पंचदशी के रचेएता की बोधप्रद कथा

24 एप्रिल 2012 shaam ; काशी सत्संग अमृत

एक बाबा थे जो  वृन्दावन में रहेते थे..गायत्री मंत्र का अनुष्ठान किया..साल -2 साल-3साल -12 साल बीत गये..बाबा ने देखा की कोई फ़ायदा नही हुआ…चमत्कार नही हुआ..कोई विशेषता का अनुभव नही हुआ..अब क्या करे?

बाबा का नाम था माधवाचार्य  स्वामी…13 वर्ष गायत्री मंत्र के अनुष्ठान करने के बाद भी कोई विशेष अनुभव नही हुआ तो किसी ने कहा की तुम वाराणसी चले जाओ..

अभी हम वाराणसी में ही तो बैठे है.. :)

तो बाबा वाराणसी आए..माधवाचार्य  स्वामी इधर उधर साधु संतों में घूमते हुए एक अघोरी बाबा के पास जा  पहुँचे..

अघोरी बाबा ने कहा, तुम जो गायत्री-वायत्री करते हो , छोड़ दो…मैं तुम को मंत्र देता हूँ..

शिव महिम्न स्त्रोत्र में आता है की :

महिशानाम परो देवों महिमानम  परास्तुति..

अघोरानाम  परो मंत्रो नास्ति तत्वों गुरु परम..

तो अघोरी ने कहा की मैं तुम को मंत्र देता हूँ..एक महीने में चमत्कार हो जाएगा..माधवाचार्य स्वामी ने अघोरी का मंत्र ले लिया..1 महीना पूरा हुआ..आवाज़ आई : मैं प्रसन्न हूँ..प्रसन्न हूँ..वरदान माँग लो!

माधवाचार्य  स्वामी बोले : आप कौन है सामने प्रगट होने की कृपा करे..तब मैं वरदान माँगूंगा..

बोले : तुम ने 13 साल जप किया है..जो भी भगवन नाम जप करते उन के मुख मंडल पे अध्यात्मिक आभा ऐसी छा जाती है की लौकिक ढंग से नही दिखती है..लेकिन आधीदैविक जगत में उस का प्रभाव पड़ता है.. तो उस के प्रभाव में हम सामने प्रगट नही हो सकते..

माधवाचार्य स्वामी बोले : मैं ने गायत्री मंत्र का जप किया है , उस के प्रभाव से तुम प्रगट नही हो सकते तो अब तुम से हम ये पुछते है की हम ने गायत्री जप किया तो हम को कुछ चमत्कार क्यूँ अनुभव नही हुआ?..ये बताने की कृपा करो..

बोले : तुम जब तक गायत्री मंत्र का जप कर रहे थे वो तुम्हारे पूर्व के प्रारब्ध को काट रहा था..

आप जप ध्यान करते और कोई अनुभव ना होता तब भी जप ध्यान चालू रखना चाहिए…क्योकी ये जप ध्यान तुम्हारे पूर्व के दुष्कृतों को हारते हुए, अंतकरण की मलिनता मिटाते हुए, पाप राशि दोष मिटाते हुए जब शुध्दी होती है तब उस मंत्र का देवता, मंत्र की दिव्यता प्रगट होती है.. तो अब आप वृंदावन में जा कर जप चालू करोगे तो कुछ  ही समय में आप को मंत्र शक्ति का प्रकाश, ज्ञान , दिव्य प्रेरणा  होगी..

वो बाबा वाराणसी छोड़ के वापस वृंदावन चले गये.. और उन को अंतर प्रेरणा हुई…जड़ी बूटियों का ज्ञान  होने लगा..और उन्हों ने एक ग्रंथ लिखा: “माधव निदानम्” ..यह आयुर्वेद में बहुत प्रसिध्द ग्रंथ है..

ऐसे ही एक महाराज थे..आयु के 24 साल तक वाराणसी में रहे..विद्यार्जन किए ..फिर अपने गुजरात गये…माँ बाप शादी के लिए कन्या खोजते लेकिन दरिद्र  माँ-बाप दरिद्र कन्या खोजे कब और कब शादी होगी?..महाराज ने कहा की मैं गायत्री देवी का पुरशचरण करता हूँ 6 महीने का..माँ गायत्री प्रगट होगी..संपत्तिवान होने का वरदान ले लूँगा..एक अनुष्ठान, 2 अनुष्ठान ऐसे करते करते काई अनुष्ठान हो गये..माताजी तो प्रगट नही हुई..12 साल में बाबा ने 23 अनुष्ठान कर डाले.. अब वो 24 साल के विद्यार्थी 36 साल के हो गये..अब उन को वैराग्य आ गया..की अब 36 साल के बाद माताजी आ भी गयी , वरदान भी दे दिया तो क्या करूँगा?..उस महाराज ने संन्यास ले लिया..बाबा ने संन्यास ले लिया और ज्यूँ ही पूर्वाभिमुख हो कर अर्घ्य देने गये तो सामने प्रकाश प्रकाश छा गया.. “वरम बृहयात!”

महाराज बोले :माँ ! अब वरदान की क्या ज़रूरत ? अब तो हम संन्यासी हो गये..अब तो भिक्षा कही भी मिल जाएगी..निवास कही भी मिल जाएगा..जब हम ने इतने 23 अनुष्ठान किए तब क्यूँ नही प्रगट हुई माँ ?

माँ  बोली : विदयारण्य  पिछे मूड कर देखो!

पिछे  मूड कर देखा तो बड़े बड़े काले काले भयंकर  अकराल विकराल पहाड़ जैसी 23 आकृतियाँ देखी..

माँ बोली की 23 ब्रम्‍ह हत्यायें तुम्हारे एक एक पुरशचरण से समाप्त हुई.. जब तुम ने संन्यास लिया तो अब तुम्हारा पुण्य शुरू हुआ..इसलिए मैं आ गयी..

विदयारण्य महाराज बोले : मैय्या मुझे तो अब शादी वादी नही करनी..

माँ  बोली : तो तुम्हारी विद्या तुम्हे फलेगी..

विदयारण्य  स्वामी इतने प्रसिध्द विद्वान हुए की उन्होने पंचदशी नाम का ग्रंथ लिखा..उस में 5 और 10 याने 15 अध्याय है..उस का 7 वाँ प्रकरण मेरे गुरुजी ने किसी को पढ़ने को दिया और मेरे को संकेत किया , “सुन”…

‘किमीच्छ कास्य कामाय शरीर मन सज्जयेत…’

उस की व्याख्या सुनते सुनते गुरु की कृपा ऐसी हजम हुई की हमारा जीवत्व बाधित हो गया और हमारा ब्रम्हत्व …

ब्राम्‍हि स्थिति प्राप्त कर

कार्य रहे ना शेष…गुरुवर..

कार्य रहे ना शेष

मोह  कभी ना ठग सके

इच्छा नही लवलेश

पूर्ण गुरु कृपा मिली,पूर्ण गुरु का ज्ञान

आंसुमल  से हो गये साँई आशाराम

तो आप के काशी के विद्यार्थी अनुष्ठान किए, विदयारण्य स्वामी बने..उन के ग्रंथ का फ़ायदा मुझे मिला..और मुझे जो फ़ायदा मिला वो दुनिया के 167 देश में सत्संग सुन के लोग लाभ ले रहे है.. हिन्दुस्तान में कई जगहों पर लोग सुन रहे..

तो आप जो जप तप करते है, पूजा पाठ करते है उस में धैर्य रखे..वो व्यर्थ्य नही जाता…जब आप छूप के भी अशुभ कर्म करते तो वो भी आप को फल दिए बिना नहीं  छोड़ता तो आप जप तप ध्यान को महत्व बुध्दी से करे..

मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा

मंत्र जाप और दृढ़ विश्वास यह भक्ति का पाँचवा सोपान है..

मैं तुम को इस युग में घर बैठे सिध्दी और महान अनुभूतियाँ हो ऐसी साधना बता सकता हूँ..

हम ने दूध पर रहे के 40 दिन का अनुष्ठान किया..मौन, ध्यान, सतसाहित्य पढ़ना ,जप करना..ऐसी अनुभूतियाँ  हुई और ऐसे खजानों की कुंजियाँ मिली की 42 साल से बाट रहा हूँ..अभी तक कुछ  खुटता ही नही..ये आप लोग बैठे है तो मेरा भाषण सुनने के लिए इतने लोग इकठ्ठा नही हो सकते.. हम आते..दृष्टि डालते.. तो ईश्वर प्रसादज़ा के कुछ  कण बिखेरते…आप लोगों का मन पवित्र होने लगता है..तसल्ली होती और आप को लाभ होने लगता है..

विवेकानंद बोलते थे की लोग आप के लचकेदार भाषा के लिए नही बैठेंगे ;  वाणी के पिछे  आप की साधना है, एकाग्रता है, उपासना है, तपस्या है इसलिए बैठते है…

********

कबीर जी के पास काशी के विद्वान गये..की “हम तो न्यायाचार्य, विशेषाचार्य आदि..हमारे पास 5-15 आदमी आते तो 2-4 उठ जाते..तुम्हारे पास ऐसा क्या है की जो लोग आते, तुम्हारे हो जाते?..”

कबीर जी बोले, “पंडितों तुम्हारे पास रटा-रटाया शास्त्रो का बोज़ा है..मेरे पास भगवत रस का झरना है..इसलिए जिस को भगवत रस चखने को मिल जाता फिर वो रटारटीवालों के यहा टिकता नही..बात मेरी कड़क लगेगी, लेकिन सच्चाई ये है..”

पंडित वाद वदंती झूठा..

राम रहीं कहे जो राम मिले

मिशरी कहे होये मुँह मीठा

कबीर जी ने सुना दिया … अकेले कबीर चिल्ला रहे है..काशी तो पंडितों का घर है ..पंडितों का और कबीर जी का खूब विरोध चलता था…लेकिन अभी भी कबीर जी को और काशी के पंडितों को सभी को धन्यवाद है..क्योकी उन का वाद विवाद भी भगवान प्राप्ति के रास्ते में साधको के लिए तो शुभ हो गया..कबीर भिड़े तो भी साधकों के लिए शुभ हो गया..

कल्पना करो..बाजार में एक लाइन में दुकाने होती तो सामने की लाइन में भी दुकाने होती है..बीच में बाजार होती है..तो आमने सामने मिठाई की दुकान थी..ये उस को ग्राहकों को इशारा करे, वो इस के ग्राहकों को इशारा करे..एक दिन दोनो आपस में भीड़ गये…बात बात में एक ने दूसरे को मारा लड्डू..तो उस ने भी अपनी दुकान से लड्डू फेंका..कोई लड्डू दुकान को लगे कोई रास्ते में गिरे..आने-जाने वाले यात्रियों के लिए, भीख माँगे, गायों के लिए तो मज़ा आ गया..बोले तुम खूब फेंको भाई.. :)  लड्डू ख़तम हुए बालूशाही फेंके..फिर मावे और रसगुल्ले फेंकने लगे.. एक दूसरे को मारते जाए दुकान की ओर  और सुनाते जाए..मिठाइयाँ  एक दूसरे को लगे ना लगे लेकिन आने जाने वालों के लिए तो निहाल हो गया..

ऐसे कबीर जी और पंडितों के वाद विवादों के तीर एक दूसरे को लगे ना लगे लेकिन काशी के भक्तों के लिए तो मौज हो गयी होगी! :)

ॐ शांती ।

श्री सद्गुरुदेव जी भगवान की महा जयजयकार हो !!!!!

गलतियों के लिए प्रभुजी क्षमा करें …..

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

**********

ek baabaa the jo vrudaavan men rahete the..gaayatri mantr kaa anushthaan kiyaa..saal -2 saal-3saal -12 saal bit gaye..baabaa ne dekhaa ki koyi phayadaa nahi huaa…chamatkaar nahi huaa..koyi visheshataa kaa anubhav nahi huaa..ab kyaa kare?
baabaa kaa naam thaa maadhawaachaary swaami…13 varsh gaayatri mantr ke anushthaan karane ke baad bhi koyi vishesh anubhav nahi huaa to kisi ne kahaa ki tum vaaraanasi chale jaao..
abhi ham vaaraanasi men hi to baithe hai.. :)
to baabaa vaaraanasi aaye..maadhavaachaary swaami idhar udhar saadhu santo ke paas ghumate huye ek aghori baabaa ke paas jaa pahunche..
aghori baabaa ne kahaa, tum jo gaayatri-vaayatri karate ho , chhod do…main tum ko mantr detaa hun..
shiv mahimn strotr men aataa hai ki mahishaa naam paro devom mahimonaam paraastuti..aghoraanaam paro mantro naasti tatvom guru param..

to aghori ne kahaa ki main tum ko mantr detaa hun..ek mahine men chamatkaar ho jaayegaa..maadhawaachaary swaami ne aghori kaa mantr le liyaa..1 mahinaa puraa huaa..aawaaj aayi : main prasann hun..prasann hun..vardaan maang lo!
maadhavaachaary swaami bole : aap kaun hai saamane pragat hone ki krupaa kare..tab main vardaan maangungaa..
bole : tum ne 13 saal jap kiyaa hai..jo bhi bhagavan naam jap karate un ke mukh mandal pe adhyaatmik aabhaa aisi chhaa jaati hai ki laukik dhang se nahi dikhati hai..lekin aadhi davik jagat men us kaa prabhaav padataa hai.. to us ke prabhaav men ham saamane pragat nahi ho sakate..
maadhavaachaary swaami bole : maine gaayatri mantr ka jap kiyaa hai , us ke prabhaav se tum pragat nahi ho sakate to ab tum se ham ye puchhate hai ki ham ne gaayatri jap kiyaa to ham ko kuchh chamtkaar kyun anubhav nahi huaa?..ye bataane ki krupaa karo..
bole : tum jab tak gaayatri mantr kaa jap kar rahe the vo tumhaare purv ke praarabdh ko kaat rahaa thaa..aap jap dhyaan karate aur koyi anubhav naa hotaa tab bhi jap dhyaan chaalu rakhanaa chaahiye…kyo ki ye jap dhyaan tumhaare purv ke dushkruton ko harate huye, antakaran ki malintaa mitaate huye, paap raashi dosh mitaate huye jab shudhdi hoti hai tab us mantr kaa devataa, mantr ki divyataa pragat hoti hai.. to ab aap vrundaavan men jaa kar jap chaalu karoge to kuchh hi samay men aap ko mantr shakti kaa prakaash gyaan divya preranaa hogi..
vo baabaa vaaraanasi chhod ke waapas vrundaavan chale gaye.. aur un ko antar preranaa huyi…jadi butiyon kaa gyaan hone lagaa..aur unhon ne ek granth likhaa: “maadhav nidaanam” ..yah aayurved men bahut prasidhd granth hai..

aise hi ek mahaaraaj the..24 saal vaaraanasi men rahe..phir apane gujraath gaye…maa baap shaadi ke liye kanyaa khojate lekin darirda maa baap daridra kanya akhoje kab shaadi hogi?..mahaaraaj ne kahaa ki main gaayatri devi kaa purascharan karataa hun 6 mahine kaa..maa gaayatri pragat hogi..sampattiwaan hone kaa vardaan le lungaa..ek anushthaan, 2 anushthaan aise karate karate kayi anushthaan ho gaye..maataaji to pragat nahi huyi..12 saal men baabaa ne 23 anushthaan kar daale.. ab vo 24 saal ke vidyaarthi 36 saal ke ho gaye..ab un ko vairaagy aa gayaa..ki ab 36 saal ke baad maataaji aa bhi gayi , vardaan bhi de diyaa to kyaa karungaa?..us mahaaraaj ne sanyaas le liyaa..baabaa ne sansyaas le liyaa aur jyun hi purvaabhimukh ho kar arghya dene gaye to saamane prakaash prakaash chhaa gayaa.. “varam bruhyaat!”
mahaaraaj bole :maa! ab vardaan ki kyaa jarurat ? ab to ham sansyaasi ho gaye..bhikshaa kahi bhi mil jaayegi..niwaas kahi bhi mil jaayegaa..jab ham ne itane 23 anushthaan kiye tab kyun nahi pragat huyi maa?
maa boli : vidyaaranya pichhe mud kar dekho!
pichhe mud kar dekhaa to bade bade kaale kaale bhayanakar akraal vikraal pahaad jaisi 23 aakrutiyaan dekhi..
maa boli ki 23 bramh hatyaaye tumhaare ek ek purascharan se samaapt huyi..sanyaas liyaa ab tumhaaraa punya shuru huaa..isliye main aa gayi..
maiyyaa mujhe to ab shaadi waadi nahi karani..
maa boli : to tumhaari vidyaa tumhe phalegi..
vidyaaranya swaami itane prasidhd vidwaan huye ki unhone panch dashi naam kaa granth likhaa..us men 5 aur 10 yaane 15 adhyaay hai..us kaa 7 vaan prakaran mere guruji ne kisi ko padhane ko diyaa aur mere ko sanket kiyaa , “sun”…
‘kimichh kasya kaamaay sharir man sujjayet l’
us ki vyaakhyaa sunate sunate guru ki krupaa aisi hajam huyi ki hamaaraa jivatv baadhit ho gayaa aur hamaaraa bramhatv …
braamhi sthiti praapt kar
kaary rahe naa shesh…guruvar..
kaary rahe naa shesh
moh kabhi naa thag sake
ichhhaa nahi lavalesh
purn guru krupaa mili
purn guru kaa gyaan
aasumal se ho gaye
saaii aashaaraam

to aap ke kaashi ke vidyaarthi anushthaan kiye, vidyaaranya swaami bane..un ke granth kaa phaayadaa mujhe milaa..aur mujhe jo phaaydaa milaa vo duniyaa ke 167 desh men satsang sun ke log laabh le rahe hai.. hindusthaan men kayi jagahon par log sun rahe..
to aap jo jap tap karate hai, puja paath karate hai us men dhairy rakhe..vo vyarthy nahi jaataa…jab aap chhup ke bhi ashubh karm karate to vo bhi aap ko phal diye binaa nahi chhodataa to aap jap tap dhyaan ko mahatv budhdi se kare..
mantr jaap mam drudh vishwaasaa
mantr jaap aur drudh vishwaas yah bhakti kaa paanchavaa sopaan hai..
main tum ko is yug men ghar baithe sidhdi aur mahaan anubhutiyaan ho aisi saadhanaa bataa sakataa hun..
ham ne dudh par rahe ke 40 din kaa anushthan kiyaa..maun, dhyaan, saahitya padhanaa ,jap karanaa..aisi anubhutiyaa huyi aur aise khajaanon ki kunjiyaa mili ki 42 saal se baat rahaa hun..abhi tak kuchh khutataa hi nahi..ye aap log baithe hai to meraa bhaashan sunane ke liye itane log ikaththaa nahi ho sakate.. ham aate..drushti daalate.. to ishwaar prasaadajaa ke kuchh kan bikherate…aap logon kaa man pavitr hone lagataa hai..tasalli hoti aur aap ko laabh hone lagataa hai..
vivekaanand bolate the ki log aap ke lachakedaar bhaashaa ke liye nahi baithange, waani ke pichhe aap ki saadhanaa hai, ekaagrataa hai, upaasanaa hai, tapasyaa hai isliye baithate hai…
********

kabir ji ke paas kaashi ke vidwaan gaye..ki “ham to nyaayaachaary, vishwashaachaary aadi..hamaare paas 5-15 aadami aate to 2-4 uth jaate..tumhaare paas aisaa kyaa hai ki jo log aate tumhaare ho jaate?..”

kabir ji bole, “panditon tumhaare paas rataa-rataayaa shaashtron kaa bojaa hai..mere paas bhagavat ras ka jharanaa hai..isliye jis ko bhagavat ras chakhane ko mil jaataa phir vo rataa rati waalon ke yahaa tikataa nahi..baat meri kadak lagegi, lekin sachchaayi ye hai..”

pandit vaad vadanti jhuthaa..
raam rahim kahe jo raam mile
mishri kahe hoye munh mithaa

akele kabir chillaa rahe hai..kaashi to panditon kaa ghar..panditon ka aur kabir ji ka khub virodh chalataa thaa…lekin abhi bhi kabir ji ko aur kaashi ke panditon ko sabhi ko dhanywaad hai..kyo ki un kaa vaad vivaad bhi bhagavaan praapti ke raaste men saadhako ke liye to shubh ho gayaa..kabir bhide to bhi saadhakon ke liye shubh ho gayaa..
kalpanaa karo..bajaar men ek line men dukaane hoti to saamane ki line men bhi dukaane hoti hai..bich men bajaar hoti hai..to aamane saamane mithaayi ki dukaan thi..ye us ko graahakon ko ishaaraa kare, vo is ke graahakon ko ishaaraa kare..ek din dono aapas men bhid gaye…baat baat men ek ne dusare ko maaraa laddu..to us ne bhi apani dukaan se laddu phenkaa..koyi laddu dukaan ko lage koyi raaste men gire..aane-jaane waale yaatriyon ke liye, bhikh mange, gaayon ke liye to majaa aa gayaa..bole tum khub phenko bhaai.. :) laddu khatam huye baalushaahi phenke..phir maave aur rasgulle phenkane lage.. ek dusare ko maarate jaaye dukaan ki aor aur sunaate jaaye..mithaayiyaa ek dusare ko lage naa lage lekin aane jaane waalon ke liye to nihaal ho gayaa..
aise kabir ji aur panditon ke vaad vivaadon ke teer ek dusare ko lage naa lage lekin kaashi ke bhakton ke liye to mauj ho gayi hogi! :)
**********

 OM SHAANTI.

SHRI SADGURUDEV JI BHAGAVAAN KI MAHAA JAYJAYKAAR HO!!!!!

Galatiyon ke liye Prabhuji kshamaa karen….

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2 Comments on “पंचदशी के रचेएता की बोधप्रद कथा”

  1. neelkamal Says:

    ye sewa to wakai kaabiletaarif hai………:D

  2. dau Dayal Says:

    i want to read this


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