता रहेगा ? तेरे गुरु तो राजा साहब के नौकर हैं।” दूत अब व्याकुल होने लगा था।

“नौकर तो गुरुदेव का शरीर हो सकता है। मेरे गुरु तो जो अनंत अनंत ब्रह्मांड के स्वामी हैं वहाँ पहुँचे हैं। मेरे गुरुदेव के लिए तुम क्या बोलते हो ?”

“अरे पगले ! तू समय को नहीं पहचान रहा है ? मैं राजा साहब का खास आदमी हूँ और दीवानजी राजा साहब के वहाँ काम करते हैं। उनके लिए मैं राजा साहब का परवाना लाया हूँ। शीघ्रातिशीघ्र उन्हें ले जाना है। राज्य पर खतरा है। सुन, तोपों की आवाज आ रही है। तू पागलपन करेगा तो नहीं चलेगा। ले यह परवाना। मैं तो जाता हूँ। अब तेरी जिम्मेदारी है।” दूत रवाना हो गया।

परवाना हाथ में उलट-पलटकर एकनाथजी सोचने लगेः “अब क्या करना चाहिए ? गुरुदेव ! अब आप ही प्रेरणा कीजिये। अगर मैं आपको जगाता हूँ तो आपके मन में होगा कि इतनी-सी सेवा नहीं कर पाया ? अगर नहीं जगाता हूँ तो बाद में आपको होगा कि अरे नादान ! जब राज्य के कल्याण का प्रश्न था, सुरक्षा का प्रश्न था तो मुझे जगाकर कह देता ? राज्य पर शत्रुओं ने घेरा डाला और तू ऐसे ही बैठा रहा चुपचाप, मुझे बताया तक नहीं ? बस, यही है तेरी सेवा ? गुरुदेव….! गुरुदेव….!! अब मैं व्यवहार में कैसे दक्ष बनूँ ? आपको जगाता हूँ तो भी और नहीं जगाता हूँ तो भी मेरी अदक्षता ही सिद्ध हो सकती है। मैं क्या करुँ मेरे प्रभु ?”

आपके जीवन में भी ऐसा प्रश्न आएगा ही। इन इतिहासों की कथाओं के साथ हमारे जीवन की कथाएँ भी जुड़ी हैं। कोई भी कथा तुम्हारे जीवन की कथा से नितान्त अलग नहीं हो सकती। चाहे वह कथा रामजी की हो या श्रीकृष्ण की हो, देवी-देवता की हो या फरिश्ते की हो, जोगीश्वर की हो या झुलेलाल की हो, उन कथाओं के साथ तुम्हारे जीवन की कथा भी मिलती जुलती है। इन सारी कथाओं से सार लेकर तुम्हें अपने जीवन की कथा सुलझाना है।

एकनाथ जी भीतर ही भीतर गुरुदेव से मार्गदर्शन पाने के लिए पूछ रहे हैं, आर्तभाव से प्रार्थना कर रहे हैं, व्याकुल हो रहे हैं। आँखों से टप….टप… आँसू बह रहे हैं। “नाथ ! अब बताओ, मैं क्या करूँ…. मैं क्या करूँ ?”

भावपूर्वक भगवान से प्रार्थना की जाय, हृदयपूर्वक गुरुदेव से प्रार्थना की जाय तो तुरन्त सुनी जाती है। ऐसा जरूरी नहीं कि प्रार्थना में कोई खास शब्द-रचना होनी चाहिए, प्रार्थना श्लोकबद्ध हो, दोहे-चौपाई में हो, कोई विशेष भाषा में हो। नहीं। प्रार्थना कैसे भी की जाय लेकिन अपने हृदय के निजी भाव से रंगी हुई हो, दिल की गहराई से की हुई तो वह तुरन्त सुनी जाती है।

एकनाथजी ने हृदयपूर्वक प्रार्थना की और रोये।

संसारी संसार के लिए रोता है जबकि प्रभु और सदगुरु का प्यारा प्रभु के लिए, सदगुरु के लिए रोता है।

