बैजू बावरा और गोपाल नायक

(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

आपके पास मानने की, जानने की, करने की शक्ति है, अतः आप ऐसे सत्कर्म करो जिन कर्मों से अंतर्यामी परमात्मा संतुष्ट हो, अहंकार पुष्ट न हो, लोभ-मोह न बढ़े, द्वेष, चिंता न बढ़े, ये सब घट जायें। आपके पास जो भी धन, सत्ता योग्यता है, अगर उसके साथ ईश्वरप्राप्ति का उद्देश्य नहीं है तो वह न जाने किस प्रकार तुम्हें धोखा दे जाय कोई पता नहीं।

वृन्दावन में हरिदास महाराज के पास संगीत विद्या सिखने ग्वालियर के पास के चंदेरी (ग्वालियर क्षेत्र, म.प्र.) का 10 साल का बच्चा आया था… गुरू  ने स्वीकार किया ..
..बैजू रात भर वृन्दावन  के गलियों में भटके…श्रीकृष्ण की बंसी की धुन सुनाई पड़ती…सुबह गुरूजी आये तो बैजू सोये मिले…
और उदारात्मा गुरूदेव  पद बना बना के उस को जगाते..
ऐ  बावरे जाग भोर भई..
तो बैजू का नाम पद गया बैजू बावरा…
10 साल के बैजू का गुरू ने हाथ पकड़ा है, कैसा भी बैजू मेरा है ..बात पूरी हो गयी….दिवाली के धन तेरस की पूजा हो रही है और बैजू सुबह धन तेरस को भी सो रहा है ..जगा तो सही लेकिन आँखों में प्यास है..

तड़पती  हुयी आँखों ने धन तेरस की रात को श्रीकृष्ण को प्रगट होने में बाध्य कर दिया..बंसी तो सुनाई पड़ती लेकिन बंसीधर कहाँ  है? … जहां  से आवाज आई वहाँ  खींचे चले गए…आवाज बंद हो गया..
देखा की वृक्ष पे वहाँ  श्रीकृष्ण है.. मैं  कैसे वहाँ  पहुंचूंगा ?….मूर्छित से हो गए बैजू…
श्रीकृष्ण ने उठाया बैजू को…. “मेरे लिए तू बावरा हैं  तो  मैं  भी तेरे लिए बावरा हूँ…!
संसारी चीजो के लिए कोई बावरा होता तो संसारी चीज उस के लिए बावरा नहीं होती…
लेकिन मनुष्य एक -दुसरे के लिए बावरा होता है और आत्मा-परमात्मा भी एक-दुसरे के लिए बावरा होता है…बैजू इस बात को  पकड़ लेना…”

बैजू बोले,  “मेरे गुरूजी के पास चलो..उन्ही की कृपा से तुम मिले हो…”
गुरूजी ने दर्शन किया ..
“बैजू तू बावरा नहीं है, तुझे बावरा कहेनेवाले भी बावरे है..लेकिन इसी नाम से बेटा तू प्रसिध्द हो और तुझे सारी  विद्यायें  हस्तगत हो…”
गुरूजी का वरदान  मिल गया …
बैजू बावरा जिस किसी को भी कुछ सिखाता , सुनाता तो अपना आत्मा समझ कर…


हरिदास महाराज के दो शिष्य थे बैजू बावरा और तानसेन। दोनों गुरुभाई महान संगीतज्ञ हो गये। बैजू बावरा का जन्म ईस्वी सन् 1542 में चंदेरी (ग्वालियर क्षेत्र, म.प्र.) में हुआ था। बैजू का संगीत और व्यवहार बहुत सुखद था। वह गुरु की कृपा को पचाने में सफल रहा। गुरु से संगीत की विद्या सीखकर बैजू एकांत में चला गया और झोंपड़ी बनाकर संयमी जीवन जीते हुए संगीत का अभ्यास करने लगा। अभ्यास में ऐसा तदाकार हुआ कि संगीत की कला सीखने वाले कई लोग उसके शिष्य बन गये। उनमें गोपाल नायक नाम का एक शिष्य बड़ा प्रतिभा सम्पन्न था। जैसे बैजू ने अपने गुरु हरिदासजी की प्रसन्नता पा ली थी, ऐसे ही गोपाल ने भी बैजू की प्रसन्नता पा ली। सप्ताह बीते, महीने बीते, वर्षों की यात्रा पूरी करके गोपाल ने संगीत-विद्या में निपुणता हासिल कर ली।

