गुरु की आवश्यकता क्यों ?

( परम पूज्य आसाराम बापूजी के सत्संग से )

गुरू का दिया हुआ मन्त्र चेतन होता है…जैसे कितनी मोटी  केबल  आ जाए तुम्हारे घर में तो कोई फरक नहीं पड़ता, लेकिन पॉवर हाउस से जुडी हुयी पतली केबल  भी आ जाए तो उस से जुड़ा  फ्रिज़ पानी ठंडा करेगा, गीजर  पानी गरम करेगा, टीवी अपना रंग दिखाएगी, तो  पंखा अपना हवा फेकेगा..
पॉवर हाउस से जुडी हुयी केबल  आप के साधनो में जान भर देती है… ऐसे गुरू रूपी पॉवर हाउस के अंतकरण से स्फुरीत  जब गुरू दीक्षा मिलती है तो 33 प्रकार के अध्यात्मिक अनुभव होने लगते है..
इसलिए शिव जी ने माँ पार्वती  जी को वामदेव गुरू से मन्त्र दीक्षा दिलाई..
भगवान राम जी ने वशिष्ठ गुरू की शरण ली.
भगवान कृष्ण ने संदीपनी गुरू की शरण ली.
कलकत्ते की काली  माता प्रगट होकर गदाधर पुजारी को  कहेती है की तोतापुरी गुरू से मन्त्र दीक्षा ले लो..तोतापुरी गुरू की दीक्षा के बाद ही गदाधर पुजारी में से रामकृष्ण परम हंस ये महापुरुष हो गए..
लीलाशाह बापूजी के कृपा से आंसूमल से आसाराम हो कर तुम्हारे सामने बैठा हूँ… :)

तो गुरू की दीक्षा और सत्संग से जो लाभ होते है वो दुनियाई रुपये  से आप माप नहीं सकते है…

मेरे शिष्यों  को   हार्ट अटैक  नहीं होगा, हाई बी पी / लो बी पी  नहीं होगा.. ..आशीर्वाद मन्त्र चालू करो..

देवियाँ माताओं को  सिजेरियन  नहीं करना पड़े ..माईयां … देवियाँ … कभी भी मासिक धरम सम्बन्धी बिमारियों के लिए अलोपथी  दवाई नहीं लेना…रात को  ताम्बे के बर्तन में 4 ग्लास पानी रख दो(फ्रिज में नहीं, ऐसे ही सादा )सुबह  पि लो..घुमो…हरि ॐ का जप करो..तो ऐसी बीमारी भागती की जैसे राम जी का तीर देख के पाप भाग जाते, दैत्य भाग जाते … :) ऐसा फायदा होगा..

जिन्हों ने मन्त्र दीक्षा लिया है उन को  33 प्रकार के अध्यात्मिक फायदे होते ही है ..और दुसरे कई अन-गिनत फायदे होते जैसे रोजी रोटी में बरकत, बे-रोजगार को नोकरी मिल जाती, घर परिवार के झगड़े  सब मिट जाते.. कोई समस्या है तो स्वप्ने में मार्गदर्शन मिलता.. ऐसे अनगिनत फायदे होते…

मेरे साधक को बाय – पास सर्जरी  नहीं करना है,अहमदाबाद अथवा देल्ही आश्रम में फ़ोन कर के मार्गदर्शन ले ले ..तो बाय -पास सर्जरी  किये बिना ऐसे ही ब्लोकेज  खुल जायेगा…
मेरे शिष्यों को मोतियाबिंदु का ओपरेशन कभी नहीं कराना है..
मोतिया बिंदु है तो नीता वैद्य से फ़ोन पर अथवा ऐसे ही मार्गदर्शन ले ले …अथवा आश्रम में फ़ोन पर मार्गदर्शन ले ले ..बिना ओपरेशन का एक महीने में विशेष नेत्र बिंदु डालने से मोतिया बिंदु ठीक होगा…

मेरे साधको पे झूठे केस नहीं टिक सकते..मन्त्र देते है ..तो झूठे केस से , या मुसीबत तनाव है तो किसी को फी देने की, घुस देने की कोई जरुरत नहीं… मन्त्र जाप करो , मुकदमे बाजी  से आराम मिल जाएगा..