एकनाथ जी रोये। हृदय से प्रार्थना की धारा चली, आँखों से आँसुओं की धारा चली। फिर आँखे बन्द हो गई, थोड़ी देर शांत हो गये। गुरुतत्त्व का संस्पर्श हो गया। कुछ तसल्ली मिल गई। आँखें खोली। सामने देखा तो गुरुदेव जिन वस्त्रों को धारण करके फौज की सलामी लेने जाते थे वे वस्त्र टँगे हुए हैं। एकनाथजी के चित्त में चमकारा हुआ, कुछ युक्ति हाथ लग गई। मुख पर एक  विलक्षण दीप्ति छा गई। वे उठे, गुरुदेव के वस्त्र पहन लिए, घोड़े पर छलांग मारी और पहुँच गये फौजियों के समक्ष। उनको हिम्मत देते, उनका उत्साह जगाते हुए, उनकी देशभक्ति को प्रकटाते हुए बोलने लगेः

 

“ऐ देश के वीर जवानों ! अपनी मातृभूमि पर शत्रुओं ने आक्रमण किया है। आज मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने का मौका आया है। देखते क्या हो ? टूट पड़ो आततायी नराधमों पर। विजय हमारी ही है। सदा धर्म की जय होती आयी है। अधर्मी लोग चाहे हजारों की संख्या में हों लेकिन धर्मवीर अगर धर्म में डटकर कर्त्तव्य लगे रहे तो ईश्वरीय शक्ति उन वीरों के लिए कार्य करेगी। पांडव पाँच ही थे, कौरव सौ थे फिर भी धर्म के पक्षकार पाँच पांडव विजयी बने। कौरव-कुल नष्ट-भ्रष्ट हो गया।

क्या अपने पास साधन कम हैं ऐसा सोचकर झिझकते हो ? ऐ बहादुर जवान ! जरा सोचो तो सही ! लंकापति रावण का मुकाबलता करते समय रामजी के पास कौन-सा बड़ा सैन्य था? वे धर्म के लिए युद्ध खेल रहे थे तो रीछ और बन्दरों ने उनके लिए कार्य किया।

क्रियासिद्धि सत्वे भवति महतां नोपकरणे।

महान् वीरों का विजय अपने सत्त्व के कारण होता है, साधनों के कारण नहीं।

आज हमें अपनी माँ-बेटियो की सुरक्षा के लिए, अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए हिम्मत जुटाना है। ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ हमें अधर्मी दुष्टों का मुकाबला करना है। अपने स्वार्थ के लिए नहीं, समष्टि हित के लिए समरांगण में कूद पड़ना है। ईश्वर का अनंत बल हमारे साथ है, डरो नहीं।”

जो तो को काँटा बोए वा को बो तू भाला।

वो भी क्या याद करेगा पड़ा था किसी से पाला।।

“ऐ वीर जवानों ! शस्त्र-सज्ज होकर निकल पड़ो धर्मयुद्ध खेलने के लिए।”

फौजी जवानों को आज दीवान साहब का शौर्यपूर्ण कुछ विलक्षण स्वरूप दिखाई दिया। ललकार सुनकर वे बहादुर जवान शत्रु सेना पर टूट पड़े और उसे तहस-नहस करके मार भगाया।

तुम अगर ब्रह्मविद्या के पथिक हो, ईश्वर के मार्ग पर चल रहे हो, सत्य की तरफ चल रहे हो तो वातावरण तुम्हारे अनुकूल आज नहीं कल होकर रहेगा। तुम डरो नहीं।

ऐसे नेताओं को मैं जानता हूँ जिनके झुण्ड के झुण्ड एम.पी. और एम.एल.ए. हाथ में थे। उनके पुण्य क्षीण हो गये तो कुर्सी से हटाये गये, दूसरे लोग आ गये और मुख्य मंत्री बन गये।

मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ कि जो जेल में थे और समय पाकर राष्ट्रपति बन गये। ऐसे लोगों को भी हम सब जानते हैं जिन पर घोर अन्याय हो रहा था, बार-बार जेल में डाल दिये जाते थे फिर भी धर्म को पकड़े रहे वे समय पाकर राष्ट्रपिता होकर आदर पाने लगे।

आपके अन्दर ईश्वर का असीम बल छुपा है भैया ! आप डटे रहो अपनी निष्ठा में, अपने धर्म में, अपने कर्त्तव्य कर्म में। लगे रहो सत्कर्म में। अपनी निष्ठा छोड़ो मत। ऐसा नहीं कि गंगा गये तो गंगा दास…. यमुना गये तो यमुनादास… नर्मदा गये तो नर्मदा शंकर….। गये बिहार तो हो गये बिहारी लाल के।

अपनी आत्म-निष्ठ का भरोसा करो।

जिसके जीवन में आत्मज्ञान पाने का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं है वह इधर-उधर के झोंकों में उलझ जायेगा।

