ये भी नही रहेगा!

एक मुसलमान फकीर(दरवेश) यात्रा को जा रहा था..रास्ते में एक गाँव में ठहेरना था..पुछा की, “है कोई मुझे ठहेराने वाला भगवान का अल्लाह का प्यारा?”

लोगों ने बोला, “ठहेरने को तो बहुत लोग तुम को बोलेंगे की हमारे यहा ठहेरो..लेकिन इस गाँव का एक ऐसा नेक इंसान जो धनवान भी है और शाकिर भी है ..उस के पास आप ठहेरना..”

शातिल बोलते शैतान दुष्ट व्यक्ति को और शाकिर बोलते संतोषी, हर बात के लिए अल्लाह का शुक्रगुज़ार मानता है ऐसे व्यक्ति को..उस गाँव के उस व्यक्ति का नाम लोग भूल गये थे, उस को शाकिर ही सब बोलते..दरवेश शाकिर के यहा ठहेरा..तो जितना उस का महेल बढ़िया, धन दौलत बढ़िया, आश्रम बढ़िया उस का उतना दिल भी बढ़िया था …दरवेश शाकिर के यहा 2-3 दिन रुके और जब विदाई हुई तो  दरवेश रास्ते में भोजन कर सके ऐसा सब सामान भी दिया..दरवेश ने कहा की अल्लाह ने तुम को जितनी संपत्ति दी उतनी बढ़िया बुध्दी भी दी और उतनी नम्रता भी दी..तो शाकिर बोलता है , “ये भी तो नही रहेगा…”

क्यों की शाकिर वेदांत के सत्संग- ब्रम्हज्ञान के सत्संग  में जाता था..शाकिर के मन में ये नही था की ये हिंदू है काफर है अथवा ये बुरा या ये अच्छा ऐसा नही था…सब अल्लाह के है..सब भगवान की लीला है ..शाकिर इस प्रकार की तात्विक समझ का धनी हो गया था…सूफ़ी और वेदांत के संतों को उस ने अपने हृदय में अच्छी तरह से पा लिया था सत्संग सुन के..

कुछ दिन बाद दरवेश जब लौट के आया तो देखा की शाकिर का शाही महेल गायब!उस की आस पास की सब मिलकते गायब थी..पुछा तो पता चला की वो शाकिर तो तबाह हो गया..बाढ़ आई थी उस में सब बहे गया…अब वह हमदाद नाम के ज़मीदार के पास मजदूरी करता है..पेट भरता है..झोपड़ी में रहेता है..भैसे चराता है..भैसो का दूध निकाल के दे आता है..सर्दियों की रातों में भी शाकीर बेचारा भूके पेट पालने के लिए काम करता है..उस की 2 जवान बेटियाँ है लेकिन अब कौन ब्याहेगा इस कंगाल की बेटियों को?..उस की तो जिंदगी अफे-दफे हो गयी..

दरवेश ने कहा, “मैं उस के घर का 2 टुकड़ा खाया है..ग़रीब हो गया है तो क्या..मैं उस के पास जाऊंगा”

शाकिर ने अपनी झोपड़ी में दरवेश को आश्रय दिया..रूखी सुखी जो भी थी रोटियाँ उस को दी..फटे पुराने टाट को साफ सुथरा कर के उस को आसन दिया..फकीर की आँखे द्रविभूत हो गयी..अल्लाह ने तुम्हारे साथ ऐसा क्यो किया?..इतने धर्मात्मा आदमी को ऐसा कंगाल बना दिया..

शाकिर बोला, “ग़रीबी आई है बाहर..लेकिन सत्संग अमीरी और ग़रीबी से कुछ उँची चीज़ भी तो देता है ना..ये भी तो नही रहेगा !”..शाकिर की आँखों में वो ही चमक और चेहरे पर शुक्रगुजारी थी…

राम राखे तेने रहिए ओधव जी

सुख दुख सर्वे सहियो ओधव जी

कोई दिन खावाने पूड़ी नि

कोई दिन भुख्या राखे तो रहियो ओधव जी

कोई दिन फ़रावा गाड़ी नि मोटर

तो कोई दिन हालता जाइयो ओधव जी

राम राखे तेने रहिए ओधव जी …

शाकिर को ये वेदांत का सत्संग पच गया था..अमीरी चली गयी तो ग़रीबी कहाँ तक रहेगी? ये भी तो जाएगी…जो आता है, वो जाता है..एक अंतरात्मा ब्रम्‍ह कहो अल्लाह कहो वो ज्यों का त्यों रहेता है ..मरने के बाद भी वो साथ नही छोड़ता है..बाकी तो जो आता है वो जाता है, जो मिलता है वो बिछड़ता है..जो पैदा होता है वो मरता है….ये सत्संग में हम ने सुना है ..और ये बिल्कुल सच्ची बात है, अनुभव की बात है..