मेरे साधको को भगवान को  पाने के सिवाय किसी चीज में महत्त्व बुध्दी नहीं रखनी चाहिए…
कोई भी चीज मिलेगी तो छुट जायेगी, मौत सब छुडा देगी, लेकिन भगवान की भक्ति अथवा भगवान का स्वरुप कभी नहीं छुटता है..
हरि ssssssss ओम्म्म sssssssssss

कैसा भी भाग्य टूटा फुटा है , तबियत गड़बड़ हो , लोग कुछ भी कहेते हो.. ज्यादा नहीं तो कम से कम 15 मिनट ये करे तो पाप ताप दुःख दारिद्र्य रोग शोक को हरनेवाले चंचलता मलिनता को हरनेवाला सुख शांती  को भरनेवाला हरी नाम का उच्चारण करो..

भय नाशन दुरमति हरण
कलि में हरी को नाम
निशदिन साधक जो जपे
सफल होवई सब काम
हरि हरि ओम्म ssss हरि ॐ


जिस ने धर्म का आश्रय लिया है, उस के अन्दर में अनुचित जगह पे जाने पर संयम करने की रीत आ जाती है .. अनुचित बोलना, अनुचित खाना, अनुचित करना- उस में ब्रेक लगाने की ताकद का नाम है धर्म…
जो पतन से बचाए वो धरम है.
धर्म अर्थात- जो सारे विश्व को  धारण करे , यहाँ और परलोक में अभ्युदय करे उस का नाम है धर्म!

यतो अभ्युदय निश्रेय  सिध्दी सा-धर्म

वैशेषिक दर्शन शास्र  कहेता है –  जिस से इस लोक में दुःख- दरिद्रता, मुसीबते चली जाये, और परलोक में भी सदगति  और परमात्म प्राप्ति हो जाए इस का नाम है धर्म !

तीरथ नहाए एक फल
संत मिले फल चार
सदगुरू  मिले अनंत फल
कहत कबीर विचार

कबीर जी कहेते :
निगुरे का नहीं कोई ठिकाना,84 में आना-जाना..
सुन लो चतुर सुजान निगुरा नहीं रहेना
गुरू बिन माला क्या सटकावे
मनवा तो दस दिशा जावे,कैसे हो कल्याण?
सुन लो चतुर सुजान निगुरा नहीं रहेना..

-बीमारी आती शरीर को , निगुरा बोलता मैं  बीमार हूँ,
-दुःख आता है मन को -निगुरा बोलता मैं  दुखी हूँ,
-चिंता आती है चित्त में निगुरा बोलता मैं  चिंतित हूँ…
ये जो शरीर दिखता है , वो मरनेवाला एक साधन है..शरीर की बीमारी अपनी बीमारी मत मानो ..शरीर का रोग अपना रोग मत मानो..मन का दुःख अपना दुःख मत मानो…इस को  तो तुम जाननेवाले हो..तुम तो इस जाननेवाले को  जिस परमात्मा से सत्ता आती है उस को अपना मानो..
उस परमात्मा से तुम्हारा नित्य योग है..जिस को कभी नहीं छोड़ सकते वो तुम्हारा आत्मा परमात्मा है…शरीर और संसार से तुम्हारा नित्य वियोग है…बचपन से वियोग हो गया, जवानी से वियोग हो गया..कल के खाए पिए से वियोग हो गया और कल के जीवन से वियोग हो गया..लेकिन उस को  जाननेवाले आत्मा-परमात्मा से कभी वियोग नहीं हुआ..जिस से कभी वियोग नहीं होता उस परमात्मा को ही अपना आत्म-रूप में जानना ही योग है..और नश्वर संसार की चीजो को अपना मानना वियोग है..