शिवजी की पूजा करो लेकिन शिवतत्त्व को अपने से भिन्न मानकर नहीं। शिवजी की दृष्टि में समानता है। उनके दरबार में परस्पर जन्मजात शत्रु प्राणी भी शांत भाव से बैठते हैं। तुम अपने जीवन में समानता लाओ तो शिवजी तुम्हें प्रसन्न मिलेंगे।

हिलाने वाली परिस्थितियाँ तो आयेंगी, पर तुम दक्ष रहो।

अपनी फौज की विजय हो गई। एकनाथ जी वापस लौट आये। अपने साधारण वेश में पुनः चौकीदार बैठ गये, मानो कुछ हुआ ही न हो। नगर के लोगों में चर्चा हो रही थीः

“अरे भाई ! दीवान साहब जनार्दन स्वामी धन्य हैं ! आज तो उनका निराला ही रूप देखने को मिला। जवान की नाईं बोल रहे थे। फौज को ऐसा उत्साहित किया कि जवानों में प्राणबल उमड़ पड़ा। अपनी विजय हो गई।”

लोग रास्ते में जाते-जाते इस प्रकार की बातें कर रहे थे और कमरे में बैठे-बैठे जनार्दन स्वामी सुन रहे थे। वे बाहर निकले, लोगों से जानकारी प्राप्त की। उनको आश्चर्य हो रहा था कि मैं तो कमरे में ही बैठा था। यह कैसे हुआ ?

आकर एकनाथजी से पूछा तो एकनाथजी प्रणाम करते हुए विनीत भाव से कहने लगेः

“क्षमा करें गुरुदेव ! आपकी आज्ञा के बिना आपके वस्त्रों का मैंने उपयोग किया। राजा साहब के वहाँ से दूत परवाना लेकर आया था, आप समाधि में थे और….।”

एकनाथजी ने सारी बात बताकर आखिर में फिर से क्षमा माँगते हुए कहाः “स्वामी ! मुझसे कुछ अनुचित हो गया हो तो क्षमा करना नाथ !”

“नहीं बेटा ! तू व्यवहार में दक्ष है। शाबाश ! बहुत अच्छा किया तूने। मैं प्रसन्न हूँ।”

दिन बीतते गये। एकनाथ जी की सेवा जोर पकड़ती गई। वर्ष के आखिरी दिन आये। दीवानजी को राज्य के हिसाब की बहियाँ पेश करनी थी। उसमें कुछ गलती रह गई थी। दीवानजी ने एकनाथ जी से कहाः

“बेटा ! जरा जाँच करना, हिसाब तो ठीक है न !”

“जी गुरुदेव !”

एकनाथजी ने हिसाब देखते-देखते पूरा दिन लगा दिया और तो सब ठीक था लेकिन एक पाई की भूल आ रही थी। कहाँ गड़बड़ थी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एकनाथजी लगे रहे। शाम ढली। रात्रि का प्रारंभ हुआ। सर्वत्र अंधेरा छा गया। फिर भी खाना पीना भूलकर एकनाथ लगे हैं हिसाब के पीछे। नौकर कब दीया रख गया, कुछ पता नहीं। मध्यरात्रि हुई फिर भी हिसाब पूरा नहीं जमा।

 

ब्रह्ममुहूर्त हुआ। गुरुदेव जागे। दैनिक नियमानुसार एकनाथ दिखे नहीं। जनार्दन स्वामी ने सोचाः दिन में दसों बार दर्शन करनेवाला एकनाथ कल से दिखता नहीं। क्या बात है ! गुरुजी गये कमरे में तो दीपक जल रहा है। एकनाथ बहियों के ढेर के बीच बैठा है, हिसाब जाँचने में मशगूल होकर। गुरुदेव पधारे फिर भी कुछ पता नहीं। दीवान साहब दीये का प्रकाश रोकते हुए खड़े रह गये। अक्षरों पर अन्धेरा छा गया फिर भी हिसाब में एकाग्र एकनाथ को सब कुछ ज्यों का त्यों दिख रहा था।

इतने में पाई की भूल पकड़ में आ गई। हिसाब सुलझ गया। एकनाथ खुश होकर बोल उठेः

“मिल गई….. मिल गई…..!”

“क्या मिल गई बेटा ?”

अरे ! यह तो गुरुदेव की आवाज ! एकनाथ ने ऊपर देखा तो गुरुदेव स्वयं खड़े हैं।

“गुरुदेव ! आप….?”