सब पसार हो जाता है..व्यसनी कभी अपने को व्यसनी मत मानो..चायवाले बोलते चाय नही छूटेगी , शराब वाले बोलते शराब नही छूटेगी, लाखा बोलते लाखन नही छूटेगी और लाखन बोलती थी लाखा नही छूटेगा ..लेकिन सब छुट जाता है..एक अबदल भगवान नही छूटता है..जिस ने ये जान लिया उस का बेड़ा पार हो जाता है..

ईश्वर के सिवाय कोई टीकेगा नही, और ईश्वर कभी छूटता नही..ये बात समझ में आ जाए, विश्वास दृढ़ हो जाए तो अभी कल्याण हो जाए..

 

शाकिर पर गुरु कृपा थी..दरवेश तो शाकिर को कंगाल छोड़ कर गया था लेकिन बार बार शाकिर की याद में उस ने दूसरी बार हज चालू किया..शाकिर के गाँव पहुँचा तो देखा की ज़मींदार तो मर गया है..शाकिर का महेल तो पहेले से भी कई गुना उँचा बना हुआ है.. बेटियों की बड़े बड़े साहूकारों के यहा शादी हो गयी.. शाकिर रेशम के कपड़े पहेनता  है..कोचवान रथ लेकर खड़ा है..इर्द गिर्द नोकर-चाकर है …  शाकिर की पत्नी महारानी जैसी और शाकिर राजाधिराज के जैसा रहेता है..क्यों की हमदाद ज़मींदार के पास ज़मीन जागीर तो थी लेकिन संतान नही थी..उस के बापज़्यादाओ के जमाने का सोने का घड़ा था , उस में हीरे जवारात थे..सब हमदाद ज़मीदार ने शाकिर के नाम कर दिया ..शाकिर तो पहेले से भी ज़्यादा आमिर हो गया..

दरवेश बड़ा प्रसन्न हुआ की शाकिर अल्लाह ने तुम को अमीरी में से ग़रीबी तो दी लेकिन ग़रीबी में से ऐसी अमीरी दी की पहेले की अमीरी भी इस के आगे कुछ  नही..

शाकिर हंसा…बोला, “ये भी तो नही रहेगा!”

दरवेश को लगा की ये क्या बोल रहा है..लेकिन उस के गुरु ने कहा था की कोई कुछ कहे तो तुरंत उस बात को काटना नही , ज़रा विचार करना..तुरंत किसी की बात को नकारना नही चाहिए, बुध्दी पूर्वक सार लेना चाहिए…

 यात्रा करते करते दरवेश फिर डेढ़ दो साल के बाद वहा आया तो देखा की शाकिर का महेल तो है लेकिन शाकिर मर गया..मरे हुए शाकिर की कबर पर फूल चढ़ाऊंगा और अल्लाहताला से दुवा माँगुगा  सोच के दरवेश गया तो क्या देखता है की कबर पर भी एक लंबा चौड़ा चमचमाता पत्थर था और उस पर लिखा था – “ये भी तो नही रहेगा!!”

अरे शाकिर जीते जी तो बोलता था की ये भी नही रहेगा..पैसा गया, ग़रीबी गयी, अमीरी गयी, शरीर भी गया ..लेकिन कबर कहाँ  जाएगी?..शाकिर तू ने ऐसा तो क्या लिखवाया!

कुछ दिन बाद दरवेश वहा से पधारे तो देखा की वहा कबरीस्तान ही नही था.. …पूरा कबरीस्तान ही  जिलजीले(भूकंप) में गायब हो गया..शाकिर की कबर भी नही रही…तब दरवेश बोलता है की शाकिर ने सत्संग पचाया था…की बाहर की परिस्थिति एक जैसी नही रहेती..हर क्षण सब बदलता है..श्वास श्वास में कई कण बदलते है.. शाकिर के जीवन में संत की वाणी का विश्वास था..शाकिर के जीवन में संतोष था भगवत सत्ता का…जो कभी नही बदलता वो मेरा आत्मा है..जो कभी नही बदलता वो मेरा चैत्यन्य है..जो चैत्यन्य है वो ज्ञान स्वरूप है..जो ज्ञान स्वरूप है वो आनंद स्वरूप है…मैं अपना आनंद जहाँ तहाँ उंड़ेल कर गुलाम बन रहा हूँ..इधर जाता हूँ ,उधर जाता हूँ … कभी  मक्‍के जाता तो कभी कही..

घर मा छे काशी नि घर मा मथुरा;

घर मा छे  गोकुलियो ग्राम रे..