परमात्म शांती  से दोषों की निवृत्ति होती है…
परमात्म शांती  से भाग्य की रेखाए बदलती है..
परमात्म शांती  से परमात्म सामर्थ्य आता है..
परमात्म ज्ञान से सुख दुःख में समता आती है.
परमात्म सुमिरन से राग द्वेष इर्षा शांत होती है..

परमात्मा के प्यारे संतो के संपर्क से प्रेमा भक्ति का रसास्वाद मिलता है…

भक्ति सकल साधन कर मुला
मिल ही जो होए संत अनुकूला

सभी सुखद साधनो का मूल है भगवान की भक्ति…संत भक्त अनुकूल हो तो भगवान की भक्ति का आस्वादन मिलता है..

धन तो वेश्याओं के पास, किन्नरो के पास, लोफरो के पास भी होता है…धन होना बड़ी बात नहीं..सत्ता होना बड़ी बात नहीं…लेकिन जिन की भगवान में भक्ति है ऐसे संतो का संग होना बहोत बड़ी बात है…भगवान की प्रीति का सदगुण , भगवान के प्यारे संतो के संग का सदगुण  भाग्य के कठिन अंक को भी मिटा देता है…

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guru ka diyaa huaa mantr chetan hota hai…jaise kitani moti cable aa jaaye tumhare ghar me to koyi pharak nahi padataa, lekin power house se judi huyi patali cable bhi aa jaaye to us se juda frize pani thanda karega, gyjar pan igaram karega, tv apana rang dikhayegi t pankha apana havaa phekegaa..
power house se judi huyi cable aap ke sadhano me jaan bhar deti hai aise guru rupi power house ke antakaran se  spurit jab gurudiksha milati hai to 33 prakaar ke adhyatmik anubhav hone lagate hai..
isliye shiv ji ne maa parvati ji ko vaamdev guru se mantr dikshaa dilaayi..
bhagavan ram ji ne vashishth guru ki sharan li.
bhagavan krushn ne sandipani guru ki sharan li.
kalakatte ki kali mata pragat hokar gadaadhar pujari k kaheti hai ki totapuri guru se mantr diksha le lo..totapuri guru ki diksha ke baad hi gadadhar pujari me se ramkrushn param hans ye mahapurush ho gaye..
lilashah bapuji ke krupa se asumal se asaram ho kar tumhare samane baithaa hun… :)

to guru ki diksha aur satsang se jo labh hote hai vo duniyaayi rupaye apison se aap maap nahi sakate hai…

tirath nahaaye ek phal
sant mile phal chaar
sadguru mile anant phal
kahat kabir vichaar

kabir ji kahete :
nigure ka nahi koyi thikana,84 me aana-jana..
sun lo chatur sujaan nigura nahi rahenaa
guru bin mala kya satakaave
manavaa to das disha jaave,kaise ho kalyan?
sun lo chatur sujaan nigura nahi rahenaa..

-bimari aati sharir ko nigura bolataa mai bimar hun,
-dukh aata hai man ko -nigura bolata mai dukhi hun,
-chinta aati hai chitt me nigura bolataa mai chintit hun…
ye jo sharir dikhata hai , vo maranewala ek sadhan hai..sharir ki bimari apani bimari mat mano..sharir ka rog apana rog mat maano..man kaa dukh apana dukh mat maano…is k to tum jananewale ho..tum to is jaananewale ki jis paramaatma se satta aati hai us ko apanaa maano..
us paramaatma se tumhara nity yog hai..jis ko kabhi  nahi chhod sakate vo tumhara aatma paramaatma hai…sharir aur sansaar se tumhara nity viyog hai…bachapan se viyog ho gayaa, jawani se viyog ho gayaa..kal ke khaye piye se viyog ho gayaa aur kal ke jeevan se viyog ho gayaa..lekin  us k jaananewale aatma-paramaatma se kabhi viyog nahi huaa..jis se kabhi viyog nahi hota us paramaatma ko hi apanaa aatm-rup me jaananaa hi yog hai..aur nashwar sansaar ki chijo ko apana mananaa viyog hai..


mere shishyon  ko   hart ataik  nahin hoga, haai bi pi / lo bi pi  nahin hoga.. ..aashirvaad mantra chaalu karo..

deviyan maataon ko  sijeriyan  ka operation nahin karana pade ..….bheem jaise bheem ko kunta maharani aaram se janam deti yahan kharagosh chhaap bachcho ke liye pet katavana bade sharm ki baat hai..
10-12 gram gaay(desi) ke gobar ka gomay-ras nikalo.. guru mantra  jap kar ke athava narayan narayan jap kar ke us mahila ko de do.. ek ghnte men nahin hota to vapis pila do..pila diya to aaram se prasuti hoti hai..

maaiyan … deviyan … kabhi bhi masik dharam sambandhi bimariyon ke liye alopathi  davai nahin lena…rat ko  taambe ke bartan men 4 glaas pani rakh do(frize men nahin, aise hi sada )subah  pi lo..ghumo…hari ॐ ka jap karo..to aisi beemari bhagti ki jaise ram ji ka teer dekh ke paap bhaag jaate, daitya bhaag jaate … :) aisa faayda hoga..

jinhon ne mantra diksha liya hai un ko  33 prakar ke adhyatmik faayde hote hi hai ..aur dusare kai an-ginat faayde hote jaise roji roti men barakat, be-rojagaar ko nokari mil jaati, ghar parivar ke jhagade  sab mit jaate.. koi samasya hai to swapne men maargadarshan milta.. aise anaginat faayde hote…

mere saadhak ko baay – paas surgery  nahin karana hai,ahamadabad athava delhi aashram men faon kar ke maargadarshan le le ..to baay -paas sarjari  kiye bina aise hi blokej  khul jayega…
mere shishyon ko motiyabindu ka opareshan kabhi nahin karana hai..
motiya bindu hai to neeta vaidya se faon par athava aise hi maargadarshan le le …athava aashram men faon par maargadarshan le le ..bina opareshan ka ek maheene men vishesh netra bindu daalne se motiya bindu theek hoga…

mere saadhako pe jhoothe case nahin tik sakte..mantra dete hai ..to jhoothe kes se , ya musibat tanaav hai to kisi ko fi dene ki, ghus dene ki koi jarurat nahin… mantra jaap karo , mukadame baaji  se aaram mil jaayega..

mere saadhako ko bhagavaan ko  paane ke sivaay kisi cheej men mahatatva budhdi nahin rakhani chaahiye…
koi bhi cheej milegi to chhut jaayegi, maut sab chhuda degi, lekin bhagavaan ki bhakti athava bhagavaan ka svaroop kabhi nahin chhutata hai..
hariiiiiiiiii oooooooooooommmmmmmmmmmmmm

kaisa bhi bhagya toota futa hai , tabiyat gadbad ho , log kuch bhi kahete ho.. jyada nahin to kam se kam 15 minat ye kare to paap taap duahkh daaridrya rog shok ko haranevaale chanchalta malinta ko haranevala sukh shanti  ko bharanevala hari naam ka uchchaaran karo..

bhaya nashan duramati haran
kali men hari ko nam
nishadin saadhak jo jape
safal hovai sab kaam
hari hari oooooooooooommmm hari ॐ


jis ne dharm ka aashray liya hai, us ke andar men anuchit jagah pe jaane par sanyam karne ki reet aa jaati hai .. anuchit bolna, anuchit khana, anuchit karana- us men brek lagane ki taakad ka nam hai dharm…
jo patan se bachaaye vo dharam hai.
dharm arthat- jo saare vishva ko  dhaaran kare , yahan aur paralok men abhyudaya kare us ka nam hai dharm!

yato abhyudaya nishreya  sidhdi sa-dharm

vaisheshik darshan shasr  kaheta hai –  jis se is lok men duahkh- daridrata, musibate chali jaaye, aur paralok men bhi sadagati  aur paramatm prapti ho jaaye is ka nam hai dharm !

narad ji kahete :- maha purushon  ke aagya  ke anusaar karm karana, mahapurushon se priti  rakhna aur mahapurushon ke sanpark men aana ye dharm ke prasad ko  sahaj men pragat kar deta hai …

paramaatm shanti se dosho ki nivrutti hoti hai…
paramaatm shanti se bhagy ki rekhaye badalati hai..
paramaatm shant se paramaatm samarthy aata hai..
paramaatm gyan se sukh dukh me samataa aati hai.
paramaatm sumiran se raag dwesh irsha shant hoti hai..

paramaatma ke pyare santo ke sampark se prema bhakti ka rasaswad milataa hai…

bhakti sakal sadhan kar mulaa
mil hi jo hoye sant anukula

sabhi sukhad sadhano ka mul hai bhagavaan ki bhakti.sant bhakt anukul ho to bhagavan ki bhakti ka aswadan milataa hai..

dhan to veshyaon ke paas, kinnaro ke paas, lopharo ke paas bhi hota hai…dhan hona badi baat nahi..satta hona badi baat nahi…lekin jin ki bhagavan me bhakti hai aise santo ka sang hona bahot badi baat hai…bhagavan ki priti ka sadgun, bhagavan ke pyare santo ke sang ka sadgun bhagy ke kathin ank ko bhi mita deta hai…


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गुरु की आवश्यकता क्यों ?— स्वामी श्रीअखंडानंदजी सरस्वती

यूँ तो प्रत्येक ज्ञान में गुरु की अनिवार्य उपयोगिता है परंतु ब्रह्मज्ञान के लिए तो दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। गुरु के बिना उपासना-मार्ग के रहस्य मालूम नहीं होते और न उसकी अड़चनें दूर होती है। जो उपासना करना चाहता है, वह गुरु के बिना एक पग भी नहीं बढ़ सकता। गुरु के संतोष में ही शिष्य की पूर्णता है। एक दृष्टांत कहता हूँ – मेरे बचपन का एक मित्र था। हम दोनों वर्षों से मिले नहीं किंतु पत्र-व्यवहार चलता था। एक बार मैं उसके घर गया पर उसने पहचाना नहीं। मैंने अपना नाम नहीं बताया और उसके साथ खुला व्यवहार करने लगा। वह तो हैरान हो गया। इतने में किसी ने मेरा नाम ले दिया तो आकर गले से लिपट गया। अब देखो कि मैं उसके सामने प्रत्यक्ष था परंतु नेत्रों के सामने होना एक बात है और पहचानना दूसरी वस्तु है।

हमारा आत्मा जो ब्रह्म है, हमसे कहीं दूर नहीं है। सदा सोते-जागते, उठते-बैठते अपने साथ है। यह नित्य प्राप्त है। इसमें वियोग की सम्भावना नहीं है। परंतु ऐसे नित्य प्राप्त आत्मा को हम पहचान नहीं रहे हैं। यदि इसमें स्थित होने से इसकी पहचान होती तो सुषुप्ति में, समाधि में हो जाती। पास रहते हम इसे पहचान नहीं रहे हैं तो बताने वाले की आवश्यकता है। जब तक कोई बतायेगा नहीं कि ‘वह ब्रह्म तो तू ही है’ तब तक उसका ज्ञान नहीं होगा।

उस ब्रह्म को आत्मरूप से जानने के लिए साधन-सम्पन्न जिज्ञासु हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु की शरण में जाय।


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सच्चे हितैषी हैं सदगुरू – संत रज्जबजी

इस सम्पूर्ण संसार में जितने भी प्राणी पुण्यकर्म करते हैं, वे सभी संतों का ज्ञानोपदेश सुन के ही करते हैं। अतः संसार में जो कुछ भी अच्छापन है वह सब संतों का ही उपकार है।