“अरे ! मैं तो आधे घण्टे से यहाँ खड़ा हूँ।”

“मुझे पता नहीं चला नाथ ! आपकी दी हुई सेवा में निमग्न था, आपके दर्शन नहीं कर पाया। एक पाई की भूल आ रही थी हिसाब में। अब वह मिल गई।”

“बेटा ! एक पाई की भूल के लिए रात-दिन लगा रहा खाये-पिये बिना ?”

“गुरुदेव ! भूल एक पाई की हो चाहे लाख रुपये की हो। भूल तो भूल ही है। आपने भूल निकालने के लिए कहा था तो मैं भूल को कैसे रहने दूँ ?”

मुनीम बनो तो ऐसे बनो। अपने कर्त्तव्य में चुस्त। आज का काम कल पर रखा तो कल का काम परसों पर चला जायेगा। एक सप्ताह में तो चढ़े हुए काम का ढेर हो जाएगा। वह काम का बोझ दिमाग में ‘टेन्शन’ पैदा करेगा।

व्यवहार में दक्ष बनो। इस काम के बाद वह काम करना है, उसके बाद यह। एक बार संकल्प करके आप संकल्प के मुताबिक काम कर लेते हैं तो आपकी योग्यता बढ़ने लगती है। एक बार संकल्प करके उसके मुताबिक आप काम नहीं करते तो मन आलसी और दुर्बल हो जाता है। आप पर हावी हो जाता है और अपनी गुलामी में पीसता रहता है। इस गुलामी से छूटने के लिए पहले सत्संकल्प करो और फिर डटकर उस संकल्प के मुताबिक कार्य पूर्ण करो। दक्षता बढ़ाओ।

एकनाथ जी का जवाब सुनकर गुरुमहाराज का हृदय बरस पड़ा। उसके नयनों से ईश्वरीय कृपा का प्रपात एकनाथ जी के हृदय में हो गया। सदगुरु और सत्शिष्य एकाकार बन गये। सत्शिष्य निहाल हो गया। वे कुछ समय के लिए आनन्दस्वरूप परमात्मा में खो गये, समाधिस्थ हो गये। गुरुदेव भी अधिकारी उर-आँगन में ईश्वरीय अमृत की वर्षा करके मानो आहलादित हो गये। अपना सारा आध्यात्मिक खजाना शिष्य के हृदय में उड़ेलते हुए मधुर वाणी से बोलेः

“एकनाथ ! बेटा ! यह तेरे अकेले के लिए नहीं दिया है। लोग विषय-विकारों में और मनःकल्पित साधनों में समय बरबाद कर रहे हैं। दिल के देवता का पता  ही नहीं। अब तू समाज में विचर। लोगों को दिल के देवता की तरफ आकर्षित कर। आध्यात्मिक खजाने का अमृत उनको चखा।”

 

एकनाथजी तीर्थों में लोगों को आंतर तीर्थ की खबर देते, आत्म-तीर्थ में स्नान करने की विधि का प्रचार करते हुए आखिर पैठण में स्थिर हुए। अपने घर के प्रांगण में ही कथा-सत्संग करना शुरु किया। प्रारंभ में पाँच सात व्यक्ति आये, फिर दस-पन्द्रह, बीस-पच्चीस-पचास-सौ-दौ सौ भक्त सत्संग सुनने आने लगे। घर का प्रांगण छोटा पड़ने लगा। खिले हुए मधुर फूल की सुगन्ध की तरह एकनाथ जी की ख्याति चहुँ ओर फैलने लगी। उनकी कथा में लोग आत्मरस के घूँट भरने लगे। टूणा-टोटका-तावीज करनेवाले पाखण्डी लोगों की ग्राहकी कम होने लगी।

एकनाथ जी आत्मवेत्ता संत थे। आत्मबल बढ़ाने की बात कहते थे। स्वावलंबी और स्वाधीन बनने की बात होने लगी।

जो दूसरों को गुलाम बनाता है वह स्वयं गुलाम बनता है। जो दूसरों को मूर्ख बनाता है वह स्वयं मूर्ख रहता है। जो दूसरों से धोखा करता है वह स्वयं पहले अपने दिल को ही धोखा देता है बाद में ही दूसरों से धोखा कर पाता है।

दूसरों को स्वतन्त्र बनाओ तो आप स्वतंत्र रहोगे। दूसरों को जितने पराधीन बनाओगे उतने ही आप पराधीन बने रहोगे। दूसरों को खीर खांड खिलाओगे तो आपकी भी खीर-खांड बढ़ती रहेगी। यह ईश्वरीय अकाट्य नियम है।