अब वक्त हुआ गुरु से विदाई लेने का। गोपाल ने प्रणाम किया। विदाई देते समय बैजू का हृदय भर आया कि यह शिष्य मेरी छाया की तरह था, मेरी विद्या को पचाने में सफल हुआ है पर जाने से रोक तो सकते नहीं। बैजू भरे कंठ, भरी आँखें शिष्य को विदाई देता हुआ बोलाः “पुत्र ! तुझे संगीत की जो विद्या दी है, यह मनुष्य जाति का शोक, मोह, दुःख, चिंता हरने के लिए है। इसका उपयोग जेब भरने या अहंकार पोसने के लिए नहीं करना।” विदाई लेकर गोपाल चला गया।

गोपाल नायक अपने गीत और संगीत के प्रभाव से चारों तरफ जय-जयकार कमाता हुआ कश्मीर के राजा का खास राजगायक था।

जब ईश्वरप्राप्ति का उद्देश्य नहीं होता तब धन मिलता है तो धन की लालसा बढ़ती है, मान मिलता है तो मान की लालसा, सत्ता मिलती है तो सत्ता की लालसा बढ़ती है। उस लालसा-लालसा में आदमी रास्ता चूक जाता है और न करने जैसे कर्म करके बुरी दशा को प्राप्त होता जाता है। इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ मिलेंगी।

अब गोपाल को चारों तरफ यश मिलने लगा तो उसका अहंकार ऐसा फूला, ऐसा फूला कि वह गायकों का सम्मेलन कराता तथा उनके साथ गीत और संगीत का शास्त्रार्थ करता। गायकों को ललकारताः “आओ मेरे सामने ! अगर कोई मुझे हरा देगा तो मैं अपना गला कटवा दूँगा और जो मेरे आगे हारेगा उसको अपना गला कटवाना पड़ेगा।” जो हार जाता उसका सिर कटवा देता। हारने वाले गायकों के सिर कटते तो कई गायक-पत्नियाँ विधवा और गायक-बच्चे अनाथ, लाचार, मोहताज हो जाते लेकिन इसके अहंकार को मजा आता कि मैंने इतने सिर कटवा दिये। मुझे चुनौती देने वाला तो मृत्यु को ही प्राप्त होता है।

बैजू बावरा का दिखाने वाला सत्शिष्य कुशिष्य बन गया। मेरे गुरुदेव का भी एक कहलाने वाला सत्शिष्य ऐसा ही कुशिष्य हो गया था तो गुरुजी ने उसका त्याग कर दिया। वह मुझसे बड़ा था, मैं उसका आदर करता था। बाद में मेरी जरा प्रसिद्धि हुई तो मेरे पास आया लेकिन मैंने उससे किनारा कर लिया। जो मेरे गुरु का नहीं हुआ, वह मेरा कब तक ? गुरुभाई तब तक है जब तक मेरे गुरु की आज्ञ में रहता है। मेरे आश्रम से 40 साल में जो 5-25 लोग भाग गये, वे बगावत करने वाले और धर्मांतरण वालों के हथकंडे बन गये। अब उनकी बातों में मेरे शिष्य थोड़े ही आते हैं। वे तो गुरुभाई तब तक थे जब तक गुरु के सिद्धान्त में रहते थे। गुरु का सिद्धान्त छोड़ा तो हमारा गुरुभाई नहीं है, वह तो हमारा त्याज्य है। जैसे सुबह मल छोड़कर आते हैं तो देखते नहीं हैं। वमन करते हैं तो देखते नहीं हैं कि कितनी कीमती उलटी है।

उस जमाने में मोबाईल की व्यवस्था नहीं थी। बैजू बावरा को गोपाल की करतूतों का जल्दी से पता नहीं चला। कई गायकों के सिर कट गये, कई अबलाएँ विधवा हो गयीं, उनके बच्चे दर-दर की ठोकर खाने वाले मोहताज हो गये तब बात घूमती-घामती बैजू बावरा के कान पड़ी। उसे बड़ा दुःख हुआ कि इस दुष्ट ने मेरी विद्या का उपयोग अहंकार पोसने में किया ! मैंने कहा था कि यह संगीत की विद्या अहंकार पोसने के लिए नहीं है।