म्हारे  नथी जाऊं तीरथ धाम रे…

अड़सठ तीरथ गुरुजी ना चरणे ..

गुरुजी नी चरणरज उड़ी उड़ी लागे मोहे अंग..

बहेणुडी मने भाग्ये मिल्‍यो सत्संग..

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 

ek musalamaan phakir(darwesh) yaatraa ko jaa rahaa thaa..raaste men ek gaanv men thaheranaa thaa..puchhaa ki, “hai koyi mujhe thaheraane waalaa bhagavaan kaa allaah kaa pyaaraa?”

logon ne bolaa, “thaherane ko to bahut log tum ko bolenge ki hamaare yahaa thahero..lekin is gaanv ka ek aisaa nek insaan dhanawaan bhi hai aur shaakir bhi hai ..us ke paas aap thaheranaa..”

shaatil bolate shaitaan dusht vyakti ko aur shaakir bolate santoshi, har baat ke liye allaah kaa shukr gujaar maanataa hai aise vyakti ko..us gaanv ke us vyakti kaa naam log bhul gaye the, us ko shaakir hi sab bolate..darawesh shaakir ke yahaa thaheraa..to jitanaa us ka mahel badhiyaa, dhan daulat badhiyaa, aashram badhiyaa us ka utanaa dil bhi badhiyaa …2-3 din ruke aur jab vidaayi huyi to  darwesh raaste men bhojan kar sake aisaa sab saamaan bhi diyaa..darwesh ne kahaa ki allaah ne tum ko jitani sampatti di utani badhiyaa budhdi bhi di aur utani namrataa bhi di..to shaakir bolataa hai , “ye bhi to nahi rahegaa…”

kyon ki shaakir vedaant ke satsang- bramhagyaan ke satsang  men jaataa thaa..shaakir ke man men ye nahi thaa ki ye hindu hai kaafar hai athavaa ye buraa yaa ye achha aisaa nahi thaa…sab allaah ke hai..sab bhagavaan ki leela hai ..shaakir is prakaar ki taatvik samajh kaa dhani ho gayaa thaa…sufi aur vedaant ke santo ko us ne apane hruday men achhi tarah se paa liyaa thaa satsang sun ke..

kuchh din baad darwesh jab laut ke aayaa to dekhaa ki shaakir kaa shaahi mahel gaayab!us ki aas paas ki sab milakate gaayab thi..puchhaa to pataa chalaa ki vo shaakir to tabaah ho gayaa..baadh aayi thi us men sab bahe gayaa…ab vah hamdaad naam ke jamidaar ke paas majaduri karataa hai..pet bharataa hai..jhopadi men rahetaa hai..bhaise charaataa hai..bhaiso ka dudh nikaal ke de aataa hai..sardiyon ki raaton men bhi shaakri bechaaraa bhuke pet paalane ke liye kaam karataa hai..us ki 2 jawaan betiyaan hai lekin ab kaun byaahegaa is kangaal ki betiyon ko?..us k ito jindagi afe-dafe ho gayi..

darawesh ne kahaa, “main us ke ghar kaa 2 tukadaa khaayaa hai..garib ho gayaa hai to kyaa..main us ke paas jaaungaa”

shaakir ne apani jhopadi men darwesh ko aashray diyaa..rukhi sukhi jo bhi thi rotiyaa us ko di..phate puraane taat ko saaf sutharaa kar ke us ko aasan diyaa..phakir ki aankhe dravibhut ho gayi..allah ne tumhaare sath aisaa kyo kiyaa?..itane dharmaatmaa aadami ko aisaa kangaal banaa diyaa diyaa..

shaakir bolaa, “garibi aayi hai baahar..lekin satsang amiri aur garibi se kuchh unchi chij bhi to detaa hai naa..ye bhi to nahi rahegaa !”..shaakir ki aankhon men wo hi chamak aur chehare par shukr gujaari thi…

raam raakhe tene rahiye odhav ji

sukh dukh sarve sahiye odhav ji

koyi din khaavaane pudi ni koyi din bhukya  raakhe to rahiyo odhav ji

koyi din pharavaa gaadi ni motar to koyi din haalataa jaayiyo odhav ji

raam raakhe tene rahiye odhav ji …

shaakir ko ye vedaant kaa satsang pach gayaa thaa..amiri chali gayi to garibi kahaan tak rahegi? ye bhi to jaayegi…jo aataa hai, wo jaataa hai..ek antaraatmaa bramh kaho allaah kaho vo jyon kaa tyon rahetaa hai ..marane ke baad bhi vo saath nahi chhodataa hai..baaki to jo aataa hai vo jaataa hai, jo milataa hai vo bichhadataa hai..jo paidaa hotaa hai vo marataa hai..jo milataa hai vo bichhadataa hai ..ye satsang men ham ne sunaa hai ..aur ye bilkul sachchi baat hai, anubhav ki baat hai..

sab pasaar ho jaataa hai..vyasani kabhi apane ko vyasani mat maano..chaaywaale bolate chaay nahi chhutegi, sharaab waale bolate sharaab nahi chhutegi, laakhaa bolate laakhan nahi chhutegi aur laakhan bolati thi laakhaa nahi chhutegaa ..lekin sab chhut jaataa hai..ek abadal bhagavaan nahi chhutataa hai..jis ne ye jaan liyaa us ka bedaa paar ho jaataa hai..

ishwar ke siwaay koyi tikegaa nahi, aur iishwar kabhi chhutataa nahi..ye baat samajh men aa jaaye, vishwaas drudh ho jaaye to abhi kalyaan ho jaaye..

 

shaakir par guru krupaa thi..darawesh to shaakir ko kangaal chhod kar gayaa thaa lekin baar baar shaakir ki yaad men us ne dusari baar haj chaalu kiyaa..shaakir ke gaanv pahunchaa to dekhaa ki jamindaar to mar gayaa hai..shaakir kaa mahel to pahele se bhi kayi gunaa unchaa banaa huaa hai.. betiyon ki bade bade saahukaaron ke yahaa shaadi ho gayi.. shaakir resham ke kapade pahenataa hai..kochawaan rath khadaa hai..ird gird nokar-chaakar, shaakir ki patni mahaarani jaisi aur shaakir raajaadhiraaj ke jaisaa rahetaa hai..kyon ki hamdaad jamindaar ke paas jamin jaagir to thi lekin santaan nahi thi..us ke baapjyaadaao ke jamaane ka sone ka ghadaa thaa , us men hire jawaaraat the..sab hamadaad jamidaar ne shaakir ke naam kar diyaa ..shaakir to pahele se bhi jyaadaa amir ho gayaa..

darwesh badaa prasann hua aki shaakir allaah ne tum ko amiri men se garibi to di lekin garibi men se aisi amiri di ki pahele ki amiri bhi is ke aage kuchh nahi..

shaakir hansaa…bola, “ye bhi to nahi rahegaa!”

 

darwesh ko lagaa ki ye kya bol rahaa hai..lekin us ke guru ne kahaa tha aki koyi kuchh kahe to turant us baat ko kaatanaa nahi , jaraa vichaar karanaa..turant kisi ki baat ko nakaaranaa nahi chaahiye, budhdi purvak saar lenaa chaahiye…

 yaatraa karate karate darwesh phir dedh do saal ke baad wahaa aayaa to dekhaa ki shaakir kaa mahel to hai lekin shaakir mar gayaa..mare huye shaakir ki kabar par phul chadhaaungaa aur allaah taalaa se duwaa mangunaa soch ke darwesh gayaa to kyaa dekhataa hai ki kabar par bhi ek lambaa chaudaa chamchamaataa paththar thaa aur us par likhaa thaa , “ye bhi to nahi rahegaa!!”

are shaakir jite jee to bolataa thaa ki ye bhi nahi rahegaa..paisaa gayaa, garibi gayi, amiri gayi, sharir bhi gayaa ..lekin kabar kahaa jaayegi?..shaakir tu ne aisaa to kyaa likhawaayaa!

kuchh din baad darwesh wahaa se padhaare to dekhaa ki wahaa kabaristhaan hi nahi tha.. …puraa kabaristhaan hi  jilajile(bhukamp) men gaayab ho gayaa..shaakir ki kabar bhi nahi rahi…tab darwesh bolataa hai ki shaakir ne satsang pachaayaa thaa…ki baahar ki paristhiti ek jaisi nahi raheti..har kshan sab badalataa hai..shwaas shwaas men kayi kan badalate hai.. shaakir ke jeevan men sant ki waani ka vishwaas thaa..shaakir ke jeevan men santosh thaa bhagavat sattaa kaa…jo kabhi nahi badalataa vo meraa aatmaa hai..jo kabhi nahi badalataa vo meraa chaityany hai..jo chaityany hai vo gyaan swarup hai..jo gyaan swarup hai vo aanand swarup hai…main apanaa aanand jahaan tahaan undel kar gulaam ban rahaa hun..idhar jaaun , makke jaaun..

ghar maa chhe kaashi ni ghar maa mathuraa;

ghar maa chhe gokuliyo gram re..

mhaare  nathi jaaun tirath dhaam re…

adasath tirath guruji naa charane ..

guru ji ni charan raj udi udi laage mohe ang..

bahenudi mane bhaagye milyo satsang..

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ


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