शक्कर खिला शक्कर मिले टक्कर खिला टक्कर मिले।

नेकी का बदला नेक है बदों की बदी देख ले।।

दुष्ट लोग एकनाथ जी का विरोध करने लगे। कुप्रचार करने वालों की संख्या बढ़ गई। अच्छी बात फैलाने में समय, शक्ति चाहिए। गन्दी बात फैलाने में उतनी समय-शक्ति नहीं लगानी पड़ती। निम्न स्तर पर जीने वालों की संख्या सदा अधिक हुआ करती है। ऐसे लोगों की टोली बन गयी। टोली का लक्ष्य रहा कि एकनाथजी का प्रभाव कैसे तोड़ें। फैसला हुआ कि हररोज दो-चार लोग एकनाथ जी के सत्संग में पहुँच जाय और उनकी हिलचाल-चेष्टा का निरीक्षण करें। उनकी कुछ कमजोरी हाथ लग जाय तो उसका कुप्रचार करें।

एकनाथ जी जब सत्संग करते तो प्रारंभ में अपने प्रियतम परमात्म-भाव में गोता, लगाते, सबमें बसे हुए अपने सर्वव्यापक ईश्वर से एकता का स्मरण कर लेते। सब श्रोताओं में बसे हुए ईश्वर का स्मरण करके, सबमें अपने आपका अनुसंधान करके जो स्वागत किया जाता है इससे बढ़कर और कोई स्वागत नहीं होता। ‘फलाने मिनिस्टर का स्वागत करता हूँ, फलाने बाबा का स्वागत करता हूँ….’ ऐसा कहकर जो मौखिक स्वागत किया जाता है उससे बढ़िया स्वागत यह है कि उनमें छुपे हुए सर्व व्यापार परमात्म चैतन्य को प्रणाम करके एक अद्वैत तत्त्व में गोता लगाकर जाय। यह सबसे बढ़िया स्वागत है।

मैं आपका ऐसा स्वागत हररोज करता हूँ ऐसा मुझे लगता है। एकनाथ जी महाराज भी अपने श्रोताजनों का ऐसा ही स्वागत किया करते थे। सबका ऐसा स्वागत करते थे तो जो चंड लोग थे उनका भी तो स्वागत हो जाता था। संत की नज़रों में वे चंड नहीं थे। संसार के व्यवहारु लोगों की नज़रों में वे चंड थे, सज्जनों की नज़रों में वे चंड थे। संत की नज़रों में उनमें भी अपना राम छुपा था।

एकनाथ जी महाराज के सत्संग में एक प्रतिभा-सम्पन्न महिला आया करती थी। गौरवर्ण देह, घुंघराले बाल, सफेद साड़ी, रत्नजड़ित गहने, आकर्षक तेजस्वी व्यक्तित्व। वह महिला मानो कोई अतिमानवीय हस्ती थी। सबसे आगे आकर बैठती थी।

कथा-प्रसंग में कोई विशेष महत्त्वपूर्ण बात आती तो एकनाथ जी उस महिला की ओर निहारते हुए बात बताते, गहरी बातों की अमृतधारा बहती। एक सामान्य नियम है कि जो विद्यार्थी ठीक से ध्यानपूर्वक सुनता हो, समझता हो उसकी तरफ अध्यापक भी अधिक ध्यान देता है, उसी को लक्ष्य करके सिखाता है। जो श्रोता एकाग्र होकर सुनता है उसकी ओर वक्ता की दृष्टि बार-बार जाती ही है।

चंड लोगों ने नोट कर लिया कि संत उस महिला की तरफ बार-बार निहारते हैं। वह महिला भी सबसे आगे जाकर बैठती है। दाल में कुछ काला है।

एक दिन कथा सुनकर महिला बाहर निकली तो चंड लोगों ने उसका पीछा किया। ऐसे लोग जैसा गुंडागर्दी का आचरण करते हैं वह सब वे पीछे-पीछे जाते हुए करने लगे। ऐसी-वैसी बातें बकते गये और वह महिला उनकी उपेक्षा करके अपना रास्ता तय करती गई, गोदावरी नदी की ओर आगे बढ़ती गई। चंड सोचने लगे कि नदी के उस पार कोई बंगला-महल होगा वहाँ रहती होगी।

महिला गोदावरी के तीर पहुँची, पानी में उतरी, कमर तक पानी में गई तब भी दुष्टों को कोई अन्दाज नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। वे तो बक रहे थेः