आखिर वह अपने शिष्य को समझाने के लिए पचासों कोस पैदल चलते-चलते वहाँ पहुँचा, जहाँ गोपाल नायक बड़े तामझाम से रहता था।

राजा साहब का खास था गोपाल, इसलिए अंगरक्षकों, सेवकों और टहलुओं से घिरा था। उसे संदेशा भेजा कि तुम्हारे गुरु तुमसे मिलने को आये हैं। गोपाल ने गुरु से मिलना अपना अपमान समझा। बैजू ने पहरेदारों से बहुत आजिजी की और किसी बहाने से अंदर पहुँचने में सफल हो गया। वृद्ध गुरु आये हैं यह देखकर भी वह बैठा रहा, उठकर खड़े होना उसके अहंकार को पसंद नहीं था। वह जोर से चिल्लायाः “अरे, क्या है बूढ़ा !”

बैजू बोलाः “बेटा ! भूल गया क्या ? मैंने भरी आँखें, भरे हृदय से तुझे विदाई दी थी। मैं वही बैजू हूँ गोपाल ! क्यों तू अहंकार में पड़ गया है ! मैंने सुना तूने कइयों के सिर कटवा दिये। बेटा ! इसलिए विद्या नहीं दी थी। मैं तेरी भलाई चाहता हूँ पुत्र !”

गोपालः “पागल कहीं का, क्या बकता है ! यदि तू गायक है या गुरु है तो कल आ जाना राजदरबार में, दिखा देना अपनी गायन कला का शौर्य। अगर हार गया तो सिर कटवा दिया जायेगा। पागल ! बड़ा आया गुरु बनने को !”

नौकरों के द्वारा धक्के मार के बाहर निकलवा दिया। अहंकार कैसा अंधा बना देता है ! लेकिन गुरुओं की क्या बलिहारी है कि एकाध दाँव अपने पास रखते हैं। उस लाचार दिखने वाले बूढ़े ने राजदरबार में घोषणा कर दी कि ‘कल हम राजगायक के साथ गीत और संगीत का शास्त्रार्थ करेंगे। अगर हम हारेंगे तो राजा साहब हमारा सिर कटवा सकते हैं और अगर वह हारता है तो उसका कटवायें-न-कटवायें स्वतंत्र हैं।’ आखिर गुरु का दिल गुरु होता है, उदार होता है। तामझाम से अपनी विजय-पताका फहराने वाले गोपाल नायक के सामने वह बूढ़ा बेचारा हिलता-डुलता ऐसा लगा मानो, मखमल से पुराने चिथड़े आकर टकरा रहे हैं लेकिन बाहर से देखने में पुराने चिथड़े थे, भीतर से हरिदास गुरु की कृपा उसने सँभाल रखी थी। गुरु से गद्दारी नहीं की थी। गुरु से गद्दारी करने से गुरु की दी हुई विद्या लुप्त हो जाती है, मेरे गुरुभाई के जीवन में मैंने देखा है।

दूसरे दिन गोपाल ने ऐसा राग आलापा की महलों के झरोखों से देखने वाली रानियाँ, दास-दासियाँ वहीं स्तब्ध हो गयीं, राजा गदगद हो गया, प्रजा भी खुश हो गयी। वह संगीत सुनने के लिए जंगल से हिरण भाग-भागकर आ गये। गोपाल ने गीत गाते-गाते हिरणों के गले में हार पहना दिये और उनको पता ही नहीं चला। गीत-संगीत के प्रभाव से वे इतने तन्मय हो गये थे। गीत बंद किया तो हिरण भाग गये। गोपाल ने गुरु को ललकाराः “औ बुड्ढे ! क्या है तेरे पास ? अब तू दिखा कोई जलवा। अगर तुझमें दम है तो उन भागे हुए जंगली हिरणों को अपने राग से वापस बुला और उनके गले की मालाएँ उतार कर दिखा तो मैं कुछ मानूँ, नहीं तो तुझे मेरे आगे परास्त होने का दंड मिलेगा। सिर कटाने को तैयार हो जा।”

जो अपने गुरु को बुड्ढा कहता है समझ लो कि उसकी योग्यताओं का ह्रास शुरु हो गया, उसकी भावना का दिवाला निकला है। उस आदमी का पुण्य प्रभाव क्षीण और मति-गति विकृत हो जाती है।

