अब्दुल रहीम खानखाना

अब्दुल रहीम खानखाना अकबर के नवरत्नों में से एक थे।

एक प्रकार से वे अपनी रियासत के राजा ही थे

परंतु हृदय के रहीम (दयालु) थे।

वे मुसलिम थे फिर भी भगवान श्रीकृष्ण को अपना इष्टदेव मानते थे।

सन् 1593 की एक घटित घटना है।

अकबर ने उन्हें दक्षिण भारत में राज्य-विस्तार के लिए भेजा।

रहीम की शूरवीरता देखकर शत्रु राजा ने उनको संदेशा भेजा

कि आप मेरे यहाँ पधारो न भोजन करने ! हम मित्रता करें।

जिसका हृदय भक्ति, स्नेह से सम्पन्न हुआ हो,

उसे अहंकार बढ़ाकर सत्ता बढ़े ऐसा नहीं लगता।

रहीम के जीवन में श्रीकृष्ण की भक्ति थी इसलिए

उन्होंने आपसी स्नेह बढ़ाने का न्यौता स्वीकार कर लिया।

एक अंगरक्षक को साथ लेकर रहीम उस राजा के यहाँ भोजन करने

गये। किले के फाटक के आगे एक बालक खड़ा था,

वह बोलाः “ठहरो-ठहरो ! तुम कहाँ जा रहे हो?”

“राजा के यहाँ भोजन करने।”

“नहीं करना भोजन। वापस चले जाओ।”

“ऐ रहीम खानखाना को वापस करने वाले बच्चे !

अभी अक्ल के कच्चे हो। मैंने मित्र को वचन दिया है।”

“फिर भी नहीं जाओ”

“अरे, तुम बोलते हो तो क्या है? कोई रास्ते चलने वाला बच्चा बोल दे-

‘ऐसा नहीं करो’ तो क्या मैं मानने वाला हूँ?

मैं अपने सलाहकारों की भी बात इतनी जल्दी नहीं मानता हूँ

तो रास्ते जानेवाले बच्चे की मानूँगा?”

बच्चा समझाता गया और रहीम सुनकर आश्चर्य करते गये।

बोलेः “तुम इतना आग्रह क्यों कर रहे हो कि मैं भोजन करने न जाऊँ?

राजा ने मैत्री के लिए हाथ बढ़ाया है तो हम तो मैत्री में मानते हैं।”

“भले किसी मैत्री-वैत्री में मानो लेकिन मैं बोलता हूँ

भोजन करने मत जाओ। राजा ने  भोजन में विष मिला दिया है।”

“क्या?”

“हाँ।”

“मैंने वचन दिया है कि मैं भोजन करने आऊँगा।

बच्चों की बातें मानकर मैं दिया हुआ वचन तोड़ दूँ और झूठा पडूँ?”

“झूठे पड़ो तो लेकिन भोजन करने मत जाओ।

काहे को जा रहे हो मरने?”

रहीम ने दोहा उच्चाराः

अमीं पियाबत मान बिनु, रहिमन हमें न सुहाय।

मान सहित मरिबौ भलौ, जो विष देय पिलाय।।

“यदि कोई बिना मान के अर्थात् बेमन से बुलाकर अमृत पिलाय

तो इस प्रकार अपमानित होना हमें नहीं भाता।

इसके विपरीत यदि कोई शत्रु आदररहित, प्रेमसहित विष भी पिला दे

तो उसे पीकर मरना ज्यादा ठीक समझते हैं।

राजा ने प्रेमपूर्वक मित्रता का हाथ बढ़ाया है

तो अब चाहे विष भी दे दे, कोई बात नहीं। मैं तो जाऊँगा।”

“अरे ! क्या जाऊँगा-जाऊँगा? जब मैं बोलता हूँ मत जाओ।”

“ऐ बालक ! इतना अधिकारपूर्वक कैसे बोलता है?

मैं तेरी आज्ञा मानने वाला नहीं हूँ।”

“मेरी आज्ञा क्यों नहीं मानोगे? माननी पड़ेगी।”

“रास्ते जानेवाला बच्चा और रहीम से आज्ञा मनवा ले !

बालक ! तू मेरा क्या लगता है कि मैं तेरा आदेश मानूँ?

बालक ! तू मेरा क्या लगता है मैं तेरा आदेश मानूँ?

क्या तू मेरा इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण है,

जो दिया हुआ वचन मैं तोड़ूँ और तेरी बात मानूँ?”

“अगर मैं श्रीकृष्ण ही होऊँ तो?”

“फिर तुम्हारी बात मानूँगा।”

“तो मैं श्री कृष्ण हूँ, बात मान लो।”

“नहीं, बालक रूप में हम विश्वास नहीं करते, प्रकट होकर दिखाओ।”

रास्ता रोकने वाला नन्हा-मुन्ना बालक अपने असली रूप से प्रकट हुआ।

भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य विग्रह देखकर रहीम घोड़े पर से उतर कर

भगवान के चरणों में गिरे तो श्रीकृष्ण अंतर्ध्यान हो गये।

भगवान भक्त के लिए कितना वात्सल्य छलकाते हैं।

क्या प़ड़ी थी? नहीं मानता था तो मुआ जाय।

पर नहीं। आखिर नहीं जाने दिया तो नहीं जाने दिया।

रहीम ने किले पर चढ़ाई कर दी और देखते-ही-देखते

उस धोखेबाज राजा को बंदी बना कर अपने सामने बुलाया।

रहीम बोलेः “क्यों ! दोस्ती का हाथ बढ़ाते-बढ़ाते मुझे

जहर देकर मारने की साजिश !”

राजा चकित हो गया।

रहीमः “आपने मित्रता की बात कही थी

तो मैं आपको मृत्युदंड तो नहीं दूँगा लेकिन धोखा !”

राजाः “मेरा तो अपराध है लेकिन यह आपको पता कैसे चला?

मैंने अपने विश्वासू रसोईये से खाना बनवाया

और जहर देने की बात उसको भी पता न चले ऐसी

मैंने व्यवस्था की थी। आपको किसने बताया?”

“छोड़ो इस बात को।”

“नहीं। भले ही आप मुझे मृत्युदंड दे दो लेकिन यह बात तो मुझे कहो।”

रहीम बोलेः “जो सर्वेश्वर है, परमेश्वर है, प्राणिमात्र का अंतरात्मा है

उसको मैं कृष्णरूप में नवाजता हूँ, उसी का मैं सिजदा करता हूँ।

वही बालक होकर आया क्योंकि अंदर की आवाज तो मैं मानने को

तैयार नहीं था। मैंने बालक रूप में उसकी बात नहीं मानी,

तब श्रीकृष्ण ने प्रकट रूप में आदेश दिया तो हमें

उसकी बात माननी पड़ी। कैसे हैं इष्टदेव !”

“रहीम ! आपने श्रीकृष्ण की भक्ति का मर्म जाना है।

अब चाहे आप मुझे मृत्युदंड दो या जीवनदान दो

लेकिन अब यह जीवन श्रीकृष्ण के लिए है।”

“आपका जीवन श्रीकृष्ण के लिए है तो मैं आपके लिए और

आप मेरे लिए।” रहीम ने राजा को गले लगा लिया

और दोनों उस दिन से सच्चे मित्र बन गये।

रहीम बड़े उच्चकोटि के भक्तकवि थे।

उन्होंने भगवदभक्ति, नीति आदि अनेक विषयों पर सागर्भित दोहे

रचे जो समाज में आज भी लोकप्रिय हैं।

रहीम कहते हैं-
रहिमन मन ही लगाय के, देखि लऊकिन कोय।

नर को बस करीबौ कहाँ, नारायण बस होय।।

रहिमन रोइबो कौन विधि, हँसिबो कौन विचार।

गये सो आवन को नहीं, रहे सो जावनहार।।

इस संसार के लिए हँसना रोना क्या?

प्रीतम छवि नैनन बसी, पर छवि कहाँ समाय।

भरी सराय रहीम लखि, पथिक आप फिरि जाय।।

एक बार इन आँखों में प्रियतम बस गया

तो वहाँ किसी और के लिए कोई स्थान नहीं रहता।

सराय में स्थान नहीं होता तो लोग स्वतः ही लौट जाते हैं।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

(पूज्य बापूजी के सत्संग प्रवचन से)

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