“वहाँ कहाँ मरने जा रही है ? ” एक बोला।

“मेरे घर में ही चली आ…।” दूसरे ने कहा।

“मेरी लुगाई हो जा मैं सुखी कर दूँगा….।” तीसरे ने अपना पापीपना प्रकट किया।

इस प्रकार न जाने क्या-क्या बकते रहे और महिला गहरे पानी में आगे बढ़ती रही। जब गरदन तक पानी आ गया तब ये चांडाल चौकड़ी घबड़ायी। सोचा कि अब वह मरेगी। उसकी आत्महत्या हमारे सिर पर पड़ेगी। इतने में तो वह महिला पानी में अदृश्य हो गई।

अब चंड लोग आपस में लड़ने लगे कि तूने गालियाँ दी, तूने ऐसा-वैसा कहा इसलिए वह मरी। आपस में लड़ाई-टंटा करने लगे तो दूसरे चंड लोग भी आ पहुँचे। किसी ने सलाह दी कि आपस में लड़ोगे तो मारे जाओगे, बेमौत मारे जाओगे। तुम सब मिलकर घोषणा कर दो कि एकनाथ जी महाराज ने माई को कुछ ऐसा-वैसा कह दिया कि माई ने बुरा मानकर गोदावरी नदी में डूबकर आत्महत्या कर ली। अपना काम बन जायगा।

 

चंड लोगों की मंडली ने ऐसा ही किया। जनता को किसी के बारे कोई अच्छी बात सुनाओगे तो उसे सन्देह होगा कि यह ऐसा होगा कि नहीं परन्तु कोई बुरी बात सुनायी जायगी तो लोग तुरन्त स्वीकार कर लेंगे कि हाँ, यह सच्ची बात है। इन बाबा लोग का क्या भरोसा? समाज में बाबा लोग, संत-महात्मा लोग यदा कदा बदनाम हुआ करते हैं।

भारत के सच्चे संत-महात्मा लोग नहीं होते न, तो संसार में जो कुछ शांति दिखती है, थोड़े बहुत आनन्द की झलक दिखती है वह भी नहीं होती। सचमुच, जो आत्मज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता महापुरुष हैं वे हमारे सच्चे माई-बाप हैं। उन्होंने तो हमें जीवनदान दिया। भारत में अगर सच्चे संत न होते तो हमारी अभी तो न जाने कैसी बुरी दशा होतती। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः

“अभी भी दुनियाँ में थोड़ी भी रौनकर दिखती है वह भी ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के कारण दिखती है।”

एकनाथजी महाराज के विषय में कुप्रचार किया गया। दूसरे दिन कथा के समय उनका प्राँगण ही नहीं गलियाँ भी लोगों से भर गईं। एकनाथ जी महाराज सत्संग करने व्यासपीठ पर बिराजे। आँख बन्द करके परमात्मा में गोता लगाकर बोलना प्रारंभ करने को ही थे इतने में वह कलवाली महिला आकर अपनी नियत जगह में बैठ गई। चंड़ों की टोली में हिलचाल मच गई। आपस में गुसफुस होने लगीः ‘अरे यार ! यही तो थी कल। वह नदी में…. और आज फिर यहीं वापस?’ कुछ समझ में नहीं आ रहा था उनकी खोपड़ी को।

एकनाथ जी जब आँखें खोलकर बोलते तो लोग सावधान हो जाते, चुप होकर सुनने लग जाते और आँखें बन्द करते तो श्रोताओं में चंचलता आ जाती। संतश्री ने जान लिया कि आज की भीड़ कुतूहल-प्रिय है सत्संग-प्रिय नही है। चालू कथा में एकनाथ जी महाराज ने सबके दिल में चमकने वाले चैतन्य से तादात्म्य करके सारी हकीकत जान ली। कथा जब पूरी हुई तो वह महिला अदब से नमस्कार करने आयी। तब एकनाथ जी ने कहाः “माताजी….!”