अब बैजू बावरा ने गुरु हरिदासजी का ध्यान कियाः

ध्यानमूलं गुरोर्मूतिः पूजामूलं गुरोः पदम्।

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा।।

गुरु की इजाजत मिल गयी कि ‘अहंकार सजाने, किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि धर्मरक्षा के लिए अपनी विद्या का उपयोग कर सकते हो।’

बैजू बावरा ने तोड़ी राग गाया। ऐसा राग आलापा कि राज भाव समाधि में चला गया, रानियाँ और प्रजा सब स्तब्ध हो गये। आज तक गोपाल ने जो प्रभाव जमा रखा था वह सब फीका हो गया। जो भागे हुए हिरण थे वे वापस आ गये। बैजू खड़े-खड़े गीत गाते गये और उनके गले की मालाएँ उतारकर एक तरफ ढेर कर दिया। हिरण एकटक देखते रहे, उन्हें अपनी सुधबुध न रही।

बाद में भीमपलासी राग गाते-गाते बैजू ने एक पत्थर पर दृष्टि डाली तो वह पत्थर पिघलने लगा जैसे मोम पिघलता है। पिघले हुए उस पत्थऱ पर उसने अपना तानपूरा फेंका और गीत बंद किया तो पत्थर फिर कड़क हो गया और तानपुरा उसमें जम गया।

बैजू बावराः “हे गुणचोर, गुरुद्रोही गोपाल नायक ! अगर तेरे पास है कोई विद्या, बल या अपनी योग्यता तो इस पत्थर को पिघला और मेरा तानपूरा निकाल कर दिखा।” जिसने अहंकार के कारण कइयों की जानें ली थीं और गुरुद्रोह कर रखा था, अब उसके राग दम ही कहाँ।

गोपाल ने गीत गाते-गाते कई बार पानी के घूँट भरे, सभी कोशिशें की मगर सब नाकाम रहीं। वह गाते-गाते थक गया, न पत्थर पिघला, न साज निकला, आखिर हार गया। राजा की आँखें क्रोध से चमचमाने लगीं। बैजू ने कहाः “राजन् ! इसे माफ कर दें। आखिर मेरा शिष्य है, बालक है। इसे मृत्युदण्ड न दें।”

गोपालः “मृत्युदण्ड तो इस बुड्ढे को दें यह मेरा गुरु बना था और यह विद्या मुझसे छुपाकर रखी। अगर यह विद्या मुझे सिखाता तो आज मैं हारता नहीं।”

बैजू बावराः “हाँ राजन् ! मुझे ही मृत्युदण्ड दे दो कि मैंने ऐसे कुपात्र को विद्या सिखायी जिसने लोकरंजन न करके, लोकेश्वर की भक्ति का प्रचार न करके अपने अहं को सजाया, कर्म को विकर्म बनाया। जिससे कई अबलाओं का सुहाग छिन गया, कई निर्दोष बच्चों के पिता छिन गये और तुम्हारे जैसे कई राजाओं का राज्य, धन-वैभव इसका अहंकार पोसने में लग गया। मैं अपराधी हूँ, मुझे दण्ड दीजिये।”

राजाः “गायकराज ! तुम्हारे गीतों से पत्थर पिघल सकता है लेकिन न्याय के इस तख्त पर बैठे राजा का कठोर हृदय तुम नहीं पिघला सकते हो। इस गद्दार को मृत्युदण्ड दिया जायेगा।”

क्रोध से चमचमाती आँखों और उग्र हाथ ने इशारा किया – इस नमकहराम, अहंकारी का शिरोच्छेद कर दो। जल्लादों ने गोपाल का सिर धरती पर गिरा दिया। यह घटना बैजू बावरा सह नहीं सका। जैसे कुपुत्र के जाने से भी माता-पिता के दिल में दुःख होता है, ऐसे ही बैजू बावरा के दिल में दुःख हुआ।

सतलज नदी के तट पर गोपाल का अग्नि संस्कार हुआ। उसकी पत्नी ने प्रार्थना कीः “हे गुरुवर ! मेरे पति ने तो अनर्थ किया लेकिन आप तो करूणामूर्ति हैं, उन्हें क्षमा कर दें। मैं अपने पति की अस्थियों के दर्शन करना चाहती हूँ। अस्थियाँ नदी में चली गयी हैं। आप मेरी सहायता करें।”

बैजू बावरा ने उसे ढाढ़स बँधाया और एक राग की रचना की। वह राग उसकी बेटी मीरा को सिखाया। मीरा को बोलेः “तू यह राग गा और भगवान को प्रार्थना कर कि पिता कि अस्थियाँ जो नदी के तल में पहुँच गयी हैं वे सब एकत्रित होकर किनारे आ जायें।” मीरा ने राग गाया और सारी अस्थियाँ किनारे लग गयीं। आज के विज्ञान के मुँह पर थप्पड़ मारने वाले गायक अपने भारत में थे, अब भी कहीं होंगे।

गोपाल ने गुरु की विद्या को अहंकार पोसने में लगाया, क्या हम-आप ऐसी गलती तो नहीं कर रहे हैं ? श्रीकृष्ण कहते हैं- सावधान !….

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।

‘कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म की गति गहन है।’

(गीताः 4.17)

आप जो भी कर्म करते हो तो वह ईश्वर की प्रीति के लिए, समाज के हित के लिए करो, न अहं पोसने के लिए, न कर्तृत्व-अभिमान बढ़ाने के लिए, न फल-लिप्सा के लिए और न कर्म-आसक्ति के वशीभूत होकर कर्म करो। क्रियाशक्ति, भावशक्ति और विवेकशक्ति इनका सदुपयोग करने से आप करने की शक्ति, मानने की शक्ति, जानने की शक्ति जहाँ से आती है उस सत्स्वरूप परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाओगे।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


baiju baavara

(poojya bapuji ke satsang-pravachan se)

aapke paas maanane ki, jaanane ki, karne ki shakti hai, atah aap aise satkarm karo jin karmon se antaryaami paramatma santusht ho, ahankar pusht n ho, lobh-moh n badhe, dvesh, chinta n badhe, ye sab ghat jaayen। aapke paas jo bhi dhan, satta yogyata hai, agar usake saath eeshvarapraapti ka uddeshya nahin hai to vah n jaane kis prakar tumhen dhokha de jaay koi pata nahin।

vrindavan men haridas maharaj ke paas sangeet vidya sikhne gwaliyar ke paas ke chanderi (gwaliyar kshetra, m.pr.) ka 10 saal ka bachcha aaya tha… guru ne sveekar kiya ..
..baiju rat bhar vrindavan ke galiyon men bhatke…shrikrishna ki bansi ki dhun sunaai padati…subah guruji aaye to baiju soye mile…
aur udaaratma guroodev pad bana bana ke us ko jagaate..
ai baavare jaag bhor bhai..
to baiju ka nam pad gaya baiju baavara…
10 saal ke baiju ka guru ne haath pakada hai, kaisa bhi baiju mera hai ..baat poori ho gayi….divali ke dhan teras ki pooja ho rahi hai aur baiju subah dhan teras ko bhi so raha hai ..jaga to sahi lekin aankhon men pyas hai..
tadapati huyi aankhon ne dhan teras ki rat ko shrikrishna ko pragat hone men badhya kar diya..bansi to sunaai padati lekin bansidhar kahan hai? … jahan se aavaaj aai vahan kheenche chale ge…aavaaj band ho gaya..
dekha ki vriksh pe vahan shrikrishna hai.. main kaise vahan pahunchoonga ?….moorchhit se ho ge baiju…
shrikrishna ne uthaya baiju ko…. “mere liye too baavara hain to main bhi tere liye baavara hoon…!
sansaari chijo ke liye koi baavara hota to sansaari cheej us ke liye baavara nahin hoti…
lekin manushya ek -dusare ke liye baavara hota hai aur aatma-paramatma bhi ek-dusare ke liye baavara hota hai…baiju is baat ko pakad lena…”

baiju bole, “mere guruji ke paas chalo..unhi ki kripa se tum mile ho…”
guruji ne darshan kiya ..
“baiju too baavara nahin hai, tujhe baavara kahenevaale bhi baavare hai..lekin isi nam se beta too prasidhd ho aur tujhe saari vidyayen hastagat ho…”
guruji ka varadaan mil gaya …
baiju baavara jis kisi ko bhi kuch sikhata , sunata to apana aatma samajh kar…

haridas maharaj ke do shishya the baiju baavara aur taanasen। donon gurubhai mahaan sangeetagya ho gaye। baiju baavara ka janm isvi san 1542 men chanderi (gwaliyar kshetra, m.pr.) men hua tha। baiju ka sangeet aur vyavahaar bahut sukhad tha। vah guru ki kripa ko pachaane men safal raha। guru se sangeet ki vidya seekhakar baiju ekant men chala gaya aur jhonpadi banakar sanyami jeevan jeete hue sangeet ka abhyas karne laga। abhyas men aisa tadakar hua ki sangeet ki kala seekhne vaale kai log usake shishya ban gaye। unamen gopal nayak nam ka ek shishya bada pratibha sampann tha। jaise baiju ne apane guru haridasaji ki prasannta pa li thi, aise hi gopal ne bhi baiju ki prasannta pa li। saptah beete, maheene beete, varshon ki yatra poori karake gopal ne sangeet-vidya men nipunta haasil kar li।

ab vakt hua guru se vidaai lene ka। gopal ne pranam kiya। vidaai dete samay baiju ka hridaya bhar aaya ki yah shishya meri chhaya ki tarah tha, meri vidya ko pachaane men safal hua hai par jaane se rok to sakte nahin। baiju bhare kanth, bhari aankhen shishya ko vidaai deta hua bolaah “putra ! tujhe sangeet ki jo vidya di hai, yah manushya jaati ka shok, moh, duahkh, chinta harne ke liye hai। iska upayog jeb bharne ya ahankar posane ke liye nahin karana।” vidaai lekar gopal chala gaya।

gopal nayak apane geet aur sangeet ke prabhaav se charon taraf jaya-jayakaar kamata hua kashmeer ke raja ka khaas rajagayak tha।

jab eeshvarapraapti ka uddeshya nahin hota tab dhan milta hai to dhan ki lalsa badhti hai, maan milta hai to maan ki lalsa, satta milti hai to satta ki lalsa badhti hai। us lalsa-lalsa men aadami raasta chook jata hai aur n karne jaise karm karake buri dasha ko prapt hota jata hai। itihas men aisi kai ghatanaayen milengi।

ab gopal ko charon taraf yash milne laga to usaka ahankar aisa foola, aisa foola ki vah gaayakon ka sammelan karata tatha unake saath geet aur sangeet ka shastrarth karta। gaayakon ko lalakarataah “aao mere saamane ! agar koi mujhe hara dega to main apana gala katava doonga aur jo mere aage haarega usako apana gala katavana padega।” jo haar jata usaka sir katava deta। haarne vaale gaayakon ke sir katate to kai gayak-patniyan vidhava aur gayak-bachche anath, lachar, mohataj ho jaate lekin isake ahankar ko maja aata ki mainne itane sir katava diye। mujhe chunauti dene vala to mrityu ko hi prapt hota hai।

baiju baavara ka dikhane vala satshishya kushishya ban gaya। mere gurudev ka bhi ek kahalane vala satshishya aisa hi kushishya ho gaya tha to guruji ne usaka tyag kar diya। vah mujhase bada tha, main usaka aadar karta tha। baad men meri jara prasiddhi hui to mere paas aaya lekin mainne usase kinara kar liya। jo mere guru ka nahin hua, vah mera kab tak ? gurubhai tab tak hai jab tak mere guru ki aagya men rahata hai। mere aashram se 40 saal men jo 5-25 log bhaag gaye, ve bagavat karne vaale aur dharmaantaran vaalon ke hathakande ban gaye। ab unki baaton men mere shishya thode hi aate hain। ve to gurubhai tab tak the jab tak guru ke siddhant men rahate the। guru ka siddhant chhoda to hamara gurubhai nahin hai, vah to hamara tyajya hai। jaise subah mal chhodkar aate hain to dekhte nahin hain। vaman karte hain to dekhte nahin hain ki kitani keemati ulati hai।

us jamaane men mobaail ki vyavastha nahin thi। baiju baavara ko gopal ki karatooton ka jaldi se pata nahin chala। kai gaayakon ke sir kat gaye, kai abalaen vidhava ho gayeen, unake bachche dar-dar ki thokar khane vaale mohataj ho gaye tab baat ghoomati-ghaamati baiju baavara ke kaan padi। use bada duahkh hua ki is dusht ne meri vidya ka upayog ahankar posane men kiya ! mainne kaha tha ki yah sangeet ki vidya ahankar posane ke liye nahin hai।

aakhir vah apane shishya ko samajhane ke liye pachason kos paidal chalte-chalte vahan pahuncha, jahan gopal nayak bade taamajham se rahata tha।

raja saahab ka khaas tha gopal, isaliye angarakshakon, sevakon aur tahaluon se ghira tha। use sandesha bheja ki tumhaare guru tumse milne ko aaye hain। gopal ne guru se milna apana apamaan samajha। baiju ne paharedaron se bahut aajiji ki aur kisi bahaane se andar pahunchane men safal ho gaya। vriddh guru aaye hain yah dekhakar bhi vah baitha raha, uthakar khade hona usake ahankar ko pasand nahin tha। vah jor se chillayaah “are, kya hai boodha !”