स्थूल और सूक्ष्म शरीर से परे अपने निजस्वरूप घर को प्राप्त करने का विचार गुरू बिना नहीं मिलता। गुरू बिना परमेश्वर के ध्यान की युक्ति नहीं मिलती और हृदय में ब्रह्मज्ञान भी उत्पन्न नहीं हो सकता। जैसे पथिक पंथ बिना किसी भी देश को नहीं जा सकता, वैसे ही साधक ब्रह्मज्ञान बिना संसार दशा रूप देश से ब्रह्म स्थिति रूप प्रदेश में नहीं जा सकता। सम्पूर्ण लोकों में घूमकर देखा है तथा तीनों भुवनों को विचार द्वारा भी देखा है, उनमें साधक के ब्रह्म-आत्म विषयक संशय को नष्ट कर सके ऐसा सदगुरू बिना कोई भी नहीं।

साधन-वृक्ष का बीज सदगुरू वचन ही है। उसे साधक निज अंतःकरणरूप पृथ्वी में बोये व विचार-जल से सींचे तथा कुविचार-पशुओं से बचाने रूप यत्न द्वारा सुरक्षित रखे तो उससे मनोवांछित (परम पद की प्राप्तिरूप) फल प्राप्त होगा।

जो गुरुवचनों को प्रेमपूर्वक हृदय में धारण करता है, वह अपने जीवनकाल में सदा सम्यक् प्रकार का सुख ही पाता है। सदगुरू का शब्द प्रदान करना अनंत दान है। वह अनंत युगों के कर्मों को नष्ट कर डालता है। सदगुरू के शब्दजन्य ज्ञान से होने वाले पुण्य से अधिक अन्य कोई भी धर्म नहीं दिखता। इस संसार में गुरू के शब्दों द्वारा ही जीवों का उद्धार होता है, सम्पूर्ण विकार हटकर परमेश्वर का साक्षात्कार होता है।

जैसे सूर्य ओलों को गलाकर जल में मिला देता है ,ओले होकर भी जल अपने जलरूप को नहीं त्याग सकता, वैसे ही सदगुरू जीवात्मा के अज्ञान को नष्ट करके ब्रह्म से मिला देते हैं, जीवात्मा में अज्ञान आने पर भी वह अपने चेतन स्वरूप का त्याग नहीं कर सकता।

गुरूदेव की दया से सुंदर ज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, जिसके बल से साधक प्रकटरूप से भासने वाले मायिक संसार को मिथ्यारूप से पहचानता है और जिसे कोई भी अज्ञानी नहीं देख सकता उस गुप्त परब्रह्म को सत्य तथा अपना निजस्वरूप समझकर पहचानता है।

गुरु गोविन्द की सेवा करने से शिष्य सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से पूर्ण हो जाता है, उसकी सब प्रकार की कमी उसके हृदय से उठ जाती है। जन्मादिक दुःख नष्ट हो जाते हैं और आशारूपी दरिद्रता भी सम्यक् प्रकार से दूर हो जाती है।

सदगुरू आकाश के समान हैं और गुरू-आज्ञा में रहने वाले शिष्य बादल के समान हैं। नभ-स्थित बादल में जैसे अपाल जल होता है, वैसे ही गुरू आज्ञा में रहने वाले शिष्यों में अपार ज्ञान होता है, उन्हें कुछ भी कमी नहीं रहती है।

जिस प्रकार वनपंक्ति के पुष्पों में शहद छिपा रहता है, वैसे ही शरीराध्यास में मन रहता है। जैसे शहद को मधु-मक्षिका निकाल लाती है, वैसे ही गुरू मन को निकाल लाते हैं। वह जो मन की छिपी हुई स्थिति है उससे भी मन को गुरू निकाल लाते हैं, अतः मैं गुरूदेव की बलिहारी जाता हूँ।

ईश्वर ने जीव को उत्पन्न किया किंतु शरीर के राग में बाँध दिया, इससे वह दुःखी ही रहा। फिर गुरूदेव ने ज्ञानोपदेश द्वारा राग के मूल कारण अज्ञान को नष्ट करके राग-बंधन से मुक्त किया है और परब्रह्म से मिलाया है। अतः इस संसार में गुरू के समान जीव का सच्चा हितैषी कोई भी नहीं है।

– संत रज्जबजी

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One Comment on “गुरु की आवश्यकता क्यों ?”

  1. Rajesh Says:

    i like above word very much


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