सब लोग चौकन्ने होकर सुनने लगे थे कि क्या बात हो रही है। जब एकनाथजी के मुँह से “माताजी” शब्द निकला  तो उन लोगों को दिल में धक्का लग गया कि अरे ! हम जो कुछ सोच रहे थे वह बात नहीं है।

एकनाथ जी कहने लगेः “माता जी ! मैंने ऐसा महसूस किया कि कल आपको अपने स्थान जाते समय रास्ते में बड़ा कष्ट सहना पड़ा ! आपकी बड़ी बेइज्जती हुई ! आपके साथ अन्याय हुआ है ऐसा मुझे लगता है।”

माताजी ने कहाः “महाराज ! हमने आपकी कथा को पचाया है। कोई कितना भी कुछ कहे, दुःखी न होना अपने हाथ की बात है।”

जब तक अपने हस्ताक्षर नहीं होते तब तक मजाक उड़ाने वाले सफल नहीं हो सकते। आप जब अपने भीतर से गिरते हैं तब गिराने वाले सफल होते हैं। यह बिल्कुल सच्ची बात है।

जग में वैरी कोई नहीं जो मनवा शीतल होय।

सुखी-दुःखी होना आपके हाथ की बात है। आप बहुत स्वतन्त्र हैं। भगवान स्वतन्त्र हैं तो भगवान का प्यारा जीव भी स्वतन्त्र हैं, आप जाग्रत जगत देखकर हटा देते हो, स्वप्न देखकर हटा देते हो, सुषुप्ति देखकर हटा देते हो। सुख आता है हट जाता है, दुःख आता है हट जाता है। आप वही के वही दृष्टा, साक्षी, स्वतन्त्र मौत आई, चली गई। मौत अगर आपको मारती तो हजारों बार मौत हुई। फिर आप अभी यहाँ कैसे होते ? मौत आपकी नहीं होती, शरीर की होती है। मौत आपको छू नहीं सकती, आप ऐसे स्वतन्त्र हो। लेकिन… पता नहीं है, अपनी समझ नहीं है।

वह महिला एकनाथजी महाराज से कहने लगीः

“हर स्थिति में चित्त की समता रखना आपने सिखाया है। लोगों ने अपमान किया तो मैंने मन से सोचा कि अपमान तो देवता है। अपमान अपने को देहासक्ति से छुड़ाकर निजस्वरूप में जगाता है। अपमान होता है देह का। देह नश्वर है और मैं देह नहीं हूँ। तो मेरा क्या बिगड़ा ? अपमान की हवा लगी देह को। मैंने बढ़िया विचार करके इसको काट दिया।”

आपके विचार बढ़िया  होंगे तो अपमान को, विघ्नों को, प्रतिकूलताओं को आप साधना बना देंगे। आपके विचार अगर घटिया होंगे तो अपमान-विघ्न-बाधाएँ आप पर प्रभाव डाल देंगे। आप स्वामी बनेंगे तो ये सेवक हो जाएँगे। आप भोले रहेंगे तो ये अपमान, विघ्न-बाधाएँ, प्रतिकूलताएँ आदि आपके स्वामी बन जाएँगे और आपको कुचलेंगे।

आप एकदम भोला मत बनिये। देवाधिदेव भगवान शंकर को ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वे भोले-भाले हैं, बेवकूफ हैं। जो निर्दोष भाव से उनको याद करते हैं उनके आगे वे दयानिधि प्रकट हो जाते हैं। ऐसे वे नाथ हैं। इसीलिए उनका नाम है भोलेनाथ। वे भोले थोड़े ही है ! जब तीसरा नेत्र खोलते हैं तब कामदेव जैसों को भस्म कर देते हैं, त्रिभुवन भुवन भंग कर देते हैं। वे बेचारे थोड़े ही हैं ! दया के पात्र थोड़े ही हैं भोलेनाथ !

भगवान भोले नहीं हैं तो भगवान के सच्चे भक्त भी भोले नहीं रह सकते।

भगत जगत को ठगत है जगत को ठगत न कोई।

एक बार जो भगत ठगे अखण्ड यज्ञ फल होई।।

नारदजी सच्चे भक्त थे। वालिया लुटेरा ने उनको एक बार ठग लिया, उनकी विद्या, उनका ज्ञान, उनकी कृपा आत्मसात कर ली, पचा ली तो वह वाल्मीकि ऋषि बन गया। कबीर जी सच्चे भक्त थे। सलूका मलूका ने सेवा करके उनका आध्यात्मिक खजाना पा लिया, उनको ठग लिया तो सलूका मलूका का बेड़ा पार हो गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य महान् भक्त थे, वे परमात्म-तत्त्व से रंच मात्र भी विभक्त नहीं थे। जिन्होंने उनको ठग लिया, उनका दिव्य खजाना स्वीकार कर लिया उनका बेड़ा पार हो गया।

सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष अपने को ठगवाने के लिए घूमते हैं, अपना मधुर, भव्य, दिव्य खजाना लुटाने के लिए घूमते हैं लेकिन आप लोग बड़े ईमानदार हैं। सोचते हैं कि संतों  का खजाना क्यों लूटें ? नहीं…। नहीं….। आप लोग संतो का भीतरी खजाना लूट लेंगे तो बढ़िया रहेगा।

एकनाथ जी कहते हैं- “भगवती ! मैं अपना रहस्यमंत्री आपके साथ भेजूँ। आपको किनारे तक छोड़ आयेगा।”

“नहीं नहीं, कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! जब तक आदमी का अपना मनोबल नहीं होता तब तक पहुँचाने वाले भी कहाँ तक रक्षा करेंगे ?”