baiju bolaah “beta ! bhool gaya kya ? mainne bhari aankhen, bhare hridaya se tujhe vidaai di thi। main vahi baiju hoon gopal ! kyon too ahankar men pad gaya hai ! mainne suna toone kiyon ke sir katava diye। beta ! isaliye vidya nahin di thi। main teri bhalaai chahta hoon putra !”

gopalah “pagal kahin ka, kya bakta hai ! yadi too gayak hai ya guru hai to kal aa jana rajadarabaar men, dikha dena apani gaayan kala ka shaurya। agar haar gaya to sir katava diya jayega। pagal ! bada aaya guru banane ko !”

naukaron ke dvara dhakke maar ke baahar nikalva diya। ahankar kaisa andha bana deta hai ! lekin guruon ki kya balihari hai ki ekaadh daanv apane paas rakhte hain। us lachar dikhne vaale boodhe ne rajadarabaar men ghoshana kar di ki ‘kal ham rajagayak ke saath geet aur sangeet ka shastrarth karenge। agar ham haarenge to raja saahab hamara sir katava sakte hain aur agar vah haarta hai to usaka katavaayen-n-katavaayen svatantra hain।’ aakhir guru ka dil guru hota hai, udaar hota hai। taamajham se apani vijay-pataka faharane vaale gopal nayak ke saamane vah boodha bechaara hilta-dulta aisa laga maano, makhamal se purane chithade aakar takara rahe hain lekin baahar se dekhne men purane chithade the, bheetar se haridas guru ki kripa usane sanbhaal rakhi thi। guru se gaddari nahin ki thi। guru se gaddari karne se guru ki di hui vidya lupt ho jaati hai, mere gurubhai ke jeevan men mainne dekha hai।

doosare din gopal ne aisa rag aalapa ki mahalon ke jharokhon se dekhne vali raniyan, das-dasiyan vahin stabdh ho gayeen, raja gadagad ho gaya, praja bhi khush ho gayi। vah sangeet sunane ke liye jangal se hiran bhaag-bhagkar aa gaye। gopal ne geet gaate-gaate hiranon ke gale men haar pahana diye aur unako pata hi nahin chala। geet-sangeet ke prabhaav se ve itane tanmay ho gaye the। geet band kiya to hiran bhaag gaye। gopal ne guru ko lalakaraah “au buddhe ! kya hai tere paas ? ab too dikha koi jalva। agar tujhamen dam hai to un bhaage hue jangli hiranon ko apane rag se vapas bula aur unake gale ki maalaen utaar kar dikha to main kuch maanoon, nahin to tujhe mere aage parast hone ka dnd milega। sir katane ko taiyaar ho ja।”

jo apane guru ko buddha kahata hai samajh lo ki usaki yogyataon ka hraas shuru ho gaya, usaki bhavna ka divala nikala hai। us aadami ka punya prabhaav ksheen aur mati-gati vikrit ho jaati hai।

ab baiju baavara ne guru haridasaji ka dhyaan kiyaah

dhyanamoolam gurormootih poojamoolam guroah padam।

mantramoolam gurorvakyn mokshamoolam guroah kripa।।

guru ki ijajat mil gayi ki ‘ahankar sajaane, kisi ko neecha dikhane ke liye nahin balki dharmaraksha ke liye apani vidya ka upayog kar sakte ho।’

baiju baavara ne todi rag gaya। aisa rag aalapa ki raj bhaav samadhi men chala gaya, raniyan aur praja sab stabdh ho gaye। aaj tak gopal ne jo prabhaav jama rakha tha vah sab fika ho gaya। jo bhaage hue hiran the ve vapas aa gaye। baiju khade-khade geet gaate gaye aur unake gale ki maalaen utarkar ek taraf dher kar diya। hiran ekatak dekhte rahe, unhen apani sudhabudh n rahi।

baad men bheemapalasi rag gaate-gaate baiju ne ek patthar par drishti dali to vah patthar pighalne laga jaise mom pighalta hai। pighale hue us पत्थऱ par usane apana taanapoora fenka aur geet band kiya to patthar fir kadak ho gaya aur taanapura usamen jam gaya।

baiju baavaraah “he gunachor, gurudrohi gopal nayak ! agar tere paas hai koi vidya, bal ya apani yogyata to is patthar ko pighala aur mera taanapoora nikaal kar dikha।” jisane ahankar ke kaaran kiyon ki jaanen li thin aur gurudroh kar rakha tha, ab usake rag dam hi kahan।

gopal ne geet gaate-gaate kai baar pani ke ghoont bhare, sabhi koshishen ki magar sab nakaam rahin। vah gaate-gaate thak gaya, n patthar pighala, n saaj nikala, aakhir haar gaya। raja ki aankhen krodh se chamachamaane lagin। baiju ne kahaah “rajan ! ise maf kar den। aakhir mera shishya hai, baalak hai। ise mrityudand n den।”

gopalah “mrityudand to is buddhe ko den yah mera guru bana tha aur yah vidya mujhase chhupakar rakhi। agar yah vidya mujhe sikhata to aaj main haarta nahin।”

baiju baavaraah “haan rajan ! mujhe hi mrityudand de do ki mainne aise kupaatra ko vidya sikhayi jisane lokaranjan n karake, lokeshwar ki bhakti ka prachaar n karake apane ahn ko sajaya, karm ko vikarm banaya। jisase kai abalaon ka suhaag chhin gaya, kai nirdosh bachchon ke pita chhin gaye aur tumhaare jaise kai rajaon ka rajya, dhan-vaibhav iska ahankar posane men lag gaya। main aparadhi hoon, mujhe dand deejiye।”

rajaah “gaayakaraj ! tumhaare geeton se patthar pighal sakta hai lekin nyay ke is takht par baithe raja ka kathor hridaya tum nahin pighala sakte ho। is gaddaar ko mrityudand diya jayega।”

krodh se chamachamaati aankhon aur ugra haath ne ishara kiya – is namakaharam, ahankari ka shirochchhed kar do। jalladon ne gopal ka sir dharati par gira diya। yah ghatna baiju baavara sah nahin saka। jaise kuputra ke jaane se bhi mata-pita ke dil men duahkh hota hai, aise hi baiju baavara ke dil men duahkh hua।

satalaj nadi ke tat par gopal ka agni sanskar hua। usaki patni ne praarthana kiah “he guruvar ! mere pati ne to anarth kiya lekin aap to karoonamoorti hain, unhen kshama kar den। main apane pati ki asthiyon ke darshan karana chahati hoon। asthiyan nadi men chali gayi hain। aap meri sahayata karen।”

baiju baavara ne use dhadhs bandhaya aur ek rag ki rachna ki। vah rag usaki beti meera ko sikhaya। meera ko boleah “too yah rag ga aur bhagavaan ko praarthana kar ki pita ki asthiyan jo nadi ke tal men pahunch gayi hain ve sab ekatrit hokar kinare aa jaayen।” meera ne rag gaya aur saari asthiyan kinare lag gayeen। aaj ke vigyaan ke munh par thappad maarne vaale gayak apane bharat men the, ab bhi kahin honge।

gopal ne guru ki vidya ko ahankar posane men lagaya, kya ham-aap aisi galti to nahin kar rahe hain ? shrikrishna kahate hain- savadhaan !….

karmano hyapi boddhavyam ch vikarmanah।

akarmanashch boddhavyam gahana karmano gatih।।

‘karm ka swaroop bhi janna chaahiye aur akarm ka swaroop bhi janna chaahiye tatha vikarm ka swaroop bhi janna chaahiye, kyonki karm ki gati gahan hai।’

(geetaah 4.17)

aap jo bhi karm karte ho to vah ishwar ki priti ke liye, samaj ke hit ke liye karo, n ahn posane ke liye, n kartritva-abhimaan badhane ke liye, n fal-lipsa ke liye aur n karm-aasakti ke vashibhoot hokar karm karo। kriyashakti, bhavashakti aur vivekashakti inka sadupayog karne se aap karne ki shakti, maanane ki shakti, jaanane ki shakti jahan se aati hai us satswaroop paramatma men pratishthit ho jaaoge।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 20,185 other followers

%d bloggers like this: