घाटवाले बाबा

मनुष्य की बड़ी कमज़ोरी है की सुख का महा..परम…सर्वे सर्वा आत्मदेव  यही के यही है (हृदय मंदिर में)..और यहा सुख छोड़ के बाहर सुख खोजते..जो जहाँ है वहा संतुष्ट नही है, सुखी नही है…कुछ बन कर, कुछ पा कर, कुछ भोग कर, कुछ कर के, कही जा  के सुखी होने की जो भ्रमणा  है ये मेरे में भी थी…

घाटवाले बाबा मेरे मित्र संत थे..बड़ी उँची हस्ती के धनी थे..आत्म साक्षात्कारी थे..उन के चित्त में समता कूट कूट के भरी थी…वो हरिद्वार के माया पूल बिरला घाट की सीढ़ियों के नीचे गंगा किनारे बैठे रहेते…वहा भीड़-भाड़, आते-जाते लोग..बाबा सुबह 4 बजे जंगल मे चले जाते तो 11 बजे आते..भिक्षा-भोजन आता तो खा लेते..फिर शाम को 4-5 बजे जंगल  मे चले जाते..लेकिन जंगल  में ऐसी जगह चले जाते की घना जंगल नही होता की उसी रास्ते से वापिस भी पैदल आना होता…इसलिए हरिद्वार से सटा हुआ जंगल का शुरूवात का प्रदेश – मिलकेश्वर के पास जहाँ हरिद्वार नगर के सारे कचरे की ट्रके खाली होती थी वहा… मरा हुआ भैस, घोड़ा, जनावर आदि वहा ही फेंक जाते..एक तरफ मरी हुई भैस को गिधे नोच रही है और दूसरी तरफ बाबा चबूतरे पर बैठे है..मैं ने कहा, “ये क्या है ?” ..तो बोले , “ये सब ब्रम्‍ह की लीला है!”

मैने कई बार उन को मोटेरा चलने का आग्रह किया की वहा सुंदर व्यवस्था हो जाएगी…तो बोलते की ” मोटेरा को यहा ले आओ” ऐसा कर के मेरी बात को मज़ाक में टाल देते…एक दिन मैं ने कहा की , “मैं आप को इतना कहेता हूँ ..मेरी बात का आप पर कोई असर नही होती…  क्या बात है?”

तो बोले : “देखो जी …जो जहाँ है वहा सुखी रहेना नही सीखा तो वैकुंठ में जा कर भी दुखी हो जाएगा!!”

 

बाप रे! क्या सार बात उस महा पुरुष ने बता दी…

जो जहाँ है..वास्तविक में सभी लोग उसी परमेश्वरी सत्ता में है..तो जो जहाँ है वहा सुखी होना नही जाना तो वैकुंठ में जाकर भी दुखी हो जाएगा…यह बात शास्त्र भी कहेते है की जय विजय भगवान विष्णु के पार्षद थे..लेकिन वहा भी राग द्वेष किए..सनकादि ऋषियों का अपमान हो गया..निरस थे तभी तो राग द्वेष हुआ..रसवान को कहा राग द्वेष ?…ऋषियों का अपमान हुआ तो ऋषियों ने श्राप दिया की 3-3 बार ऋषियों का अपमान किया तो 3-3 बार जा कर दैत्य बनो..वो ही जय -विजय हिराणाक्श-हीरण्यकश्यपू बने,वोही जय – विजय शिशुपाल-दन्तवक्र बने, और वो ही जय -विजय  रावण और कुंभकर्ण  बने…

तो वैकुंठ में जाने के बाद भी सुख की पूर्णता नही है.

रावण ने सोने की लंका बनाई तो भी अंतरात्मा का सुख नही था तो ललना और सुंदरी के सुख सुख  करने में सीता जी तक पहुँच गया…

तो सार बात यह है की आप का अंतरात्मा परमेश्वर सुख रूप है..आनंद रूप है..अब आप वो आनंद मन से संसार में दूसरी जगह उंड़ेल के गुलाम बन जाते..

कश्मीर में सुख है की वासना से सुख है? लेकिन जिस को कश्मीर में पहुँचने की वासना नही है उस को कश्मीर में सुख नही आएगा…

इसी को बोलते है माया..

वो माया मन से अलग नही है..मन ही एक माया है..माया कहो , अविद्या  कहो वो मन से अलग नही है..

नास्ति अविद्या मनसो अतिरिक्ता

मन एव अविद्या भवबन्ध हेतु..

मन ही इंद्रियों से जुड़ कर बाहर से सुखी होने की बेवकूफी करता है तो ये माया है..

अगर मन में संस्कार पड़े और बाहर का आकर्षण घटते घटते अंतरात्मा में तृप्ति मिल जाए..संतुष्टि मिल जाए..विश्रान्ति मिल जाए..अंतरात्मा का सामर्थ्य मिल जाए..फिर कहीं भी गये सैर करने वो अलग बात है…

तो ज्ञानी  अपना असली काम निबटा के फिर घूमता है..लेकिन अज्ञानी  असली काम छोड़ कर बाहर भटकता है..ज्ञानी सैर करता है और अज्ञानी मूढ़ भटकता है..

भगवान कहेते है :

अज्ञानेन आवृत्तम ज्ञानम

तेन मोहंती जंतवा ll

अज्ञान से उन का आत्म रस ढक गया है इसलिए वो मोहित हो जाते है…मोह क्या है? उलटे ज्ञान को मोह बोलते..सुख है अपने में और बाहर सुख ढूँढ के सुखी होना चाहते है ये उलटा ज्ञान है..तो अपना सुख आप जिस में उंड़ेलते वो सुख रूप हो जाता है..अपना प्रेम जिस में उंड़ेलते वो प्रेम रूप हो जाता है..अपना महत्व जिस जिस को देते वो महत्वपूर्ण हो जाता है..

जब मनुष्य के चित्त में बाहर की चीज़ का महत्व आता है और वो अपनी सच्चाई वफ़ादारी भूल जाता है..तब वो  तुच्छ हो जाता है..जब सच्चाई वफ़ादारी और भगवान का महत्व आता है तब बाहर के विचार तुच्छ हो जाते है..

इसी बात को भगवान कृष्ण बोलते है :

आत्मेव आत्मनो बंधु l

मनुष्य अपने आप का बंधु है..विषय विकारों से बच कर अंतरात्मा के सुख में, ज्ञान में और प्रभु की प्रीति के लिए सेवा में आता है तो अपने आप का मित्र है..अगर ये सत्कर्म छोड़ कर स्वार्थ में, धन में, संग्रह में लगता है तो तनाव और आकर्षण में गिर के उसी में मर जाता है..

(Pujyashri Bapuji on 5/5/2012: Dwarka Satsang Amrut)

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