कितनी सुन्दर बात है ! आपका मनोबल नहीं है तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है। वह शोषण करने लग जाता है। इसलिए आपका दक्ष हो जाओ। छोटी-मोटी घटनाओं से अपने को प्रभावित मत होने दो, भयभीत मत करो। उन बातों से आप उदासीन हो जाओ ताकि मनःशक्ति का विकास हो जाये।

उदासीन का मतलब पलायनवादी नहीं। छोटे-मोटे आकर्षणों से उदासीन होकर मनःशक्ति को, बुद्धिशक्ति को बढ़ाने का मौका लेकर अपने साक्षी स्वरूप ब्रह्म में बैठना इसी का नाम उदासीन होना है।

एकनाथ जी ने कहाः “देवी ! तो ऐसा करें, मैं आपके किनारे आकर रोज आपको कथा सुनाया करूँ ?”

“नहीं महाराज ! “गोदावरी माता की जय….’ करके लोग मुझमें गोता मारते हैं और अपने पाप मुझमें छोड़ जाते हैं। मैं लोगों के पापों से बोझिल हो जाती हूँ। फिर महाराज ! मैं नारी का रूप धारण करके आप जैसे आत्मज्ञानी ब्रह्मवेत्ता संत-महात्मा के द्वार पर एक-एक कदम चलकर आती हूँ तो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। परमात्म-तत्त्व से छूकर आती हुई आपकी अमृतवाणी मेरे कानों में पड़कर मेरे हृदय का बोझा विच्छिन्न कर देती है। मुझे शीतलता मिलती है, आत्मशांति मिलती है। मुझे देखकर आप अपने ऊँचे अनुभव की बातें भी बताते हैं तो मेरे साथ अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। यहाँ बहुजनहिताय…. बहुजनसुखाय सत्संग हो रहा है और वहाँ मेरे किनारे पर आप संत पुरुष चलकर आवें, मुझ अकेली के लिए कष्ट उठाएँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता। कृपा करके आप यहीं सत्संग चालू रखें। मैं आया करूँगी, अपने को पावन किया करूँगी। मुझे कोई कष्ट नहीं। आपका कथा अमृत पीकर अपने को निर्द्वन्द्व तत्त्व में जगाऊँगी।”

चांडाल चौकड़ी के लोग यह सुनकर दंग रह गयेः “अरे ! ये तो साक्षात् गोदावरी मैया ! लोगों के पाप हरकर पावन करने वाली भगवती गोदावरी माता स्वयं पावन होने के लिए एकनाथ जी महाराज की कथा में आती हैं ?…. और हम लोगों ने एकनाथ जी महाराज के लिए क्या-क्या सोचा और किया !

 

साक्षात् गोदावरी माता भी जिनके दर्शन करने और सत्संग सुनने आती है ऐसे महान् संत पुरुष के सत्संग दूषित भाव से आये, कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से आने पर भी संत-समागम से इतना फायदा होता तो सुभाव से आने वालों का तो बेड़ा पार हो जाय।”

कभी-कभी ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनने के लिए कई सूक्ष्म जगत की आत्माएँ भी आती हैं। आकाश में विचरने वाले सिद्ध भी गुप्त रूप से आ जाते हैं और तत्त्वेत्ता की वाणी सुनकर गुपचुप रवाना हो जाते हैं।

जो कष्ट सहन करता है उसको सिद्धि मिलती है। मैं आपको दो तीन घण्टे बिठा रहा हूँ। लगातार बैठकर, कष्ट सहकर सत्संग सुनते-सुनते आपकी भी सिद्धि हो रही है। पाप कट रहे हैं। पुण्य बढ़ रहे हैं। 

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
Advertisements

4 Comments on “संत एकनाथ”

  1. raji Says:

    good one!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

  2. shruti Says:

    this is really useful……….

  3. havish Says:

    IT IS VERY GOOD


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


%d bloggers like this: