मंत्र, भगवन्नाम और गुरुमंत्र में क्या फर्क है ?

मंत्र, भगवन्नाम और गुरूमंत्र

मंत्र, भगवन्नाम और गुरुमंत्र में क्या फर्क है ? कई प्रकार के मंत्र होते हैं। मनोरथपूर्ति के लिए भी कई तरह के मंत्र जपे जाते हैं और जरूरी नहीं है कि मंत्र भगवान का ही नाम हो। मानों, पाचन-तंत्र कमजोर है और खाना पचाना है तो यह मंत्र हैः

अगस्त्यं कुंभकर्णं च शनिं च वडवानलम्।

आहारपरिपाकार्थं स्मरेद भीमं च पंचमम्।।

इससे आपका खाना पचेगा, पक्की बात है।

नींद नहीं आती है तो सोने के समय शुद्धे शुद्धे महायोगिनी महानिद्रे स्वाहा। ऐसा जप करें तो नींद आ जायेगी। नींद की गोली ले-लेकर भी जिन्हें नींद नहीं आयी, उन्हें भी इस मंत्र से नींद आने लगी। तो इस लोक अथवा परलोक की कुछ सुविधा पाने का मंत्र होता है। ऐसे ही शादी-विवाह का, विघ्न-बाधाओं को टालने का, कार्यसाफल्य, रोगनिवृत्ति, शत्रु-दमन व अकाल मृत्यु टालने का भी मंत्र होता है।

दूसरा होता है भगवन्नाम। मंत्र में तो जापक की श्रद्धा, मंत्र के आंदोलन और मंत्र जप की विधि काम करती है किंतु भगवन्नाम में इनके साथ-साथ भगवान की अहैतुकी करूणा-कृपा भी सहयोग करती है। भगवन्नाम और मंत्र में यह फर्क है कि मंत्र जापक की मेहनत एवं श्रद्धा का फल लाता है तथा भगवन्नाम भगवान की कृपा से फल को सुहावना बनाता है। भगवन्नाम में भगवान की विशेष कृपा भी काम करती है।

अगर भगवन्नाम गुरु के द्वारा गुरूमंत्र के रूप में मिलता है और उसे अर्थसहित जपते हैं तो वह सारे अनर्थों की निवृत्ति तथा परम पद की प्राप्ति कराने में समर्थ होता है। गुरु जब मंत्रदीक्षा देते हैं तो अपने परब्रह्म-परमात्म स्वरूप में एकाकार होते हैं। जैसे रामकृष्ण परमहंस ने नरेन्द्र को कहाः “तुझे ईश्वर के प्रति रूचि है, ईश्वर को पाना ही है ?”

नरेन्द्र बोलेः “हाँ।”

रामकृष्ण उन्हें कमरे में ले गये। बोलेः “कमीज उतार दो।” मंत्र दीक्षा देने के लिए कमीज उतरवाना कोई जरूरी नहीं है लेकिन नरेन्द्र दार्शनिक है, तार्किक है, इसमें श्रद्धा है कि नहीं देखने पड़ेगा। कमीज उतारी। रामकृष्णदेव ने परखा कि श्रद्धा है तथा ध्यानस्थ होकर देख लिया कि कौन से केन्द्र में नरेन्द्र के मन और प्राण रहते हैं। वहाँ स्पर्श कर दिया और स्पर्श दीक्षा दे दी। कुछ ही समय में नरेन्द्र को अलौकिक अनुभूतियाँ होने लगीं। वे घबराये और सोचा कि “इन पागल बाबा ने क्या कर दिया है ? कभी मुझे हँसी आती है, कभी रोना आता है, कभी क्रियाएँ होती हैं, कभी क्या-क्या होता है ! अब दुबारा दक्षिणेश्वर नहीं जाऊँगा।” किंतु गुरु की स्पर्शदीक्षा का प्रभाव ऐसा कि न जाने का इरादा कराने वाले नरेन्द्र अपने को रोक नहीं पाये और स्वामी विवेकानन्द बनने तक की यात्रा कर ली। यह ईश्वरकृपा-गुरुकृपा का सुमेल है।

मरने के बाद भी तीन चीजें आपका पीछा नहीं छोड़तीं – पुण्य आपको स्वर्ग ले जाता है, पाप आपको नरक में ले जाता है और भगवन्नाम गुरुमंत्र जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं हुई, तब तक मरने के बाद भी आपको यात्रा कराके भगवान तक ले जाता है। यह गुरुमंत्र की महिमा है। मंत्रदीक्षा ली व जापक ने कुछ वर्ष या कुछ महीने मंत्र जपा और फिर किसी पाप से, किसी कुसंग से उसकी श्रद्धा टूटी एवं उसने मंत्र छोड़ दिया तो मंत्रत्यागात् दरिद्रता…. गुरुमंत्र का त्याग करने से दरिद्रता आती है।

दिल्ली की यह सच्ची बात है, घटित घटना है। एक सरदार आया। बोलाः “बाबाजी ! माफ कर दो, माफ कर दो।”

मैंने कहाः “क्या हुआ भैया ?”

“मैंने मंत्रदीक्षा ली और मेरा धंधा चलने लगा। मैं लखपति हो गया। मकान हो गया, यह हो गया…. फिर दोस्तों के, हरामियों के संग में आकर ऐसा वैसा खाना-पीना किया, ऐसी-वैसी बातें की और मंत्र छोड़ दिया। फिर मुझे घाटा हुआ और मेरा मकान बिक गया, यह हो गया, वह हो गया…..”

तो क्या भगवान नाराज हो गये ? नहीं, मंत्र का यह प्रभाव है कि आप ज्यादा समय नीचे के केन्द्रों में रहो, नीच कर्मों में न रहो, इसलिए बाहर की चीजें थोड़ा हेर-फेर करवा के ईश्वर ने आपको फिर से ऊपर उठने का अवसर दिया है। यह मंत्र चेतना के चमत्कार की बात है !

देवाधीनं जगत्सर्वं मंत्राधीनश्च देवता।

‘समस्त जगत देव के अधीन है और देव मंत्र के अधीन है।’

गुरुमंत्र को साधारण न समझें। प्रीतिपूर्वक, आदरपूर्वक, अर्थसहित नियमित जपते जायें। यह आपको परमात्मदेव में, परमात्मसुख में प्रतिष्ठित कर देगा।

मंत्रसिद्धि की चार बातें

मंत्रसिद्धि की चार बातें जितने अंश में ठीक से पाली जायेंगी, ठीक से होंगी उतने ही अंश में उसका अलौकिक, चमत्कारिक लाभ महसूस होगा।

एक तो है शब्द-उच्चारण का ध्वनि विज्ञान। इस विज्ञान की जानकारी शिष्य को नहीं हो तो गुरु को होनी ही चाहिए। सामनेवाला भावप्रधान है, श्रद्धाप्रधान है या विचारप्रधान है यह देखना पड़ता है। किसी की रूचि है शिवजी में और उसको मंत्र थमा दें ‘हरि ॐ’, किसी की रूचि है माता जी में और मंत्र थमा दें शिवजी का तो यह ध्वनि विज्ञान के विपरीत है। जिस देव में शिष्य की श्रद्धा प्रीति हो उनका मंत्र देने से उसको विशेष लाभ होगा। गुरुमंत्र-दीक्षा के समय मंत्र का अर्थ भी समझाने वाले को समझा देना चाहिए।

दूसरी बात हैः संयम, प्राणशक्ति, मानसिक एकाग्रता। जैसे अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी, पर्व आदि के दिनों में संसार व्यवहार करने से ज्यादा हानि होती है। बाकी के दिनों में भी एक दूसरे से शारीरिक सुखभोग करने का प्रयत्न करना यह असंयमी व्यक्ति की पहचान है।

कोई पूछेः ‘बाबाजी ! लवर-लवरी के प्यार और भक्त-भगवान के प्यार में क्या फर्क है ?’ लवर-लवरी का प्रेम शरीर प्रधान है। वह एक दूसरे को खोखला बनाता है, एक दूसरे का विनाश करता है, सत्यानाश करता है। भक्त भगवान का और संत-साधक का प्रेम एक दूसरे को पोषता है। जो पोषता है वह परमात्म-प्रेम है और जो शोषता है वह लवर-लवरी का प्रेम है। संयम के साथ जितनी प्राणशक्ति, मानसिक एकाग्रता होगी, उतनी उपासना अथवा मंत्रसिद्धि जल्दी होगी।

तीसरी बात हैः उपासना की सामग्री – तुम्हारा यह भौतिक शरीर जितना स्वस्थ होगा, उतनी उपासना में बरकत आयेगी।

चौथी बात हैः भावना, श्रद्धा विश्वास और आपका लक्ष्य-उद्देश्य जितना ऊँचा होगा, उतना ही नाम-कमाई से ऊँचा फल आएगा। नाम तो भगवान का है लेकिन आप पुत्र को पास कराने के लिए जप रहे हैं तो फल छोटा आयेगा। यदि आप परमात्मप्राप्ति के उद्देश्य से भगवन्नाम मंत्र जपते हैं तो ऊँचा फल आयेगा। दृढ़ता से लगे रहो तो अवश्य-अवश्य परमात्मप्राप्ति हो जायेगी। भगव्तप्राप्ति के उद्देश्य से किये हुए जप दोषों को मिटाते हैं। जप से धारणा भी होने लगती है, ध्यान भी होने लगता है, समाधान भी होने लगता है। परमात्म-तत्त्व का ज्ञान भी सहज उपदेशमात्र से स्थित हो जाता है।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 157

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One Comment on “मंत्र, भगवन्नाम और गुरुमंत्र में क्या फर्क है ?”

  1. Rakesh Aggarwal Says:

    Hariom, Pujya Bapu ji dwara diya gaya mantra ka satat jaap karte rahe ya guru mantra kewal aasan aur mala per hi karna chaiye chalte firte karya karte guru mantra nahi karna chaiye ?kripya meri jigyasa ka samadhan kare.


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